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अंग 145

अंग
145
राग माझ
राग: माझ · रचयिता: गुरु नानक देव जी (महला 1)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
जा तुधु भावहि ता करहि बिभूता सिंङी नादु वजावहि ॥
जा तुधु भावै ता पड़हि कतेबा मुला सेख कहावहि ॥
जा तुधु भावै ता होवहि राजे रस कस बहुतु कमावहि ॥
जा तुधु भावै तेग वगावहि सिर मुंडी कटि जावहि ॥
जा तुधु भावै जाहि दिसंतरि सुणि गला घरि आवहि ॥
जा तुधु भावै नाइ रचावहि तुधु भाणे तूं भावहि ॥
नानकु एक कहै बेनंती होरि सगले कूड़ु कमावहि ॥1॥
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।

हिन्दी अर्थ: कई (शरीर पर) राख मलते हैं और कई सिंञी का नाद बजाते हैं। कई जीव कुरान आदि धार्मिक पुस्तकें पढ़ते हैं और अपने आप को मुल्ला व शेख कहलवाते हैं। कोई राजे बन जाते हैं तो कई स्वादिष्ट भोजन बाँटते हैं। कोई तलवार चलाते हैं और गर्दन से सिर अलग हो जाते हैं। कोई परदेस जाते हैं (वहाँ की) बातें सुन के (मुड़ अपने) घर आते हैं। (हे प्रभू ! ये भी आपकी रजा ही है कि कई जीव) आपके नाम में जुड़ते हैं। जो आपकी रजा में चलते हैं वे आपको प्यारे लगते हैं। नानक एक अर्ज करता है (कि रजा में चले बिना) और सारे (जिनका ऊपर जिक्र किया है) झूठ कमा रहे हैं (अर्थात वह सौदा करते हैं जो व्यर्थ जाता है)। 1।
मः 1 ॥
जा तूं वडा सभि वडिआंईआ चंगै चंगा होई ॥
जा तूं सचा ता सभु को सचा कूड़ा कोइ न कोई ॥
आखणु वेखणु बोलणु चलणु जीवणु मरणा धातु ॥
हुकमु साजि हुकमै विचि रखै नानक सचा आपि ॥2॥
नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।

हिन्दी अर्थ: महला 1॥ अर्थ: जब (ये बात ठीक है कि) आप बड़ा (प्रभू जगत का करतार है, तो जगत में जो कुछ हो रहा है) सब आपका ही बडप्पन है। (क्योंकि) अच्छे से अच्छाईआं ही उत्पन्न होतीं हैं। (जब ये यकीन बन जाए कि) आप ही सच्चा प्रभू सृजनहार है (तो) हरेक जीव सच्चा (दिखता है क्योंकि हरेक जीव में आप स्वयं मौजूद है तो फिर इस जगत में) कोई झूठा नहीं हैं सकता। (जो कुछ बाहर दिखावे मात्र दिखाई दे रहा है ये) कहना देखना, ये बोल-चाल, ये जीना व मरना (ये सब कुछ) माया-रूप है। (असलियत नहीं है, असलियत तो प्रभू स्वयं ही है)। हे नानक ! वह सदा कायम रहने वाला प्रभू (अपनी) हुकम (रूपी सत्ता) रच के सब जीवों को उस हुकम में चला रहा है।
पउड़ी ॥
सतिगुरु सेवि निसंगु भरमु चुकाईऐ ॥
सतिगुरु आखै कार सु कार कमाईऐ ॥
सतिगुरु होइ दइआलु त नामु धिआईऐ ॥
लाहा भगति सु सारु गुरमुखि पाईऐ ॥
मनमुखि कूड़ु गुबारु कूड़ु कमाईऐ ॥
सचे दै दरि जाइ सचु चवांईऐ ॥
सचै अंदरि महलि सचि बुलाईऐ ॥
नानक सचु सदा सचिआरु सचि समाईऐ ॥15॥
गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ अगर सच्चे दिल से गुरू का हुकम मानें, तो भटकना दूर हो जाती है। वही काम करना चाहिए, जो गुरू करने के लिए कहे। अगर सतिगुरू मेहर करे, तो प्रभू का नाम सिमरा जा सकता है। गुरू के सन्मुख होने से प्रभू का बंदगी-रूप सबसे बढ़िया लाभ मिलता है। पर मन के पीछे चलने वाला मनुष्य निरा झूठ निरा अंधकार ही कमाता है। अगर सच्चे प्रभू के चरणों में जुड़ के सच्चे का नाम जपें, तो इस सच्चे नाम के द्वारा सच्चे प्रभू की हजूरी में जगह मिलती है। हे नानक ! (जिसके पल्ले) सदा सत्य है वह सच का व्यापारी है वह सच में लीन रहता है। 15।
सलोकु मः 1 ॥
कलि काती राजे कासाई धरमु पंख करि उडरिआ ॥
कूड़ु अमावस सचु चंद्रमा दीसै नाही कह चड़िआ ॥
हउ भालि विकुंनी होई ॥ आधेरै राहु न कोई ॥
विचि हउमै करि दुखु रोई ॥
कहु नानक किनि बिधि गति होई ॥1॥
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 1॥ ये घोर कलियुगी स्वाभाव (मानों) छुरी है (जिसके कारण) राजे जालिम हो रहे हैं (इस वास्ते) धर्म पंख लगा के उड़ गया है। झूठ (मानो) अमावस की रात है, (इसमें) सत्य रूपी चंद्रमा कहीं भी चढ़ा दिखाई नहीं देता। मैं इस चंद्रमा को ढूँढ-ढूँढ के व्याकुल हो गई हूँ, अंधेरे में कोई रास्ता दिखता नहीं। (इस अंधेरे) में (सृष्टि) अहंकार के कारण दुखी हो रही है। हे नानक ! कैसे इससे मुक्ति हो?। 1।
मः 3 ॥
कलि कीरति परगटु चानणु संसारि ॥
गुरमुखि कोई उतरै पारि ॥
जिस नो नदरि करे तिसु देवै ॥
नानक गुरमुखि रतनु सो लेवै ॥2॥
नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।

हिन्दी अर्थ: महला 3॥ इस कलयुगी स्वभाव (-रूपी अंधकार को दूर करने) के लिए (प्रभू की) सिफत सालाह (स्मर्थ) है।(ये सिफत सालाह) जगत में प्रचण्ड प्रकाश है, (पर) कोई (विरला) जो गुरू के सन्मुख होता है (इस प्रकाश का आसरा ले कर इस अंधेरे में से) पार लांघ जाता है। हे नानक ! प्रभू जिस पर मेहर की नजर करता है, उसको (ये कीर्ति रूप प्रकाश) देता है। वह मनुष्य गुरू के सन्मुख हो के (नाम-रूप) रत्न ढूँढ लेता है। 2। नोट: पहला श्लोक गुरू नानक देव जी का है। जिस में उन्होंने सिर्फ सवाल उठाया है कि इस कलियुगी स्वभाव में से जीव की मुक्ति कैसे हो। दूसरे श्लोक में गुरू अमरदास जी ने उक्तर दिया है कि प्रभू की उस्तति, सिफत सालाह ही इससे बचाती है। सो, ये श्लोक उचारने वाले गुरू अमरदास जी के पास गुरू नानक देव जी का उपरोक्त श्लोक मौजूद था। ये बात अनहोनी सी है, कि अकेला यही श्लोक गुरू अमरदास जी को कहीं से बा,सबब् मिल गया होंगे। दरअसल बात ये है कि गुरू नानक देव जी ने अपनी सारी बाणी अपने हाथों लिखी और संभाली हुई गुरू अंगद देव जी को दी। और उन्होंने गुरू अमरदास जी को। (देखें मेरी पुस्तक ‘गुरबाणी और इतिहास बारे’)।
पउड़ी ॥
भगता तै सैसारीआ जोड़ु कदे न आइआ ॥
करता आपि अभुलु है न भुलै किसै दा भुलाइआ ॥
भगत आपे मेलिअनु जिनी सचो सचु कमाइआ ॥
सैसारी आपि खुआइअनु जिनी कूड़ु बोलि बोलि बिखु खाइआ ॥
चलण सार न जाणनी कामु करोधु विसु वधाइआ ॥
भगत करनि हरि चाकरी जिनी अनदिनु नामु धिआइआ ॥
दासनि दास होइ कै जिनी विचहु आपु गवाइआ ॥
ओना खसमै कै दरि मुख उजले सचै सबदि सुहाइआ ॥16॥
गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ (जगत में ये रोज देख रहे हैं कि) भगतों और दुनियादारों का जोड़ नहीं बनता। (पर, जगत-रचना में प्रभू की तरफ से ये कोई कमी नहीं है)। करतार खुद तो कमी छोड़ने वाला नहीं है, और किसी के भुलेखा डालने पर (भी) भुलेखा खाता नहीं (ये उसकी रजा है कि) उसने खुद ही भक्तों को (अपने चरणों से) जोड़ा हुआ है। वे पूर्णतया बंदगी रूपी कार्र-व्यवहार करते हैं। दुनियादारों को भी उसने खुद ही तोड़ा हुआ है। वह झूठ बोल बोल के (आत्मिक मौत का मूल) विष खा रहे हैं। उनको ये समझ ही नहीं आई कि यहां से चले भी जाना है। सो, वह काम-क्रोध रूपी जहर (जगत में) बढ़ा रहे हैं। (उसकी अपनी रजा में) भगत उस प्रभू की बंदगी कर रहे हैं, वह हर वक्त नाम सिमर रहे हैं। जिन मनुष्यों ने प्रभू के सेवकों का सेवक बन के अपने अंदर से अहंकार को दूर किया है, प्रभू के दर पे उनके मुंह उजले होते हैं। सच्चे शबद के कारण वे प्रभू दर पर शोभा पाते हैं। 16।
सलोकु मः 1 ॥
सबाही सालाह जिनी धिआइआ इक मनि ॥
सेई पूरे साह वखतै उपरि लड़ि मुए ॥
दूजै बहुते राह मन कीआ मती खिंडीआ ॥
बहुतु पए असगाह गोते खाहि न निकलहि ॥
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 1 ॥ जो मनुष्य सुबह ही प्रभू की सिफत सालाह करते हैं, एक मन हो के प्रभू को सिमरते हैं। समय सिर (भाव, अमृत बेला में) मन से युद्ध करते हैं (भाव, आलस में से निकल के बंदगी का उद्यम करते हैं), वही पूरे शाह हैं। दिन चढ़े मन की वासनाएं बिखर जाती हैं। मन कई रास्तों से दौड़ता है। मनुष्य दुनिया के धंधों के गहरे समुंद्र में पड़ जाता है। यहां ही इतने गोते खाता है (भाव, फंसता है) कि निकल नहीं सकता।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। गौड़ी राग का विस्तार ग्रंथ का सबसे लम्बा है। गुरु अर्जन की वाणी इसमें प्रमुख है, जो सत्रहवीं सदी के पहले दशक में संकलित हुई।

नानक की रचनाओं में एक खास तरह की आबजर्वेशनल आँख है। एक पटवारी का पेशा छोड़ कर तीस के बाद के दशकों में वो काबुल, मक्का, अरब, असम, श्रीलंका, और तिब्बत की सरहद तक गए। हर जगह संत-फ़क़ीरों, बादशाहों, और साधारण किसानों से बातचीत की, और उसी बातचीत की पर्तें इन शबदों में बैठी हैं।

इस अंग पर 7 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “कई (शरीर पर) राख मलते हैं और कई सिंञी का नाद बजाते हैं।”

एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।