अंग 124

अंग
124
राग माझ
राग: माझ · रचयिता: Guru Amar Daas Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਇਕਿ ਕੂੜਿ ਲਾਗੇ ਕੂੜੇ ਫਲ ਪਾਏ ॥
ਦੂਜੈ ਭਾਇ ਬਿਰਥਾ ਜਨਮੁ ਗਵਾਏ ॥
ਆਪਿ ਡੁਬੇ ਸਗਲੇ ਕੁਲ ਡੋਬੇ ਕੂੜੁ ਬੋਲਿ ਬਿਖੁ ਖਾਵਣਿਆ ॥੬॥
ਇਸੁ ਤਨ ਮਹਿ ਮਨੁ ਕੋ ਗੁਰਮੁਖਿ ਦੇਖੈ ॥
ਭਾਇ ਭਗਤਿ ਜਾ ਹਉਮੈ ਸੋਖੈ ॥
ਸਿਧ ਸਾਧਿਕ ਮੋਨਿਧਾਰੀ ਰਹੇ ਲਿਵ ਲਾਇ ਤਿਨ ਭੀ ਤਨ ਮਹਿ ਮਨੁ ਨ ਦਿਖਾਵਣਿਆ ॥੭॥
ਆਪਿ ਕਰਾਏ ਕਰਤਾ ਸੋਈ ॥
ਹੋਰੁ ਕਿ ਕਰੇ ਕੀਤੈ ਕਿਆ ਹੋਈ ॥
ਨਾਨਕ ਜਿਸੁ ਨਾਮੁ ਦੇਵੈ ਸੋ ਲੇਵੈ ਨਾਮੋ ਮੰਨਿ ਵਸਾਵਣਿਆ ॥੮॥੨੩॥੨੪॥
इकि कूड़ि लागे कूड़े फल पाए ॥
दूजै भाइ बिरथा जनमु गवाए ॥
आपि डुबे सगले कुल डोबे कूड़ु बोलि बिखु खावणिआ ॥६॥
इसु तन महि मनु को गुरमुखि देखै ॥
भाइ भगति जा हउमै सोखै ॥
सिध साधिक मोनिधारी रहे लिव लाइ तिन भी तन महि मनु न दिखावणिआ ॥७॥
आपि कराए करता सोई ॥
होरु कि करे कीतै किआ होई ॥
नानक जिसु नामु देवै सो लेवै नामो मंनि वसावणिआ ॥८॥२३॥२४॥

हिन्दी अर्थ: कई जीव ऐसे हैं जो नाशवंत जगत के मोह में ही फंसे रहते हैं वे फल भी वही प्राप्त करते हैं जिनसे साथ टूट जाता है (और इस तरह सदा) माया के मोह में ही रह के वे अपना मानस जनम व्यर्थ गवा लेते हैं। वे स्वयं माया के मोह में गलतान रहते हैं~ अपनी सारी कुलों को उस मोह में ही डुबोए रखते हैं~ वह सदा माया के मोह की ही बातें करके उस जहर को अपनी आत्मिक खुराक बनाए रखते हैं (जो उनकी आत्मिक मौत का कारण बनता है)। 6। (आम तौर पे हरेक मनुष्य माया के पदार्थों के पीछे ही भटकता फिरता है) गुरू के सन्मुख रहने वाला कोई विरला मनुष्य अपने मन को अपने इस शरीर के अंदर ही टिका हुआ देखता है। (पर ये तब ही होता है) जब वह प्रभू के प्रेम में प्रभू की भक्ति में टिक के (अपने अंदर से) अहंकार को खत्म कर देता है। पहुँचे हुए योगी~ योग साधना करने वाले योगी~ मौनधारी साधू सुरति जोड़ने का यत्न करते हैं~ पर वे भी अपने मन को शरीर के अंदर टिका हुआ नहीं देख सकते। 7। (पर~ जीवों के भी क्या वश?मन को काबू करने का और भक्ति में जुड़ने का उद्यम) वह करतार स्वयं ही (जीवों से) करवाता है। (अपने आप) कोई जीव क्या कर सकता है? करतार के पैदा किए हुए इस जीव द्वारा किए गए अपने उद्यम से कुछ नहीं हो सकता। हे नानक ! जिस मनुष्य को परमात्मा अपने नाम की दात देता है~ वही नाम सिमर सकता है। उस सदा प्रभू के नाम को ही अपने मन में बसाए रखता है। 8। 23। 24।
ਮਾਝ ਮਹਲਾ ੩ ॥
ਇਸੁ ਗੁਫਾ ਮਹਿ ਅਖੁਟ ਭੰਡਾਰਾ ॥
ਤਿਸੁ ਵਿਚਿ ਵਸੈ ਹਰਿ ਅਲਖ ਅਪਾਰਾ ॥
ਆਪੇ ਗੁਪਤੁ ਪਰਗਟੁ ਹੈ ਆਪੇ ਗੁਰ ਸਬਦੀ ਆਪੁ ਵੰਞਾਵਣਿਆ ॥੧॥
ਹਉ ਵਾਰੀ ਜੀਉ ਵਾਰੀ ਅੰਮ੍ਰਿਤ ਨਾਮੁ ਮੰਨਿ ਵਸਾਵਣਿਆ ॥
ਅੰਮ੍ਰਿਤ ਨਾਮੁ ਮਹਾ ਰਸੁ ਮੀਠਾ ਗੁਰਮਤੀ ਅੰਮ੍ਰਿਤੁ ਪੀਆਵਣਿਆ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਹਉਮੈ ਮਾਰਿ ਬਜਰ ਕਪਾਟ ਖੁਲਾਇਆ ॥
ਨਾਮੁ ਅਮੋਲਕੁ ਗੁਰ ਪਰਸਾਦੀ ਪਾਇਆ ॥
ਬਿਨੁ ਸਬਦੈ ਨਾਮੁ ਨ ਪਾਏ ਕੋਈ ਗੁਰ ਕਿਰਪਾ ਮੰਨਿ ਵਸਾਵਣਿਆ ॥੨॥
ਗੁਰ ਗਿਆਨ ਅੰਜਨੁ ਸਚੁ ਨੇਤ੍ਰੀ ਪਾਇਆ ॥
ਅੰਤਰਿ ਚਾਨਣੁ ਅਗਿਆਨੁ ਅੰਧੇਰੁ ਗਵਾਇਆ ॥
ਜੋਤੀ ਜੋਤਿ ਮਿਲੀ ਮਨੁ ਮਾਨਿਆ ਹਰਿ ਦਰਿ ਸੋਭਾ ਪਾਵਣਿਆ ॥੩॥
ਸਰੀਰਹੁ ਭਾਲਣਿ ਕੋ ਬਾਹਰਿ ਜਾਏ ॥ ਨਾਮੁ ਨ ਲਹੈ ਬਹੁਤੁ ਵੇਗਾਰਿ ਦੁਖੁ ਪਾਏ ॥
ਮਨਮੁਖ ਅੰਧੇ ਸੂਝੈ ਨਾਹੀ ਫਿਰਿ ਘਿਰਿ ਆਇ ਗੁਰਮੁਖਿ ਵਥੁ ਪਾਵਣਿਆ ॥੪॥
ਗੁਰ ਪਰਸਾਦੀ ਸਚਾ ਹਰਿ ਪਾਏ ॥
ਮਨਿ ਤਨਿ ਵੇਖੈ ਹਉਮੈ ਮੈਲੁ ਜਾਏ ॥
ਬੈਸਿ ਸੁਥਾਨਿ ਸਦ ਹਰਿ ਗੁਣ ਗਾਵੈ ਸਚੈ ਸਬਦਿ ਸਮਾਵਣਿਆ ॥੫॥
ਨਉ ਦਰ ਠਾਕੇ ਧਾਵਤੁ ਰਹਾਏ ॥
ਦਸਵੈ ਨਿਜ ਘਰਿ ਵਾਸਾ ਪਾਏ ॥
ਓਥੈ ਅਨਹਦ ਸਬਦ ਵਜਹਿ ਦਿਨੁ ਰਾਤੀ ਗੁਰਮਤੀ ਸਬਦੁ ਸੁਣਾਵਣਿਆ ॥੬॥
ਬਿਨੁ ਸਬਦੈ ਅੰਤਰਿ ਆਨੇਰਾ ॥
ਨ ਵਸਤੁ ਲਹੈ ਨ ਚੂਕੈ ਫੇਰਾ ॥
ਸਤਿਗੁਰ ਹਥਿ ਕੁੰਜੀ ਹੋਰਤੁ ਦਰੁ ਖੁਲੈ ਨਾਹੀ ਗੁਰੁ ਪੂਰੈ ਭਾਗਿ ਮਿਲਾਵਣਿਆ ॥੭॥
ਗੁਪਤੁ ਪਰਗਟੁ ਤੂੰ ਸਭਨੀ ਥਾਈ ॥
ਗੁਰ ਪਰਸਾਦੀ ਮਿਲਿ ਸੋਝੀ ਪਾਈ ॥
ਨਾਨਕ ਨਾਮੁ ਸਲਾਹਿ ਸਦਾ ਤੂੰ ਗੁਰਮੁਖਿ ਮੰਨਿ ਵਸਾਵਣਿਆ ॥੮॥੨੪॥੨੫॥
माझ महला ३ ॥
इसु गुफा महि अखुट भंडारा ॥
तिसु विचि वसै हरि अलख अपारा ॥
आपे गुपतु परगटु है आपे गुर सबदी आपु वंञावणिआ ॥१॥
हउ वारी जीउ वारी अंम्रित नामु मंनि वसावणिआ ॥
अंम्रित नामु महा रसु मीठा गुरमती अंम्रितु पीआवणिआ ॥१॥ रहाउ ॥
हउमै मारि बजर कपाट खुलाइआ ॥
नामु अमोलकु गुर परसादी पाइआ ॥
बिनु सबदै नामु न पाए कोई गुर किरपा मंनि वसावणिआ ॥२॥
गुर गिआन अंजनु सचु नेत्री पाइआ ॥
अंतरि चानणु अगिआनु अंधेरु गवाइआ ॥
जोती जोति मिली मनु मानिआ हरि दरि सोभा पावणिआ ॥३॥
सरीरहु भालणि को बाहरि जाए ॥ नामु न लहै बहुतु वेगारि दुखु पाए ॥
मनमुख अंधे सूझै नाही फिरि घिरि आइ गुरमुखि वथु पावणिआ ॥४॥
गुर परसादी सचा हरि पाए ॥
मनि तनि वेखै हउमै मैलु जाए ॥
बैसि सुथानि सद हरि गुण गावै सचै सबदि समावणिआ ॥५॥
नउ दर ठाके धावतु रहाए ॥
दसवै निज घरि वासा पाए ॥
ओथै अनहद सबद वजहि दिनु राती गुरमती सबदु सुणावणिआ ॥६॥
बिनु सबदै अंतरि आनेरा ॥
न वसतु लहै न चूकै फेरा ॥
सतिगुर हथि कुंजी होरतु दरु खुलै नाही गुरु पूरै भागि मिलावणिआ ॥७॥
गुपतु परगटु तूं सभनी थाई ॥
गुर परसादी मिलि सोझी पाई ॥
नानक नामु सलाहि सदा तूं गुरमुखि मंनि वसावणिआ ॥८॥२४॥२५॥

हिन्दी अर्थ: माझ महला ३ ॥ (योगी पहाड़ों की गुफाओं में बैठ के आत्मिक शक्तियां प्राप्त करने के यत्न करते हैं~ पर) इस शरीर गुफा में (आत्मिक गुणों के इतने) खजाने (भरे हुए हैं जो) खत्म होने वाले नहीं। (क्योंकि सारे गुणों का मालिक) अदृष्ट व बेअंत हरी इस शरीर में ही बसता है। जिन मनुष्यों ने गुरू के शबद में लीन हो के (अपने अंदर से) स्वै भाव दूर कर लिया उन्हें दिखाई देने लग पड़ता है कि परमात्मा स्वयं ही हर जगह मौजूद है। किसी को प्रत्यक्ष नजर आ जाता है और किसी को छुपा हुआ ही प्रतीत होता है। 1। (हे भाई !) मैं उनसे सदके जाता हूँ जो आत्मिक जीवन देने वालेहरी के नाम को अपने मन में बसाते हैं। आत्मिक जीवन दाता हरी नाम अत्यंत रसीला व मधुर है~ मीठा है। गुरू की मति पर चल कर ही ये नाम अंमृत पिया जा सकता है। 1। रहाउ। जिस मनुष्य ने (अपने अंदर से) अहंकार को मार के (अहम् के) कठोर कपाट खोल लिए हैं~ उसने गुरू की कृपा से वह नाम अंमृत (अंदर ही) ढूँढ लिया है जो किसी (दुनियावी पदार्थ के बदले) मोल में नहीं मिलता। गुरू के शबद (में जुड़े) बगैर कोई मनुष्य नाम अंमृत प्राप्त नहीं कर सकता। गुरू की कृपा से ही (हरी नाम) मन में बसाया जा सकता है। 2। जिस मनुष्य ने गुरू से ज्ञान का अंजन (सुर्मा) (अपनी आत्मिक) आँखों में डाला है~ उस के अंदर (आत्मिक) प्रकाश हो गया है। उसने (अपने अंदर से) अज्ञान अंधेरा दूर कर लिया है। उसकी सुरति प्रभू की ज्योति में लीन रहती है। उसका मन (प्रभू की याद में) मगन हो जाता है। वह मनुष्य परमात्मा के दर पे शोभा हासिल करता है। 3। (पर यदि कोई मनुष्य अपने) शरीर के बाहर (अर्थात जंगलों में~ पहाड़ों की गुफाओं में इस आत्मिक रोशनी को) तलाशने जाता है~उसे (ये आत्मिक प्रकाश देने वाला) हरी नाम तो नहीं मिलता~ (उल्टा) वह (बेगार में फंसे किसी) बेगारी की तरह दुख ही पाता है। अपने मन के पीछे चलने वाले माया के मोह में अंधे हुए मनुष्य को समझ नहीं पड़ती। (जंगलों पहाड़ों में खुआर हो हो के~ भटक के) आखिर वह आ के गुरू की शरण पड़ के ही नाम अंमृत प्राप्त करता है। 4। जब मनुष्य गुरू की कृपा से सदा स्थिर हरी का मिलाप प्राप्त करता है~ तो वह अपने मन में (ही) अपने तन में (ही) उसका दर्शन कर लेता है~ और उसके अंदर से अहंकार की मैल दूर हो जाती है। अपने शुद्ध हुए हृदय में ही बैठ के (भटकना रहित हो के) वह सदा परमात्मा के गुण गाता है~ गुरू के शबद द्वारा सदा स्थिर प्रभू में समाया रहता है। 5। जिस मनुष्य ने अपने नौ दरवाजे (नौ गोलकें) (विकारों के प्रभाव की ओर से) बंद कर लिए हैं~ जिस ने (विकारों की ओर) दौड़ता अपना मन काबू कर लिया है। उसने अपने चिक्त आकाश के द्वारा (अपनी ऊँची हुई सुरति के द्वारा) अपने असल घर में (प्रभू चरणों में) निवास प्राप्त कर लिया है। उस अवस्था में पहुँचे मनुष्य के अंदर (हृदय में) सदा एक रस परमात्माकी सिफत सालाह के बोल अपना प्रभाव डाले रखते हैं। वह दिन रात अपने गुरू की मति पर चल के सिफत सालाह की बाणी को ही अपनी सुरति में टिकाए रखता है। 6। गुरू के शबद के बिना मनुष्य के हृदय में माया के मोह का अंधकार बना रहता है। जिसके कारण उसे अपने अंदरनाम पदार्थ नहीं मिलता और उसके जनम मरन का चक्कर बना रहता है। (मोह के बज्र किवाड़ खोलने की) कुँजी गुरू के हाथ में ही है। किसी और तरीके से वह दरवाजा नहीं खुलता। और~ गुरू भी बहुत किस्मत से ही मिलता है। 7। हे प्रभू ! तू सब जगह मौजूद है। (किसी को) प्रत्यक्ष (दिखाई देता है और किसी के लिए) छुपा हुआ है। (तेरे सर्व-व्यापक होने की) समझ गुरू की कृपा से (तुझे) मिल के होती है। हे नानक ! तू (गुरू की शरण पड़ कर) सदा परमात्मा के नाम की सिफत सालाह करता रह। गुरू के सन्मुख रहने वाला मनुष्य प्रभू के नाम को अपने मन में बसा लेता है। 8। 24। 25।
ਮਾਝ ਮਹਲਾ ੩ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਮਿਲੈ ਮਿਲਾਏ ਆਪੇ ॥
ਕਾਲੁ ਨ ਜੋਹੈ ਦੁਖੁ ਨ ਸੰਤਾਪੇ ॥
ਹਉਮੈ ਮਾਰਿ ਬੰਧਨ ਸਭ ਤੋੜੈ ਗੁਰਮੁਖਿ ਸਬਦਿ ਸੁਹਾਵਣਿਆ ॥੧॥
ਹਉ ਵਾਰੀ ਜੀਉ ਵਾਰੀ ਹਰਿ ਹਰਿ ਨਾਮਿ ਸੁਹਾਵਣਿਆ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਗਾਵੈ ਗੁਰਮੁਖਿ ਨਾਚੈ ਹਰਿ ਸੇਤੀ ਚਿਤੁ ਲਾਵਣਿਆ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
माझ महला ३ ॥
गुरमुखि मिलै मिलाए आपे ॥
कालु न जोहै दुखु न संतापे ॥
हउमै मारि बंधन सभ तोड़ै गुरमुखि सबदि सुहावणिआ ॥१॥
हउ वारी जीउ वारी हरि हरि नामि सुहावणिआ ॥
गुरमुखि गावै गुरमुखि नाचै हरि सेती चितु लावणिआ ॥१॥ रहाउ ॥

हिन्दी अर्थ: माझ महला ३ ॥ जो मनुष्य गुरू का आसरा परना लेता है~ उसे परमात्मा मिल जाता है। परमात्मा स्वयं ही उसे गुरू मिलाता है। (ऐसे मनुष्य को) आत्मिक मौत अपनी नजर में नहीं रखती~ उसे कोई दुख कलेश सता नहीं सकता। गुरू के आसरे रहने वाला मनुष्य (अपने अंदर से) अहंकार को दूर करके (माया के मोह के) सारे बंधन तोड़ लेता है। गुरू के शबद द्वारा उसका जीवन खूबसूरत बन जाता है। 1। मैं उस मनुष्य से सदा सदके जाता हूँ~ जो परमात्मा के नाम में जुड़ के अपना जीवन सुंदर बना लेता है। गुरू के सन्मुख रहने वाला मनुष्य प्रभू के गुण गाता रहता है। उसका मन (नाम सिमरन के) हिलोरों में आया रहता है। गुरू का आसरा रखने वाला मनुष्य परमात्मा (के चरणों) के साथ अपना मन जोड़े रखता है। 1। रहाउ।

संदर्भ: यह अंग 124 है, राग माझ का हिस्सा। मुख्य रचयिता: Guru Amar Daas Ji।

दिल्ली-यूनिवर्सिटी के North Campus में exam-season की tension।

ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।

यह अंग कुल 41 पंक्तियों का है, 3 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 124” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।

राग के context में: माझ राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।

पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।

अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।

“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।

नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।

अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।

तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।

हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।

ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।

दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।

“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।

हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।

अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।

आगे का अंग: अंग 125 →, पीछे का: ← अंग 123

हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।

(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)

शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।

संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।

शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।

संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।

एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।

अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।

स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।