Lulla Family

अंग 98

अंग
98
राग माझ
राग: माझ · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
थिरु सुहागु वरु अगमु अगोचरु जन नानक प्रेम साधारी जीउ ॥4॥4॥11॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: हे दास नानक ! जो परमात्मा अपहुँच है जिस तक ज्ञानेंद्रियों की पहुँच नहीं हो सकती वह उस जीव स्त्री का सदा कायम रहने वाला सुहाग-भाग बन जाता है। उस जीव-स्त्री को उसके प्रेम का आसरा सदैव मिला रहता है।4।4।11।
माझ महला 5 ॥
खोजत खोजत दरसन चाहे ॥
भाति भाति बन बन अवगाहे ॥
निरगुणु सरगुणु हरि हरि मेरा कोई है जीउ आणि मिलावै जीउ ॥1॥
खटु सासत बिचरत मुखि गिआना ॥
पूजा तिलकु तीरथ इसनाना ॥
निवली करम आसन चउरासीह इन महि सांति न आवै जीउ ॥2॥
अनिक बरख कीए जप तापा ॥
गवनु कीआ धरती भरमाता ॥
इकु खिनु हिरदै सांति न आवै जोगी बहुड़ि बहुड़ि उठि धावै जीउ ॥3॥
करि किरपा मोहि साधु मिलाइआ ॥
मनु तनु सीतलु धीरजु पाइआ ॥
प्रभु अबिनासी बसिआ घट भीतरि हरि मंगलु नानकु गावै जीउ ॥4॥5॥12॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: माझ महला 5 ॥ अनेकों लोग (जंगलों पहाड़ों में) तलाशते तलाशते (परमात्मा के) दर्शन की तमन्ना करते हैं। कई किस्म के जंगल गाह मारते हैं। (पर इस तरह परमात्मा के दर्शन नही होते)। वह परमात्मा माया के तीन गुणों से अलग भी है और तीन गुणी संसार में व्यापक भी है।2। कई ऐसे हैं जो छह शास्त्रों को विचारते हैं और उनका उपदेश मुंह से (सुनाते हैं)। देव पूजा करते हैं और तिलक लगाते हैं, तीर्थों का स्नान करते हैं। कई ऐसे भी हैं जो निवली कर्म आदिक योगियों वाले चौरासी आसन करते हैं। पर इन उद्यमों से (मन में) शांति नहीं मिलती।2। जोगी लोग अनेकों साल जप करते हैं, तप साधते हैं। सारी धरती पे भ्रमण भी करते हैं। (इस तरह भी) हृदय में एक छिन के लिए भी शांति नहीं आती। फिर भी जोगी इन जपों-तपों के पीछे ही मुड़ मुड़ के ही दौड़ता है।3। परमात्मा ने कृपा करके मुझे गुरू मिला दिया है। मेरा मन शीतल हो गया है (मेरे मन और ज्ञानेंद्रियों में से विकारों की तपस समाप्त हो चुकी है) गुरू से मुझे धैर्य मिला है। (गुरू की मेहर से) अविनाशी प्रभू मेरे हृदय में आ बसा है। अब (ये दास) नानक परमात्मा की सिफत-सालाह का गीत ही गाता है (ये सिफत सलाह प्रभू चरणों में जोड़ के रखती है)।4।5।12।
माझ महला 5 ॥
पारब्रहम अपरंपर देवा ॥
अगम अगोचर अलख अभेवा ॥
दीन दइआल गोपाल गोबिंदा हरि धिआवहु गुरमुखि गाती जीउ ॥1॥
गुरमुखि मधुसूदनु निसतारे ॥
गुरमुखि संगी क्रिसन मुरारे ॥
दइआल दमोदरु गुरमुखि पाईऐ होरतु कितै न भाती जीउ ॥2॥
निरहारी केसव निरवैरा ॥
कोटि जना जा के पूजहि पैरा ॥
गुरमुखि हिरदै जा कै हरि हरि सोई भगतु इकाती जीउ ॥3॥
अमोघ दरसन बेअंत अपारा ॥
वड समरथु सदा दातारा ॥
गुरमुखि नामु जपीऐ तितु तरीऐ गति नानक विरली जाती जीउ ॥4॥6॥13॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: माझ महला 5 ॥ (हे भाई !) गुरू की शरण पड़ के उस हरी का सिमरन करो, जो परम आत्मा है।जो सबसे परे है। जो प्रकाश-रूप है, जो अपहुँच है, जिस तक ज्ञाने इंद्रयों की पहुँच नहीं हो सकती, जिसका स्वरूप बयान नहीं किया जा सकता, जिसका भेद नहीं पाया जा सकता, जो दीनों पर दया करने वाला है। जो सुष्टि की पालना करने वाला है, जो सृष्टि के जीवों के दिलों की जानने वाला है और जो उच्च आत्मिक अवस्था देने वाला है।1। गुरू की शरण पड़ने से मधु दैंत को मारने वाला (विकार रूपी दैंत से) बचा लेता है। गुरू की शरण पड़ने से मुर दैंत को मारने वाला प्रभू (सदा के लिए) साथी बन जाता है। गुरू की शरण पड़ने से ही वह प्रभू मिलता है जो दया का स्रोत है और जिसे दामादेर कहा है, किसी और तरीके से नहीं मिल सकता।2। वह परमात्मा केशव (सुंदर केशों वाला) किसी के साथ वैर नहीं रखता और उसे किसी खुराक की जरूरत नहीं पड़ती। करोड़ों ही सेवक जिसके पैर पूजते हैं, गुरू के द्वारा जिस मनुष्य के हृदय में वह बस जाता है, वह मनुष्य अनिंन भगत बन जाता है।3। उस परमात्मा का दर्शन जरूर (मन इच्छित) फल देता है। उसके गुणों का अंत नहीं पाया जा सकता। उसकी हस्ती का दूसरा छोर नहीं ढूंढा जा सकता। वह बड़ी ताकतों वाला है और वह सदा ही दातें देता रहता है। गुरू की शरण पड़ कर अगर उसका नाम जपें, तो उसके नाम की बरकति से (संसार समुंद्र से) पार हो जाते हैं। पर, हे नानक ! ये ऊँची आत्मिक अवस्था किसी विरले ने ही समझी है।4।6।13।
माझ महला 5 ॥
कहिआ करणा दिता लैणा ॥
गरीबा अनाथा तेरा माणा ॥
सभ किछु तूंहै तूंहै मेरे पिआरे तेरी कुदरति कउ बलि जाई जीउ ॥1॥
भाणै उझड़ भाणै राहा ॥
भाणै हरि गुण गुरमुखि गावाहा ॥
भाणै भरमि भवै बहु जूनी सभ किछु तिसै रजाई जीउ ॥2॥
ना को मूरखु ना को सिआणा ॥
वरतै सभ किछु तेरा भाणा ॥
अगम अगोचर बेअंत अथाहा तेरी कीमति कहणु न जाई जीउ ॥3॥
खाकु संतन की देहु पिआरे ॥
आइ पइआ हरि तेरै दुआरै ॥
दरसनु पेखत मनु आघावै नानक मिलणु सुभाई जीउ ॥4॥7॥14॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: माझ महला 5 ॥ हे प्रभू ! आप जो हुकम करता है, वही जीव करते हैं। जो कुछ आप देता है, वही जीव हासिल कर सकते हैं। गरीब और अनाथ जीवों को आपका ही आसरा है। हे मेरे प्यारे प्रभू ! (जगत में) सब कुछ आप ही कर रहा है आप ही कर रहा है। मैं आपकी स्मर्था से सदके जाता हूँ।1। परमात्मा की रजा में ही जीव (जिंदगी का) गलत रास्ता पकड़ लेते हैं और कई सही रास्ता पकड़ते हैं। परमात्मा की रजा में ही कई जीव गुरू की शरण पड़ कर हरी के गुण गाते हैं। प्रभू की रजा अनुसार ही जीव (माया के मोह की) भटकन में फंस के अनेकों जूनों में भटकते फिरते हैं। (ये) सब कुछ उस प्रभू की रजा में ही हो रहा है।2। हे अपहुँच प्रभू ! हे इन्द्रियों की पहुँच से परे प्रभू ! हे अथाह प्रभू ! (अपनी स्मर्था से) ना ही कोई जीव मूर्ख है ना ही कोई बुद्धिमान। (जगत में जो कुछ हो रहा है) सब आपका हुकम चल रहा है। आपके बराबर की कोई शै बताई नहीं जा सकती।3। हे प्यारे हरी ! मुझे अपने संतों के चरणों की धूड़ दे। मैं आपके दर पे आ गिरा हूँ। हे नानक ! (कह, परमात्मा का) दर्शन करने से मन (दुनिया के पदार्थों की तरफ से) भर जाता है और उसकी रजा अनुसार उससे मिलाप हो जाता है।4।7।14।
माझ महला 5 ॥
दुखु तदे जा विसरि जावै ॥
भुख विआपै बहु बिधि धावै ॥
सिमरत नामु सदा सुहेला जिसु देवै दीन दइआला जीउ ॥1॥
सतिगुरु मेरा वड समरथा ॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: माझ महला 5 ॥ (जीव को) दुख तभी होता है जब उसे (परमात्मा का नाम) बिसर जाता है। (नाम से वंचित जीव पे) माया की तृष्णा जोर डाल लेती है, और जीव कई ढंगों से (माया की खातिर) भटकता फिरता है। दीनों पे दया करने वाला परमात्मा जिस मनुष्य को (नाम की दात) देता है वह सिमर सिमर के सदा सुखी रहता है।1। (पर ये नाम की दात गुरू से ही मिलती है) मेरा सतिगुरू बड़ी ताकत वाला है,

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। गौड़ी राग का विस्तार ग्रंथ का सबसे लम्बा है। गुरु अर्जन की वाणी इसमें प्रमुख है, जो सत्रहवीं सदी के पहले दशक में संकलित हुई।

गुरु अर्जन देव जी ने ही 1604 में आदि ग्रंथ का प्रथम संकलन तैयार किया, और हरमंदिर साहिब में स्थापित किया। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय। जहाँगीर के दरबार में 1606 में, चालीस-तीन वर्ष की आयु में, उन्हें यंत्रणा देकर मारा गया। वो सिख-इतिहास के पहले शहीद हैं।

इस अंग पर 5 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे दास नानक ! जो परमात्मा अपहुँच है जिस तक ज्ञानेंद्रियों की पहुँच नहीं हो सकती वह उस जीव स्त्री का सदा कायम रहने वाला सुहाग-भाग बन जाता है।”

पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।