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अंग 148

अंग
148
राग माझ
राग: माझ · रचयिता: गुरु अंगद देव जी (महला 2)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
कब चंदनि कब अकि डालि कब उची परीति ॥
नानक हुकमि चलाईऐ साहिब लगी रीति ॥2॥
गुरु अंगद देव जी की शिक्षक-वाली शान्त-दृष्टि यहाँ काम कर रही है। 1539 में गुरु-गद्दी पर बैठने के बाद, उन्होंने गुरमुखी लिपि को व्यवस्थित किया, जिससे आगे की वाणी संग्रहित हो सकी।

हिन्दी अर्थ: कभी (ये मति रूपी पंछी) चंदन (के पौधे) पे (बैठता है) कभी धतूरे की डाली पे। कभी (इसके अंदर) ऊँची (प्रभू चरणों की) प्रीति है। (पर किसी के बस की बात नहीं) मालिक की (धुर से) रीत चली आ रही है, कि वह (सब जीवों को अपने) हुकम में चला रहा है (भाव, उसके हुकम अनुसार ही कोई अच्छी तो बुरी मति वाला है)। 2।
पउड़ी ॥
केते कहहि वखाण कहि कहि जावणा ॥
वेद कहहि वखिआण अंतु न पावणा ॥
पड़िऐ नाही भेदु बुझिऐ पावणा ॥
खटु दरसन कै भेखि किसै सचि समावणा ॥
सचा पुरखु अलखु सबदि सुहावणा ॥
मंने नाउ बिसंख दरगह पावणा ॥
खालक कउ आदेसु ढाढी गावणा ॥
नानक जुगु जुगु एकु मंनि वसावणा ॥21॥
अंगद जी की वाणी कम है, मगर हर एक रचना में एक संयम झलकता है। 1552 तक उनके गुरु-काल में लिपि-व्यवस्था और संगठन का काम सबसे अधिक हुआ।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी ॥ बेअंत जीव (परमात्मा के गुणों का) बयान करते आए हैं और बयान करके (जगत से) चले गए हैं। वेद (आदि धर्म पुस्तकें भी उसके गुण) बताते आए हैं, (पर) किसी ने भी उसके गुणों का अंत नहीं पाया। (पुस्तकें) पढ़ने से (भी) उसका भेद नहीं पता चलता। मति ऊँची होने से ही ये राज समझ में आता है (कि वह बेअंत है)। छे भेस वाले साधुओं के बाहरी लिबास से भी कोई सत्य के साथ नहीं जुड़ सका। वह सदा स्थिर रहने वाला अकाल-पुरख है तो अदृश्य, (पर गुरू) शबद के द्वारासुंदर लगता है। जो मनुष्य बेअंत प्रभू के ‘नाम’ को मानता है (भाव, जो नाम में जुड़ता है), वह उसकी हजूरी में पहुँचता है। वह अकाल पुरख को सिर झुकाता है। ढाढी बन के उसके गुण गाता है, और, हे नानक ! हरेक युग में मौजूद रहने वाले एक प्रभू को अपने मन में बसाता है। 21।
सलोकु महला 2 ॥
मंत्री होइ अठूहिआ नागी लगै जाइ ॥ आपण हथी आपणै दे कूचा आपे लाइ ॥
हुकमु पइआ धुरि खसम का अती हू धका खाइ ॥
गुरमुख सिउ मनमुखु अड़ै डुबै हकि निआइ ॥
दुहा सिरिआ आपे खसमु वेखै करि विउपाइ ॥
नानक एवै जाणीऐ सभ किछु तिसहि रजाइ ॥1॥
गुरु अंगद देव जी की शिक्षक-वाली शान्त-दृष्टि यहाँ काम कर रही है। 1539 में गुरु-गद्दी पर बैठने के बाद, उन्होंने गुरमुखी लिपि को व्यवस्थित किया, जिससे आगे की वाणी संग्रहित हो सकी।

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 2॥ बिच्छुओं का मांदरी हो के (जो मनुष्य) सापों कोजा के हाथ डालता है, वह अपने आप को अपने ही हाथों से (जैसे) लांबू लगाता है। धुर से मालिक का हुकम ही ऐसे होता है कि इस अति के कारण (भाव, अति के मूर्खपने के कारण) उसे धक्का लगता है। मनमुख मनुष्य गुरमुख से खहिबाजी करता है (करतार के) सच्चे न्याय अनुसार वह (संसार समुंद्र में) डूबता है (भाव, विकारों की लहरों में उसकी जिंदगी के बेड़ी ग़रक हो जाती है)। पर (किसी को दोष नहीं दिया जा सकता, क्या गुरमुख और क्या मनमुख) दोनों तरफ पति प्रभू खुद (सिर पे खड़ा हुआ) है, खुद ही निर्णय करके देख रहा है। हे नानक ! (असल बात) ऐसे ही समझनी चाहिए कि हरेक काम उसकी रजा में हो रहा है।
महला 2 ॥
नानक परखे आप कउ ता पारखु जाणु ॥
रोगु दारू दोवै बुझै ता वैदु सुजाणु ॥
वाट न करई मामला जाणै मिहमाणु ॥
मूलु जाणि गला करे हाणि लाए हाणु ॥
लबि न चलई सचि रहै सो विसटु परवाणु ॥
सरु संधे आगास कउ किउ पहुचै बाणु ॥
अगै ओहु अगंमु है वाहेदड़ु जाणु ॥2॥
अंगद जी की वाणी कम है, मगर हर एक रचना में एक संयम झलकता है। 1552 तक उनके गुरु-काल में लिपि-व्यवस्था और संगठन का काम सबसे अधिक हुआ।

हिन्दी अर्थ: महला 2॥ हे नानक ! (दूसरों की पड़ताल करने की जगह) अगर मनुष्य अपने आप को परखे, तो उसे (असल) पारखू समझो। (दूसरों के विकार रूपी रोग ढूँढने के बजाए) अगर मनुष्य अपना (आत्मिक) रोग और रोग का इलाज दोनों समझ ले तो उसे अकलमंद हकीम जान लो। (ऐसा ‘सुजान वैद्य’) (जिंदगी के) राह में (औरों के साथ) झगड़े नहीं डाल बैठता, वह (अपने आप को जगत में) मुसाफिर समझता है। (अपने) असल (प्रभू) के साथ गहरी सांझ डाल के, जो भी बात करता है अपना समय सत्संगियों के साथ (मिल के) गुजारता है। वह मनुष्य लालच के आसरे नही चलता, सच में टिका रहता है (ऐसा मनुष्य खुद तो तैरता ही है औरों के लिए भी) प्रमाणिक बिचोलिया बन जाता है। (पर, अगर खुद हो मनमुख, और झगड़े गुरमुखों से, वह ऐसे ही है जैसे आकाश में तीर मारता है) जो मनुष्य आकाश की ओर तीर मारता है, (उसका) तीर कैसे (निशाने पे) पहुँचे? वह आकाश तो आगे से अपहुँच है, सो, (यकीन) जानों कि तीर चलाने वाला ही (खुद ही भेदा जाता है)। 2।
पउड़ी ॥
नारी पुरख पिआरु प्रेमि सीगारीआ ॥
करनि भगति दिनु राति न रहनी वारीआ ॥
महला मंझि निवासु सबदि सवारीआ ॥
सचु कहनि अरदासि से वेचारीआ ॥
सोहनि खसमै पासि हुकमि सिधारीआ ॥
सखी कहनि अरदासि मनहु पिआरीआ ॥
बिनु नावै ध्रिगु वासु फिटु सु जीविआ ॥
सबदि सवारीआसु अंम्रितु पीविआ ॥22॥
गुरु अंगद देव जी की शिक्षक-वाली शान्त-दृष्टि यहाँ काम कर रही है। 1539 में गुरु-गद्दी पर बैठने के बाद, उन्होंने गुरमुखी लिपि को व्यवस्थित किया, जिससे आगे की वाणी संग्रहित हो सकी।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी। जिन जीव सि्त्रयों को प्रभू पति से प्यार है, वह इस प्यार (रूपी गहने से) सजी हुई हैं। वह दिन रात (प्रभू पति की) भगती करती हैं। मना करने से (भी भक्ति से) हटती नहीं। सत्गुरू के शबद की बरकति से सुधरी हुई वे (मानो) महलों में बसती हैं। वह विचारवान (हो जाने के कारण) सदा स्थिर रहने वाली अरदास करती हैं (भाव, दुनिया के नाशवंत पदार्थ नहीं मांगती, सदा कायम रहने वाला ‘प्यार’ ही मांगती हैं), (पति प्रभू के) हुकम मुताबिक (पति प्रभू तक) पहुँची हुई वे पति प्रभू के पास (बैठी) शोभती हैं। प्रभू को दिल से प्यार करती हैं और सखी भाव के साथ उसके आगे अरदास करती हैं। (पर) वह जीना धिक्कारयोग्य है, उस बसेरे को लाहनत है जो नाम से विहीन है। जिस जीव-स्त्री को (अकाल पुरख) ने गुरू-शबद के द्वारा सुधारा है उसने (नाम-) अमृत पिया है। 22।
सलोकु मः 1 ॥
मारू मीहि न त्रिपतिआ अगी लहै न भुख ॥
राजा राजि न त्रिपतिआ साइर भरे किसुक ॥
नानक सचे नाम की केती पुछा पुछ ॥1॥
अंगद जी की वाणी कम है, मगर हर एक रचना में एक संयम झलकता है। 1552 तक उनके गुरु-काल में लिपि-व्यवस्था और संगठन का काम सबसे अधिक हुआ।

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 1 ॥ मरुस्थल बरसात से (कभी) तृप्त नहीं होता। आग की (जलाने की) भूख (कभी ईधन से) नहीं मिटती। (कोई) राजा कभी राज (करने) से नहीं अघाया। भरे समुंद्र को सूखा क्या कह सकता है? (भाव, कितनी ही तपष क्यूँ ना पड़े भरे समुंद्रों के गहरे पानियों को सूखा नहीं मिटा सकता)। (वैसे ही) हे नानक ! (नाम जपने वालों के अंदर) सच्चे नाम की कितनी कि चाहत होती है, ये बात कही नहीं जा सकती। 1।
महला 2 ॥
निहफलं तसि जनमसि जावतु ब्रहम न बिंदते ॥
सागरं संसारसि गुर परसादी तरहि के ॥
करण कारण समरथु है कहु नानक बीचारि ॥
कारणु करते वसि है जिनि कल रखी धारि ॥2॥
गुरु अंगद देव जी की शिक्षक-वाली शान्त-दृष्टि यहाँ काम कर रही है। 1539 में गुरु-गद्दी पर बैठने के बाद, उन्होंने गुरमुखी लिपि को व्यवस्थित किया, जिससे आगे की वाणी संग्रहित हो सकी।

हिन्दी अर्थ: महला 2॥ जब तक (मनुष्य) अकाल-पुरख को नहीं पहचानता तब तक उसका जनम व्यर्थ है। पर, गुरू की कृपा से जो लोग (नाम में जुड़ते हैं वह) संसार के समुंद्र से तैर जाते हैं। हे नानक ! जो प्रभू जगत का मूल सब कुछ करने योग्य है, जिस ईश्वर के वश में जगत का सृजन है, जिस ने (सारे जगत में) अपनी सत्ता टिकाई हुई है, उसका ध्यान धर। 2।
पउड़ी ॥
खसमै कै दरबारि ढाढी वसिआ ॥
सचा खसमु कलाणि कमलु विगसिआ ॥
खसमहु पूरा पाइ मनहु रहसिआ ॥
दुसमन कढे मारि सजण सरसिआ ॥
सचा सतिगुरु सेवनि सचा मारगु दसिआ ॥
अंगद जी की वाणी कम है, मगर हर एक रचना में एक संयम झलकता है। 1552 तक उनके गुरु-काल में लिपि-व्यवस्था और संगठन का काम सबसे अधिक हुआ।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ जो मनुष्य प्रभू की सिफत सलाह करता है वह (सदा) मालिक की हजूरी में बसता है। सदा कायम रहने वाले पति की प्रशंसा करके उसका हृदय रूपी कमल खिला जाता है। मालिक से पूरा गौरव (भाव, पूर्ण अवस्था) हासिल करके वह अंदर से उल्लास में आता है (क्योंकि, कामादिक विकार) वैरियों को वह (अंदर से) मार के निकाल देता है (तो फिर नाम में लगे उसके ज्ञानेंद्रिय रूप) मित्र प्रसन्न हो जाते हैं। ये (ज्ञानेंद्रियां) गुरू की रजा में चलने लग जाती हैं। सत्गुरू इन्हें (अब जीवन का) सच्चा राह दिखता है।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। गौड़ी राग का विस्तार ग्रंथ का सबसे लम्बा है। गुरु अर्जन की वाणी इसमें प्रमुख है, जो सत्रहवीं सदी के पहले दशक में संकलित हुई।

अंगद जी के समय गुरमुखी ने अपनी रूप-रेखा पायी। उनकी अपनी रचनाएँ कम मगर पठनीय हैं, और बाद के गुरुओं की वाणी को संग्रहित-करने की संरचना उन्हीं की देन है।

इस अंग पर 8 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “कभी (ये मति रूपी पंछी) चंदन (के पौधे) पे (बैठता है) कभी धतूरे की डाली पे।”

इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।