अंग 119

अंग
119
राग माझ
राग: माझ · रचयिता: Guru Amar Daas Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਖੋਟੇ ਖਰੇ ਤੁਧੁ ਆਪਿ ਉਪਾਏ ॥
ਤੁਧੁ ਆਪੇ ਪਰਖੇ ਲੋਕ ਸਬਾਏ ॥
ਖਰੇ ਪਰਖਿ ਖਜਾਨੈ ਪਾਇਹਿ ਖੋਟੇ ਭਰਮਿ ਭੁਲਾਵਣਿਆ ॥੬॥
ਕਿਉ ਕਰਿ ਵੇਖਾ ਕਿਉ ਸਾਲਾਹੀ ॥
ਗੁਰ ਪਰਸਾਦੀ ਸਬਦਿ ਸਲਾਹੀ ॥
ਤੇਰੇ ਭਾਣੇ ਵਿਚਿ ਅੰਮ੍ਰਿਤੁ ਵਸੈ ਤੂੰ ਭਾਣੈ ਅੰਮ੍ਰਿਤੁ ਪੀਆਵਣਿਆ ॥੭॥
ਅੰਮ੍ਰਿਤ ਸਬਦੁ ਅੰਮ੍ਰਿਤ ਹਰਿ ਬਾਣੀ ॥
ਸਤਿਗੁਰਿ ਸੇਵਿਐ ਰਿਦੈ ਸਮਾਣੀ ॥
ਨਾਨਕ ਅੰਮ੍ਰਿਤ ਨਾਮੁ ਸਦਾ ਸੁਖਦਾਤਾ ਪੀ ਅੰਮ੍ਰਿਤੁ ਸਭ ਭੁਖ ਲਹਿ ਜਾਵਣਿਆ ॥੮॥੧੫॥੧੬॥
खोटे खरे तुधु आपि उपाए ॥
तुधु आपे परखे लोक सबाए ॥
खरे परखि खजानै पाइहि खोटे भरमि भुलावणिआ ॥६॥
किउ करि वेखा किउ सालाही ॥
गुर परसादी सबदि सलाही ॥
तेरे भाणे विचि अंम्रितु वसै तूं भाणै अंम्रितु पीआवणिआ ॥७॥
अंम्रित सबदु अंम्रित हरि बाणी ॥
सतिगुरि सेविऐ रिदै समाणी ॥
नानक अंम्रित नामु सदा सुखदाता पी अंम्रितु सभ भुख लहि जावणिआ ॥८॥१५॥१६॥

हिन्दी अर्थ: (हे प्रभू !) खोटे जीव और खरे जीव तेरे खुद के ही पैदा किए हुए हैं। तू स्वयं ही सारे जीवों (की करतूतों) को परखता रहता है। खरे जीवों को परख के तू अपने खजाने में डाल लेता है (अपने चरणों में जोड़ लेता है) और खोटे जीवों को भटकना में डाल के गलत रास्ते पर डाल देता है। 6। (हे करतार !) मैं (तेरा दास) किस तरह तेरे दर्शन करूं? किस तरह तेरी सिफत-सालाह करूं? (यदि तेरी अपनी ही मेहर हो~ और तू मुझे गुरू मिला दे~ तो) गुरू की कृपा से गुरू के शबद में लग के तेरी सिफत सलाह कर सकता हूँ। (हे प्रभू !) तेरे हुकमि से ही तेरा अमृत नाम (जीव के हृदय में) बसता है। तू अपने हुकम अनुसार ही अपना नाम-अंमृत (जीवों को) पिलाता है। 7। तब ही आत्मिक जीवन देने वाला गुरू शबद तब ही आत्मिक जीवन दाती सिफत सलाह की बाणी मनुष्य के हृदय में बस सकती है (हे भाई !) अगर सतिगुरू का आसरा-परना लिया जाए~ जब हे नानक ! आत्मिक जीवन देने वाला हरि नाम सदा आत्मिक आनंद देने वाला है। ये नाम अंमृत पीने से (माया की) सारी भूख उतर जाती है। 8। 15। 16।
ਮਾਝ ਮਹਲਾ ੩ ॥
ਅੰਮ੍ਰਿਤੁ ਵਰਸੈ ਸਹਜਿ ਸੁਭਾਏ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਵਿਰਲਾ ਕੋਈ ਜਨੁ ਪਾਏ ॥
ਅੰਮ੍ਰਿਤੁ ਪੀ ਸਦਾ ਤ੍ਰਿਪਤਾਸੇ ਕਰਿ ਕਿਰਪਾ ਤ੍ਰਿਸਨਾ ਬੁਝਾਵਣਿਆ ॥੧॥
ਹਉ ਵਾਰੀ ਜੀਉ ਵਾਰੀ ਗੁਰਮੁਖਿ ਅੰਮ੍ਰਿਤੁ ਪੀਆਵਣਿਆ ॥
ਰਸਨਾ ਰਸੁ ਚਾਖਿ ਸਦਾ ਰਹੈ ਰੰਗਿ ਰਾਤੀ ਸਹਜੇ ਹਰਿ ਗੁਣ ਗਾਵਣਿਆ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਗੁਰ ਪਰਸਾਦੀ ਸਹਜੁ ਕੋ ਪਾਏ ॥
ਦੁਬਿਧਾ ਮਾਰੇ ਇਕਸੁ ਸਿਉ ਲਿਵ ਲਾਏ ॥
ਨਦਰਿ ਕਰੇ ਤਾ ਹਰਿ ਗੁਣ ਗਾਵੈ ਨਦਰੀ ਸਚਿ ਸਮਾਵਣਿਆ ॥੨॥
ਸਭਨਾ ਉਪਰਿ ਨਦਰਿ ਪ੍ਰਭ ਤੇਰੀ ॥
ਕਿਸੈ ਥੋੜੀ ਕਿਸੈ ਹੈ ਘਣੇਰੀ ॥
ਤੁਝ ਤੇ ਬਾਹਰਿ ਕਿਛੁ ਨ ਹੋਵੈ ਗੁਰਮੁਖਿ ਸੋਝੀ ਪਾਵਣਿਆ ॥੩॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਤਤੁ ਹੈ ਬੀਚਾਰਾ ॥
ਅੰਮ੍ਰਿਤਿ ਭਰੇ ਤੇਰੇ ਭੰਡਾਰਾ ॥
ਬਿਨੁ ਸਤਿਗੁਰ ਸੇਵੇ ਕੋਈ ਨ ਪਾਵੈ ਗੁਰ ਕਿਰਪਾ ਤੇ ਪਾਵਣਿਆ ॥੪॥
ਸਤਿਗੁਰੁ ਸੇਵੈ ਸੋ ਜਨੁ ਸੋਹੈ ॥
ਅੰਮ੍ਰਿਤ ਨਾਮਿ ਅੰਤਰੁ ਮਨੁ ਮੋਹੈ ॥
ਅੰਮ੍ਰਿਤਿ ਮਨੁ ਤਨੁ ਬਾਣੀ ਰਤਾ ਅੰਮ੍ਰਿਤੁ ਸਹਜਿ ਸੁਣਾਵਣਿਆ ॥੫॥
ਮਨਮੁਖੁ ਭੂਲਾ ਦੂਜੈ ਭਾਇ ਖੁਆਏ ॥
ਨਾਮੁ ਨ ਲੇਵੈ ਮਰੈ ਬਿਖੁ ਖਾਏ ॥
ਅਨਦਿਨੁ ਸਦਾ ਵਿਸਟਾ ਮਹਿ ਵਾਸਾ ਬਿਨੁ ਸੇਵਾ ਜਨਮੁ ਗਵਾਵਣਿਆ ॥੬॥
ਅੰਮ੍ਰਿਤੁ ਪੀਵੈ ਜਿਸ ਨੋ ਆਪਿ ਪੀਆਏ ॥
ਗੁਰ ਪਰਸਾਦੀ ਸਹਜਿ ਲਿਵ ਲਾਏ ॥
ਪੂਰਨ ਪੂਰਿ ਰਹਿਆ ਸਭ ਆਪੇ ਗੁਰਮਤਿ ਨਦਰੀ ਆਵਣਿਆ ॥੭॥
ਆਪੇ ਆਪਿ ਨਿਰੰਜਨੁ ਸੋਈ ॥
ਜਿਨਿ ਸਿਰਜੀ ਤਿਨਿ ਆਪੇ ਗੋਈ ॥
ਨਾਨਕ ਨਾਮੁ ਸਮਾਲਿ ਸਦਾ ਤੂੰ ਸਹਜੇ ਸਚਿ ਸਮਾਵਣਿਆ ॥੮॥੧੬॥੧੭॥
माझ महला ३ ॥
अंम्रितु वरसै सहजि सुभाए ॥
गुरमुखि विरला कोई जनु पाए ॥
अंम्रितु पी सदा त्रिपतासे करि किरपा त्रिसना बुझावणिआ ॥१॥
हउ वारी जीउ वारी गुरमुखि अंम्रितु पीआवणिआ ॥
रसना रसु चाखि सदा रहै रंगि राती सहजे हरि गुण गावणिआ ॥१॥ रहाउ ॥
गुर परसादी सहजु को पाए ॥
दुबिधा मारे इकसु सिउ लिव लाए ॥
नदरि करे ता हरि गुण गावै नदरी सचि समावणिआ ॥२॥
सभना उपरि नदरि प्रभ तेरी ॥
किसै थोड़ी किसै है घणेरी ॥
तुझ ते बाहरि किछु न होवै गुरमुखि सोझी पावणिआ ॥३॥
गुरमुखि ततु है बीचारा ॥
अंम्रिति भरे तेरे भंडारा ॥
बिनु सतिगुर सेवे कोई न पावै गुर किरपा ते पावणिआ ॥४॥
सतिगुरु सेवै सो जनु सोहै ॥
अंम्रित नामि अंतरु मनु मोहै ॥
अंम्रिति मनु तनु बाणी रता अंम्रितु सहजि सुणावणिआ ॥५॥
मनमुखु भूला दूजै भाइ खुआए ॥
नामु न लेवै मरै बिखु खाए ॥
अनदिनु सदा विसटा महि वासा बिनु सेवा जनमु गवावणिआ ॥६॥
अंम्रितु पीवै जिस नो आपि पीआए ॥
गुर परसादी सहजि लिव लाए ॥
पूरन पूरि रहिआ सभ आपे गुरमति नदरी आवणिआ ॥७॥
आपे आपि निरंजनु सोई ॥
जिनि सिरजी तिनि आपे गोई ॥
नानक नामु समालि सदा तूं सहजे सचि समावणिआ ॥८॥१६॥१७॥

हिन्दी अर्थ: माझ महला ३ ॥ जब मनुष्य आत्मिक अडोलता में टिकता है~ प्रभू प्रेम में जुड़ता है~ तब उसके अंदर आत्मिक जीवन देने वाला नाम जल बरखा करता है। पर (ये दाति) कोई वह विरला मनुष्य हासिल करता है~ जो गुरू के बताए हुए रास्ते पे चलता है। आत्मिक जीवन देने वाला नाम जल पी के मनुष्य सदा के लिए (माया की ओर से) तृप्त हो जाते हैं। (प्रभू) मेहर करके उनकी तृष्णा बुझा देता है। 1। मैं सदा उनके सदके हूँ कुर्बान हूँ~ जो गुरू की शरण पड़ कर आत्मिक जीवन देने वाला नाम जल पीते हैं। जिनकी जीभ नाम रस चख के प्रभू के प्रेम रंग में सदा रंगी रहती है~ वह आत्मिक अडोलता में टिक के परमात्मा के गुण गाते रहते हैं। 1। रहाउ। गुरू की कृपा से कोई विरला मनुष्य आत्मिक अडोलता हासिल करता है। (जिसकी बरकति से) वह मन का दुचिक्तापन मार के सिर्फ परमात्मा (के चरणों) के साथ लगन लगाए रखता है। जब परमात्मा (किसी जीव पर मिहर की) निगाह करता है तब वह परमात्माके गुण गाता है~ और प्रभू की मेहर की नजर सेसदा स्थिर प्रभू में लीन रहता है। 2। हे प्रभू ! तेरी मेहर की निगाह सब जीवों पर ही है। किसी पे थोड़ी किसी पे बहुती। तुझसे बाहर (तेरी मेहर की निगाह के बगैर) कुछ नहीं होता- ये समझ उस मनुष्य को होती है जो गुरू की शरण पड़ता है। 3। गुरू के सन्मुख रहने वाले मनुष्य ने इस अस्लियत को समझा है। हे प्रभू ! आत्मिक जीवन देने वाले तेरे नाम जलसे तेरे खजाने भरे पड़े हैं। (गुरू के सन्मुख रहने वाला मनुष्य जानता है कि) गुरू की शरण पड़े बिना कोई मनुष्य नाम-अंमृत नही ले सकता। गुरू की कृपा से ही हासिल कर सकता है। 4। जो मनुष्य गुरू की शरण पड़ता है~ वह मनुष्य सुहाने जीवन वाला बन जाता है। आत्मिक जीवन देने वाले नाम में उसका अंदरूनी मन मस्त रहता है। उस मनुष्य का मन उस का तन नाम अंमृत से सिफत-सालाह की बाणी से रंगा जाता है। आत्मिक अडोलता में टिक के वह मनुष्य आत्मिक जीवन देने वाली नाम धुनि को सुनता रहता है। 5। पर अपने मन के पीछे चलने वाला मनुष्य गलत रास्ते पर पड़ जाता है। माया के प्यार में (खचित हो के) सही जीवन राह से वंचित हो जाता है। वह परमात्मा का नाम नहीं सिमरता। वह (माया का मोह रूपी) जहर खा के आत्मिक मौत ले लेता है। (गंदगी के कीड़े की तरह) उस मनुष्य का निवास सदा हर वक्त (विकारों के) गंद में ही रहता है। परमातमा की सेवा भक्ति के बिना वह अपना मानस जनम बरबाद कर लेता है। 6। (पर जीवों के भी क्या वश?) वही मनुष्य आत्मिक जीवन देने वाला नाम जल पीता है~ जिसे परमात्मा स्वयं मिलाता है। गुरू की कृपा से वह मनुष्य आत्मिक अडोलता में टिक के (प्रभू चरणों में) सुरति जोड़े रखता है। सतिगुरू की मति ले कर फिर उसे ये प्रत्यक्ष दिखता है कि हर जगह स्वयं मौजूद है। 7। (हे भाई !) माया के प्रभाव से ऊँचा रहने वाला परमात्मा हर जगह स्वयं ही मौजूद है। जिस परमात्मा ने ये सृष्टि पैदा की है वह स्वयं ही इसका नाश करता है। हे नानक ! तू उस परमात्मा का नाम सदा अपने हृदय में संभाल के रख। (नाम सिमरन की बरकति से) आत्मिक अडोलता में टिक के उस सदा स्थिर प्रभू में लीन रहता है। 8। 16। 17।
ਮਾਝ ਮਹਲਾ ੩ ॥
ਸੇ ਸਚਿ ਲਾਗੇ ਜੋ ਤੁਧੁ ਭਾਏ ॥
ਸਦਾ ਸਚੁ ਸੇਵਹਿ ਸਹਜ ਸੁਭਾਏ ॥
ਸਚੈ ਸਬਦਿ ਸਚਾ ਸਾਲਾਹੀ ਸਚੈ ਮੇਲਿ ਮਿਲਾਵਣਿਆ ॥੧॥
ਹਉ ਵਾਰੀ ਜੀਉ ਵਾਰੀ ਸਚੁ ਸਾਲਾਹਣਿਆ ॥
ਸਚੁ ਧਿਆਇਨਿ ਸੇ ਸਚਿ ਰਾਤੇ ਸਚੇ ਸਚਿ ਸਮਾਵਣਿਆ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਜਹ ਦੇਖਾ ਸਚੁ ਸਭਨੀ ਥਾਈ ॥
ਗੁਰ ਪਰਸਾਦੀ ਮੰਨਿ ਵਸਾਈ ॥
ਤਨੁ ਸਚਾ ਰਸਨਾ ਸਚਿ ਰਾਤੀ ਸਚੁ ਸੁਣਿ ਆਖਿ ਵਖਾਨਣਿਆ ॥੨॥
माझ महला ३ ॥
से सचि लागे जो तुधु भाए ॥
सदा सचु सेवहि सहज सुभाए ॥
सचै सबदि सचा सालाही सचै मेलि मिलावणिआ ॥१॥
हउ वारी जीउ वारी सचु सालाहणिआ ॥
सचु धिआइनि से सचि राते सचे सचि समावणिआ ॥१॥ रहाउ ॥
जह देखा सचु सभनी थाई ॥
गुर परसादी मंनि वसाई ॥
तनु सचा रसना सचि राती सचु सुणि आखि वखानणिआ ॥२॥

हिन्दी अर्थ: माझ महला ३ ॥ (हे प्रभू !) जो लोग तुझे अच्छे लगते हैं वह (तेरे) सदा-स्थिर नाम में जुड़े रहते हैं। वे आत्मिक अडोलता के भाव में (टिक के) सदा (तेरे) सदा स्थिर रहने वाले नाम को सिमरते हैं। (हे भाई ! यदि प्रभू की मेहर हो तो) मैं भी सदा स्थिर प्रभू के सिफत सालाह के शबद के द्वारा उस सदा स्थिर प्रभू की सिफत सालाह करता रहूँ। (जो सिफत सालाह करते हैं) वे सदा स्थिर रहने वाले प्रभू के चरणों में जुड़े रहते हैं। 1। मैं उनसे सदके हूँ कुर्बान हूँ~ जो सदा कायम रहने वाले परमात्मा की सिफत सालाह करते हैं। जो मनुष्य सदा स्थिर प्रभू का ध्यान धरते हैं~ वे उस सदा स्थिर में रंगे रहते हैं वे सदा ही सदा स्थिर में लीन रहते हैं। 1। रहाउ। (हे भाई !) मैं जिधर देखता हूँ~ सदा स्थिर परमात्मा हर जगह बसता है। गुरू की कृपा से ही मैं अपने मन में बसा सकता हूँ। जो मनुष्य उस सदा स्थिर प्रभू का नाम सुन के~ उच्चार के~ उसके गुण कथन करते हैं~ उनकी जीभ सदा स्थिर रहने वाले प्रभू (के नाम रंग) में ही रंगी जाती है~ उनके ज्ञानेंद्रियां अडोल हो जाती हैं। 2।

संदर्भ: यह अंग 119 है, राग माझ का हिस्सा। मुख्य रचयिता: Guru Amar Daas Ji।

Rajiv Chowk metro station की platform पर 9 PM की भीड़।

ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।

यह अंग कुल 45 पंक्तियों का है, 3 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 119” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।

राग के context में: माझ राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।

पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।

अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।

“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।

नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।

अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।

तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।

हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।

ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।

दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।

“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।

हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।

अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।

आगे का अंग: अंग 120 →, पीछे का: ← अंग 118

हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।

(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)

शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।

संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।

शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।

संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।

एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।

अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।

स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।