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अंग 146

अंग
146
राग माझ
राग: माझ · रचयिता: गुरु अंगद देव जी (महला 2)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
तीजै मुही गिराह भुख तिखा दुइ भउकीआ ॥
खाधा होइ सुआह भी खाणे सिउ दोसती ॥
चउथै आई ऊंघ अखी मीटि पवारि गइआ ॥
भी उठि रचिओनु वादु सै वरि॑आ की पिड़ बधी ॥
सभे वेला वखत सभि जे अठी भउ होइ ॥
नानक साहिबु मनि वसै सचा नावणु होइ ॥1॥
गुरु अंगद देव जी की शिक्षक-वाली शान्त-दृष्टि यहाँ काम कर रही है। 1539 में गुरु-गद्दी पर बैठने के बाद, उन्होंने गुरमुखी लिपि को व्यवस्थित किया, जिससे आगे की वाणी संग्रहित हो सकी।

हिन्दी अर्थ: तीसरे पहर भूख और प्यास दोनों चमक पड़ती हैं। रोटी खाने में (जीव) लग जाते हैं। (जब) जो कुछ खया होता है भस्म हो जाता है, तो और खाने की तमन्ना पैदा होती है। चौथे पहर नींद आ दबोचती है। आँखें बंद करके गहरी नींद के आगोश में सो जाता है। नींद से उठता है फिर वही जगत का झमेला। जैसे, मनुष्य ने (यहां) सैकड़ों साल जीने का कुश्ती मैदान बनाया हुआ है। (सो, अमृत बेला ही सिमरने के लिए जरूरी है, पर) जब (अमृत बेला के अभ्यास से) आठों पहर परमात्मा का डर-अदब (मन में) टिक जाए तो सारे बेला-वक्तों में (मन प्रभू चरणों में जुड़ सकता है)। (इस तरह) हे नानक ! (अगर आठों पहर) मालिक मन में बसा रहे, तो सदा टिके रहने वाला (आत्मिक) स्नान प्राप्त होता है। 1।
मः 2 ॥
सेई पूरे साह जिनी पूरा पाइआ ॥
अठी वेपरवाह रहनि इकतै रंगि ॥
दरसनि रूपि अथाह विरले पाईअहि ॥
करमि पूरै पूरा गुरू पूरा जा का बोलु ॥
नानक पूरा जे करे घटै नाही तोलु ॥2॥
अंगद जी की वाणी कम है, मगर हर एक रचना में एक संयम झलकता है। 1552 तक उनके गुरु-काल में लिपि-व्यवस्था और संगठन का काम सबसे अधिक हुआ।

हिन्दी अर्थ: महला 2॥ जिन मनुष्यों को पूरा प्रभू मिल जाता है वही पूरे शाह हैं। वे एक परमात्मा के रंग (प्यार) में आठों पहर (दुनिया की ओर से) बे-परवाह रहते हैं (भाव, किसी के मुथाज नहीं होते)। (पर ऐसे लोग) बहुत कम मिलते हैं, जो अथाह प्रभू के दीदार व स्वरूप में (हर वक्त जुड़े रहें)। पूरे बोल वाला पूर्ण गुरू पूरे भाग्य से, हे नानक ! जिस मनुष्य को पूर्ण बना देता है, उसका तोल घटता नहीं (अर्थात, ईश्वर के साथ उसका आठों पहर का संबंध कम नहीं होता)। 2।
पउड़ी ॥
जा तूं ता किआ होरि मै सचु सुणाईऐ ॥
मुठी धंधै चोरि महलु न पाईऐ ॥
एनै चिति कठोरि सेव गवाईऐ ॥
जितु घटि सचु न पाइ सु भंनि घड़ाईऐ ॥
किउ करि पूरै वटि तोलि तुलाईऐ ॥
कोइ न आखै घटि हउमै जाईऐ ॥
लईअनि खरे परखि दरि बीनाईऐ ॥
सउदा इकतु हटि पूरै गुरि पाईऐ ॥17॥
गुरु अंगद देव जी की शिक्षक-वाली शान्त-दृष्टि यहाँ काम कर रही है। 1539 में गुरु-गद्दी पर बैठने के बाद, उन्होंने गुरमुखी लिपि को व्यवस्थित किया, जिससे आगे की वाणी संग्रहित हो सकी।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी ॥ (हे प्रभू !) मैं सत्य कहता हूँ कि जब आप (मेरा रक्षक) है तो मुझे किसी और की अधीनगी नहीं। पर जिस (जीव-स्त्री) को जगत के धंधे रूपी चोर ने मोह लिया है, उससे आपका दर (महल) नहीं ढूँढा जाता। उसके कठोर चित्त के कारण (अपनी सारी) मेहनत व्यर्थ गवा ली है। जिस हृदय में सच नहीं बसा, वह हृदय सदैव टूटता बनता रहता है (अर्थात, उसके जनम मरण का चक्र बना रहता है), (जब उसके किए कर्मों का लेखा हो) वह पूरे बाँट के तोल में कैसे पूरा उतरे? हाँ, अगर जीव का अहम् दूर हो जाए, तो कोई इसे (तोले) कम नहीं ठहरा सकता। खरे जीव सियाने प्रभू के दर पे परख लिए जाते हैं, (ये) सौदा (जिससे प्रभू के दर पे कबूल हो सकते हैं) एक ही दुकान से पूरे गुरू से ही प्राप्त होता है। 17।
सलोक मः 2 ॥
अठी पहरी अठ खंड नावा खंडु सरीरु ॥
तिसु विचि नउ निधि नामु एकु भालहि गुणी गहीरु ॥
करमवंती सालाहिआ नानक करि गुरु पीरु ॥
चउथै पहरि सबाह कै सुरतिआ उपजै चाउ ॥
तिना दरीआवा सिउ दोसती मनि मुखि सचा नाउ ॥
ओथै अंम्रितु वंडीऐ करमी होइ पसाउ ॥
कंचन काइआ कसीऐ वंनी चड़ै चड़ाउ ॥
जे होवै नदरि सराफ की बहुड़ि न पाई ताउ ॥
सती पहरी सतु भला बहीऐ पड़िआ पासि ॥
ओथै पापु पुंनु बीचारीऐ कूड़ै घटै रासि ॥
ओथै खोटे सटीअहि खरे कीचहि साबासि ॥
बोलणु फादलु नानका दुखु सुखु खसमै पासि ॥1॥
अंगद जी की वाणी कम है, मगर हर एक रचना में एक संयम झलकता है। 1552 तक उनके गुरु-काल में लिपि-व्यवस्था और संगठन का काम सबसे अधिक हुआ।

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 2॥ अर्थ: अगर (धरती के 9 खण्डों में से) 9वां खण्ड मानव शरीर को मान लिया जाए, तो आठों पहर (मनुष्य के मन धरती के) सारे आठ खण्डी पदार्थों में लगा रहता है। (कोई विरले) नौ-निधि नाम ढूँढते हैं, अथाह गुणों वाले प्रभू को तलाशते हैं। हे नानक ! भाग्यशाली लोग गुरू पीर धारण करके इस (इस 9वें खण्ड शरीर) में (तलाशते हैं) सुबह के चौथे पहर (भाव अमृत बेला) ऊँची सुरति वाले लोगों के मन में (इस नौ-निधि नाम के लिए) चाव पैदा होता है। (उस वक्त) उनकी सांझ उन गुरमुखों के साथ बनती है (जिनके अंदर नाम का प्रवाह चल रहा है) और उनके मन तथा मुंह में सच्चा नाम बसता है। वहां (सत्संग में) नाम-अमृत बाँटा जाता है। प्रभू की मेहर से उन्हें नाम की दाति मिलती है। (जैसे ताउ, गरमी दे दे के) सोने (को कस लगाई जाती है, वैसे ही अमृत बेला की मेहनत की उनके) शरीर को कॅस लगाई जाती है तो (भगती) का बढ़िया रंग चढ़ता है। जब सर्राफ़ (प्रभू) के मेहर की नज़र होती है, तो फिर तपने (अर्थात, और मेहनत, मुशक्कतों) की जरूरत नहीं रहती। (आठवां पहर अमृत वेला प्रभू के चरणों में लगा के बाकी के) सात पहर भी भले आचरण (बनाने की आवश्यक्ता है) गुरमुखों के पास बैठना चाहिए। उनकी संगति में (बैठने से) अच्छे-बुरे कामों की विचार होती है। झूठ की पूँजी घटती है। क्योंकि उस संगति में खोटे कामों को फेंक दिया जाता है और खरे कामों की उपमा की जाती है। और, हे नानक ! वहां ये भी समझ आ जाती है कि किसी घटित दुख का गिला करना कितना व्यर्थ है, दुख-सुख वह पति परमेश्वर स्वयं ही देता है। 1।
मः 2 ॥
पउणु गुरू पाणी पिता माता धरति महतु ॥
दिनसु राति दुइ दाई दाइआ खेलै सगल जगतु ॥
चंगिआईआ बुरिआईआ वाचे धरमु हदूरि ॥
करमी आपो आपणी के नेड़ै के दूरि ॥
जिनी नामु धिआइआ गए मसकति घालि ॥
नानक ते मुख उजले होर केती छुटी नालि ॥2॥
गुरु अंगद देव जी की शिक्षक-वाली शान्त-दृष्टि यहाँ काम कर रही है। 1539 में गुरु-गद्दी पर बैठने के बाद, उन्होंने गुरमुखी लिपि को व्यवस्थित किया, जिससे आगे की वाणी संग्रहित हो सकी।

हिन्दी अर्थ: महला 2॥ हवा (जीवों का, जैसे) गुरू है (भाव, हवा शरीर के लिए ऐसे है, जैसे गुरू जीवों की आत्मा के लिए है), पानी (सब जीवों का) पिता है, और धरती (सबकी) बड़ी माँ है। दिन और रात खेल खिलाने वाले दाई और दाया है, (इनके साथ) सारा जगत खेल रहा है (भाव, संसार के सारे जीव रात को सोने में और दिन के कार-व्यवहार में खचित हैं)। धर्मराज बड़े ध्यान से (इनके) किए हुए अच्छे-बुरे काम (नित्य) विचारता है। और, अपने अपने (इन किये हुए) कर्मों के अनुसार कई जीव अकाल पुरख के नजदीक होते जा रहे हैं, और कई उससे दूर। हे नानक ! जिन मनुष्यों ने अकाल-पुरख का नाम सिमरा है, वे अपनी मेहनत सफल कर गए हैं। (प्रभू के दर पे) वे सुर्खरू हैं। और बहुत सारी दुनिया भी उनकी संगति में रह कर मुक्त हो जाती है। 2।
पउड़ी ॥
सचा भोजनु भाउ सतिगुरि दसिआ ॥
सचे ही पतीआइ सचि विगसिआ ॥
सचै कोटि गिरांइ निज घरि वसिआ ॥
सतिगुरि तुठै नाउ प्रेमि रहसिआ ॥
सचै दै दीबाणि कूड़ि न जाईऐ ॥
झूठो झूठु वखाणि सु महलु खुआईऐ ॥
अंगद जी की वाणी कम है, मगर हर एक रचना में एक संयम झलकता है। 1552 तक उनके गुरु-काल में लिपि-व्यवस्था और संगठन का काम सबसे अधिक हुआ।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी ॥ (जिस भाग्यशाली को) सत्गुरू ने (आत्मा के लिए) प्रभू प्रेम रूपी सच्चा भोजन बताया है, वह मनुष्य सच्चे प्रभू में पतीज जाता है। सच्चे प्रभू में टिक के प्रसन्न रहता है। वह (प्रभू के चरण रूपी) स्वै स्वरूप में बसता है (मानो) सदा स्थिर रहने वाले किले में गाँव में बसता है। गुरू के खुश होने पर ही प्रभू का नाम मिलता है, और प्रभू के प्रेम में रह के प्रसन्न चित्त खिले रह सकते हैं। सदा स्थिर रहने वाले परमात्मा के दरबार में झूठ के (सौदे) से नहीं पहुँच सकते, झूठ बोल बोल के प्रभू का निवास-स्थान गवा बैठते हैं।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। गौड़ी राग का विस्तार ग्रंथ का सबसे लम्बा है। गुरु अर्जन की वाणी इसमें प्रमुख है, जो सत्रहवीं सदी के पहले दशक में संकलित हुई।

अंगद जी के समय गुरमुखी ने अपनी रूप-रेखा पायी। उनकी अपनी रचनाएँ कम मगर पठनीय हैं, और बाद के गुरुओं की वाणी को संग्रहित-करने की संरचना उन्हीं की देन है।

इस अंग पर 6 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “तीसरे पहर भूख और प्यास दोनों चमक पड़ती हैं।”

पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।