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अंग 105

अंग
105
राग माझ
राग: माझ · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
करि किरपा प्रभु भगती लावहु सचु नानक अंम्रितु पीए जीउ ॥4॥28॥35॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: हे प्रभू ! जिस मनुष्य को आप कृपा करके अपनी भक्ति में जोड़ता है, वह आपका सदा स्थिर रहने वाला नाम अंम्रित पीता रहता है।4।28।35।
माझ महला 5 ॥
भए क्रिपाल गोविंद गुसाई ॥
मेघु वरसै सभनी थाई ॥
दीन दइआल सदा किरपाला ठाढि पाई करतारे जीउ ॥1॥
अपुने जीअ जंत प्रतिपारे ॥
जिउ बारिक माता संमारे ॥
दुख भंजन सुख सागर सुआमी देत सगल आहारे जीउ ॥2॥
जलि थलि पूरि रहिआ मिहरवाना ॥
सद बलिहारि जाईऐ कुरबाना ॥
रैणि दिनसु तिसु सदा धिआई जि खिन महि सगल उधारे जीउ ॥3॥
राखि लीए सगले प्रभि आपे ॥
उतरि गए सभ सोग संतापे ॥
नामु जपत मनु तनु हरीआवलु प्रभ नानक नदरि निहारे जीउ ॥4॥29॥36॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: माझ महला 5 ॥ सृष्टि का पति परमात्मा (वैसे ही सभ जीवों पर) दयावान होता है। (जैसे) बादल (ऊँचे-नीचे) हर जगह पर वर्षा करते हैं, उस करतार ने जो दीनों पर दया करने वाला है जो सदा ही कृपा का घर है (सेवकों के हृदय में नाम की बरकति से) शांति की दाति बख्शी हुई है।1। परमात्मा अपने (पैदा किए) सारे जीव जंतुओं की (वैसे ही)पालना करता है। (हे भाई !) जैसे माँ अपने बच्चों की संभाल करती है, (सब के) दुखों के नाश करने वाले और सुखों के समुंद्र मालिक प्रभू सब जीवों को खुराक देता है।2। (हे भाई !) मेहर करने वाला परमात्मा पानी में धरती में (हर जगह) व्याप रहा है। उससे सदके जाना चाहिए। कुर्बान होना चाहिए। (हे भाई !) जो परमातमा सब जीवों को एक पल में (संसार समुंद्र से) बचा सकता है, उसे दिन रात हर समय सिमरना चाहिए।3। (जो जो भाग्यशाली प्रभू की शरण आए) प्रभू ने वो सारे स्वयं (दुख कलेशों से) बचा लिए। उनके सारे चिंता फिक्र, सारे दु:ख कलेश दूर हो गए। परमातमा का नाम जपने से मनुष्य का मन, मनुष्य का शरीर में (उच्च आत्मिक जीवन की) हरियाली (का स्वरूप) बन जाती है। हे नानक ! (अरदास कर और कह) हे प्रभू ! (मेरे पर भी) मेहर की निगाह कर (मैं भी आपका नाम सिमरता रहूँ)।4।29।36।
माझ महला 5 ॥
जिथै नामु जपीऐ प्रभ पिआरे ॥
से असथल सोइन चउबारे ॥
जिथै नामु न जपीऐ मेरे गोइदा सेई नगर उजाड़ी जीउ ॥1॥
हरि रुखी रोटी खाइ समाले ॥
हरि अंतरि बाहरि नदरि निहाले ॥
खाइ खाइ करे बदफैली जाणु विसू की वाड़ी जीउ ॥2॥
संता सेती रंगु न लाए ॥
साकत संगि विकरम कमाए ॥
दुलभ देह खोई अगिआनी जड़ अपुणी आपि उपाड़ी जीउ ॥3॥
तेरी सरणि मेरे दीन दइआला ॥
सुख सागर मेरे गुर गोपाला ॥
करि किरपा नानकु गुण गावै राखहु सरम असाड़ी जीउ ॥4॥30॥37॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: माझ महला 5 ॥ (हे भाई !) जिस जगह पे प्यारे प्रभू का नाम सिमरते रहें, वह ऊची जीची जगह भी (मानो) सोने के चौबारे हैं। पर, हे मेरे गोबिंद ! जिस स्थान पे आपका नाम ना जपा जाए, वो (बसे हुए) शहर भी उजाड़ (समान) हैं।1। (हे भाई !) जो मनुष्य रूखी रोटी खा के भी परमात्मा (का नाम अपने हृदय में) संभाल के रखता है। परमात्मा उसके अंदर बाहर हर जगह उस पर अपनी मिहर की निगाह रखता है। जो मनुष्य दुनिया के पदार्थ खा खा के बुरे काम ही करता रहता है, उसे जहर की बगीची जानो।2। जो मनुष्य संत जनों के साथ प्रेम नहीं बनाता, और परमात्मा से टूटे हुए लोगों के साथ (मिल के) बुरे कर्म करता रहता है, उस बे-समझ ने ये अति कीमती शरीर व्यर्थ गवा लिया, वह अपनी जड़ें स्वयं ही काट रहा है।3। हे दीनों पर दया करने वाले मेरे प्रभू ! मैं आपकी शरण आया हूँ। हे सुखों के समुंद्र ! हे सृष्टि के सबसे बड़े पालक ! मेहर करो (आपका दास) नानक आपके गुण गाता रहे। (हे प्रभू !) हमारी लाज रखो (हम विकारों में ख्वार ना होएं)।4।30।47।
माझ महला 5 ॥
चरण ठाकुर के रिदै समाणे ॥
कलि कलेस सभ दूरि पइआणे ॥
सांति सूख सहज धुनि उपजी साधू संगि निवासा जीउ ॥1॥
लागी प्रीति न तूटै मूले ॥
हरि अंतरि बाहरि रहिआ भरपूरे ॥
सिमरि सिमरि सिमरि गुण गावा काटी जम की फासा जीउ ॥2॥
अंम्रितु वरखै अनहद बाणी ॥
मन तन अंतरि सांति समाणी ॥
त्रिपति अघाइ रहे जन तेरे सतिगुरि कीआ दिलासा जीउ ॥3॥
जिस का सा तिस ते फलु पाइआ ॥
करि किरपा प्रभ संगि मिलाइआ ॥
आवण जाण रहे वडभागी नानक पूरन आसा जीउ ॥4॥31॥38॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: माझ महला 5 ॥ उसके हृदय में पालनहार प्रभू के चरण (सदैव) टिके रहते हैं। उसके अंदर से सभ तरह के झगड़े दुख कलेश कूच कर जाते हैं और उसके हृदय में शांत आत्मिक आनंद आत्मिक अडोलता की लहिर पैदा हो जाती है, जिस मनुष्य का निवास गुरू की संगति में बना रहता है।1। प्रभू चरणों के साथ लगी हुई उसकी प्रीति बिल्कुल नहीं टूटती, और उसको अपने अंदर और बाहर जगत में हर जगह परमात्मा ही व्यापक दिखता है जो मनुष्य सदा परमात्मा का नाम सिमर सिमर के उसकी सिफत सलाह के गीत गाता रहता है, उसकी जमों की फाही काटी जाती है।2। उनके अंदर सिफत सलाह की बाणी की बरकति से एक रस नाम अंमृत की बरखा होती है। उनके मन में उनके शरीर में (ज्ञानेंद्रियों में) शांति टिकी रहती है।3। हे प्रभू ! जिन सौभाग्यशालियों को विकारों का टाकरा करने के लिए) गुरू ने हौसला दिया, वह आपके सेवक (माया की तृष्णा की ओर से) पूरी तरह से तृप्त हैं जाते हैं, उसने उस प्रभू से जीवन मनोरथ प्राप्त कर लिया, जिसका वह भेजा हुआ है। (गुरू ने) कृपा करके (जिस मनुष्य को) प्रभू के चरणों में जोड़ दिया हे नानक ! उस सौभाग्यशाली मनुष्य के जनम मरन के चक्कर खत्म हो गए, उसकी आशाएं पूरी हो गई (भाव, आसा-तृष्णा आदि उसे व्यथित, दुखी नही कर सकतीं)।4।31।38।
माझ महला 5 ॥
मीहु पइआ परमेसरि पाइआ ॥
जीअ जंत सभि सुखी वसाइआ ॥
गइआ कलेसु भइआ सुखु साचा हरि हरि नामु समाली जीउ ॥1॥
जिस के से तिन ही प्रतिपारे ॥
पारब्रहम प्रभ भए रखवारे ॥
सुणी बेनंती ठाकुरि मेरै पूरन होई घाली जीउ ॥2॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: माझ महला 5 ॥ (जैसे जैसे) बारिश हुई (जब) परमेश्वर ने बरसात की तो उसके सारे जीव जन्तु सुखी बसा दिए। (वैसे ही, ज्यों ज्यों) मैं परमात्मा का नाम अपने हृदय में बसाता हूँ मेरे अंदर से दुख कलेश खत्म होता जाता है और सदा स्थिर रहने वाला आत्मिक आनंद मेरे अंदर टिकता जाता है।1। (जैसे बरसात करके) पारब्रहम प्रभू उन सारे जीव जन्तुओं की पालना करता है जो उसने पैदा किए हुए हैं सबका रक्षक बनता है (वैसे ही उसके नाम की बरखा वास्ते जब जब मैंने विनती की तो) मेरे पालणहार प्रभू ने मेरी विनती सुनी और मेरी (सेवा भगती की) मेहनत सिरे चढ़ गई।2।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। गौड़ी राग का विस्तार ग्रंथ का सबसे लम्बा है। गुरु अर्जन की वाणी इसमें प्रमुख है, जो सत्रहवीं सदी के पहले दशक में संकलित हुई।

अर्जन देव जी एक compiler-कवि थे। उन्होंने अपने पूर्ववर्ती चार गुरुओं की वाणी, पन्द्रह हिन्दू भगतों की वाणी, ग्यारह भट्ट कवियों की प्रशंसा-वाणी, और अपनी स्वयं की सबसे बड़ी रचना-संख्या को एक साथ रख कर ग्रंथ का प्रथम-संकलन पूरा किया। यह क्षण सिख-इतिहास में 1604 का है।

इस अंग पर 5 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे प्रभू ! जिस मनुष्य को आप कृपा करके अपनी भक्ति में जोड़ता है, वह आपका सदा स्थिर रहने वाला नाम अंम्रित पीता रहता है।”

एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
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