Lulla Family

अंग 97

अंग
97
राग माझ
राग: माझ · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
मोहि रैणि न विहावै नीद न आवै बिनु देखे गुर दरबारे जीउ ॥3॥
हउ घोली जीउ घोलि घुमाई तिसु सचे गुर दरबारे जीउ ॥1॥ रहाउ ॥
भागु होआ गुरि संतु मिलाइआ ॥
प्रभु अबिनासी घर महि पाइआ ॥
सेव करी पलु चसा न विछुड़ा जन नानक दास तुमारे जीउ ॥4॥
हउ घोली जीउ घोलि घुमाई जन नानक दास तुमारे जीउ ॥ रहाउ ॥1॥8॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: गुरू के दरबार का दर्शन करने के बिना मेरी (जिंदगी की) रात (आसान) नहीं गुजरती, मेरे अंदर शांति नहीं आती।3। मैं गुरू के दरबार से सदके हूँ कुर्बान हूँ जो सदैव अटॅल रहने वाला है।1।रहाउ। मेरे भाग्य जाग पड़े हैं, गुरू ने मुझे शांति का स्रोत परमात्मा मिला दिया है (गुरू की कृपा से उस) अबिनाशी प्रभू को मैंने अपने हृदय में ढूंढ लिया है। हे दास नानक ! (कह,हे प्रभू ! मेहर कर) मैं आपके दासों की (नित्य) सेवा करता रहूँ, (आपके दासों से) मैं एक पल भर भी ना बिछड़ जाऊँ, एक रत्ती भर भी ना अलग होऊँ।4। हे दास नानक ! (कह, हे प्रभू !) मैं आपके दासों से सदके हूँ कुर्बान हूँ।1।रहाउ।
रागु माझ महला 5 ॥
सा रुति सुहावी जितु तुधु समाली ॥
सो कंमु सुहेला जो तेरी घाली ॥
सो रिदा सुहेला जितु रिदै तूं वुठा सभना के दातारा जीउ ॥1॥
तूं साझा साहिबु बापु हमारा ॥
नउ निधि तेरै अखुट भंडारा ॥
जिसु तूं देहि सु त्रिपति अघावै सोई भगतु तुमारा जीउ ॥2॥
सभु को आसै तेरी बैठा ॥
घट घट अंतरि तूंहै वुठा ॥
सभे साझीवाल सदाइनि तूं किसै न दिसहि बाहरा जीउ ॥3॥
तूं आपे गुरमुखि मुकति कराइहि ॥
तूं आपे मनमुखि जनमि भवाइहि ॥
नानक दास तेरै बलिहारै सभु तेरा खेलु दसाहरा जीउ ॥4॥2॥9॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: रागु माझ महला 5 ॥ हे सभी जीवों के दाते ! जब मैं आपको अपने हृदय में बसाता हूँ, वह समय मुझे सुखदायी प्रतीत होता है। हे प्रभू ! जो काम मैं आपकी सेवा के लिए करता हूँ, वह काम मुझे खुशी देता है। हे दातार ! जिस दिल में आप बसता है, वह हृदय शीतल रहता है।1। हे दातार ! आप हमारे सभी जीवों का पिता है (और सभी को दातें बख्शता है)। आपके घर में (जगत के सारे) नौ ही खजाने मौजूद हैं, आपके खजानों में कभी कमी नहीं आती। (पर) जिस को (अपने नाम की दात) देता है, वह (दुनिया के पदार्थों की तरफ से) तृप्त हो जाता है, और, हे प्रभू ! वही आपका भगत (कहलवा सकता) है।2। हे मेरे मालिक ! सभी प्राणी आपकी आशा में ही बैठे हैं। आप घट-घट में वास कर रहा है। समस्त प्राणी आपके भागीदार कहलाते हैं और किसी भी प्राणी को ऐसा नहीं लगता कि आप उससे बाहर किसी अन्य स्थान पर निवास करते हो॥3॥ हे दातार ! आप खुद ही जीवों को गुरू की शरण में डाल के (माया के बंधनों से) आजाद करा देता है। आप स्वयं ही जीवों को मन का गुलाम बना के जनम मरण के चक्कर में भटकाता रहता है। हे दास नानक ! (कह, हे प्रभू !) मैं आपसे कुर्बान हूँ, ये सारी जगत रचना आपका ही प्रत्यक्ष तमाशा है।4।2।9। नोट: अंक 2 का भाव है कि गुरू अरजन साहिब का दूसरा शबद है।अंक 9 अब तक के सारे शबदों का जोड़ बताता है;गुरू राम दास जी—————07गुरू अरजन देव जी————02जोड़—————————–09
माझ महला 5 ॥
अनहदु वाजै सहजि सुहेला ॥
सबदि अनंद करे सद केला ॥
सहज गुफा महि ताड़ी लाई आसणु ऊच सवारिआ जीउ ॥1॥
फिरि घिरि अपुने ग्रिह महि आइआ ॥
जो लोड़ीदा सोई पाइआ ॥
त्रिपति अघाइ रहिआ है संतहु गुरि अनभउ पुरखु दिखारिआ जीउ ॥2॥
आपे राजनु आपे लोगा ॥
आपि निरबाणी आपे भोगा ॥
आपे तखति बहै सचु निआई सभ चूकी कूक पुकारिआ जीउ ॥3॥
जेहा डिठा मै तेहो कहिआ ॥
तिसु रसु आइआ जिनि भेदु लहिआ ॥
जोती जोति मिली सुखु पाइआ जन नानक इकु पसारिआ जीउ ॥4॥3॥10॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: माझ महला 5 ॥ (गुरू की कृपा से मेरे अंदर परमात्मा की सिफत सलाह का) एक रस संगीत बज रहा है। (मेरा मन) आत्मिक अडोलता में टिक के सुखी हो रहा है, गुरू के शबद के साथ जुड़ के सदा आनंद का रंग माण रहा है। (सतिगुरू की मेहर से मैंने) आत्मिक अडोलता-रूपी गुफा में समाधि लगाई हुई है और सबसे ऊँचे अकाल पुरख के चरणों में बढ़िया ठिकाना बना लिया है।1। हे संत जनों ! गुरू ने (मुझे) आत्मिक प्रकाश दे के सब में व्यापक परमात्मा के दर्शन करा दिए हैं। अब (मेरा मन) मुड़ मुड़ के अंतरात्में में आ टिकता है। जो (आत्मिक शांति) मुझे चाहिए थी वह मैंने हासिल कर ली है, और (मेरा मन दुनिया की वासनाओं से) पूरी तरह से भर चुका है।2। (गुरू की कृपा से मुझे दिखाई दे गया है कि) प्रभू स्वयं ही बादशाह है और स्वयं ही प्रजा-रूप है। प्रभु वासना रहित भी है और (सब जीवों में व्यापक होने करके) स्वयं ही सारे पदार्थ भोग रहा है। वह सदा स्थिर रहने वाला प्रभू स्वयं ही तख्त पर बैठा हुआ है और न्याय कर रहा है (इसलिए सुख आए चाहे दुख आए, मेरा) सारा गिला-शिकवा खत्म हो चुका है।3। (गुरू की मेहर से) मैंने परमात्मा को जिस (सर्व-व्यापक) रूप में देखा है वैसा ही कह दिया है। जिस मनुष्य ने ये भेद पा लिया है उसे (उसके मिलाप) का आनंद आता है। हे नानक ! उस मनुष्य की सुरति प्रभू की जोति में मिली है, उसे आत्मिक आनंद प्राप्त होता है, उसे सिर्फ परमात्मा ही सारे जगत में व्यापक दिखता हैं।4।3।10।
माझ महला 5 ॥
जितु घरि पिरि सोहागु बणाइआ ॥
तितु घरि सखीए मंगलु गाइआ ॥
अनद बिनोद तितै घरि सोहहि जो धन कंति सिगारी जीउ ॥1॥
सा गुणवंती सा वडभागणि ॥
पुत्रवंती सीलवंति सोहागणि ॥
रूपवंति सा सुघड़ि बिचखणि जो धन कंत पिआरी जीउ ॥2॥
अचारवंति साई परधाने ॥
सभ सिंगार बणे तिसु गिआने ॥
सा कुलवंती सा सभराई जो पिरि कै रंगि सवारी जीउ ॥3॥
महिमा तिस की कहणु न जाए ॥
जो पिरि मेलि लई अंगि लाए ॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: माझ महला 5 ॥ हे सखी ! जिस हृदय घर में प्रभू पति ने (अपने प्रकाश से) अच्छे भाग्य लगा दिये हों, उसके हृदय घर में (प्रभू पति की) सिफत सलाह का गीत गाए जाते है। जिस जीव-स्त्री को पति प्रभू ने आत्मिक सुंदरता बख्श दी हो, उसके हृदय घर में आतिमक आनंद शोभते हैं, आत्मिक खुशिआं शोभती हैं। जो जीव स्त्री पति प्रभू की प्यारी बन जाए, वह सब गुणों की मलिका बन जाती है। वह भाग्यशाली हो जाती है। वह (आत्मिक ज्ञान-रूपी) पुत्रवती, सु-स्वाभाव वाली और सुहाग-भाग वाली बन जाती है। उसका आत्मिक जीवन सुंदर बन जाता है। वह सुचज्जे घाढ़त वाले मन वाले व्यक्तित्व और अच्छी सूझ की मलिका बन जाती है।2। जो जीव-स्त्री प्रभू पति के प्रेम रंग में (रंग के) सुंदर जीवन वाली बन जाती है उसका आचरण ऊँचा हो जाता है वह (संगति में) जानी मानी जाती है। प्रभू पति के साथ गहरी सांझ के सदका सारे आत्मिक गुण उसके जीवन को संवार देते है। वह ऊँचे कुल वाली समझी जाती है। वह भाईयों वाली हो जाती है।3। उसकी उपमा बयान नही की जा सकती। जिस जीव-स्त्री को प्रभू पति ने अपने चरणों में जोड़ के अपने में लीन कर लिया हो,

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। गौड़ी राग का विस्तार ग्रंथ का सबसे लम्बा है। गुरु अर्जन की वाणी इसमें प्रमुख है, जो सत्रहवीं सदी के पहले दशक में संकलित हुई।

अर्जन देव की वाणी पढ़ने पर पता चलता है कि वो एक संगठक-कवि थे। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। आदि ग्रंथ के संकलन के दो साल बाद, 1606 में, उन्होंने मुगल यंत्रणा में अपनी जान दे दी, और सिख-शहादत की परम्परा यहीं से शुरू होती है।

इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “गुरू के दरबार का दर्शन करने के बिना मेरी (जिंदगी की) रात (आसान) नहीं गुजरती, मेरे अंदर शांति नहीं आती।”

एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।