अंग
120
राग माझ
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਮਨਸਾ ਮਾਰਿ ਸਚਿ ਸਮਾਣੀ ॥
ਇਨਿ ਮਨਿ ਡੀਠੀ ਸਭ ਆਵਣ ਜਾਣੀ ॥
ਸਤਿਗੁਰੁ ਸੇਵੇ ਸਦਾ ਮਨੁ ਨਿਹਚਲੁ ਨਿਜ ਘਰਿ ਵਾਸਾ ਪਾਵਣਿਆ ॥੩॥
ਗੁਰ ਕੈ ਸਬਦਿ ਰਿਦੈ ਦਿਖਾਇਆ ॥
ਮਾਇਆ ਮੋਹੁ ਸਬਦਿ ਜਲਾਇਆ ॥
ਸਚੋ ਸਚਾ ਵੇਖਿ ਸਾਲਾਹੀ ਗੁਰ ਸਬਦੀ ਸਚੁ ਪਾਵਣਿਆ ॥੪॥
ਜੋ ਸਚਿ ਰਾਤੇ ਤਿਨ ਸਚੀ ਲਿਵ ਲਾਗੀ ॥
ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਸਮਾਲਹਿ ਸੇ ਵਡਭਾਗੀ ॥
ਸਚੈ ਸਬਦਿ ਆਪਿ ਮਿਲਾਏ ਸਤਸੰਗਤਿ ਸਚੁ ਗੁਣ ਗਾਵਣਿਆ ॥੫॥
ਲੇਖਾ ਪੜੀਐ ਜੇ ਲੇਖੇ ਵਿਚਿ ਹੋਵੈ ॥
ਓਹੁ ਅਗਮੁ ਅਗੋਚਰੁ ਸਬਦਿ ਸੁਧਿ ਹੋਵੈ ॥
ਅਨਦਿਨੁ ਸਚ ਸਬਦਿ ਸਾਲਾਹੀ ਹੋਰੁ ਕੋਇ ਨ ਕੀਮਤਿ ਪਾਵਣਿਆ ॥੬॥
ਪੜਿ ਪੜਿ ਥਾਕੇ ਸਾਂਤਿ ਨ ਆਈ ॥
ਤ੍ਰਿਸਨਾ ਜਾਲੇ ਸੁਧਿ ਨ ਕਾਈ ॥
ਬਿਖੁ ਬਿਹਾਝਹਿ ਬਿਖੁ ਮੋਹ ਪਿਆਸੇ ਕੂੜੁ ਬੋਲਿ ਬਿਖੁ ਖਾਵਣਿਆ ॥੭॥
ਗੁਰ ਪਰਸਾਦੀ ਏਕੋ ਜਾਣਾ ॥
ਦੂਜਾ ਮਾਰਿ ਮਨੁ ਸਚਿ ਸਮਾਣਾ ॥
ਨਾਨਕ ਏਕੋ ਨਾਮੁ ਵਰਤੈ ਮਨ ਅੰਤਰਿ ਗੁਰ ਪਰਸਾਦੀ ਪਾਵਣਿਆ ॥੮॥੧੭॥੧੮॥
ਇਨਿ ਮਨਿ ਡੀਠੀ ਸਭ ਆਵਣ ਜਾਣੀ ॥
ਸਤਿਗੁਰੁ ਸੇਵੇ ਸਦਾ ਮਨੁ ਨਿਹਚਲੁ ਨਿਜ ਘਰਿ ਵਾਸਾ ਪਾਵਣਿਆ ॥੩॥
ਗੁਰ ਕੈ ਸਬਦਿ ਰਿਦੈ ਦਿਖਾਇਆ ॥
ਮਾਇਆ ਮੋਹੁ ਸਬਦਿ ਜਲਾਇਆ ॥
ਸਚੋ ਸਚਾ ਵੇਖਿ ਸਾਲਾਹੀ ਗੁਰ ਸਬਦੀ ਸਚੁ ਪਾਵਣਿਆ ॥੪॥
ਜੋ ਸਚਿ ਰਾਤੇ ਤਿਨ ਸਚੀ ਲਿਵ ਲਾਗੀ ॥
ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਸਮਾਲਹਿ ਸੇ ਵਡਭਾਗੀ ॥
ਸਚੈ ਸਬਦਿ ਆਪਿ ਮਿਲਾਏ ਸਤਸੰਗਤਿ ਸਚੁ ਗੁਣ ਗਾਵਣਿਆ ॥੫॥
ਲੇਖਾ ਪੜੀਐ ਜੇ ਲੇਖੇ ਵਿਚਿ ਹੋਵੈ ॥
ਓਹੁ ਅਗਮੁ ਅਗੋਚਰੁ ਸਬਦਿ ਸੁਧਿ ਹੋਵੈ ॥
ਅਨਦਿਨੁ ਸਚ ਸਬਦਿ ਸਾਲਾਹੀ ਹੋਰੁ ਕੋਇ ਨ ਕੀਮਤਿ ਪਾਵਣਿਆ ॥੬॥
ਪੜਿ ਪੜਿ ਥਾਕੇ ਸਾਂਤਿ ਨ ਆਈ ॥
ਤ੍ਰਿਸਨਾ ਜਾਲੇ ਸੁਧਿ ਨ ਕਾਈ ॥
ਬਿਖੁ ਬਿਹਾਝਹਿ ਬਿਖੁ ਮੋਹ ਪਿਆਸੇ ਕੂੜੁ ਬੋਲਿ ਬਿਖੁ ਖਾਵਣਿਆ ॥੭॥
ਗੁਰ ਪਰਸਾਦੀ ਏਕੋ ਜਾਣਾ ॥
ਦੂਜਾ ਮਾਰਿ ਮਨੁ ਸਚਿ ਸਮਾਣਾ ॥
ਨਾਨਕ ਏਕੋ ਨਾਮੁ ਵਰਤੈ ਮਨ ਅੰਤਰਿ ਗੁਰ ਪਰਸਾਦੀ ਪਾਵਣਿਆ ॥੮॥੧੭॥੧੮॥
मनसा मारि सचि समाणी ॥
इनि मनि डीठी सभ आवण जाणी ॥
सतिगुरु सेवे सदा मनु निहचलु निज घरि वासा पावणिआ ॥३॥
गुर कै सबदि रिदै दिखाइआ ॥
माइआ मोहु सबदि जलाइआ ॥
सचो सचा वेखि सालाही गुर सबदी सचु पावणिआ ॥४॥
जो सचि राते तिन सची लिव लागी ॥
हरि नामु समालहि से वडभागी ॥
सचै सबदि आपि मिलाए सतसंगति सचु गुण गावणिआ ॥५॥
लेखा पड़ीऐ जे लेखे विचि होवै ॥
ओहु अगमु अगोचरु सबदि सुधि होवै ॥
अनदिनु सच सबदि सालाही होरु कोइ न कीमति पावणिआ ॥६॥
पड़ि पड़ि थाके सांति न आई ॥
त्रिसना जाले सुधि न काई ॥
बिखु बिहाझहि बिखु मोह पिआसे कूड़ु बोलि बिखु खावणिआ ॥७॥
गुर परसादी एको जाणा ॥
दूजा मारि मनु सचि समाणा ॥
नानक एको नामु वरतै मन अंतरि गुर परसादी पावणिआ ॥८॥१७॥१८॥
इनि मनि डीठी सभ आवण जाणी ॥
सतिगुरु सेवे सदा मनु निहचलु निज घरि वासा पावणिआ ॥३॥
गुर कै सबदि रिदै दिखाइआ ॥
माइआ मोहु सबदि जलाइआ ॥
सचो सचा वेखि सालाही गुर सबदी सचु पावणिआ ॥४॥
जो सचि राते तिन सची लिव लागी ॥
हरि नामु समालहि से वडभागी ॥
सचै सबदि आपि मिलाए सतसंगति सचु गुण गावणिआ ॥५॥
लेखा पड़ीऐ जे लेखे विचि होवै ॥
ओहु अगमु अगोचरु सबदि सुधि होवै ॥
अनदिनु सच सबदि सालाही होरु कोइ न कीमति पावणिआ ॥६॥
पड़ि पड़ि थाके सांति न आई ॥
त्रिसना जाले सुधि न काई ॥
बिखु बिहाझहि बिखु मोह पिआसे कूड़ु बोलि बिखु खावणिआ ॥७॥
गुर परसादी एको जाणा ॥
दूजा मारि मनु सचि समाणा ॥
नानक एको नामु वरतै मन अंतरि गुर परसादी पावणिआ ॥८॥१७॥१८॥
हिन्दी अर्थ: (मन को) मार के जिस मनुष्य की वासना सदा स्थिर प्रभू में लीन हो गई है~ उसने इस (टिके हुए) मन से इस सारे जनम मरन के चक्कर की खेल देख ली है (समझ ली है)। वह मनुष्य गुरू का आसरा लेता है~ उसका मन सदा वास्ते (माया के हमलों से) अडोल हो जाता है। वह अपने असल घर में (प्रभू चरणों में) ठिकाना हासिल कर लेता है। 3। (हे भाई !) गुरू के शबद ने (मुझे परमात्मा मेरे) हृदय में (बसता) दिखा दिया है। शबद ने (मेरे अंदर से) माया का मोह जला दिया है। (अब) मैं (हर जगह) उस सदा स्थिर प्रभू को देख के (उसकी) सिफत सालाह करता हूँ। (हे भाई !) गुरू के शबद में (जुड़ने वाले मनुष्य) सदा स्थिर प्रभू का मिलाप हासिल कर लेते हैं। 4। जो मनुष्य सदा स्थिर प्रभू (के नाम रंग) में रंगे जाते हैं~ उनके अंदर (प्रभू चरणों के वास्ते) सदा कायम रहने वाली लगन पैदा हो जाती है। वे बहुत भाग्यशाली मनुष्य प्रभू के नाम को (अपने हृदय में) सम्भाल के रखते हैं। जिन मनुष्यों को प्रभू स्वयं ही सिफत सालाह की बाणी में जोड़ता है~ वह साध-संगति में रह के सदा स्थिर प्रभू को सिमरते है। असके गुण गाते हैं। 5। (हे भाई !) उस परमात्मा की कुदरति का उसकी हस्ती का उसके गुणों का पूरा ज्ञान प्राप्त करने का प्रयत्न करना व्यर्थ है। उसका स्वरूप लेखों से बाहर हे। वह अपहुँच है~ मनुष्य के ज्ञानेंद्रियों तक उसकी पहुँच नही हो सकती। पर (परमात्मा की इस अगाधता की) समझ गुरू के शबद द्वारा ही होती है। मैं तो हर समय प्रभू की सिफत सालाह की बाणी के द्वारा उसकी सिफत सालाह करता हूँ। कोई भी और ऐसा नहीं जिस को परमात्मा के बराबर का कहा जा सके। 6। (परमात्मा का अंत पाने के लिए अनेकों पुस्तकें) पढ़ पढ़ के (विद्वान लोग) थक गए~ (प्रभू का स्वरूप भी ना समझ सके~ और) आत्मिक अडोलता (भी) प्राप्त ना हुई। बल्कि (माया की) तृष्णा (की आग) में ही जलते रहे। आत्मिक मौत लाने वाली वो माया रूपी जहर ही एकत्र करते रहते हैं। इस माया-जहर के मोह की ही उन्हें प्यास लगी रहती है। झूठ बोल के वो इस जहर को ही अपनी (आत्मिक खुराक) बनाए रखते हैं। 7। हे नानक ! जिस मनुष्य ने गुरू की कृपा से सिर्फ एक परमात्मा से ही गहरी सांझ डाली~ प्रभू के बिना अन्य प्यार को मार के उसका मन सदा स्थिर रहने वाले प्रभू में लीन हो गया। जिन के मन में सिर्फ परमात्मा का नाम ही बसता है~ वह गुरू की कृपा से (परमात्मा के चरणों में) मिलाप हासिल कर लेते हैं। 8। 17। 18।
ਮਾਝ ਮਹਲਾ ੩ ॥
ਵਰਨ ਰੂਪ ਵਰਤਹਿ ਸਭ ਤੇਰੇ ॥
ਮਰਿ ਮਰਿ ਜੰਮਹਿ ਫੇਰ ਪਵਹਿ ਘਣੇਰੇ ॥
ਤੂੰ ਏਕੋ ਨਿਹਚਲੁ ਅਗਮ ਅਪਾਰਾ ਗੁਰਮਤੀ ਬੂਝ ਬੁਝਾਵਣਿਆ ॥੧॥
ਹਉ ਵਾਰੀ ਜੀਉ ਵਾਰੀ ਰਾਮ ਨਾਮੁ ਮੰਨਿ ਵਸਾਵਣਿਆ ॥
ਤਿਸੁ ਰੂਪੁ ਨ ਰੇਖਿਆ ਵਰਨੁ ਨ ਕੋਈ ਗੁਰਮਤੀ ਆਪਿ ਬੁਝਾਵਣਿਆ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਸਭ ਏਕਾ ਜੋਤਿ ਜਾਣੈ ਜੇ ਕੋਈ ॥
ਸਤਿਗੁਰੁ ਸੇਵਿਐ ਪਰਗਟੁ ਹੋਈ ॥
ਗੁਪਤੁ ਪਰਗਟੁ ਵਰਤੈ ਸਭ ਥਾਈ ਜੋਤੀ ਜੋਤਿ ਮਿਲਾਵਣਿਆ ॥੨॥
ਤਿਸਨਾ ਅਗਨਿ ਜਲੈ ਸੰਸਾਰਾ ॥
ਲੋਭੁ ਅਭਿਮਾਨੁ ਬਹੁਤੁ ਅਹੰਕਾਰਾ ॥
ਮਰਿ ਮਰਿ ਜਨਮੈ ਪਤਿ ਗਵਾਏ ਅਪਣੀ ਬਿਰਥਾ ਜਨਮੁ ਗਵਾਵਣਿਆ ॥੩॥
ਗੁਰ ਕਾ ਸਬਦੁ ਕੋ ਵਿਰਲਾ ਬੂਝੈ ॥
ਆਪੁ ਮਾਰੇ ਤਾ ਤ੍ਰਿਭਵਣੁ ਸੂਝੈ ॥
ਫਿਰਿ ਓਹੁ ਮਰੈ ਨ ਮਰਣਾ ਹੋਵੈ ਸਹਜੇ ਸਚਿ ਸਮਾਵਣਿਆ ॥੪॥
ਮਾਇਆ ਮਹਿ ਫਿਰਿ ਚਿਤੁ ਨ ਲਾਏ ॥
ਗੁਰ ਕੈ ਸਬਦਿ ਸਦ ਰਹੈ ਸਮਾਏ ॥
ਸਚੁ ਸਲਾਹੇ ਸਭ ਘਟ ਅੰਤਰਿ ਸਚੋ ਸਚੁ ਸੁਹਾਵਣਿਆ ॥੫॥
ਸਚੁ ਸਾਲਾਹੀ ਸਦਾ ਹਜੂਰੇ ॥
ਗੁਰ ਕੈ ਸਬਦਿ ਰਹਿਆ ਭਰਪੂਰੇ ॥
ਗੁਰ ਪਰਸਾਦੀ ਸਚੁ ਨਦਰੀ ਆਵੈ ਸਚੇ ਹੀ ਸੁਖੁ ਪਾਵਣਿਆ ॥੬॥
ਸਚੁ ਮਨ ਅੰਦਰਿ ਰਹਿਆ ਸਮਾਇ ॥
ਸਦਾ ਸਚੁ ਨਿਹਚਲੁ ਆਵੈ ਨ ਜਾਇ ॥
ਸਚੇ ਲਾਗੈ ਸੋ ਮਨੁ ਨਿਰਮਲੁ ਗੁਰਮਤੀ ਸਚਿ ਸਮਾਵਣਿਆ ॥੭॥
ਸਚੁ ਸਾਲਾਹੀ ਅਵਰੁ ਨ ਕੋਈ ॥
ਜਿਤੁ ਸੇਵਿਐ ਸਦਾ ਸੁਖੁ ਹੋਈ ॥
ਵਰਨ ਰੂਪ ਵਰਤਹਿ ਸਭ ਤੇਰੇ ॥
ਮਰਿ ਮਰਿ ਜੰਮਹਿ ਫੇਰ ਪਵਹਿ ਘਣੇਰੇ ॥
ਤੂੰ ਏਕੋ ਨਿਹਚਲੁ ਅਗਮ ਅਪਾਰਾ ਗੁਰਮਤੀ ਬੂਝ ਬੁਝਾਵਣਿਆ ॥੧॥
ਹਉ ਵਾਰੀ ਜੀਉ ਵਾਰੀ ਰਾਮ ਨਾਮੁ ਮੰਨਿ ਵਸਾਵਣਿਆ ॥
ਤਿਸੁ ਰੂਪੁ ਨ ਰੇਖਿਆ ਵਰਨੁ ਨ ਕੋਈ ਗੁਰਮਤੀ ਆਪਿ ਬੁਝਾਵਣਿਆ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਸਭ ਏਕਾ ਜੋਤਿ ਜਾਣੈ ਜੇ ਕੋਈ ॥
ਸਤਿਗੁਰੁ ਸੇਵਿਐ ਪਰਗਟੁ ਹੋਈ ॥
ਗੁਪਤੁ ਪਰਗਟੁ ਵਰਤੈ ਸਭ ਥਾਈ ਜੋਤੀ ਜੋਤਿ ਮਿਲਾਵਣਿਆ ॥੨॥
ਤਿਸਨਾ ਅਗਨਿ ਜਲੈ ਸੰਸਾਰਾ ॥
ਲੋਭੁ ਅਭਿਮਾਨੁ ਬਹੁਤੁ ਅਹੰਕਾਰਾ ॥
ਮਰਿ ਮਰਿ ਜਨਮੈ ਪਤਿ ਗਵਾਏ ਅਪਣੀ ਬਿਰਥਾ ਜਨਮੁ ਗਵਾਵਣਿਆ ॥੩॥
ਗੁਰ ਕਾ ਸਬਦੁ ਕੋ ਵਿਰਲਾ ਬੂਝੈ ॥
ਆਪੁ ਮਾਰੇ ਤਾ ਤ੍ਰਿਭਵਣੁ ਸੂਝੈ ॥
ਫਿਰਿ ਓਹੁ ਮਰੈ ਨ ਮਰਣਾ ਹੋਵੈ ਸਹਜੇ ਸਚਿ ਸਮਾਵਣਿਆ ॥੪॥
ਮਾਇਆ ਮਹਿ ਫਿਰਿ ਚਿਤੁ ਨ ਲਾਏ ॥
ਗੁਰ ਕੈ ਸਬਦਿ ਸਦ ਰਹੈ ਸਮਾਏ ॥
ਸਚੁ ਸਲਾਹੇ ਸਭ ਘਟ ਅੰਤਰਿ ਸਚੋ ਸਚੁ ਸੁਹਾਵਣਿਆ ॥੫॥
ਸਚੁ ਸਾਲਾਹੀ ਸਦਾ ਹਜੂਰੇ ॥
ਗੁਰ ਕੈ ਸਬਦਿ ਰਹਿਆ ਭਰਪੂਰੇ ॥
ਗੁਰ ਪਰਸਾਦੀ ਸਚੁ ਨਦਰੀ ਆਵੈ ਸਚੇ ਹੀ ਸੁਖੁ ਪਾਵਣਿਆ ॥੬॥
ਸਚੁ ਮਨ ਅੰਦਰਿ ਰਹਿਆ ਸਮਾਇ ॥
ਸਦਾ ਸਚੁ ਨਿਹਚਲੁ ਆਵੈ ਨ ਜਾਇ ॥
ਸਚੇ ਲਾਗੈ ਸੋ ਮਨੁ ਨਿਰਮਲੁ ਗੁਰਮਤੀ ਸਚਿ ਸਮਾਵਣਿਆ ॥੭॥
ਸਚੁ ਸਾਲਾਹੀ ਅਵਰੁ ਨ ਕੋਈ ॥
ਜਿਤੁ ਸੇਵਿਐ ਸਦਾ ਸੁਖੁ ਹੋਈ ॥
माझ महला ३ ॥
वरन रूप वरतहि सभ तेरे ॥
मरि मरि जंमहि फेर पवहि घणेरे ॥
तूं एको निहचलु अगम अपारा गुरमती बूझ बुझावणिआ ॥१॥
हउ वारी जीउ वारी राम नामु मंनि वसावणिआ ॥
तिसु रूपु न रेखिआ वरनु न कोई गुरमती आपि बुझावणिआ ॥१॥ रहाउ ॥
सभ एका जोति जाणै जे कोई ॥
सतिगुरु सेविऐ परगटु होई ॥
गुपतु परगटु वरतै सभ थाई जोती जोति मिलावणिआ ॥२॥
तिसना अगनि जलै संसारा ॥
लोभु अभिमानु बहुतु अहंकारा ॥
मरि मरि जनमै पति गवाए अपणी बिरथा जनमु गवावणिआ ॥३॥
गुर का सबदु को विरला बूझै ॥
आपु मारे ता त्रिभवणु सूझै ॥
फिरि ओहु मरै न मरणा होवै सहजे सचि समावणिआ ॥४॥
माइआ महि फिरि चितु न लाए ॥
गुर कै सबदि सद रहै समाए ॥
सचु सलाहे सभ घट अंतरि सचो सचु सुहावणिआ ॥५॥
सचु सालाही सदा हजूरे ॥
गुर कै सबदि रहिआ भरपूरे ॥
गुर परसादी सचु नदरी आवै सचे ही सुखु पावणिआ ॥६॥
सचु मन अंदरि रहिआ समाइ ॥
सदा सचु निहचलु आवै न जाइ ॥
सचे लागै सो मनु निरमलु गुरमती सचि समावणिआ ॥७॥
सचु सालाही अवरु न कोई ॥
जितु सेविऐ सदा सुखु होई ॥
वरन रूप वरतहि सभ तेरे ॥
मरि मरि जंमहि फेर पवहि घणेरे ॥
तूं एको निहचलु अगम अपारा गुरमती बूझ बुझावणिआ ॥१॥
हउ वारी जीउ वारी राम नामु मंनि वसावणिआ ॥
तिसु रूपु न रेखिआ वरनु न कोई गुरमती आपि बुझावणिआ ॥१॥ रहाउ ॥
सभ एका जोति जाणै जे कोई ॥
सतिगुरु सेविऐ परगटु होई ॥
गुपतु परगटु वरतै सभ थाई जोती जोति मिलावणिआ ॥२॥
तिसना अगनि जलै संसारा ॥
लोभु अभिमानु बहुतु अहंकारा ॥
मरि मरि जनमै पति गवाए अपणी बिरथा जनमु गवावणिआ ॥३॥
गुर का सबदु को विरला बूझै ॥
आपु मारे ता त्रिभवणु सूझै ॥
फिरि ओहु मरै न मरणा होवै सहजे सचि समावणिआ ॥४॥
माइआ महि फिरि चितु न लाए ॥
गुर कै सबदि सद रहै समाए ॥
सचु सलाहे सभ घट अंतरि सचो सचु सुहावणिआ ॥५॥
सचु सालाही सदा हजूरे ॥
गुर कै सबदि रहिआ भरपूरे ॥
गुर परसादी सचु नदरी आवै सचे ही सुखु पावणिआ ॥६॥
सचु मन अंदरि रहिआ समाइ ॥
सदा सचु निहचलु आवै न जाइ ॥
सचे लागै सो मनु निरमलु गुरमती सचि समावणिआ ॥७॥
सचु सालाही अवरु न कोई ॥
जितु सेविऐ सदा सुखु होई ॥
हिन्दी अर्थ: माझ महला ३ ॥ (हे प्रभू ! जगत में बेअंत जीव हैं~ इन) सब में तेरे ही अलग अलग रूप दिखाई दे रहे हैं। (ये बेअंत जीव) बार बार पैदा होते मरते हैं~ इन्हें जनम मरण के कई चक्कर पड़े रहते हैं। (हे प्रभू !) सिर्फ तू ही अटॅल है अपहुँच है~ बेअंत है, ये समझ तू ही गुरू की मति पर चला के जीवों को देता है। 1। मैं उन मनुष्यों पर से सदा कुर्बान जाता हूँ~ जो परमात्मा का नाम अपने मन में बसाते हैं। उस परमात्मा का कोई खास रूप नहीं~ कोई खास चिन्ह-चक्र नहीं~ कोई खास रंग नहीं। वह स्वयं ही जीवों को गुरू की मति के द्वारा अपनी सूझ देता है। 1। रहाउ। सारी सृष्टि में एक परमात्मा की ही जोति मौजूद है। पर ये समझ किसी विरले मनुष्य को पड़ती है। गुरू की शरण पड़ने से ही (सभ जीवों में व्यापक जोति) प्रत्यक्ष दिखने लगती है। हर जगह परमात्मा की ज्योति गुप्त भी मौजूद है और प्रत्यक्ष भी। प्रभू की ज्योति हरेक जीव की ज्योति में मिली हुई है। 2। (हे भाई !) जगत (माया की) तृष्णा की अग्नि में जल रहा है~ (इस पर लोभ अभिमान अहंकार अपना अपना) जोर डाल रहे हैं। (तृष्णा की आग के कारण) जगत आत्मिक मौत झेल के जनम मरण के चक्कर में पड़ा हुआ है। अपनी इज्जत गवा रहा है और अपना मानस जनम व्यर्थ गवा रहा है। 3। कोई एक-आध (भाग्यशाली मनुष्य) गुरू के शबद को समझता है~ (जो समझता है~ वह जब अपने अंदर से) स्वै भाव दूर करता है~ तब वह परमात्मा को तीनों भवनों में व्यापक जान लेता है। (इस अवस्था पे पहुँच के) पुनः वह आत्मिक मौत नहीं झेलता। आत्मिक मौत उसके नजदीक नहीं फटकती। वह आत्मिक अडोलता में टिक के सदा स्थिर रहने वाले परमात्मा में लीन रहता है। 4। (ऐसी आत्मिक अवस्था पर पहुँचा हुआ मनुष्य) दुबारा कभी माया (के मोह) में अपना मन नहीं जोड़ता। वह गुरू के शबद की बरकति से सदा परमात्मा की याद में टिका रहता है। वह सदा स्थिर रहने वाले प्रभू की ही सिफत सालाह करता है। उसे यही दिखता है कि सारे शरीरों में वह सदा कायम रहने वाला परमात्मा ही शोभा दे रहा है। 5। (हे भाई !) मैं तो उस सदा स्थिर रहने वाले प्रभू की सिफत सालाह करता हूं~ जो सदा (सब जीवों के) अंग संग बसता है। गुरू के शबद में जुड़ने से वह हर जगह ही बसा हुआ दिखने लग पड़ता है। जिस मनुष्य को गुरू की कृपा से सदा कायम रहने वाला परमात्मा (हर जगह बसा हुआ) दिखाई देने लग पड़ता है। वह उस सदा स्थिर में ही लीन रह के आत्मिक आनंद लेता है। 6। सदा कायम रहने वाला परमात्मा हरेक मनुष्य के मन में मौजूद रहता है। वह स्वयं सदा अटॅल रहता है। ना कभी पैदा होता है~ ना मरता है। जो मन उस सदा स्थिर प्रभू में प्यार पा लेता है~ वह पवित्र हो जाता है। गुरू की मति पर चल करवह उस सदा स्थिर रहने वाले (की याद) में जुड़ा रहता है। 7। (हे भाई !) मैं सदा कायम रहने वाले परमातमा की ही सिफत सालाह करता हूँ। मुझे कहीं उस जैसा कोई और नहीं दिखता। उस सदा स्थिर प्रभू का सिमरन करने से सदैव आत्मिक आनंद बना रहता है।
स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
संदर्भ: यह अंग 120 है, राग माझ का हिस्सा। मुख्य रचयिता: Guru Amar Daas Ji।
Faridabad-Delhi border के पास सर्दियों की धुंध में सुबह का सूरज।
ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।
यह अंग कुल 44 पंक्तियों का है, 2 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 120” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।
राग के context में: माझ राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।
पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।
अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।
“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।
नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।
अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।
तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।
हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।
ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।
दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।
“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।
हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।
अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।
आगे का अंग: अंग 121 →, पीछे का: ← अंग 119।
हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।
(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)
शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।
संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।
शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।
संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।
एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।
अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।