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अंग 150

अंग
150
राग माझ
राग: माझ · रचयिता: गुरु नानक देव जी (महला 1)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
दयि विगोए फिरहि विगुते फिटा वतै गला ॥
जीआ मारि जीवाले सोई अवरु न कोई रखै ॥
दानहु तै इसनानहु वंजे भसु पई सिरि खुथै ॥
पाणी विचहु रतन उपंने मेरु कीआ माधाणी ॥
अठसठि तीरथ देवी थापे पुरबी लगै बाणी ॥
नाइ निवाजा नातै पूजा नावनि सदा सुजाणी ॥
मुइआ जीवदिआ गति होवै जां सिरि पाईऐ पाणी ॥
नानक सिरखुथे सैतानी एना गल न भाणी ॥
वुठै होइऐ होइ बिलावलु जीआ जुगति समाणी ॥
वुठै अंनु कमादु कपाहा सभसै पड़दा होवै ॥
वुठै घाहु चरहि निति सुरही सा धन दही विलोवै ॥
तितु घिइ होम जग सद पूजा पइऐ कारजु सोहै ॥
गुरू समुंदु नदी सभि सिखी नातै जितु वडिआई ॥
नानक जे सिरखुथे नावनि नाही ता सत चटे सिरि छाई ॥1॥
गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।

हिन्दी अर्थ: रॅब की ओर से (भी) टूटे हुए भटकते हैं (भाव, परमात्मा की बंदगी में भी इनकी कोई श्रद्धा नहीं) ये सारा मामला ही गड़बड़ है। (ये बेचारे नहीं समझते कि) जीवों को मारने जिवाने वाला प्रभू खुद ही है। प्रभू के बिना कोई और इनको (जीवित) रख नहीं सकता। (जीव हिंसा के वहिम में पड़ के, किरत कमाई छोड़ के) ये दान व स्नान से वंचित हुए हैं। राख पड़े ऐसे भ्रमित सिर पे। (ये लोग साफ पानी नहीं पीते और पानी में नहाते भी नहीं हैं। ये यह बात नहीं समझते कि जब देवताओं ने) सुमेर पर्वत को मथानी बना के (समुंद्र को बिलोया) तब (पानी में से) ही रत्न निकले थे (भाव, इस बात को तो लोग पुराने समयों से ही जानते हैं कि पानी में से बेअंत कीमती पदार्थ निकलते हैं, जो मनुष्य के काम आते हैं, आखिरवह पानी में घुसने से ही निकलेंगे)। (पानी की बरकति की वजह से ही) देवतों के वास्ते अठारह तीर्थ बनाए गए जहां पर्व लगते हैं, कथा-वारता होती है नहा के नमाज़ पढ़ी जाती है, नहा के ही पूजा होती है। स्वच्छ लोग नित्य स्नान करते हैं। सारी उम्र ही मनुष्य की स्वच्छ हालत तभी रह सकती है, अगर स्नान करे। पर, हे नानक ! ये सिर फिरे ऐसी उलटी राह पर पड़े हुए हैं (ऐसे शैतान हैं कि) इन्हें स्नान वाली बात ठीक नहीं लगी। (पानी की और बरकतें देखो) बरसात होने से (सब जीवों के अंदर) खुशी पैदा होती है। जीवों की जीवन जुगति ही (पानी में) टिकी हुई है। वर्षा होने से अन्न पैदा होता है, चारा उगता है, कपास होती है, जो सबका पर्दा बनती है। बरसात होने से ही (उगा हुआ) घास गाऐ चुगती हैं (और दूध देती हैं, उस दूध से बना) दही घर की औरत बिलोती है (और घी बनाती है), उस घी से ही सदा हवन-यॅग पूजा आदि होते हैं। ये घी पड़ने से ही हरेक कार्य शोभता है। (एक और स्नान भी है) सतिगुरू (मानो) समुंद्र है उसकी शिक्षा (जैसे) सारी नदियां हैं। (इस गुरू शिक्षा) में नहाने से (भाव, सुरति जोड़ने से) वडिआई मिलती है। हे नानक ! अगर ये सिरफिरे (इस ‘नाम’ जल में) स्नान नहीं करते, तो निरा मुंह की कालख ही कमाते हैं। 1।
मः 2 ॥
अगी पाला कि करे सूरज केही राति ॥
चंद अनेरा कि करे पउण पाणी किआ जाति ॥
धरती चीजी कि करे जिसु विचि सभु किछु होइ ॥
नानक ता पति जाणीऐ जा पति रखै सोइ ॥2॥
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।

हिन्दी अर्थ: महला 2॥ आग को पाला क्या कर सकता है? (पाला आग का कुछ नहीं बिगाड़ सकता) रात सूरज को नहीं बिगाड़ सकती। अंधकार चंद्रमा को कोई नुकसान नहीं पहुँचा सकता। (कोई ऊंची-नीची जाति) हवा और पानी को बिगाड़ नहीं सकती (भाव, कोई नीची जाति इन तत्वों को भ्रष्ट नहीं कर सकती)। जिस धरती में हरेक जीव पैदा होते हैं ये चीजें उस धरती को बिगाड़ नहीं सकती (ये तो पैदा ही धरती में से हुई हैं)। (इसी तरह) हे नानक ! वही इज्जत (असली) समझो (भाव, सिर्फ उसी इज्जत को कोई बिगाड़ नहीं सकता) जो इज्जत प्रभू से मिली है (प्रभू दर से जो आदर मिले उसे कोई जीव बिगाड़ नहीं सकता, इस दरगाही आदर के लिए उद्यम करो)। 2।
पउड़ी ॥
तुधु सचे सुबहानु सदा कलाणिआ ॥
तूं सचा दीबाणु होरि आवण जाणिआ ॥
सचु जि मंगहि दानु सि तुधै जेहिआ ॥
सचु तेरा फुरमानु सबदे सोहिआ ॥
मंनिऐ गिआनु धिआनु तुधै ते पाइआ ॥
करमि पवै नीसानु न चलै चलाइआ ॥
तूं सचा दातारु नित देवहि चड़हि सवाइआ ॥
नानकु मंगै दानु जो तुधु भाइआ ॥26॥
नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ हे सच्चे (प्रभू) !मैं आपको सदा ‘सुबहान’ (कह कह के) सालाहता हूं। आप ही सदा कायम रहने वाला हाकिम है। और सारे जीव पैदा होते मरते रहते हैं। (हे प्रभू !) जो लोग आपका सच्चा नाम रूपी दान आपसे मांगते हैं वे आपके जैसे हैं जाते हैं। आपका अटल हुकम (गुर-) शबद की बरकति से (उनको) मीठा लगता है। आपका हुकम मानने से असलियत की समझ व ऊूंची टिकी सुरति आपसे उन्हें हासिल होती है। आपकी मेहर से (उनके माथे पे ये सुहाना) लेख लिखा जाता है जो किसी के मिटाए नहीं मिटता। हे प्रभू ! आप सदा बख्शिशें करने वाला है। आप नित्य बख्शिशें करता है और बढ़-बढ़ के बख्शिशें किए जाता है। नानक (आपके दर से) वही दान मांगता है जो आपको अच्छा लगता है (भाव, आपकी रजा में राजी रहने का दान मांगता है)। 26।
सलोकु मः 2 ॥
दीखिआ आखि बुझाइआ सिफती सचि समेउ ॥
तिन कउ किआ उपदेसीऐ जिन गुरु नानक देउ ॥1॥
गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 2॥ हे नानक ! जिनका गुरदेव है (भाव, जिनके सिर पे गुरदेव है), जिन्हें (गुरू ने) शिक्षा दे के ज्ञान दिया है और सिफत सालाह द्वारा सच से जोड़ा है, उन्हें किसी और उपदेश की जरूरत नहीं रहती (अर्थात, प्रभू नाम में जुड़ने की शिक्षा से ऊची कोई शिक्षा नहीं है)। 1।
मः 1 ॥
आपि बुझाए सोई बूझै ॥
जिसु आपि सुझाए तिसु सभु किछु सूझै ॥
कहि कहि कथना माइआ लूझै ॥
हुकमी सगल करे आकार ॥
आपे जाणै सरब वीचार ॥
अखर नानक अखिओ आपि ॥
लहै भराति होवै जिसु दाति ॥2॥
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।

हिन्दी अर्थ: महला 1॥ जिस मनुष्य को प्रभू खुद मति देता है, उसे ही मति आती है। जिस मनुष्य को खुद सूझ बख्शता है, उसे (जीवन सफर की) हरेक बात की सूझ आ जाती है। (अगर ये मति और सूझ नहीं तो इसकी प्राप्ति बारे) कहे जाना कहे जाना (कोई लाभ नहीं देता) (मनुष्य अमली जीवन में) माया में ही जलता रहता है। सारे जीव-जन्तु प्रभू खुद ही अपने हुकम मुताबिक पैदा करता है। सारे जीवों के बारे में विचारें (उन्हें क्या कुछ देना है) प्रभू खुद ही जानता है। हे नानक ! जिस मनुष्य को उस अबिनाशी व अक्षय प्रभू से (सूझ-बूझ की) दाति मिलती है, उसके मन की भटकना दूर हो जाती है। 2।
पउड़ी ॥
हउ ढाढी वेकारु कारै लाइआ ॥
राति दिहै कै वार धुरहु फुरमाइआ ॥
ढाढी सचै महलि खसमि बुलाइआ ॥
सची सिफति सालाह कपड़ा पाइआ ॥
सचा अंम्रित नामु भोजनु आइआ ॥
गुरमती खाधा रजि तिनि सुखु पाइआ ॥
ढाढी करे पसाउ सबदु वजाइआ ॥
नानक सचु सालाहि पूरा पाइआ ॥27॥ सुधु
नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी ॥ मैं बेकार था। मुझे ढाढी बना के प्रभू ने (असल) काम में लगा दिया। प्रभू ने धुर से हुकम दिया कि चाहे रात हो दिन, जस (यश, गुणगान) करते रहो। मुझे ढाढी को (भाव, जब से मैं उसकी सिफत सालाह में लगा तो) पति ने अपने सच्चे महल में (अपनी हजूरी में) बुलाया। (उसने) सच्ची सिफत सालाह रूपी मुझे सिरोपाउ (आदर-सत्कार का प्रतीक रूपी कपड़ा) दिया। सदा कायम रहने वाला आत्मिक जीवन नाम (मेरे आत्मा के आधार के लिए मुझे) भोजन (उसकी ओर से) मिला। जिस जिस मनुष्य ने गुरू की शिक्षा पे चल के (ये ‘अमृत नामु भोजन’) पेट भर के खाया, उसने सुख पाया है। मैं ढाढी (भी ज्यों ज्यों) सिफत सालाह का गीत गाता हूँ, प्रभू दर से मिले इस नाम प्रसाद को खाता हूँ (भाव, नाम का आनंद लेता हूँ)। हे नानक ! सच्चे प्रभू की सिफत सालाह करके उस पूर्ण प्रभू की प्राप्ति होती है। 27। सुधु।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। गौड़ी राग का विस्तार ग्रंथ का सबसे लम्बा है। गुरु अर्जन की वाणी इसमें प्रमुख है, जो सत्रहवीं सदी के पहले दशक में संकलित हुई।

नानक का स्वर साफ़ है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पन्द्रहवीं सदी के अंतिम दशकों में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पहली बड़ी यात्रा पर थे। वो जो शब्द लाए, वो आज भी इसी ग्रंथ में पढ़े जाते हैं।

इस अंग पर 6 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “रॅब की ओर से (भी) टूटे हुए भटकते हैं (भाव, परमात्मा की बंदगी में भी इनकी कोई श्रद्धा नहीं) ये सारा मामला ही गड़बड़ है।”

पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।