अंग
122
राग माझ
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਮਾਇਆ ਮੋਹੁ ਇਸੁ ਮਨਹਿ ਨਚਾਏ ਅੰਤਰਿ ਕਪਟੁ ਦੁਖੁ ਪਾਵਣਿਆ ॥੪॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਭਗਤਿ ਜਾ ਆਪਿ ਕਰਾਏ ॥
ਤਨੁ ਮਨੁ ਰਾਤਾ ਸਹਜਿ ਸੁਭਾਏ ॥
ਬਾਣੀ ਵਜੈ ਸਬਦਿ ਵਜਾਏ ਗੁਰਮੁਖਿ ਭਗਤਿ ਥਾਇ ਪਾਵਣਿਆ ॥੫॥
ਬਹੁ ਤਾਲ ਪੂਰੇ ਵਾਜੇ ਵਜਾਏ ॥
ਨਾ ਕੋ ਸੁਣੇ ਨ ਮੰਨਿ ਵਸਾਏ ॥
ਮਾਇਆ ਕਾਰਣਿ ਪਿੜ ਬੰਧਿ ਨਾਚੈ ਦੂਜੈ ਭਾਇ ਦੁਖੁ ਪਾਵਣਿਆ ॥੬॥
ਜਿਸੁ ਅੰਤਰਿ ਪ੍ਰੀਤਿ ਲਗੈ ਸੋ ਮੁਕਤਾ ॥
ਇੰਦ੍ਰੀ ਵਸਿ ਸਚ ਸੰਜਮਿ ਜੁਗਤਾ ॥
ਗੁਰ ਕੈ ਸਬਦਿ ਸਦਾ ਹਰਿ ਧਿਆਏ ਏਹਾ ਭਗਤਿ ਹਰਿ ਭਾਵਣਿਆ ॥੭॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਭਗਤਿ ਜੁਗ ਚਾਰੇ ਹੋਈ ॥
ਹੋਰਤੁ ਭਗਤਿ ਨ ਪਾਏ ਕੋਈ ॥
ਨਾਨਕ ਨਾਮੁ ਗੁਰ ਭਗਤੀ ਪਾਈਐ ਗੁਰ ਚਰਣੀ ਚਿਤੁ ਲਾਵਣਿਆ ॥੮॥੨੦॥੨੧॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਭਗਤਿ ਜਾ ਆਪਿ ਕਰਾਏ ॥
ਤਨੁ ਮਨੁ ਰਾਤਾ ਸਹਜਿ ਸੁਭਾਏ ॥
ਬਾਣੀ ਵਜੈ ਸਬਦਿ ਵਜਾਏ ਗੁਰਮੁਖਿ ਭਗਤਿ ਥਾਇ ਪਾਵਣਿਆ ॥੫॥
ਬਹੁ ਤਾਲ ਪੂਰੇ ਵਾਜੇ ਵਜਾਏ ॥
ਨਾ ਕੋ ਸੁਣੇ ਨ ਮੰਨਿ ਵਸਾਏ ॥
ਮਾਇਆ ਕਾਰਣਿ ਪਿੜ ਬੰਧਿ ਨਾਚੈ ਦੂਜੈ ਭਾਇ ਦੁਖੁ ਪਾਵਣਿਆ ॥੬॥
ਜਿਸੁ ਅੰਤਰਿ ਪ੍ਰੀਤਿ ਲਗੈ ਸੋ ਮੁਕਤਾ ॥
ਇੰਦ੍ਰੀ ਵਸਿ ਸਚ ਸੰਜਮਿ ਜੁਗਤਾ ॥
ਗੁਰ ਕੈ ਸਬਦਿ ਸਦਾ ਹਰਿ ਧਿਆਏ ਏਹਾ ਭਗਤਿ ਹਰਿ ਭਾਵਣਿਆ ॥੭॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਭਗਤਿ ਜੁਗ ਚਾਰੇ ਹੋਈ ॥
ਹੋਰਤੁ ਭਗਤਿ ਨ ਪਾਏ ਕੋਈ ॥
ਨਾਨਕ ਨਾਮੁ ਗੁਰ ਭਗਤੀ ਪਾਈਐ ਗੁਰ ਚਰਣੀ ਚਿਤੁ ਲਾਵਣਿਆ ॥੮॥੨੦॥੨੧॥
माइआ मोहु इसु मनहि नचाए अंतरि कपटु दुखु पावणिआ ॥४॥
गुरमुखि भगति जा आपि कराए ॥
तनु मनु राता सहजि सुभाए ॥
बाणी वजै सबदि वजाए गुरमुखि भगति थाइ पावणिआ ॥५॥
बहु ताल पूरे वाजे वजाए ॥
ना को सुणे न मंनि वसाए ॥
माइआ कारणि पिड़ बंधि नाचै दूजै भाइ दुखु पावणिआ ॥६॥
जिसु अंतरि प्रीति लगै सो मुकता ॥
इंद्री वसि सच संजमि जुगता ॥
गुर कै सबदि सदा हरि धिआए एहा भगति हरि भावणिआ ॥७॥
गुरमुखि भगति जुग चारे होई ॥
होरतु भगति न पाए कोई ॥
नानक नामु गुर भगती पाईऐ गुर चरणी चितु लावणिआ ॥८॥२०॥२१॥
गुरमुखि भगति जा आपि कराए ॥
तनु मनु राता सहजि सुभाए ॥
बाणी वजै सबदि वजाए गुरमुखि भगति थाइ पावणिआ ॥५॥
बहु ताल पूरे वाजे वजाए ॥
ना को सुणे न मंनि वसाए ॥
माइआ कारणि पिड़ बंधि नाचै दूजै भाइ दुखु पावणिआ ॥६॥
जिसु अंतरि प्रीति लगै सो मुकता ॥
इंद्री वसि सच संजमि जुगता ॥
गुर कै सबदि सदा हरि धिआए एहा भगति हरि भावणिआ ॥७॥
गुरमुखि भगति जुग चारे होई ॥
होरतु भगति न पाए कोई ॥
नानक नामु गुर भगती पाईऐ गुर चरणी चितु लावणिआ ॥८॥२०॥२१॥
हिन्दी अर्थ: उसके मन को माया का मोह ही नचा रहा है~ उसके अंदर छल है। (सिर्फ बाहर ही रास आदि के वक्त प्रेम बताता है) और वह दुख पाता है। 4। जब परमात्मा खुद किसी मनुष्य को गुरू की शरण में डाल के उससे अपनी भगती करवाता है~ तो उसका मन उसका तन (अर्थात~ हरेक ज्ञानेंद्रिय) आत्मिक अडोलता में प्रभू चरणों के प्रेम में रंगा जाता है। उसके अंदर सिफत सलाह की बाणी अपना प्रभाव डाले रखती है। वह गुरू के शबद में जुड़ के (अपने अंदर से सिफत सालाह का~ मानो~) बाजा बजाता है। गुरू का आसरा ले के की हुई भक्ति परमात्मा परवान करता है। 5। पर जो भी मनुष्य निरे साज बजाता है और साजों के साथ मिल के नाच करता है। वह (इस तरह) परमात्मा का नाम ना ही सुनता है और ना ही अपने मन में बसाता है। वह तो माया कामनी की खातिर मैदान बांध के नाचता है। माया के मोह में टिका रह के वह दुख ही सहता है (इस नाच से वह आत्मिक आनंद नहीं पा सकता)। 6। जिस मनुष्य के हृदय में प्रभू चरणों की प्रीति पैदा होती है~ वह माया के मोह से स्वतंत्र हो जाता है। वह अपनी इन्द्रियों को अपने वश में कर लेता है। वह मनुष्य सदा स्थिर प्रभू का नाम सिमरन के संजम में टिका रहता है। गुरू के शबद में जुड़ के वह सदा परमात्मा का नाम सिमरता है~ और यही है भगती~ जो परमात्मा को पसंद आती है। 7। परमात्मा की भक्ति गुरू के सन्मुख रहके ही हो सकती है,ये नियम सदा के लिए अटॅल है। (इसके बगैर) किसी भी और तरीके से कोई मनुष्य प्रभू की भक्ति प्राप्त नहीं कर सकता। हे नानक ! परमात्मा के नाम सिमरन की दाति गुरू में श्रद्धा रखने से ही मिल सकती है। वही मनुष्य नाम सिमर सकता है~ जो गुरू के चरणों में अपना चिक्त जोड़ता है। 8। 20। 21।
ਮਾਝ ਮਹਲਾ ੩ ॥
ਸਚਾ ਸੇਵੀ ਸਚੁ ਸਾਲਾਹੀ ॥
ਸਚੈ ਨਾਇ ਦੁਖੁ ਕਬ ਹੀ ਨਾਹੀ ॥
ਸੁਖਦਾਤਾ ਸੇਵਨਿ ਸੁਖੁ ਪਾਇਨਿ ਗੁਰਮਤਿ ਮੰਨਿ ਵਸਾਵਣਿਆ ॥੧॥
ਹਉ ਵਾਰੀ ਜੀਉ ਵਾਰੀ ਸੁਖ ਸਹਜਿ ਸਮਾਧਿ ਲਗਾਵਣਿਆ ॥
ਜੋ ਹਰਿ ਸੇਵਹਿ ਸੇ ਸਦਾ ਸੋਹਹਿ ਸੋਭਾ ਸੁਰਤਿ ਸੁਹਾਵਣਿਆ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਸਭੁ ਕੋ ਤੇਰਾ ਭਗਤੁ ਕਹਾਏ ॥
ਸੇਈ ਭਗਤ ਤੇਰੈ ਮਨਿ ਭਾਏ ॥
ਸਚੁ ਬਾਣੀ ਤੁਧੈ ਸਾਲਾਹਨਿ ਰੰਗਿ ਰਾਤੇ ਭਗਤਿ ਕਰਾਵਣਿਆ ॥੨॥
ਸਭੁ ਕੋ ਸਚੇ ਹਰਿ ਜੀਉ ਤੇਰਾ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਮਿਲੈ ਤਾ ਚੂਕੈ ਫੇਰਾ ॥
ਜਾ ਤੁਧੁ ਭਾਵੈ ਤਾ ਨਾਇ ਰਚਾਵਹਿ ਤੂੰ ਆਪੇ ਨਾਉ ਜਪਾਵਣਿਆ ॥੩॥
ਗੁਰਮਤੀ ਹਰਿ ਮੰਨਿ ਵਸਾਇਆ ॥
ਹਰਖੁ ਸੋਗੁ ਸਭੁ ਮੋਹੁ ਗਵਾਇਆ ॥
ਇਕਸੁ ਸਿਉ ਲਿਵ ਲਾਗੀ ਸਦ ਹੀ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਮੰਨਿ ਵਸਾਵਣਿਆ ॥੪॥
ਭਗਤ ਰੰਗਿ ਰਾਤੇ ਸਦਾ ਤੇਰੈ ਚਾਏ ॥
ਨਉ ਨਿਧਿ ਨਾਮੁ ਵਸਿਆ ਮਨਿ ਆਏ ॥
ਪੂਰੈ ਭਾਗਿ ਸਤਿਗੁਰੁ ਪਾਇਆ ਸਬਦੇ ਮੇਲਿ ਮਿਲਾਵਣਿਆ ॥੫॥
ਤੂੰ ਦਇਆਲੁ ਸਦਾ ਸੁਖਦਾਤਾ ॥
ਤੂੰ ਆਪੇ ਮੇਲਿਹਿ ਗੁਰਮੁਖਿ ਜਾਤਾ ॥
ਤੂੰ ਆਪੇ ਦੇਵਹਿ ਨਾਮੁ ਵਡਾਈ ਨਾਮਿ ਰਤੇ ਸੁਖੁ ਪਾਵਣਿਆ ॥੬॥
ਸਦਾ ਸਦਾ ਸਾਚੇ ਤੁਧੁ ਸਾਲਾਹੀ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਜਾਤਾ ਦੂਜਾ ਕੋ ਨਾਹੀ ॥
ਏਕਸੁ ਸਿਉ ਮਨੁ ਰਹਿਆ ਸਮਾਏ ਮਨਿ ਮੰਨਿਐ ਮਨਹਿ ਮਿਲਾਵਣਿਆ ॥੭॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਹੋਵੈ ਸੋ ਸਾਲਾਹੇ ॥
ਸਾਚੇ ਠਾਕੁਰ ਵੇਪਰਵਾਹੇ ॥
ਨਾਨਕ ਨਾਮੁ ਵਸੈ ਮਨ ਅੰਤਰਿ ਗੁਰ ਸਬਦੀ ਹਰਿ ਮੇਲਾਵਣਿਆ ॥੮॥੨੧॥੨੨॥
ਸਚਾ ਸੇਵੀ ਸਚੁ ਸਾਲਾਹੀ ॥
ਸਚੈ ਨਾਇ ਦੁਖੁ ਕਬ ਹੀ ਨਾਹੀ ॥
ਸੁਖਦਾਤਾ ਸੇਵਨਿ ਸੁਖੁ ਪਾਇਨਿ ਗੁਰਮਤਿ ਮੰਨਿ ਵਸਾਵਣਿਆ ॥੧॥
ਹਉ ਵਾਰੀ ਜੀਉ ਵਾਰੀ ਸੁਖ ਸਹਜਿ ਸਮਾਧਿ ਲਗਾਵਣਿਆ ॥
ਜੋ ਹਰਿ ਸੇਵਹਿ ਸੇ ਸਦਾ ਸੋਹਹਿ ਸੋਭਾ ਸੁਰਤਿ ਸੁਹਾਵਣਿਆ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਸਭੁ ਕੋ ਤੇਰਾ ਭਗਤੁ ਕਹਾਏ ॥
ਸੇਈ ਭਗਤ ਤੇਰੈ ਮਨਿ ਭਾਏ ॥
ਸਚੁ ਬਾਣੀ ਤੁਧੈ ਸਾਲਾਹਨਿ ਰੰਗਿ ਰਾਤੇ ਭਗਤਿ ਕਰਾਵਣਿਆ ॥੨॥
ਸਭੁ ਕੋ ਸਚੇ ਹਰਿ ਜੀਉ ਤੇਰਾ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਮਿਲੈ ਤਾ ਚੂਕੈ ਫੇਰਾ ॥
ਜਾ ਤੁਧੁ ਭਾਵੈ ਤਾ ਨਾਇ ਰਚਾਵਹਿ ਤੂੰ ਆਪੇ ਨਾਉ ਜਪਾਵਣਿਆ ॥੩॥
ਗੁਰਮਤੀ ਹਰਿ ਮੰਨਿ ਵਸਾਇਆ ॥
ਹਰਖੁ ਸੋਗੁ ਸਭੁ ਮੋਹੁ ਗਵਾਇਆ ॥
ਇਕਸੁ ਸਿਉ ਲਿਵ ਲਾਗੀ ਸਦ ਹੀ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਮੰਨਿ ਵਸਾਵਣਿਆ ॥੪॥
ਭਗਤ ਰੰਗਿ ਰਾਤੇ ਸਦਾ ਤੇਰੈ ਚਾਏ ॥
ਨਉ ਨਿਧਿ ਨਾਮੁ ਵਸਿਆ ਮਨਿ ਆਏ ॥
ਪੂਰੈ ਭਾਗਿ ਸਤਿਗੁਰੁ ਪਾਇਆ ਸਬਦੇ ਮੇਲਿ ਮਿਲਾਵਣਿਆ ॥੫॥
ਤੂੰ ਦਇਆਲੁ ਸਦਾ ਸੁਖਦਾਤਾ ॥
ਤੂੰ ਆਪੇ ਮੇਲਿਹਿ ਗੁਰਮੁਖਿ ਜਾਤਾ ॥
ਤੂੰ ਆਪੇ ਦੇਵਹਿ ਨਾਮੁ ਵਡਾਈ ਨਾਮਿ ਰਤੇ ਸੁਖੁ ਪਾਵਣਿਆ ॥੬॥
ਸਦਾ ਸਦਾ ਸਾਚੇ ਤੁਧੁ ਸਾਲਾਹੀ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਜਾਤਾ ਦੂਜਾ ਕੋ ਨਾਹੀ ॥
ਏਕਸੁ ਸਿਉ ਮਨੁ ਰਹਿਆ ਸਮਾਏ ਮਨਿ ਮੰਨਿਐ ਮਨਹਿ ਮਿਲਾਵਣਿਆ ॥੭॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਹੋਵੈ ਸੋ ਸਾਲਾਹੇ ॥
ਸਾਚੇ ਠਾਕੁਰ ਵੇਪਰਵਾਹੇ ॥
ਨਾਨਕ ਨਾਮੁ ਵਸੈ ਮਨ ਅੰਤਰਿ ਗੁਰ ਸਬਦੀ ਹਰਿ ਮੇਲਾਵਣਿਆ ॥੮॥੨੧॥੨੨॥
माझ महला ३ ॥
सचा सेवी सचु सालाही ॥
सचै नाइ दुखु कब ही नाही ॥
सुखदाता सेवनि सुखु पाइनि गुरमति मंनि वसावणिआ ॥१॥
हउ वारी जीउ वारी सुख सहजि समाधि लगावणिआ ॥
जो हरि सेवहि से सदा सोहहि सोभा सुरति सुहावणिआ ॥१॥ रहाउ ॥
सभु को तेरा भगतु कहाए ॥
सेई भगत तेरै मनि भाए ॥
सचु बाणी तुधै सालाहनि रंगि राते भगति करावणिआ ॥२॥
सभु को सचे हरि जीउ तेरा ॥
गुरमुखि मिलै ता चूकै फेरा ॥
जा तुधु भावै ता नाइ रचावहि तूं आपे नाउ जपावणिआ ॥३॥
गुरमती हरि मंनि वसाइआ ॥
हरखु सोगु सभु मोहु गवाइआ ॥
इकसु सिउ लिव लागी सद ही हरि नामु मंनि वसावणिआ ॥४॥
भगत रंगि राते सदा तेरै चाए ॥
नउ निधि नामु वसिआ मनि आए ॥
पूरै भागि सतिगुरु पाइआ सबदे मेलि मिलावणिआ ॥५॥
तूं दइआलु सदा सुखदाता ॥
तूं आपे मेलिहि गुरमुखि जाता ॥
तूं आपे देवहि नामु वडाई नामि रते सुखु पावणिआ ॥६॥
सदा सदा साचे तुधु सालाही ॥
गुरमुखि जाता दूजा को नाही ॥
एकसु सिउ मनु रहिआ समाए मनि मंनिऐ मनहि मिलावणिआ ॥७॥
गुरमुखि होवै सो सालाहे ॥
साचे ठाकुर वेपरवाहे ॥
नानक नामु वसै मन अंतरि गुर सबदी हरि मेलावणिआ ॥८॥२१॥२२॥
सचा सेवी सचु सालाही ॥
सचै नाइ दुखु कब ही नाही ॥
सुखदाता सेवनि सुखु पाइनि गुरमति मंनि वसावणिआ ॥१॥
हउ वारी जीउ वारी सुख सहजि समाधि लगावणिआ ॥
जो हरि सेवहि से सदा सोहहि सोभा सुरति सुहावणिआ ॥१॥ रहाउ ॥
सभु को तेरा भगतु कहाए ॥
सेई भगत तेरै मनि भाए ॥
सचु बाणी तुधै सालाहनि रंगि राते भगति करावणिआ ॥२॥
सभु को सचे हरि जीउ तेरा ॥
गुरमुखि मिलै ता चूकै फेरा ॥
जा तुधु भावै ता नाइ रचावहि तूं आपे नाउ जपावणिआ ॥३॥
गुरमती हरि मंनि वसाइआ ॥
हरखु सोगु सभु मोहु गवाइआ ॥
इकसु सिउ लिव लागी सद ही हरि नामु मंनि वसावणिआ ॥४॥
भगत रंगि राते सदा तेरै चाए ॥
नउ निधि नामु वसिआ मनि आए ॥
पूरै भागि सतिगुरु पाइआ सबदे मेलि मिलावणिआ ॥५॥
तूं दइआलु सदा सुखदाता ॥
तूं आपे मेलिहि गुरमुखि जाता ॥
तूं आपे देवहि नामु वडाई नामि रते सुखु पावणिआ ॥६॥
सदा सदा साचे तुधु सालाही ॥
गुरमुखि जाता दूजा को नाही ॥
एकसु सिउ मनु रहिआ समाए मनि मंनिऐ मनहि मिलावणिआ ॥७॥
गुरमुखि होवै सो सालाहे ॥
साचे ठाकुर वेपरवाहे ॥
नानक नामु वसै मन अंतरि गुर सबदी हरि मेलावणिआ ॥८॥२१॥२२॥
हिन्दी अर्थ: माझ महला ३ ॥ (हे भाई !) मैं सदा स्थिर प्रभू का सिमरन करता हूँ। मैं सदा स्थिर प्रभू की ही सिफत सालाह करता हूँ। सदा स्थिर प्रभू के नाम में जुड़ने से कभी कोई दुख छू नहीं सकता। जो मनुष्य सब सुख देने वाले परमात्मा को सिमरते हैं~ और गुरू की मति ले के उस प्रभू को अपने मन में बसाऐ रखते हैं~ वे आत्मिक आनंद प्राप्त करते हैं। 1। (हे भाई !) मैं उन लोगों से सदके कुर्बान जाता हूं~ जो आत्मिक अडोलता में टिक के आत्मिक आनंद की समाधि लगाए रखते हैं। जो मनुष्य परमात्मा को सिमरते हैं~ वे सदैव सुंदर जीवन वाले बने रहते हैं। उन्हें (लोक परलोक में) शोभा मिलती है~ उनकी सुरति सदा सुहावनी टिकी रहती है। 1। रहाउ। (हे प्रभू ! वैसे तो) हरेक मनुष्य तेरा भक्त कहलाता है~ पर (असल) भगत वही हैं जो तेरे मन को अच्छे लगते हैं। (हे प्रभू !) वह गुरू की बाणी के द्वारा तुझे सदा स्थिर रहने वाले को सलाहते हैं। वह तेरे प्रेम रंग में रंगे हुए तेरी भक्ति करते रहते हैं। 2। हे सदा स्थिर रहने वाले प्रभू जी ! हरेक जीव तेरा (ही पैदा किया हुआ) है। (पर जब किसी को) गुरू की शरण पड़ के तेरा नाम मिलता है~ तब (उसके जनम मरण का) चक्कर समाप्त होता है। जब तुझे अच्छा लगता है (जब तेरी रजा होती है)~ तब तू (जीवों को अपने) नाम में जोड़ता है। तू स्वयं ही (जीवों से अपना) नाम जपाता है। 3। जिस मनुष्य ने गुरू की मति ले के परमात्मा (का नाम अपने) मन में बसा लिया~ उसने खुशी (की लालसा) ग़मी (से घबराहट) खत्म कर ली। उसने (माया का) सारा मोह दूर कर लिया। उस मनुष्य की लगन सदा ही सिर्फ परमात्मा (के चरणों) से लगी रहती है। वह सदा हरी के नाम को अपने मन में बसाए रखता है। 4। हे प्रभू ! तेरे भक्त (बड़े) चाव से तेरे नाम रंग में रंगे रहते हैं। उनके मन में तेरा नाम आ बसता है (जो~ मानो) नौ खजाने (हैं)। जिस मनुष्य ने पूरी किस्मत से गुरू को ढूँढ लिया~ गुरू उसे (अपने) शबद के द्वारा परमात्मा के चरणों में मिला देता है। 5। हे प्रभू तू दया का (सोमा है) श्रोत है। तू सदा (सब जीवों को) सुख देने वाला है। तू स्वयं ही (जीवों को गुरू के साथ) मिलाता है। गुरू की शरण पड़ कर जीव तेरे साथ गहरी सांझ डाल लेते हैं। हे प्रभू ! तू स्वयं ही जीवों को अपना नाम बख्शता है~ (नाम जपने की) इज्जत देता है। जो मनुष्य तेरे नाम (-रंग) में रंगे जाते हैं~ वे आत्मिक आनंद लेते हैं। 6। हे सदा स्थिर रहने वाले प्रभू ! (मेहर कर) मैं सदा ही सदा ही तेरी सिफत सालाह करता रहूँ। जो मनुष्य गुरू की शरण पड़ता है~ वह तेरे साथ सांझ डालता है। अन्य कोई (तेरे साथ सांझ) नहीं (डाल सकता)। (जो मनुष्य गुरू का आसरा लेता है उसका) मन सदा एक परमात्मा के साथ ही जुड़ा रहता है। अगर (मनुष्य का) मन (परमात्मा की याद में) मगन हो जाए~ तो मनुष्य मन में मिला रहता है (भाव~ बाहर नहीं भटकता)। 7। जो मनुष्य गुरू का आसरा परना लेता है~ वह सदा कायम रहने वाले बेपरवाह ठाकुर की सिफत सालाह करता है। हे नानक ! उस मनुष्य के मन में परमात्मा का नाम आ बसता है। गुरू के शबद की बरकति से वह मनुष्य परमात्मा (के चरणों) में लीन रहता है। 8। 21। 22।
ਮਾਝ ਮਹਲਾ ੩ ॥
ਤੇਰੇ ਭਗਤ ਸੋਹਹਿ ਸਾਚੈ ਦਰਬਾਰੇ ॥
ਗੁਰ ਕੈ ਸਬਦਿ ਨਾਮਿ ਸਵਾਰੇ ॥
ਸਦਾ ਅਨੰਦਿ ਰਹਹਿ ਦਿਨੁ ਰਾਤੀ ਗੁਣ ਕਹਿ ਗੁਣੀ ਸਮਾਵਣਿਆ ॥੧॥
ਤੇਰੇ ਭਗਤ ਸੋਹਹਿ ਸਾਚੈ ਦਰਬਾਰੇ ॥
ਗੁਰ ਕੈ ਸਬਦਿ ਨਾਮਿ ਸਵਾਰੇ ॥
ਸਦਾ ਅਨੰਦਿ ਰਹਹਿ ਦਿਨੁ ਰਾਤੀ ਗੁਣ ਕਹਿ ਗੁਣੀ ਸਮਾਵਣਿਆ ॥੧॥
माझ महला ३ ॥
तेरे भगत सोहहि साचै दरबारे ॥
गुर कै सबदि नामि सवारे ॥
सदा अनंदि रहहि दिनु राती गुण कहि गुणी समावणिआ ॥१॥
तेरे भगत सोहहि साचै दरबारे ॥
गुर कै सबदि नामि सवारे ॥
सदा अनंदि रहहि दिनु राती गुण कहि गुणी समावणिआ ॥१॥
हिन्दी अर्थ: माझ महला ३ ॥ (हे प्रभू !) तेरी भक्ति करने वाले बंदेतेरे सदा स्थिर रहने वाले दरबार में शोभा पाते हैं। (हे भाई !) भगत जन गुरू के शबद द्वारा परमात्मा के नाम में जुड़ के सुंदर जीवन वाले बन जाते हैं। वे सदा आत्मिक आनंद में टिके रहते हैं। वे दिन रात प्रभू के गुण उचार के गुणों के मालिक प्रभू में समाए रहते हैं।
स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
संदर्भ: यह अंग 122 है, राग माझ का हिस्सा। मुख्य रचयिता: Guru Amar Daas Ji।
Noida के office-tower की 15वीं मंज़िल से शाम का Delhi-view।
ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।
यह अंग कुल 44 पंक्तियों का है, 3 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 122” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।
राग के context में: माझ राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।
पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।
अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।
“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।
नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।
अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।
तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।
हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।
ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।
दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।
“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।
हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।
अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।
आगे का अंग: अंग 123 →, पीछे का: ← अंग 121।
हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।
(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)
शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।
संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।
शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।
संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।
एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।
अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।