खोजत खोजत दरसन चाहे ॥
भाति भाति बन बन अवगाहे ॥
निरगुणु सरगुणु हरि हरि मेरा कोई है जीउ आणि मिलावै जीउ ॥1॥
खटु सासत बिचरत मुखि गिआना ॥
पूजा तिलकु तीरथ इसनाना ॥
निवली करम आसन चउरासीह इन महि सांति न आवै जीउ ॥2॥
अनिक बरख कीए जप तापा ॥
गवनु कीआ धरती भरमाता ॥
इकु खिनु हिरदै सांति न आवै जोगी बहुड़ि बहुड़ि उठि धावै जीउ ॥3॥
करि किरपा मोहि साधु मिलाइआ ॥
मनु तनु सीतलु धीरजु पाइआ ॥
प्रभु अबिनासी बसिआ घट भीतरि हरि मंगलु नानकु गावै जीउ ॥4॥5॥12॥
पारब्रहम अपरंपर देवा ॥
अगम अगोचर अलख अभेवा ॥
दीन दइआल गोपाल गोबिंदा हरि धिआवहु गुरमुखि गाती जीउ ॥1॥
गुरमुखि मधुसूदनु निसतारे ॥
गुरमुखि संगी क्रिसन मुरारे ॥
दइआल दमोदरु गुरमुखि पाईऐ होरतु कितै न भाती जीउ ॥2॥
निरहारी केसव निरवैरा ॥
कोटि जना जा के पूजहि पैरा ॥
गुरमुखि हिरदै जा कै हरि हरि सोई भगतु इकाती जीउ ॥3॥
अमोघ दरसन बेअंत अपारा ॥
वड समरथु सदा दातारा ॥
गुरमुखि नामु जपीऐ तितु तरीऐ गति नानक विरली जाती जीउ ॥4॥6॥13॥
कहिआ करणा दिता लैणा ॥
गरीबा अनाथा तेरा माणा ॥
सभ किछु तूंहै तूंहै मेरे पिआरे तेरी कुदरति कउ बलि जाई जीउ ॥1॥
भाणै उझड़ भाणै राहा ॥
भाणै हरि गुण गुरमुखि गावाहा ॥
भाणै भरमि भवै बहु जूनी सभ किछु तिसै रजाई जीउ ॥2॥
ना को मूरखु ना को सिआणा ॥
वरतै सभ किछु तेरा भाणा ॥
अगम अगोचर बेअंत अथाहा तेरी कीमति कहणु न जाई जीउ ॥3॥
खाकु संतन की देहु पिआरे ॥
आइ पइआ हरि तेरै दुआरै ॥
दरसनु पेखत मनु आघावै नानक मिलणु सुभाई जीउ ॥4॥7॥14॥
दुखु तदे जा विसरि जावै ॥
भुख विआपै बहु बिधि धावै ॥
सिमरत नामु सदा सुहेला जिसु देवै दीन दइआला जीउ ॥1॥
सतिगुरु मेरा वड समरथा ॥
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। गौड़ी राग का विस्तार ग्रंथ का सबसे लम्बा है। गुरु अर्जन की वाणी इसमें प्रमुख है, जो सत्रहवीं सदी के पहले दशक में संकलित हुई।
गुरु अर्जन देव जी ने ही 1604 में आदि ग्रंथ का प्रथम संकलन तैयार किया, और हरमंदिर साहिब में स्थापित किया। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय। जहाँगीर के दरबार में 1606 में, चालीस-तीन वर्ष की आयु में, उन्हें यंत्रणा देकर मारा गया। वो सिख-इतिहास के पहले शहीद हैं।
इस अंग पर 5 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे दास नानक ! जो परमात्मा अपहुँच है जिस तक ज्ञानेंद्रियों की पहुँच नहीं हो सकती वह उस जीव स्त्री का सदा कायम रहने वाला सुहाग-भाग बन जाता है।”
पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।