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अंग 94

अंग
94
राग माझ
राग: माझ · रचयिता: Guru Raam Daas Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
रागु माझ चउपदे घरु 1 महला 4
ੴ सतिनामु करता पुरखु निरभउ निरवैरु अकाल मूरति अजूनी सैभं गुर प्रसादि ॥
हरि हरि नामु मै हरि मनि भाइआ ॥
वडभागी हरि नामु धिआइआ ॥
गुरि पूरै हरि नाम सिधि पाई को विरला गुरमति चलै जीउ ॥1॥
मै हरि हरि खरचु लइआ बंनि पलै ॥
मेरा प्राण सखाई सदा नालि चलै ॥
गुरि पूरै हरि नामु दिड़ाइआ हरि निहचलु हरि धनु पलै जीउ ॥2॥
हरि हरि सजणु मेरा प्रीतमु राइआ ॥
कोई आणि मिलावै मेरे प्राण जीवाइआ ॥
हउ रहि न सका बिनु देखे प्रीतमा मै नीरु वहे वहि चलै जीउ ॥3॥
सतिगुरु मित्रु मेरा बाल सखाई ॥
हउ रहि न सका बिनु देखे मेरी माई ॥
हरि जीउ क्रिपा करहु गुरु मेलहु जन नानक हरि धनु पलै जीउ ॥4॥1॥
गुरु रामदास जी ने 1577 के क़रीब अमृतसर शहर की नींव रखी, और हरमंदिर साहिब का स्थान चुना। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य-प्रेम की tasviren बार-बार लौटती हैं।

हिन्दी अर्थ: रागु माझ चउपदे घरु 1 महला 4 सबका मालिक एक है, उसका नाम सत्य है, वह सृष्टि की रचना करने वाला सर्वशक्तिमान,निर्भय, निर्वेर, अकालमूर्ति, अयोनि एवं स्वयंभू है, जिसकी लब्धि गुरु की कृपा से होती है। परमात्मा का नाम मेरे मन को प्यारा लग रहा है, परमात्मा मुझे मन में भा रहा है। बड़े भाग्यों से (ही) मैंने परमात्मा का नाम सिमरा है। परमात्मा का नाम सिमरन की ये सफलता मैंने पूरे गुरू से हासिल की है (जिस पर गुरू की मेहर हो, उसे ये दात मिलती है) कोई विरला (भाग्यशाली) गुरू की मति पर चलता है (और नाम सिमरन करता है)।1। (पूरे गुरू की मेहर से) मैंने परमात्मा का नाम (अपने जीवन सफर के वास्ते) खर्च पल्ले से बांध लिया है। ये हरि का नाम मेरी जिंद का साथी बन गया है। (अब ये) सदा मेरे साथ रहता है (मेरे दिल में टिका रहता है)। पूरे गुरू ने (ये) हरि नाम (मेरे दिल में) पक्का करके टिका दिया है। हरि नाम धन मेरे पास अब सदा टिके रहने वाला धन हो गया है।2। परमात्मा (ही) मेरा (असल) सज्जन है। परमात्मा ही मेरा प्रीतम पातशाह है। मुझे आत्मिक जीवन देने वाला है। (मेरी हर समय तमन्ना है कि) कोई (गुरमुख वह प्रीतम) ला के मुझे मिला दे। हे मेरे प्रीतम प्रभू ! मैं आपका दर्शन किये बिना नहीं रह सकता (आपके विछोड़े में मेरी आँखों में से बिरह का) पानी निरंतर चल पड़ता है।3। हे मेरी माँ ! गुरू मेरा (ऐसा) मित्र है (जैसे) बचपन का साथी हो। मैं गुरू के दर्शन किये बगैर नहीं रह सकता (मुझे धैर्य नहीं आता)। हे दास नानक ! (कह) हे प्रभू जी ! जिस पे आप कृपा करते हो, उसे गुरू मिलाते हैं और उसके पल्ले हरि नाम धन इकट्ठा हो जाता है।4।1।
माझ महला 4 ॥
मधुसूदन मेरे मन तन प्राना ॥
हउ हरि बिनु दूजा अवरु न जाना ॥
कोई सजणु संतु मिलै वडभागी मै हरि प्रभु पिआरा दसै जीउ ॥1॥
हउ मनु तनु खोजी भालि भालाई ॥
किउ पिआरा प्रीतमु मिलै मेरी माई ॥
मिलि सतसंगति खोजु दसाई विचि संगति हरि प्रभु वसै जीउ ॥2॥
मेरा पिआरा प्रीतमु सतिगुरु रखवाला ॥
हम बारिक दीन करहु प्रतिपाला ॥
मेरा मात पिता गुरु सतिगुरु पूरा गुर जल मिलि कमलु विगसै जीउ ॥3॥
मै बिनु गुर देखे नीद न आवै ॥
मेरे मन तनि वेदन गुर बिरहु लगावै ॥
हरि हरि दइआ करहु गुरु मेलहु जन नानक गुर मिलि रहसै जीउ ॥4॥2॥
रामदास जी की रचनाओं में एक स्नेह-भरी लय है। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्र है, उन्हीं की रचना है, और उसी लय की प्रतिध्वनि इस शबद में भी सुनी जा सकती है।

हिन्दी अर्थ: माझ महला 4 ॥ परमात्मा मेरे मन का आसरा है, मेरे शरीर का (ज्ञानेंद्रियों का) आसरा है। परमात्मा के बिना किसी और को मैं (जीवन का आसरा) नहीं समझता। सौभाग्य से मुझे कोई गुरमुख सज्जन मिल जाए और मुझे प्यारे प्रभू का पता बता दे।1। मैं ढूंढ के और ढूंढवा के अपना मन खोजता हूँ अपना शरीर खेजता हूँ, हे मेरी मां ! (इसलिए कि) कैसे मुझे प्यारा प्रीतम प्रभू मिल जाए। साध-संगत में (भी) मिल के (उस प्रीतम का) पता पूछता हूँ (क्योंकि वह) हरि प्रभू साध-संगति में बसता है।2। (हे प्रभू !) मुझे प्यारा प्रीतम गुरू मिला (वही विकारों से मेरी) रक्षा करने वाला है। (हे प्रभू !) हम आपके नादान बच्चे हैं। हमारी रक्षा कर। पूरा गुरू सत्गुरू (मुझे इस तरह प्यारा है, जैसे) मेरी मां और मेरा पिता है (जैसे) पानी को मिल के कमल फूल खिलता है (वैसे ही) गुरू को (मिल के मेरा हृदय गद्-गद् हो जाता है)।3। हे हरी ! गुरू का दर्शन किए बिनां मेरे मन को शांति नहीं आती। गुरू से विछोड़ा (एक ऐसी) पीड़ा (है, जो सदा) मेरे मन में मेरे तन में लगी रहती है। हे हरी ! (मेरे पर) मेहर कर (और मुझे) गुरू मिला। हे दास नानक ! (स्वयं-) गुरू को मिल के (मन) खिल उठॅता है।4।2।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। गौड़ी राग का विस्तार ग्रंथ का सबसे लम्बा है। गुरु अर्जन की वाणी इसमें प्रमुख है, जो सत्रहवीं सदी के पहले दशक में संकलित हुई।

रामदास जी का जीवन-व्यवहार और रचना दोनों एक तरह की संगति में रहीं। अमृतसर का चयन, हरमंदिर साहिब का स्थल, और सूही राग की भावुक रचनाएँ, सब एक ही मनोदशा के अलग-अलग पहलू हैं।

इस अंग पर दो शबद बैठे हैं, एक के बाद दूसरा। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “रागु माझ चउपदे घरु 1 महला 4 सबका मालिक एक है, उसका नाम सत्य है, वह सृष्टि की रचना करने वाला सर्वशक्तिमान,निर्भय, निर्वेर, अकालमूर्ति, अयोनि एवं स्वयंभू है, जिसकी लब्धि गुरु की कृपा।”

पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।