अंग
121
राग माझ
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ਨਾਨਕ ਨਾਮਿ ਰਤੇ ਵੀਚਾਰੀ ਸਚੋ ਸਚੁ ਕਮਾਵਣਿਆ ॥੮॥੧੮॥੧੯॥
नानक नामि रते वीचारी सचो सचु कमावणिआ ॥८॥१८॥१९॥
हिन्दी अर्थ: हे नानक ! जो मनुष्य परमात्मा के नाम (-रंग) में रंगे जाते हैं~ वे अच्छी-बुरी करतूत को परखने के लायक हो जाते हैं~ और वे सदा कायम रहने वाले परमात्मा के नाम सिमरन की कमाई करते हैं। 8। 18। 19।
ਮਾਝ ਮਹਲਾ ੩ ॥
ਨਿਰਮਲ ਸਬਦੁ ਨਿਰਮਲ ਹੈ ਬਾਣੀ ॥
ਨਿਰਮਲ ਜੋਤਿ ਸਭ ਮਾਹਿ ਸਮਾਣੀ ॥
ਨਿਰਮਲ ਬਾਣੀ ਹਰਿ ਸਾਲਾਹੀ ਜਪਿ ਹਰਿ ਨਿਰਮਲੁ ਮੈਲੁ ਗਵਾਵਣਿਆ ॥੧॥
ਹਉ ਵਾਰੀ ਜੀਉ ਵਾਰੀ ਸੁਖਦਾਤਾ ਮੰਨਿ ਵਸਾਵਣਿਆ ॥
ਹਰਿ ਨਿਰਮਲੁ ਗੁਰ ਸਬਦਿ ਸਲਾਹੀ ਸਬਦੋ ਸੁਣਿ ਤਿਸਾ ਮਿਟਾਵਣਿਆ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਨਿਰਮਲ ਨਾਮੁ ਵਸਿਆ ਮਨਿ ਆਏ ॥
ਮਨੁ ਤਨੁ ਨਿਰਮਲੁ ਮਾਇਆ ਮੋਹੁ ਗਵਾਏ ॥
ਨਿਰਮਲ ਗੁਣ ਗਾਵੈ ਨਿਤ ਸਾਚੇ ਕੇ ਨਿਰਮਲ ਨਾਦੁ ਵਜਾਵਣਿਆ ॥੨॥
ਨਿਰਮਲ ਅੰਮ੍ਰਿਤੁ ਗੁਰ ਤੇ ਪਾਇਆ ॥
ਵਿਚਹੁ ਆਪੁ ਮੁਆ ਤਿਥੈ ਮੋਹੁ ਨ ਮਾਇਆ ॥
ਨਿਰਮਲ ਗਿਆਨੁ ਧਿਆਨੁ ਅਤਿ ਨਿਰਮਲੁ ਨਿਰਮਲ ਬਾਣੀ ਮੰਨਿ ਵਸਾਵਣਿਆ ॥੩॥
ਜੋ ਨਿਰਮਲੁ ਸੇਵੇ ਸੁ ਨਿਰਮਲੁ ਹੋਵੈ ॥
ਹਉਮੈ ਮੈਲੁ ਗੁਰ ਸਬਦੇ ਧੋਵੈ ॥
ਨਿਰਮਲ ਵਾਜੈ ਅਨਹਦ ਧੁਨਿ ਬਾਣੀ ਦਰਿ ਸਚੈ ਸੋਭਾ ਪਾਵਣਿਆ ॥੪॥
ਨਿਰਮਲ ਤੇ ਸਭ ਨਿਰਮਲ ਹੋਵੈ ॥
ਨਿਰਮਲੁ ਮਨੂਆ ਹਰਿ ਸਬਦਿ ਪਰੋਵੈ ॥
ਨਿਰਮਲ ਨਾਮਿ ਲਗੇ ਬਡਭਾਗੀ ਨਿਰਮਲੁ ਨਾਮਿ ਸੁਹਾਵਣਿਆ ॥੫॥
ਸੋ ਨਿਰਮਲੁ ਜੋ ਸਬਦੇ ਸੋਹੈ ॥
ਨਿਰਮਲ ਨਾਮਿ ਮਨੁ ਤਨੁ ਮੋਹੈ ॥
ਸਚਿ ਨਾਮਿ ਮਲੁ ਕਦੇ ਨ ਲਾਗੈ ਮੁਖੁ ਊਜਲੁ ਸਚੁ ਕਰਾਵਣਿਆ ॥੬॥
ਮਨੁ ਮੈਲਾ ਹੈ ਦੂਜੈ ਭਾਇ ॥
ਮੈਲਾ ਚਉਕਾ ਮੈਲੈ ਥਾਇ ॥
ਮੈਲਾ ਖਾਇ ਫਿਰਿ ਮੈਲੁ ਵਧਾਏ ਮਨਮੁਖ ਮੈਲੁ ਦੁਖੁ ਪਾਵਣਿਆ ॥੭॥
ਮੈਲੇ ਨਿਰਮਲ ਸਭਿ ਹੁਕਮਿ ਸਬਾਏ ॥
ਸੇ ਨਿਰਮਲ ਜੋ ਹਰਿ ਸਾਚੇ ਭਾਏ ॥
ਨਾਨਕ ਨਾਮੁ ਵਸੈ ਮਨ ਅੰਤਰਿ ਗੁਰਮੁਖਿ ਮੈਲੁ ਚੁਕਾਵਣਿਆ ॥੮॥੧੯॥੨੦॥
ਨਿਰਮਲ ਸਬਦੁ ਨਿਰਮਲ ਹੈ ਬਾਣੀ ॥
ਨਿਰਮਲ ਜੋਤਿ ਸਭ ਮਾਹਿ ਸਮਾਣੀ ॥
ਨਿਰਮਲ ਬਾਣੀ ਹਰਿ ਸਾਲਾਹੀ ਜਪਿ ਹਰਿ ਨਿਰਮਲੁ ਮੈਲੁ ਗਵਾਵਣਿਆ ॥੧॥
ਹਉ ਵਾਰੀ ਜੀਉ ਵਾਰੀ ਸੁਖਦਾਤਾ ਮੰਨਿ ਵਸਾਵਣਿਆ ॥
ਹਰਿ ਨਿਰਮਲੁ ਗੁਰ ਸਬਦਿ ਸਲਾਹੀ ਸਬਦੋ ਸੁਣਿ ਤਿਸਾ ਮਿਟਾਵਣਿਆ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਨਿਰਮਲ ਨਾਮੁ ਵਸਿਆ ਮਨਿ ਆਏ ॥
ਮਨੁ ਤਨੁ ਨਿਰਮਲੁ ਮਾਇਆ ਮੋਹੁ ਗਵਾਏ ॥
ਨਿਰਮਲ ਗੁਣ ਗਾਵੈ ਨਿਤ ਸਾਚੇ ਕੇ ਨਿਰਮਲ ਨਾਦੁ ਵਜਾਵਣਿਆ ॥੨॥
ਨਿਰਮਲ ਅੰਮ੍ਰਿਤੁ ਗੁਰ ਤੇ ਪਾਇਆ ॥
ਵਿਚਹੁ ਆਪੁ ਮੁਆ ਤਿਥੈ ਮੋਹੁ ਨ ਮਾਇਆ ॥
ਨਿਰਮਲ ਗਿਆਨੁ ਧਿਆਨੁ ਅਤਿ ਨਿਰਮਲੁ ਨਿਰਮਲ ਬਾਣੀ ਮੰਨਿ ਵਸਾਵਣਿਆ ॥੩॥
ਜੋ ਨਿਰਮਲੁ ਸੇਵੇ ਸੁ ਨਿਰਮਲੁ ਹੋਵੈ ॥
ਹਉਮੈ ਮੈਲੁ ਗੁਰ ਸਬਦੇ ਧੋਵੈ ॥
ਨਿਰਮਲ ਵਾਜੈ ਅਨਹਦ ਧੁਨਿ ਬਾਣੀ ਦਰਿ ਸਚੈ ਸੋਭਾ ਪਾਵਣਿਆ ॥੪॥
ਨਿਰਮਲ ਤੇ ਸਭ ਨਿਰਮਲ ਹੋਵੈ ॥
ਨਿਰਮਲੁ ਮਨੂਆ ਹਰਿ ਸਬਦਿ ਪਰੋਵੈ ॥
ਨਿਰਮਲ ਨਾਮਿ ਲਗੇ ਬਡਭਾਗੀ ਨਿਰਮਲੁ ਨਾਮਿ ਸੁਹਾਵਣਿਆ ॥੫॥
ਸੋ ਨਿਰਮਲੁ ਜੋ ਸਬਦੇ ਸੋਹੈ ॥
ਨਿਰਮਲ ਨਾਮਿ ਮਨੁ ਤਨੁ ਮੋਹੈ ॥
ਸਚਿ ਨਾਮਿ ਮਲੁ ਕਦੇ ਨ ਲਾਗੈ ਮੁਖੁ ਊਜਲੁ ਸਚੁ ਕਰਾਵਣਿਆ ॥੬॥
ਮਨੁ ਮੈਲਾ ਹੈ ਦੂਜੈ ਭਾਇ ॥
ਮੈਲਾ ਚਉਕਾ ਮੈਲੈ ਥਾਇ ॥
ਮੈਲਾ ਖਾਇ ਫਿਰਿ ਮੈਲੁ ਵਧਾਏ ਮਨਮੁਖ ਮੈਲੁ ਦੁਖੁ ਪਾਵਣਿਆ ॥੭॥
ਮੈਲੇ ਨਿਰਮਲ ਸਭਿ ਹੁਕਮਿ ਸਬਾਏ ॥
ਸੇ ਨਿਰਮਲ ਜੋ ਹਰਿ ਸਾਚੇ ਭਾਏ ॥
ਨਾਨਕ ਨਾਮੁ ਵਸੈ ਮਨ ਅੰਤਰਿ ਗੁਰਮੁਖਿ ਮੈਲੁ ਚੁਕਾਵਣਿਆ ॥੮॥੧੯॥੨੦॥
माझ महला ३ ॥
निरमल सबदु निरमल है बाणी ॥
निरमल जोति सभ माहि समाणी ॥
निरमल बाणी हरि सालाही जपि हरि निरमलु मैलु गवावणिआ ॥१॥
हउ वारी जीउ वारी सुखदाता मंनि वसावणिआ ॥
हरि निरमलु गुर सबदि सलाही सबदो सुणि तिसा मिटावणिआ ॥१॥ रहाउ ॥
निरमल नामु वसिआ मनि आए ॥
मनु तनु निरमलु माइआ मोहु गवाए ॥
निरमल गुण गावै नित साचे के निरमल नादु वजावणिआ ॥२॥
निरमल अंम्रितु गुर ते पाइआ ॥
विचहु आपु मुआ तिथै मोहु न माइआ ॥
निरमल गिआनु धिआनु अति निरमलु निरमल बाणी मंनि वसावणिआ ॥३॥
जो निरमलु सेवे सु निरमलु होवै ॥
हउमै मैलु गुर सबदे धोवै ॥
निरमल वाजै अनहद धुनि बाणी दरि सचै सोभा पावणिआ ॥४॥
निरमल ते सभ निरमल होवै ॥
निरमलु मनूआ हरि सबदि परोवै ॥
निरमल नामि लगे बडभागी निरमलु नामि सुहावणिआ ॥५॥
सो निरमलु जो सबदे सोहै ॥
निरमल नामि मनु तनु मोहै ॥
सचि नामि मलु कदे न लागै मुखु ऊजलु सचु करावणिआ ॥६॥
मनु मैला है दूजै भाइ ॥
मैला चउका मैलै थाइ ॥
मैला खाइ फिरि मैलु वधाए मनमुख मैलु दुखु पावणिआ ॥७॥
मैले निरमल सभि हुकमि सबाए ॥
से निरमल जो हरि साचे भाए ॥
नानक नामु वसै मन अंतरि गुरमुखि मैलु चुकावणिआ ॥८॥१९॥२०॥
निरमल सबदु निरमल है बाणी ॥
निरमल जोति सभ माहि समाणी ॥
निरमल बाणी हरि सालाही जपि हरि निरमलु मैलु गवावणिआ ॥१॥
हउ वारी जीउ वारी सुखदाता मंनि वसावणिआ ॥
हरि निरमलु गुर सबदि सलाही सबदो सुणि तिसा मिटावणिआ ॥१॥ रहाउ ॥
निरमल नामु वसिआ मनि आए ॥
मनु तनु निरमलु माइआ मोहु गवाए ॥
निरमल गुण गावै नित साचे के निरमल नादु वजावणिआ ॥२॥
निरमल अंम्रितु गुर ते पाइआ ॥
विचहु आपु मुआ तिथै मोहु न माइआ ॥
निरमल गिआनु धिआनु अति निरमलु निरमल बाणी मंनि वसावणिआ ॥३॥
जो निरमलु सेवे सु निरमलु होवै ॥
हउमै मैलु गुर सबदे धोवै ॥
निरमल वाजै अनहद धुनि बाणी दरि सचै सोभा पावणिआ ॥४॥
निरमल ते सभ निरमल होवै ॥
निरमलु मनूआ हरि सबदि परोवै ॥
निरमल नामि लगे बडभागी निरमलु नामि सुहावणिआ ॥५॥
सो निरमलु जो सबदे सोहै ॥
निरमल नामि मनु तनु मोहै ॥
सचि नामि मलु कदे न लागै मुखु ऊजलु सचु करावणिआ ॥६॥
मनु मैला है दूजै भाइ ॥
मैला चउका मैलै थाइ ॥
मैला खाइ फिरि मैलु वधाए मनमुख मैलु दुखु पावणिआ ॥७॥
मैले निरमल सभि हुकमि सबाए ॥
से निरमल जो हरि साचे भाए ॥
नानक नामु वसै मन अंतरि गुरमुखि मैलु चुकावणिआ ॥८॥१९॥२०॥
हिन्दी अर्थ: माझ महला ३ ॥ उसकी सिफत सालाह का शबद (सबको) पवित्र करने वाला है। परमात्मा की पवित्र ज्योति सब जीवों में समाई हुई है। उसकी सिफत सालाह की बाणी (सबको) पवित्र करने वाली है। (हे भाई !) मैं उस हरी की पवित्र बाणी के द्वारा उसकी सिफत सालाह करता हूँ। परमात्मा का नाम जप के हम पवित्र हो जाते हैं। (विकारों की) मैल (मन से) दूर कर लेते हैं। 1। मैं उनके सदके हूँ कुर्बान हूँ~ जो सुख देने वाले परमात्मा को अपने मन में बसाते हैं। मैं गुरू के शबद में जुड़ के पवित्र परमात्मा की सिफत सालाह करता हूँ। गुरू का शबद ही सुन के मैं (अपने अंदर से माया की) तृष्णा को मिटाता हूँ। 1। रहाउ। (जिस मनुष्य के) मन में पवित्र परमात्मा का नाम आ बसता है~ उसका मन पवित्र हो जाता है~ उसका तन पवित्र हो जाता है। (वह अपने अंदर से) माया का मोह दूर कर लेता है। वह मनुष्य सदा स्थिर रहने वाले परमात्मा के पवित्र गुण सदैव गाता है (जैसे जोगी नाद बजाता है) वह मनुष्य सिफत सालाह का (जैसे) नाद बजाता है। 2। जिस मनुष्य ने गुरू से पवित्र परमात्मा का आत्मिक जीवन देने वाला नाम जल प्राप्त कर लिया~ उसके अंदर से स्वै भाव (अहम्) खत्म हो जाता है, उसके हृदय में माया का मोह नहीं रह जाता। (ज्यों ज्यों वह मनुष्य) परमात्मा के सिफत सालाह वाली पवित्र बाणी अपने मन में बसाता है~ परमात्मा के साथ उसका पवित्र गहरा अपनापन बनता है~ उसकी सुरति प्रभू चरणों से जुड़ती है जो उसे (और भी) पवित्र करती है। 3। जो मनुष्य पवित्र परमात्मा का सिमरन करता है~ वह (स्वयं भी) पवित्र हो जाता है। गुरू के शबद की बरकति से वह (अपने मन में से) अहंकार की मैल धो लेता है। उस मनुष्य के अंदर एक रस लगन पैदा करने वाली सिफत सालाह की पवित्र बाणी अपना प्रभाव बनाए रखती है~ और वह सदा स्थिर प्रभू के दर पे शोभा पाता है। 4। पवित्र परमात्मा के (नाम की) छोह से सारी लोकाई पवित्र हो जाती है। (ज्यों ज्यों मनुष्य अपने मन को) परमात्मा के सिफत सालाह के शबद में परोता है (त्यों त्यों उसका) मन पवित्र होता जाता है। बहुत भाग्यशाली मनुष्य ही प्रभू के नाम में लीन होते हैं। जो मनुष्य नाम में जुड़ता है~ वह पवित्र जीवन वाला बन जाता है~ वह सुंदर जीवन वाला बन जाता है। 5। वही मनुष्य पवित्र जीवन वाला बनता है~ जो गुरू के शबद में जुड़ कर सुंदर जीवन वाला बनता है। पवित्र प्रभू के नाम में उसका मन मस्त रहता है~ उसका तन (भाव~ हरेक ज्ञान इंद्रियां) मस्त रहता है। सदा स्थिर परमात्मा के नाम में जुड़ने के कारण उसे (विकारों की) मैल कभी नहीं लगती। सदा स्थिर रहने वाला प्रभू उसका मुंह (लोक परलोक में) उज्जवल कर देता है। 6। पर~ जो मनुष्य माया के प्यार में मस्त रहता है~ उसका मन (विकारों की मैल से) मैला (ही) रहता है। (वह लकीरें खीच खीच के बेशक स्वच्छ चौके बनाएं~ पर उसके हृदय का) चौका मैला ही रहता है। (उसकी सुरति सदा) मैली जगह पर ही टिकी रहती है। वह मनुष्य (विकारों की) मैल को ही अपनी आत्मिक खुराक बनाए रखता है (जिस करके वह अपने अंदर) और और (विकारों की) मैल बढ़ाता जाता है। (इस तरह) अपने मन के पीछे चलने वाला मनुष्य (विकारों की) मैल (बढ़ा बढ़ा के) दुख सहता है। 7। (पर जीवों के भी क्या वश?) विकारी जीव और पवित्र आत्मा जीव सारे परमात्मा के हुकम में (ही चल रहे हैं)। जो लोग सदा स्थिर हरी को प्यारे लगने लगते हैं~ वे पवित्र जीवन वाले हो जाते हैं। हे नानक ! जो मनुष्य गुरू के बताए रास्ते पर चलता है~ उसके मन में परमात्मा का नाम बसता है~ वह (अपने अंदर से विकार आदि की) मैल दूर कर लेता है। 8। 19। 20।
ਮਾਝ ਮਹਲਾ ੩ ॥
ਗੋਵਿੰਦੁ ਊਜਲੁ ਊਜਲ ਹੰਸਾ ॥
ਮਨੁ ਬਾਣੀ ਨਿਰਮਲ ਮੇਰੀ ਮਨਸਾ ॥
ਮਨਿ ਊਜਲ ਸਦਾ ਮੁਖ ਸੋਹਹਿ ਅਤਿ ਊਜਲ ਨਾਮੁ ਧਿਆਵਣਿਆ ॥੧॥
ਹਉ ਵਾਰੀ ਜੀਉ ਵਾਰੀ ਗੋਬਿੰਦ ਗੁਣ ਗਾਵਣਿਆ ॥
ਗੋਬਿਦੁ ਗੋਬਿਦੁ ਕਹੈ ਦਿਨ ਰਾਤੀ ਗੋਬਿਦ ਗੁਣ ਸਬਦਿ ਸੁਣਾਵਣਿਆ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਗੋਬਿਦੁ ਗਾਵਹਿ ਸਹਜਿ ਸੁਭਾਏ ॥
ਗੁਰ ਕੈ ਭੈ ਊਜਲ ਹਉਮੈ ਮਲੁ ਜਾਏ ॥
ਸਦਾ ਅਨੰਦਿ ਰਹਹਿ ਭਗਤਿ ਕਰਹਿ ਦਿਨੁ ਰਾਤੀ ਸੁਣਿ ਗੋਬਿਦ ਗੁਣ ਗਾਵਣਿਆ ॥੨॥
ਮਨੂਆ ਨਾਚੈ ਭਗਤਿ ਦ੍ਰਿੜਾਏ ॥
ਗੁਰ ਕੈ ਸਬਦਿ ਮਨੈ ਮਨੁ ਮਿਲਾਏ ॥
ਸਚਾ ਤਾਲੁ ਪੂਰੇ ਮਾਇਆ ਮੋਹੁ ਚੁਕਾਏ ਸਬਦੇ ਨਿਰਤਿ ਕਰਾਵਣਿਆ ॥੩॥
ਊਚਾ ਕੂਕੇ ਤਨਹਿ ਪਛਾੜੇ ॥
ਮਾਇਆ ਮੋਹਿ ਜੋਹਿਆ ਜਮਕਾਲੇ ॥
ਗੋਵਿੰਦੁ ਊਜਲੁ ਊਜਲ ਹੰਸਾ ॥
ਮਨੁ ਬਾਣੀ ਨਿਰਮਲ ਮੇਰੀ ਮਨਸਾ ॥
ਮਨਿ ਊਜਲ ਸਦਾ ਮੁਖ ਸੋਹਹਿ ਅਤਿ ਊਜਲ ਨਾਮੁ ਧਿਆਵਣਿਆ ॥੧॥
ਹਉ ਵਾਰੀ ਜੀਉ ਵਾਰੀ ਗੋਬਿੰਦ ਗੁਣ ਗਾਵਣਿਆ ॥
ਗੋਬਿਦੁ ਗੋਬਿਦੁ ਕਹੈ ਦਿਨ ਰਾਤੀ ਗੋਬਿਦ ਗੁਣ ਸਬਦਿ ਸੁਣਾਵਣਿਆ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਗੋਬਿਦੁ ਗਾਵਹਿ ਸਹਜਿ ਸੁਭਾਏ ॥
ਗੁਰ ਕੈ ਭੈ ਊਜਲ ਹਉਮੈ ਮਲੁ ਜਾਏ ॥
ਸਦਾ ਅਨੰਦਿ ਰਹਹਿ ਭਗਤਿ ਕਰਹਿ ਦਿਨੁ ਰਾਤੀ ਸੁਣਿ ਗੋਬਿਦ ਗੁਣ ਗਾਵਣਿਆ ॥੨॥
ਮਨੂਆ ਨਾਚੈ ਭਗਤਿ ਦ੍ਰਿੜਾਏ ॥
ਗੁਰ ਕੈ ਸਬਦਿ ਮਨੈ ਮਨੁ ਮਿਲਾਏ ॥
ਸਚਾ ਤਾਲੁ ਪੂਰੇ ਮਾਇਆ ਮੋਹੁ ਚੁਕਾਏ ਸਬਦੇ ਨਿਰਤਿ ਕਰਾਵਣਿਆ ॥੩॥
ਊਚਾ ਕੂਕੇ ਤਨਹਿ ਪਛਾੜੇ ॥
ਮਾਇਆ ਮੋਹਿ ਜੋਹਿਆ ਜਮਕਾਲੇ ॥
माझ महला ३ ॥
गोविंदु ऊजलु ऊजल हंसा ॥
मनु बाणी निरमल मेरी मनसा ॥
मनि ऊजल सदा मुख सोहहि अति ऊजल नामु धिआवणिआ ॥१॥
हउ वारी जीउ वारी गोबिंद गुण गावणिआ ॥
गोबिदु गोबिदु कहै दिन राती गोबिद गुण सबदि सुणावणिआ ॥१॥ रहाउ ॥
गोबिदु गावहि सहजि सुभाए ॥
गुर कै भै ऊजल हउमै मलु जाए ॥
सदा अनंदि रहहि भगति करहि दिनु राती सुणि गोबिद गुण गावणिआ ॥२॥
मनूआ नाचै भगति द्रिड़ाए ॥
गुर कै सबदि मनै मनु मिलाए ॥
सचा तालु पूरे माइआ मोहु चुकाए सबदे निरति करावणिआ ॥३॥
ऊचा कूके तनहि पछाड़े ॥
माइआ मोहि जोहिआ जमकाले ॥
गोविंदु ऊजलु ऊजल हंसा ॥
मनु बाणी निरमल मेरी मनसा ॥
मनि ऊजल सदा मुख सोहहि अति ऊजल नामु धिआवणिआ ॥१॥
हउ वारी जीउ वारी गोबिंद गुण गावणिआ ॥
गोबिदु गोबिदु कहै दिन राती गोबिद गुण सबदि सुणावणिआ ॥१॥ रहाउ ॥
गोबिदु गावहि सहजि सुभाए ॥
गुर कै भै ऊजल हउमै मलु जाए ॥
सदा अनंदि रहहि भगति करहि दिनु राती सुणि गोबिद गुण गावणिआ ॥२॥
मनूआ नाचै भगति द्रिड़ाए ॥
गुर कै सबदि मनै मनु मिलाए ॥
सचा तालु पूरे माइआ मोहु चुकाए सबदे निरति करावणिआ ॥३॥
ऊचा कूके तनहि पछाड़े ॥
माइआ मोहि जोहिआ जमकाले ॥
हिन्दी अर्थ: माझ महला ३ ॥ वे पवित्र गोविंद का रूप हो जाते है~ जो मनुष्य परमात्मा का नाम सिमरते हैं वे बहुत पवित्र आत्मा के हो जाते हैं। उनके मन में (भी) शुद्ध (फुरने~ विचार) उठते हैं उनका मन पवित्र हो जाता है। उनके मुंह (भी) सुंदर दिखाई देते हैं। परमात्मा सरोवर के वह~ (जैसे) सुंदर हंस बन जाते हैं। 1। मैं सदा उस मनुष्य के सदके वारने जाता हूँ~ जो गोबिंद के गुण सदा गाता है। जो दिन रात गोबिंद का नाम उचारता है। जो गुरू के शबद द्वारा (औरों को भी) गोबिंद के गुण सुनाता है। 1। रहाउ। जो मनुष्य गोबिंद (के गुण) आत्मिक अडोलता में (प्रभू के चरणों के) प्रेम में (टिक के) गाते हैं~ गुरू के डर अदब में रह के वे (लोक परलोक में) सुर्ख-रू हो जाते हैं~ (उनके अंदर से) अहम् की मैल दूर हो जाती है। वे दिन रात परमात्मा की भगती करते हैं~ सदा आत्मिक आनंद में मगन रहते हैं। वे (औरों से) सुन के (भाव~ वे गोबिंद के गुण सुनते भी हैं~ और) गोबिंद के गुण गाते (भी) हैं। 2। ज्यों ज्यों मनुष्य भगती दृढ़ करता है उसका मन हुलारे में आता है। गुरू के शबद द्वारा वह अपने मन को उधर ही टिकाए रखता है (बाहर भटकने से बचाए रखता है)। (जैसे कोई रास-धारिया रास डालने के समय राग व साज़ के साथ साथ मिल के नृत्य करता है~ वैसे ही) वह मनुष्य (जैसे) सच्चा नाच करता है (जब वह अपने अंदर से) माया का मोह दूर करता है। गुरू के शबद में जुड़ के वह (आत्मिक) नृत्य करता है। 3। पर~ जो मनुष्य (रास आदि डालने के समय) ऊँचे-ऊँचे सुर में बोलता है और अपने शरीर को (किसी चीज से) पटकाता है। (वैसे वह) माया के मोह में (फंसा हुआ) है। उसे आत्मिक मौत ने अपनी निगाह (पहुँच~ सीमा) में रखा हुआ है।
स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
संदर्भ: यह अंग 121 है, राग माझ का हिस्सा। मुख्य रचयिता: Guru Amar Daas Ji।
Dwarka के नए-बसे sector में पहली बार आए परिवार का घर देखना।
ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।
यह अंग कुल 42 पंक्तियों का है, 3 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 121” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।
राग के context में: माझ राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।
पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।
अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।
“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।
नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।
अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।
तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।
हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।
ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।
दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।
“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।
हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।
अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।
आगे का अंग: अंग 122 →, पीछे का: ← अंग 120।
हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।
(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)
शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।
संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।
शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।
संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।
एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।
अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।