अंग 125

अंग
125
राग माझ
राग: माझ · रचयिता: Guru Amar Daas Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਗੁਰਮੁਖਿ ਜੀਵੈ ਮਰੈ ਪਰਵਾਣੁ ॥
ਆਰਜਾ ਨ ਛੀਜੈ ਸਬਦੁ ਪਛਾਣੁ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਮਰੈ ਨ ਕਾਲੁ ਨ ਖਾਏ ਗੁਰਮੁਖਿ ਸਚਿ ਸਮਾਵਣਿਆ ॥੨॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਹਰਿ ਦਰਿ ਸੋਭਾ ਪਾਏ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਵਿਚਹੁ ਆਪੁ ਗਵਾਏ ॥
ਆਪਿ ਤਰੈ ਕੁਲ ਸਗਲੇ ਤਾਰੇ ਗੁਰਮੁਖਿ ਜਨਮੁ ਸਵਾਰਣਿਆ ॥੩॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਦੁਖੁ ਕਦੇ ਨ ਲਗੈ ਸਰੀਰਿ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਹਉਮੈ ਚੂਕੈ ਪੀਰ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਮਨੁ ਨਿਰਮਲੁ ਫਿਰਿ ਮੈਲੁ ਨ ਲਾਗੈ ਗੁਰਮੁਖਿ ਸਹਜਿ ਸਮਾਵਣਿਆ ॥੪॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਨਾਮੁ ਮਿਲੈ ਵਡਿਆਈ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਗੁਣ ਗਾਵੈ ਸੋਭਾ ਪਾਈ ॥
ਸਦਾ ਅਨੰਦਿ ਰਹੈ ਦਿਨੁ ਰਾਤੀ ਗੁਰਮੁਖਿ ਸਬਦੁ ਕਰਾਵਣਿਆ ॥੫॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਅਨਦਿਨੁ ਸਬਦੇ ਰਾਤਾ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਜੁਗ ਚਾਰੇ ਹੈ ਜਾਤਾ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਗੁਣ ਗਾਵੈ ਸਦਾ ਨਿਰਮਲੁ ਸਬਦੇ ਭਗਤਿ ਕਰਾਵਣਿਆ ॥੬॥
ਬਾਝੁ ਗੁਰੂ ਹੈ ਅੰਧ ਅੰਧਾਰਾ ॥
ਜਮਕਾਲਿ ਗਰਠੇ ਕਰਹਿ ਪੁਕਾਰਾ ॥
ਅਨਦਿਨੁ ਰੋਗੀ ਬਿਸਟਾ ਕੇ ਕੀੜੇ ਬਿਸਟਾ ਮਹਿ ਦੁਖੁ ਪਾਵਣਿਆ ॥੭॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਆਪੇ ਕਰੇ ਕਰਾਏ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਹਿਰਦੈ ਵੁਠਾ ਆਪਿ ਆਏ ॥
ਨਾਨਕ ਨਾਮਿ ਮਿਲੈ ਵਡਿਆਈ ਪੂਰੇ ਗੁਰ ਤੇ ਪਾਵਣਿਆ ॥੮॥੨੫॥੨੬॥
गुरमुखि जीवै मरै परवाणु ॥
आरजा न छीजै सबदु पछाणु ॥
गुरमुखि मरै न कालु न खाए गुरमुखि सचि समावणिआ ॥२॥
गुरमुखि हरि दरि सोभा पाए ॥
गुरमुखि विचहु आपु गवाए ॥
आपि तरै कुल सगले तारे गुरमुखि जनमु सवारणिआ ॥३॥
गुरमुखि दुखु कदे न लगै सरीरि ॥
गुरमुखि हउमै चूकै पीर ॥
गुरमुखि मनु निरमलु फिरि मैलु न लागै गुरमुखि सहजि समावणिआ ॥४॥
गुरमुखि नामु मिलै वडिआई ॥
गुरमुखि गुण गावै सोभा पाई ॥
सदा अनंदि रहै दिनु राती गुरमुखि सबदु करावणिआ ॥५॥
गुरमुखि अनदिनु सबदे राता ॥
गुरमुखि जुग चारे है जाता ॥
गुरमुखि गुण गावै सदा निरमलु सबदे भगति करावणिआ ॥६॥
बाझु गुरू है अंध अंधारा ॥
जमकालि गरठे करहि पुकारा ॥
अनदिनु रोगी बिसटा के कीड़े बिसटा महि दुखु पावणिआ ॥७॥
गुरमुखि आपे करे कराए ॥
गुरमुखि हिरदै वुठा आपि आए ॥
नानक नामि मिलै वडिआई पूरे गुर ते पावणिआ ॥८॥२५॥२६॥

हिन्दी अर्थ: गुरू के सन्मुख रहने वाला मनुष्य आत्मिक जीवन प्राप्त कर लेता है और अहंकार की तरफ से मरा रहता है (इस तरह वह प्रभू की नजरों में) कबूल हो जाता है। उसकी उम्र व्यर्थ नहीं जाती। गुरू का शबद उसका जीवन साथी बना रहता है। गुरू के सन्मुख रहने वाला मनुष्य आत्मिक मौत से बचा रहता है। आत्मिक मौत उस पर कोई जोर नहीं डाल सकती। वह सदा स्थिर प्रभू की याद में लीन रहता है। 2। गुरू के आसरे परने रहने वाला मनुष्य परमात्मा के दर पर शोभा प्राप्त करता है। वह अपने अंदर से स्वै भाव दूर किए रखता है। वह स्वयं संसार समुंद्र (के विकारों से) पार लांघ जाता है। अपनी सारी कुलों को भी पार लंघा लेता है। गुरू के सन्मुख रहने वाला मनुष्य अपना जीवन सवार लेता है। 3। जो मनुष्य गुरू की शरण लेता है~ उसके शरीर में कभी हउमै का रोग नहीं लगता। उसके अंदर से अहंकार की पीड़ा समाप्त हो जाती है। गुरू के सन्मुख रहने वाले मनुष्य का मन अहम् की मैल से साफ रहता है~ (गुरू का आसरा लेने के कारण उसको) फिर (अहंकार की मैल) नही चिपकती~ वह आत्मिक अडोलता में लीन रहता है। 4। गुरू के सन्मुख रहने वाले मनुष्य को परमात्मा का नाम प्राप्त हो जाता है। (लोक परलोक में) आदर मिलता है। वह परमात्मा के गुण गाता है और (हर जगह) शोभा कमाता है। गुरू के दर पे टिके रहने के कारण मनुष्य सदा दिन रात आत्मिक आनंद में मगन रहता है। वह सदा परमात्मा की सिफत सालाह ही करता रहता है। 5। गुरू के सन्मुख रहने वाला मनुष्य हर वक्त गुरू के शबद में रंगा रहता है। सदा से ही ये नियम है कि गुरू के दर पर रहने वाला मनुष्य प्रभू के साथ गहरी सांझ बनाए रखता है। वह सदा परमात्मा के गुण गाता है और पवित्र जीवन वाला बना रहता है। गुरू के शबद द्वारा वह परमात्मा की भक्ति करता है। 6। गुरू की शरण पड़े बिना (माया के मोह का) घोर अंधेरा छाया रहता है। (इस अंधकार के कारण) जिन्हें आत्मिक मौत ने ग्रस लिया होता है वे (दुखी हो हो के) पुकारें करते रहते हैं (दुखों के गिले करते हैं)। वे हर वक्त विकारों के रोग में फंसे रहते हैं और दुख सहते रहते हैं। जैसे गंदगी के कीड़े गंदगी में ही कुरबल कुरबल करते रहते हैं। 7। जो मनुष्य गुरू की शरण में रहता है~ उसके हृदय में परमात्मा स्वयं आ बसता है। उसे फिर ये निश्चय हो जाता है कि (प्रभू सब जीवों में व्यापक हो के) स्वयं ही सब कुछ करता है ओर (जीवों से) करवाता है। हे नानक ! परमात्मा के नाम में जुड़ने से (लोक परलोक में) आदर मिलता है~ और (प्रभू का नाम) पूरे गुरू से (ही) मिलता है। 8। 25। 26।
ਮਾਝ ਮਹਲਾ ੩ ॥
ਏਕਾ ਜੋਤਿ ਜੋਤਿ ਹੈ ਸਰੀਰਾ ॥
ਸਬਦਿ ਦਿਖਾਏ ਸਤਿਗੁਰੁ ਪੂਰਾ ॥
ਆਪੇ ਫਰਕੁ ਕੀਤੋਨੁ ਘਟ ਅੰਤਰਿ ਆਪੇ ਬਣਤ ਬਣਾਵਣਿਆ ॥੧॥
ਹਉ ਵਾਰੀ ਜੀਉ ਵਾਰੀ ਹਰਿ ਸਚੇ ਕੇ ਗੁਣ ਗਾਵਣਿਆ ॥
ਬਾਝੁ ਗੁਰੂ ਕੋ ਸਹਜੁ ਨ ਪਾਏ ਗੁਰਮੁਖਿ ਸਹਜਿ ਸਮਾਵਣਿਆ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਤੂੰ ਆਪੇ ਸੋਹਹਿ ਆਪੇ ਜਗੁ ਮੋਹਹਿ ॥
ਤੂੰ ਆਪੇ ਨਦਰੀ ਜਗਤੁ ਪਰੋਵਹਿ ॥
ਤੂੰ ਆਪੇ ਦੁਖੁ ਸੁਖੁ ਦੇਵਹਿ ਕਰਤੇ ਗੁਰਮੁਖਿ ਹਰਿ ਦੇਖਾਵਣਿਆ ॥੨॥
ਆਪੇ ਕਰਤਾ ਕਰੇ ਕਰਾਏ ॥
ਆਪੇ ਸਬਦੁ ਗੁਰ ਮੰਨਿ ਵਸਾਏ ॥
ਸਬਦੇ ਉਪਜੈ ਅੰਮ੍ਰਿਤ ਬਾਣੀ ਗੁਰਮੁਖਿ ਆਖਿ ਸੁਣਾਵਣਿਆ ॥੩॥
ਆਪੇ ਕਰਤਾ ਆਪੇ ਭੁਗਤਾ ॥
ਬੰਧਨ ਤੋੜੇ ਸਦਾ ਹੈ ਮੁਕਤਾ ॥
ਸਦਾ ਮੁਕਤੁ ਆਪੇ ਹੈ ਸਚਾ ਆਪੇ ਅਲਖੁ ਲਖਾਵਣਿਆ ॥੪॥
ਆਪੇ ਮਾਇਆ ਆਪੇ ਛਾਇਆ ॥
ਆਪੇ ਮੋਹੁ ਸਭੁ ਜਗਤੁ ਉਪਾਇਆ ॥
ਆਪੇ ਗੁਣਦਾਤਾ ਗੁਣ ਗਾਵੈ ਆਪੇ ਆਖਿ ਸੁਣਾਵਣਿਆ ॥੫॥
ਆਪੇ ਕਰੇ ਕਰਾਏ ਆਪੇ ॥
ਆਪੇ ਥਾਪਿ ਉਥਾਪੇ ਆਪੇ ॥
ਤੁਝ ਤੇ ਬਾਹਰਿ ਕਛੂ ਨ ਹੋਵੈ ਤੂੰ ਆਪੇ ਕਾਰੈ ਲਾਵਣਿਆ ॥੬॥
ਆਪੇ ਮਾਰੇ ਆਪਿ ਜੀਵਾਏ ॥
ਆਪੇ ਮੇਲੇ ਮੇਲਿ ਮਿਲਾਏ ॥
ਸੇਵਾ ਤੇ ਸਦਾ ਸੁਖੁ ਪਾਇਆ ਗੁਰਮੁਖਿ ਸਹਜਿ ਸਮਾਵਣਿਆ ॥੭॥
माझ महला ३ ॥
एका जोति जोति है सरीरा ॥
सबदि दिखाए सतिगुरु पूरा ॥
आपे फरकु कीतोनु घट अंतरि आपे बणत बणावणिआ ॥१॥
हउ वारी जीउ वारी हरि सचे के गुण गावणिआ ॥
बाझु गुरू को सहजु न पाए गुरमुखि सहजि समावणिआ ॥१॥ रहाउ ॥
तूं आपे सोहहि आपे जगु मोहहि ॥
तूं आपे नदरी जगतु परोवहि ॥
तूं आपे दुखु सुखु देवहि करते गुरमुखि हरि देखावणिआ ॥२॥
आपे करता करे कराए ॥
आपे सबदु गुर मंनि वसाए ॥
सबदे उपजै अंम्रित बाणी गुरमुखि आखि सुणावणिआ ॥३॥
आपे करता आपे भुगता ॥
बंधन तोड़े सदा है मुकता ॥
सदा मुकतु आपे है सचा आपे अलखु लखावणिआ ॥४॥
आपे माइआ आपे छाइआ ॥
आपे मोहु सभु जगतु उपाइआ ॥
आपे गुणदाता गुण गावै आपे आखि सुणावणिआ ॥५॥
आपे करे कराए आपे ॥
आपे थापि उथापे आपे ॥
तुझ ते बाहरि कछू न होवै तूं आपे कारै लावणिआ ॥६॥
आपे मारे आपि जीवाए ॥
आपे मेले मेलि मिलाए ॥
सेवा ते सदा सुखु पाइआ गुरमुखि सहजि समावणिआ ॥७॥

हिन्दी अर्थ: माझ महला ३ ॥ सब शरीरों में परमात्मा की ही ज्योति व्यापक है। पूरा गुरू अपने शबद में जोड़ के (शरण आए मनुष्य को) दिखा देता है (निष्चय करा देता है) परमात्मा ने स्वयं ही सब जीवों की बनावट बनायी है (पैदा किए हैं) और खुद ही उसने सारे शरीरों में (आत्मिक जीवन का) फर्क बनाया हुआ है। 1। मैं सदा उन मनुष्यों पर से कुर्बान जाता हूँ~ जो सदा स्थिर रहने वाले परमात्मा के गुण गाते रहते हैं (आत्मिक अडोलता में रह के ही सिफत सालाह की जा सकती है~ तथा) गुरू की शरण के बिना कोई मनुष्य आत्मिक अडोलता हासिल नहीं कर सकता। गुरू के सन्मुख रहने वाले मनुष्य ही आत्मिक अडोलता में लीन रहते हैं। 1। रहाउ। हे करतार ! तू स्वयं ही (जगत रच के जगत रचना से अपनी) सुंदरता दिखा रहा है~ और (उस सुंदरता से) तू खुद ही जगत को मोहित करता है। तू खुद ही अपनी मेहर की निगाह से जगत को (अपनी कायम की मर्यादा के धागे में) परोए रखता है। हे करतार ! तू खुद ही जीवों को दुख देता है~ खुद ही जीवों को सुख देता है। हे हरी ! गुरू की शरण पड़ने वाले बंदे (हर जगह) तेरा ही दर्शन करते हैं। 2। (हे भाई ! सारे जीवों में व्यापक हो के) करतार खुद ही सब कुछ कर रहा है और (जीवों से) करा रहा है। करतार खुद ही गुरू का शबद (जीवों के) मन में बसाता है। गुरू के शबद के द्वारा ही आत्मिक जीवन देने वाली सिफत सालाह की बाणी (की लगन जीवों के हृदय में) पैदा होती है। गुरू के सन्मुख रहने वाला मनुष्य (सिफत सालाह की बाणी) उचार के (औरों को भी) सुनाता है। 3। करतार स्वयं ही सब जीवों को पैदा करने वाला है (सब जीवों में व्यापक हो के) खुद ही दुनिया के पदार्थ भोगने वाला है। करतार खुद ही (सारे जीवों के माया के) बंधन तोड़ता है। वह खुद सदा ही बंधनों से मुक्त है। सदा स्थिर रहने वाला करतार खुद ही सदा निर्लिप है~ खुद ही अदृश्य (भी) है~ और खुद ही अपना स्वरूप (जीवों को) दिखलाने वाला है। 4। (हे भाई !) करतार ने खुद ही माया पैदा की है~ उसने खुद ही माया का प्रभाव पैदा किया है। करतार ने खुद ही माया का मोह पैदा किया है और खुद ही सारा जगत पैदा किया है। करतार स्वयं ही अपने गुणों की दाति (जीवों को) देने वाला है~ स्वयं ही (अपने) गुण (जीवों में व्यापक हो के) गाता है। स्वयं ही (अपने गुण) उचार के (औरों को) सुनाता है। 5। (हे भाई ! सब जीवों में व्यापक हो के) करतार स्वयं ही सब कुछ कर रहा है और स्वयं ही (जीवों से) करा रहा है। करतार स्वयं ही जगत की रचना करके स्वयं ही (जगत का) नाश करता है। (हे प्रभू ! जो कुछ जगत में हो रहा है) तेरे हुकम से बाहर कुछ नहीं होता~ तू खुद ही (सब जीवों को) काम में लगा रहा है। 6। (हे भाई !) परमात्मा स्वयं ही (किसी जीव को) आत्मिक मौत दे रहा है (किसी को) आत्मिक जीवन बख्श रहा है। प्रभू स्वयं ही (जीवों को गुरू) मिलाता है और (गुरू) मिला के अपने चरणों में जोड़ता है। (गुरू की बताई) सेवा करने वाले ने सदा आत्मिक आनंद पाया है। गुरू के सन्मुख रहने वाला मनुष्य आत्मिक अडोलता में लीन रहता है। 7।

संदर्भ: यह अंग 125 है, राग माझ का हिस्सा। मुख्य रचयिता: Guru Amar Daas Ji।

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ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।

यह अंग कुल 45 पंक्तियों का है, 2 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 125” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।

राग के context में: माझ राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।

पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।

अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।

“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।

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अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।

तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।

हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।

ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।

दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।

“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।

हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।

अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।

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हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।

(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)

शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।

संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।

शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।

संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।

एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।

अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।

स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।