अंग
123
राग माझ
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਹਉ ਵਾਰੀ ਜੀਉ ਵਾਰੀ ਨਾਮੁ ਸੁਣਿ ਮੰਨਿ ਵਸਾਵਣਿਆ ॥
ਹਰਿ ਜੀਉ ਸਚਾ ਊਚੋ ਊਚਾ ਹਉਮੈ ਮਾਰਿ ਮਿਲਾਵਣਿਆ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਹਰਿ ਜੀਉ ਸਾਚਾ ਸਾਚੀ ਨਾਈ ॥
ਗੁਰ ਪਰਸਾਦੀ ਕਿਸੈ ਮਿਲਾਈ ॥
ਗੁਰ ਸਬਦਿ ਮਿਲਹਿ ਸੇ ਵਿਛੁੜਹਿ ਨਾਹੀ ਸਹਜੇ ਸਚਿ ਸਮਾਵਣਿਆ ॥੨॥
ਤੁਝ ਤੇ ਬਾਹਰਿ ਕਛੂ ਨ ਹੋਇ ॥
ਤੂੰ ਕਰਿ ਕਰਿ ਵੇਖਹਿ ਜਾਣਹਿ ਸੋਇ ॥
ਆਪੇ ਕਰੇ ਕਰਾਏ ਕਰਤਾ ਗੁਰਮਤਿ ਆਪਿ ਮਿਲਾਵਣਿਆ ॥੩॥
ਕਾਮਣਿ ਗੁਣਵੰਤੀ ਹਰਿ ਪਾਏ ॥
ਭੈ ਭਾਇ ਸੀਗਾਰੁ ਬਣਾਏ ॥
ਸਤਿਗੁਰੁ ਸੇਵਿ ਸਦਾ ਸੋਹਾਗਣਿ ਸਚ ਉਪਦੇਸਿ ਸਮਾਵਣਿਆ ॥੪॥
ਸਬਦੁ ਵਿਸਾਰਨਿ ਤਿਨਾ ਠਉਰੁ ਨ ਠਾਉ ॥
ਭ੍ਰਮਿ ਭੂਲੇ ਜਿਉ ਸੁੰਞੈ ਘਰਿ ਕਾਉ ॥
ਹਲਤੁ ਪਲਤੁ ਤਿਨੀ ਦੋਵੈ ਗਵਾਏ ਦੁਖੇ ਦੁਖਿ ਵਿਹਾਵਣਿਆ ॥੫॥
ਲਿਖਦਿਆ ਲਿਖਦਿਆ ਕਾਗਦ ਮਸੁ ਖੋਈ ॥
ਦੂਜੈ ਭਾਇ ਸੁਖੁ ਪਾਏ ਨ ਕੋਈ ॥
ਕੂੜੁ ਲਿਖਹਿ ਤੈ ਕੂੜੁ ਕਮਾਵਹਿ ਜਲਿ ਜਾਵਹਿ ਕੂੜਿ ਚਿਤੁ ਲਾਵਣਿਆ ॥੬॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਸਚੋ ਸਚੁ ਲਿਖਹਿ ਵੀਚਾਰੁ ॥
ਸੇ ਜਨ ਸਚੇ ਪਾਵਹਿ ਮੋਖ ਦੁਆਰੁ ॥
ਸਚੁ ਕਾਗਦੁ ਕਲਮ ਮਸਵਾਣੀ ਸਚੁ ਲਿਖਿ ਸਚਿ ਸਮਾਵਣਿਆ ॥੭॥
ਮੇਰਾ ਪ੍ਰਭੁ ਅੰਤਰਿ ਬੈਠਾ ਵੇਖੈ ॥
ਗੁਰ ਪਰਸਾਦੀ ਮਿਲੈ ਸੋਈ ਜਨੁ ਲੇਖੈ ॥
ਨਾਨਕ ਨਾਮੁ ਮਿਲੈ ਵਡਿਆਈ ਪੂਰੇ ਗੁਰ ਤੇ ਪਾਵਣਿਆ ॥੮॥੨੨॥੨੩॥
ਹਰਿ ਜੀਉ ਸਚਾ ਊਚੋ ਊਚਾ ਹਉਮੈ ਮਾਰਿ ਮਿਲਾਵਣਿਆ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਹਰਿ ਜੀਉ ਸਾਚਾ ਸਾਚੀ ਨਾਈ ॥
ਗੁਰ ਪਰਸਾਦੀ ਕਿਸੈ ਮਿਲਾਈ ॥
ਗੁਰ ਸਬਦਿ ਮਿਲਹਿ ਸੇ ਵਿਛੁੜਹਿ ਨਾਹੀ ਸਹਜੇ ਸਚਿ ਸਮਾਵਣਿਆ ॥੨॥
ਤੁਝ ਤੇ ਬਾਹਰਿ ਕਛੂ ਨ ਹੋਇ ॥
ਤੂੰ ਕਰਿ ਕਰਿ ਵੇਖਹਿ ਜਾਣਹਿ ਸੋਇ ॥
ਆਪੇ ਕਰੇ ਕਰਾਏ ਕਰਤਾ ਗੁਰਮਤਿ ਆਪਿ ਮਿਲਾਵਣਿਆ ॥੩॥
ਕਾਮਣਿ ਗੁਣਵੰਤੀ ਹਰਿ ਪਾਏ ॥
ਭੈ ਭਾਇ ਸੀਗਾਰੁ ਬਣਾਏ ॥
ਸਤਿਗੁਰੁ ਸੇਵਿ ਸਦਾ ਸੋਹਾਗਣਿ ਸਚ ਉਪਦੇਸਿ ਸਮਾਵਣਿਆ ॥੪॥
ਸਬਦੁ ਵਿਸਾਰਨਿ ਤਿਨਾ ਠਉਰੁ ਨ ਠਾਉ ॥
ਭ੍ਰਮਿ ਭੂਲੇ ਜਿਉ ਸੁੰਞੈ ਘਰਿ ਕਾਉ ॥
ਹਲਤੁ ਪਲਤੁ ਤਿਨੀ ਦੋਵੈ ਗਵਾਏ ਦੁਖੇ ਦੁਖਿ ਵਿਹਾਵਣਿਆ ॥੫॥
ਲਿਖਦਿਆ ਲਿਖਦਿਆ ਕਾਗਦ ਮਸੁ ਖੋਈ ॥
ਦੂਜੈ ਭਾਇ ਸੁਖੁ ਪਾਏ ਨ ਕੋਈ ॥
ਕੂੜੁ ਲਿਖਹਿ ਤੈ ਕੂੜੁ ਕਮਾਵਹਿ ਜਲਿ ਜਾਵਹਿ ਕੂੜਿ ਚਿਤੁ ਲਾਵਣਿਆ ॥੬॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਸਚੋ ਸਚੁ ਲਿਖਹਿ ਵੀਚਾਰੁ ॥
ਸੇ ਜਨ ਸਚੇ ਪਾਵਹਿ ਮੋਖ ਦੁਆਰੁ ॥
ਸਚੁ ਕਾਗਦੁ ਕਲਮ ਮਸਵਾਣੀ ਸਚੁ ਲਿਖਿ ਸਚਿ ਸਮਾਵਣਿਆ ॥੭॥
ਮੇਰਾ ਪ੍ਰਭੁ ਅੰਤਰਿ ਬੈਠਾ ਵੇਖੈ ॥
ਗੁਰ ਪਰਸਾਦੀ ਮਿਲੈ ਸੋਈ ਜਨੁ ਲੇਖੈ ॥
ਨਾਨਕ ਨਾਮੁ ਮਿਲੈ ਵਡਿਆਈ ਪੂਰੇ ਗੁਰ ਤੇ ਪਾਵਣਿਆ ॥੮॥੨੨॥੨੩॥
हउ वारी जीउ वारी नामु सुणि मंनि वसावणिआ ॥
हरि जीउ सचा ऊचो ऊचा हउमै मारि मिलावणिआ ॥१॥ रहाउ ॥
हरि जीउ साचा साची नाई ॥
गुर परसादी किसै मिलाई ॥
गुर सबदि मिलहि से विछुड़हि नाही सहजे सचि समावणिआ ॥२॥
तुझ ते बाहरि कछू न होइ ॥
तूं करि करि वेखहि जाणहि सोइ ॥
आपे करे कराए करता गुरमति आपि मिलावणिआ ॥३॥
कामणि गुणवंती हरि पाए ॥
भै भाइ सीगारु बणाए ॥
सतिगुरु सेवि सदा सोहागणि सच उपदेसि समावणिआ ॥४॥
सबदु विसारनि तिना ठउरु न ठाउ ॥
भ्रमि भूले जिउ सुंञै घरि काउ ॥
हलतु पलतु तिनी दोवै गवाए दुखे दुखि विहावणिआ ॥५॥
लिखदिआ लिखदिआ कागद मसु खोई ॥
दूजै भाइ सुखु पाए न कोई ॥
कूड़ु लिखहि तै कूड़ु कमावहि जलि जावहि कूड़ि चितु लावणिआ ॥६॥
गुरमुखि सचो सचु लिखहि वीचारु ॥
से जन सचे पावहि मोख दुआरु ॥
सचु कागदु कलम मसवाणी सचु लिखि सचि समावणिआ ॥७॥
मेरा प्रभु अंतरि बैठा वेखै ॥
गुर परसादी मिलै सोई जनु लेखै ॥
नानक नामु मिलै वडिआई पूरे गुर ते पावणिआ ॥८॥२२॥२३॥
हरि जीउ सचा ऊचो ऊचा हउमै मारि मिलावणिआ ॥१॥ रहाउ ॥
हरि जीउ साचा साची नाई ॥
गुर परसादी किसै मिलाई ॥
गुर सबदि मिलहि से विछुड़हि नाही सहजे सचि समावणिआ ॥२॥
तुझ ते बाहरि कछू न होइ ॥
तूं करि करि वेखहि जाणहि सोइ ॥
आपे करे कराए करता गुरमति आपि मिलावणिआ ॥३॥
कामणि गुणवंती हरि पाए ॥
भै भाइ सीगारु बणाए ॥
सतिगुरु सेवि सदा सोहागणि सच उपदेसि समावणिआ ॥४॥
सबदु विसारनि तिना ठउरु न ठाउ ॥
भ्रमि भूले जिउ सुंञै घरि काउ ॥
हलतु पलतु तिनी दोवै गवाए दुखे दुखि विहावणिआ ॥५॥
लिखदिआ लिखदिआ कागद मसु खोई ॥
दूजै भाइ सुखु पाए न कोई ॥
कूड़ु लिखहि तै कूड़ु कमावहि जलि जावहि कूड़ि चितु लावणिआ ॥६॥
गुरमुखि सचो सचु लिखहि वीचारु ॥
से जन सचे पावहि मोख दुआरु ॥
सचु कागदु कलम मसवाणी सचु लिखि सचि समावणिआ ॥७॥
मेरा प्रभु अंतरि बैठा वेखै ॥
गुर परसादी मिलै सोई जनु लेखै ॥
नानक नामु मिलै वडिआई पूरे गुर ते पावणिआ ॥८॥२२॥२३॥
हिन्दी अर्थ: मैं उन मनुष्यों से सदा कुर्बान जाता हूँ~ जो परमात्मा का नाम सुन के उसे अपने मन में बसाए रखते हैं। वह परमात्मा सदा कायम रहने वाला है। (वह जीवों वाली ‘मैं मेरी’ से) बहुत ऊँचा है। भाग्यशाली जीव अहंकार को मार के (ही) उसमें लीन होते हैं। 1। रहाउ। परमात्मा सदा कायम रहने वाला है। उसका बड़प्पन सदा कायम रहने वाला है। गुरू की कृपा से किसी (विरले भाग्यशाली) को (प्रभू अपने चरणों में) मिलाता है। जो मनुष्य गुरू के शबद के द्वारा (परमात्मा में) मिलते हैं~ वह (उससे) बिछुड़ते नहीं। वे आत्मिक अडोलता में व सदा स्थिर प्रभू में लीन रहते हैं। 2। (हे भाई !) तुझसे (अर्थात~ तेरे हुकम से) बाहर कुछ नहीं हो सकता। तू (जगत) पैदा करके (उसकी) संभाल (भी) करता है। तू (हरेक के दिल की) जानता भी है। (हे भाई !) करतार स्वयं ही (सब जीवों में व्यापक हो के सब कुछ) करता है (और जीवों से) करवाता है। गुरू की मति के द्वारा स्वयं ही जीवों को अपने में मिलाता है। 3। जो जीव स्त्री परमात्मा के गुण अपने अंदर बसाती है वह परमात्मा को मिल पड़ती है। परमात्मा के डर अदब में रह के~ परमात्मा के प्रेम में जुड़ के वह (परमात्मा के गुणों को अपने जीवन का) श्रृंगार बनाती है। वह गुरू का आसरा परना बन के सदा के लिए पति प्रभू वाली बन जाती है। वह प्रभू मिलाप वाले गुर-उपदेश में लीन रहती है। 4। जो मनुष्य गुरू के शबदको भुला देते हैं उन्हें (परमात्मा की हजूरी में) कोई जगह ठिकाना नहीं मिलता। वह (माया मोह की) भटकन में पड़ कर कुमार्ग पर पड़े रहते हैं। जैसे कोई कौए को किसी उजड़े घर में (खाने के लिए कुछ भी नहीं मिल सकता~ वैसे ही गुरू शबद को भुलाने वाले लोग आत्मिक जीवन के पक्ष से खाली हाथ ही रहते हैं)। ऐसे मनुष्य इस लोक व परलोक दोनों को बर्बाद कर लेते हैं~ उनकी उम्र सदा दुख में ही व्यतीत होती है। 5। (माया के आँगन में माया के लेखे) लिखते लिखते (अनेकों) कागज व (बेअंत) स्याही खत्म कर लेते हैं। पर माया के मोह में फंसे रह के किसी को कभी आत्मिक आनंद नहीं मिला। वे माया का ही लेखा लिखते रहते हैं~ और माया ही एकत्र करते रहते हैं। वे सदा खिझते ही रहते हैं क्योंकि वे नाशवंत माया में ही अपना मन जोड़े रखते हैं। 6। गुरू की शरण में रहने वाले मनुष्य सदा स्थिर प्रभू का नाम लिखते है। परमात्मा के गुणों के विचार लिखते हैं। वे मनुष्य सदा स्थिर प्रभू का रूप हो जाते हैं~ वे माया के मोह से विरक्त रहने का राह ढूँढ लेते हैं। उन मनुष्यों के कागज सफल हैं~ उनकी कलम सफल हैं~ दवात भी सफल है~ जो सदा स्थिर प्रभू का नाम लिख लिख के सदा स्थिर प्रभू में ही लीन रहते हैं। 7। (हे भाई !) मेरा परमात्मा (सब जीवों के) अंदर बैठा (हरेक की) संभाल करता है। जो मनुष्य गुरू की कृपा से उस परमात्मा के चरणों में जुड़ता है~ वही मनुष्य परमात्मा की नजरों में परवान होता है। हे नानक ! परमात्मा का नाम पूरे गुरू के पास से ही मिलता है। जिसे ये नाम मिल जाता है~ वह (परमात्मा की हजूरी में) आदर प्राप्त करता है। 8। 22। 23।
ਮਾਝ ਮਹਲਾ ੩ ॥
ਆਤਮ ਰਾਮ ਪਰਗਾਸੁ ਗੁਰ ਤੇ ਹੋਵੈ ॥
ਹਉਮੈ ਮੈਲੁ ਲਾਗੀ ਗੁਰ ਸਬਦੀ ਖੋਵੈ ॥
ਮਨੁ ਨਿਰਮਲੁ ਅਨਦਿਨੁ ਭਗਤੀ ਰਾਤਾ ਭਗਤਿ ਕਰੇ ਹਰਿ ਪਾਵਣਿਆ ॥੧॥
ਹਉ ਵਾਰੀ ਜੀਉ ਵਾਰੀ ਆਪਿ ਭਗਤਿ ਕਰਨਿ ਅਵਰਾ ਭਗਤਿ ਕਰਾਵਣਿਆ ॥
ਤਿਨਾ ਭਗਤ ਜਨਾ ਕਉ ਸਦ ਨਮਸਕਾਰੁ ਕੀਜੈ ਜੋ ਅਨਦਿਨੁ ਹਰਿ ਗੁਣ ਗਾਵਣਿਆ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਆਪੇ ਕਰਤਾ ਕਾਰਣੁ ਕਰਾਏ ॥
ਜਿਤੁ ਭਾਵੈ ਤਿਤੁ ਕਾਰੈ ਲਾਏ ॥
ਪੂਰੈ ਭਾਗਿ ਗੁਰ ਸੇਵਾ ਹੋਵੈ ਗੁਰ ਸੇਵਾ ਤੇ ਸੁਖੁ ਪਾਵਣਿਆ ॥੨॥
ਮਰਿ ਮਰਿ ਜੀਵੈ ਤਾ ਕਿਛੁ ਪਾਏ ॥
ਗੁਰ ਪਰਸਾਦੀ ਹਰਿ ਮੰਨਿ ਵਸਾਏ ॥
ਸਦਾ ਮੁਕਤੁ ਹਰਿ ਮੰਨਿ ਵਸਾਏ ਸਹਜੇ ਸਹਜਿ ਸਮਾਵਣਿਆ ॥੩॥
ਬਹੁ ਕਰਮ ਕਮਾਵੈ ਮੁਕਤਿ ਨ ਪਾਏ ॥
ਦੇਸੰਤਰੁ ਭਵੈ ਦੂਜੈ ਭਾਇ ਖੁਆਏ ॥
ਬਿਰਥਾ ਜਨਮੁ ਗਵਾਇਆ ਕਪਟੀ ਬਿਨੁ ਸਬਦੈ ਦੁਖੁ ਪਾਵਣਿਆ ॥੪॥
ਧਾਵਤੁ ਰਾਖੈ ਠਾਕਿ ਰਹਾਏ ॥
ਗੁਰ ਪਰਸਾਦੀ ਪਰਮ ਪਦੁ ਪਾਏ ॥
ਸਤਿਗੁਰੁ ਆਪੇ ਮੇਲਿ ਮਿਲਾਏ ਮਿਲਿ ਪ੍ਰੀਤਮ ਸੁਖੁ ਪਾਵਣਿਆ ॥੫॥
ਆਤਮ ਰਾਮ ਪਰਗਾਸੁ ਗੁਰ ਤੇ ਹੋਵੈ ॥
ਹਉਮੈ ਮੈਲੁ ਲਾਗੀ ਗੁਰ ਸਬਦੀ ਖੋਵੈ ॥
ਮਨੁ ਨਿਰਮਲੁ ਅਨਦਿਨੁ ਭਗਤੀ ਰਾਤਾ ਭਗਤਿ ਕਰੇ ਹਰਿ ਪਾਵਣਿਆ ॥੧॥
ਹਉ ਵਾਰੀ ਜੀਉ ਵਾਰੀ ਆਪਿ ਭਗਤਿ ਕਰਨਿ ਅਵਰਾ ਭਗਤਿ ਕਰਾਵਣਿਆ ॥
ਤਿਨਾ ਭਗਤ ਜਨਾ ਕਉ ਸਦ ਨਮਸਕਾਰੁ ਕੀਜੈ ਜੋ ਅਨਦਿਨੁ ਹਰਿ ਗੁਣ ਗਾਵਣਿਆ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਆਪੇ ਕਰਤਾ ਕਾਰਣੁ ਕਰਾਏ ॥
ਜਿਤੁ ਭਾਵੈ ਤਿਤੁ ਕਾਰੈ ਲਾਏ ॥
ਪੂਰੈ ਭਾਗਿ ਗੁਰ ਸੇਵਾ ਹੋਵੈ ਗੁਰ ਸੇਵਾ ਤੇ ਸੁਖੁ ਪਾਵਣਿਆ ॥੨॥
ਮਰਿ ਮਰਿ ਜੀਵੈ ਤਾ ਕਿਛੁ ਪਾਏ ॥
ਗੁਰ ਪਰਸਾਦੀ ਹਰਿ ਮੰਨਿ ਵਸਾਏ ॥
ਸਦਾ ਮੁਕਤੁ ਹਰਿ ਮੰਨਿ ਵਸਾਏ ਸਹਜੇ ਸਹਜਿ ਸਮਾਵਣਿਆ ॥੩॥
ਬਹੁ ਕਰਮ ਕਮਾਵੈ ਮੁਕਤਿ ਨ ਪਾਏ ॥
ਦੇਸੰਤਰੁ ਭਵੈ ਦੂਜੈ ਭਾਇ ਖੁਆਏ ॥
ਬਿਰਥਾ ਜਨਮੁ ਗਵਾਇਆ ਕਪਟੀ ਬਿਨੁ ਸਬਦੈ ਦੁਖੁ ਪਾਵਣਿਆ ॥੪॥
ਧਾਵਤੁ ਰਾਖੈ ਠਾਕਿ ਰਹਾਏ ॥
ਗੁਰ ਪਰਸਾਦੀ ਪਰਮ ਪਦੁ ਪਾਏ ॥
ਸਤਿਗੁਰੁ ਆਪੇ ਮੇਲਿ ਮਿਲਾਏ ਮਿਲਿ ਪ੍ਰੀਤਮ ਸੁਖੁ ਪਾਵਣਿਆ ॥੫॥
माझ महला ३ ॥
आतम राम परगासु गुर ते होवै ॥
हउमै मैलु लागी गुर सबदी खोवै ॥
मनु निरमलु अनदिनु भगती राता भगति करे हरि पावणिआ ॥१॥
हउ वारी जीउ वारी आपि भगति करनि अवरा भगति करावणिआ ॥
तिना भगत जना कउ सद नमसकारु कीजै जो अनदिनु हरि गुण गावणिआ ॥१॥ रहाउ ॥
आपे करता कारणु कराए ॥
जितु भावै तितु कारै लाए ॥
पूरै भागि गुर सेवा होवै गुर सेवा ते सुखु पावणिआ ॥२॥
मरि मरि जीवै ता किछु पाए ॥
गुर परसादी हरि मंनि वसाए ॥
सदा मुकतु हरि मंनि वसाए सहजे सहजि समावणिआ ॥३॥
बहु करम कमावै मुकति न पाए ॥
देसंतरु भवै दूजै भाइ खुआए ॥
बिरथा जनमु गवाइआ कपटी बिनु सबदै दुखु पावणिआ ॥४॥
धावतु राखै ठाकि रहाए ॥
गुर परसादी परम पदु पाए ॥
सतिगुरु आपे मेलि मिलाए मिलि प्रीतम सुखु पावणिआ ॥५॥
आतम राम परगासु गुर ते होवै ॥
हउमै मैलु लागी गुर सबदी खोवै ॥
मनु निरमलु अनदिनु भगती राता भगति करे हरि पावणिआ ॥१॥
हउ वारी जीउ वारी आपि भगति करनि अवरा भगति करावणिआ ॥
तिना भगत जना कउ सद नमसकारु कीजै जो अनदिनु हरि गुण गावणिआ ॥१॥ रहाउ ॥
आपे करता कारणु कराए ॥
जितु भावै तितु कारै लाए ॥
पूरै भागि गुर सेवा होवै गुर सेवा ते सुखु पावणिआ ॥२॥
मरि मरि जीवै ता किछु पाए ॥
गुर परसादी हरि मंनि वसाए ॥
सदा मुकतु हरि मंनि वसाए सहजे सहजि समावणिआ ॥३॥
बहु करम कमावै मुकति न पाए ॥
देसंतरु भवै दूजै भाइ खुआए ॥
बिरथा जनमु गवाइआ कपटी बिनु सबदै दुखु पावणिआ ॥४॥
धावतु राखै ठाकि रहाए ॥
गुर परसादी परम पदु पाए ॥
सतिगुरु आपे मेलि मिलाए मिलि प्रीतम सुखु पावणिआ ॥५॥
हिन्दी अर्थ: माझ महला ३ ॥ गुरू से ही मनुष्य को ये प्रकाश हो सकता है कि परमात्मा की ज्योति सब में व्यापक है। गुरू के शबद द्वारा ही मनुष्य (मन को) लगी हुई मैल धो सकता है। जिस मनुष्य का मन मल-रहित हो जाता है वह प्रभू की भक्ति में रंगा जाता है। भगती कर करके वह परमात्मा (का मिलाप) प्राप्त कर लेता है। 1। मैं उन मनुष्यों से सदके कुर्बान जाता हूँ~ जों स्वयं परमात्मा की भगती करते हैं तथा औरों से भी भक्ति करवाते हैं। ऐसे भगतो के आगे सदा सिर झुकाना चाहिए जो हर रोज परमात्मा के गुण गाते हैं। 1। रहाउ। करतार स्वयं ही (जीवों से भक्ति करवाने का) सबब पैदा करता है (क्योंकि) वह जीवों को उस काम में लगाता है जिस में लगाना उसे अच्छा लगता है। खुश किस्मती से ही जीव से गुरू का आसरा लिया जा सकता है। गुरू का आसरा ले कर (भाग्यशाली) मनुष्य आत्मिक आनंद प्राप्त करता है। 2। जब मनुष्य बारंबार प्रयत्न करके अहंकार को मारता है~ तो आत्मिक जीवन हासिल करता है। तब वह परमात्मा की भक्ति का कुछ आनंद लेता है। (तब) गुरू की कृपा से वह परमात्मा को अपने मन में बसाता है। जो मनुष्य परमात्मा को अपने मन में बसाए रखता है~ वह सदैव (अहम् आदि विकारों से) आजाद रहता है। वह सदा आत्किम अडोलता में लीन रहता है। 3। (भक्ति के बिना) अगर मनुष्य अनेकों और (निहित धार्मिक) कर्म करता है (तो भी विकारों से) मुक्ति प्राप्त नहीं कर सकता। अगर देश-देशांतरों का रटन करता फिरे तो भी माया के मोह में रह के कुमार्ग पर पड़ा रहता है। (असल में वह मनुष्य छल ही करता है और) छली मनुष्य अपना मानस जीवन व्यर्थ गवाता है। गुरू के शबद (का आसरा लिए) बिना वह दुख ही पाता रहता है। 4। जो मनुष्य (विकारों की तरफ) दौड़ते मन की रक्षा करता है (इसे विकारों से) रोक के रखता है। वह गुरू की कृपा से सबसे ऊँचा दर्जा हासिल कर लेता है। गुरू स्वयं ही उसे परमात्मा के चरणों में मिला देता है। प्रीतम प्रभू को मिल के वह आत्मिक आनंद भोगता है। 5।
स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
संदर्भ: यह अंग 123 है, राग माझ का हिस्सा। मुख्य रचयिता: Guru Amar Daas Ji।
Vasant Vihar के market में Sunday सुबह की धीमी-धीमी activity।
ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।
यह अंग कुल 41 पंक्तियों का है, 2 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 123” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।
राग के context में: माझ राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।
पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।
अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।
“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।
नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।
अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।
तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।
हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।
ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।
दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।
“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।
हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।
अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।
आगे का अंग: अंग 124 →, पीछे का: ← अंग 122।
हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।
(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)
शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।
संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।
शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।
संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।
एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।
अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।