ੴ सतिनामु करता पुरखु निरभउ निरवैरु अकाल मूरति अजूनी सैभं गुर प्रसादि ॥
हरि हरि नामु मै हरि मनि भाइआ ॥
वडभागी हरि नामु धिआइआ ॥
गुरि पूरै हरि नाम सिधि पाई को विरला गुरमति चलै जीउ ॥1॥
मै हरि हरि खरचु लइआ बंनि पलै ॥
मेरा प्राण सखाई सदा नालि चलै ॥
गुरि पूरै हरि नामु दिड़ाइआ हरि निहचलु हरि धनु पलै जीउ ॥2॥
हरि हरि सजणु मेरा प्रीतमु राइआ ॥
कोई आणि मिलावै मेरे प्राण जीवाइआ ॥
हउ रहि न सका बिनु देखे प्रीतमा मै नीरु वहे वहि चलै जीउ ॥3॥
सतिगुरु मित्रु मेरा बाल सखाई ॥
हउ रहि न सका बिनु देखे मेरी माई ॥
हरि जीउ क्रिपा करहु गुरु मेलहु जन नानक हरि धनु पलै जीउ ॥4॥1॥
मधुसूदन मेरे मन तन प्राना ॥
हउ हरि बिनु दूजा अवरु न जाना ॥
कोई सजणु संतु मिलै वडभागी मै हरि प्रभु पिआरा दसै जीउ ॥1॥
हउ मनु तनु खोजी भालि भालाई ॥
किउ पिआरा प्रीतमु मिलै मेरी माई ॥
मिलि सतसंगति खोजु दसाई विचि संगति हरि प्रभु वसै जीउ ॥2॥
मेरा पिआरा प्रीतमु सतिगुरु रखवाला ॥
हम बारिक दीन करहु प्रतिपाला ॥
मेरा मात पिता गुरु सतिगुरु पूरा गुर जल मिलि कमलु विगसै जीउ ॥3॥
मै बिनु गुर देखे नीद न आवै ॥
मेरे मन तनि वेदन गुर बिरहु लगावै ॥
हरि हरि दइआ करहु गुरु मेलहु जन नानक गुर मिलि रहसै जीउ ॥4॥2॥
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। गौड़ी राग का विस्तार ग्रंथ का सबसे लम्बा है। गुरु अर्जन की वाणी इसमें प्रमुख है, जो सत्रहवीं सदी के पहले दशक में संकलित हुई।
रामदास जी का जीवन-व्यवहार और रचना दोनों एक तरह की संगति में रहीं। अमृतसर का चयन, हरमंदिर साहिब का स्थल, और सूही राग की भावुक रचनाएँ, सब एक ही मनोदशा के अलग-अलग पहलू हैं।
इस अंग पर दो शबद बैठे हैं, एक के बाद दूसरा। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “रागु माझ चउपदे घरु 1 महला 4 सबका मालिक एक है, उसका नाम सत्य है, वह सृष्टि की रचना करने वाला सर्वशक्तिमान,निर्भय, निर्वेर, अकालमूर्ति, अयोनि एवं स्वयंभू है, जिसकी लब्धि गुरु की कृपा।”
पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।