अयोध्या उस सुबह की प्रतीक्षा में जाग रही थी, जो उसके भविष्य को सदा के लिए बदल देने वाली थी। भरत और शत्रुघ्न अपने ननिहाल गए हुए थे; वृद्ध सम्राट दशरथ अपने चारों पुत्रों में से ज्येष्ठ राम को देख कर एक गहरा निश्चय कर चुके थे। शरीर पर बुढ़ापे की छाया और आकाश में अशुभ संकेतों की आहट ले कर उन्होंने राजाओं और मन्त्रियों की सभा बुलाई, और घोषणा कर दी कि कल पुष्य-नक्षत्र की वेला में राम युवराज पद पर अभिषिक्त होंगे। यहाँ से वह उत्सव आरम्भ होता है, जिसमें एक पूरी नगरी अपने प्रिय राजकुमार के राज्याभिषेक की कल्पना-मात्र से उल्लास में डूब जाती है।
चार पुत्र, और दशरथ के मन का निश्चय

उन्हीं दिनों, जब भरत अपने मामा के घर की ओर जा रहे थे, उन्होंने अपने प्रति प्रीति रखने वाले निष्पाप शत्रुघ्न (शत्रुओं का संहारक) को भी अपने साथ ले लिया। वहाँ अश्वों के स्वामी अपने मामा युधाजित के द्वारा आतिथ्य से सत्कृत और पुत्र-स्नेह से लालित हो कर, भरत अपने छोटे भाई शत्रुघ्न के साथ रहने लगे। वहाँ इच्छित भोगों से तृप्त होते हुए भी, वे दोनों वीर भाई अपने वृद्ध पिता राजा दशरथ को स्मरण करते रहे। उधर महातेजस्वी सम्राट भी अपने उन दोनों परदेश गए पुत्रों, भरत और शत्रुघ्न को स्मरण करते थे, जो पराक्रम में महेन्द्र (देवराज इन्द्र) और वरुण (जल के अधिपति देव) के समान थे।
वे चारों राजकुमार दशरथ को समान रूप से प्रिय थे, मानो उनके अपने ही शरीर से निकली चार भुजाएँ हों। किन्तु उन सब में महातेजस्वी राम पिता को वैसा ही परम आनन्द देते थे, और गुणों में वैसे ही सब से बढ़कर थे, जैसे स्वयम्भू ब्रह्मा (स्वयं उत्पन्न होने वाले सृष्टि-कर्ता) सब प्राणियों में श्रेष्ठ हैं। क्योंकि देवों के द्वारा अहंकारी रावण के वध के लिए प्रार्थित हो कर, सनातन भगवान् विष्णु ही राम के रूप में मनुष्य-लोक में अवतरित हुए थे। उन अमित-तेजस्वी पुत्र से कौसल्या वैसी ही शोभा पाती थीं, जैसे वज्रधारी देवराज इन्द्र को जन्म दे कर अदिति शोभा पाती थीं।
राम रूप से सम्पन्न, पराक्रमी, और किसी में दोष न ढूँढ़ने वाले थे। वे पृथ्वी पर पुत्र के रूप में अनुपम थे, और गुणों में स्वयं दशरथ की प्रतिमूर्ति। मन से सदा प्रशान्त रहने वाले राम बिना बुलाए भी मृदु वाणी में बोलते; किसी के कठोर वचन कहने पर भी वे उत्तर में कुछ कठोर न कहते। एक बार किया हुआ छोटा-सा उपकार भी उन्हें तृप्त कर देता था, और अपने आत्म-संयम के कारण वे दूसरों के सौ अपकारों को भी स्मरण न रखते थे। शस्त्र-विद्या के अभ्यास से अवकाश मिलने पर भी वे शील, ज्ञान और अवस्था में अपने से बड़े सत्पुरुषों से ही वार्तालाप करते थे।
वे बुद्धिमान्, मधुरभाषी, और पहले स्वयं बात आरम्भ करने वाले प्रियवादी थे; महान् पराक्रमी हो कर भी अपने उस असाधारण बल पर कभी गर्व न करते थे। वे असत्य कभी न कहते, विद्वान् थे, वृद्धों का सम्मान करते थे; प्रजा उनसे और वे प्रजा से अनुरक्त (गहरे स्नेह से बँधे) थे। वे करुणाशील, क्रोध को जीत चुके, ब्राह्मणों के पूजक, दीनों पर दया करने वाले, धर्म के ज्ञाता, सदा अपने को संयम में रखने वाले, और भीतर-बाहर से पवित्र थे।
अपने कुल के योग्य बुद्धि रखने वाले राम क्षात्र-धर्म (क्षत्रिय का स्वधर्म) को बहुत मानते थे, और उसी से प्राप्त होने वाले महान् स्वर्ग-फल को परम प्रीति से श्रेष्ठ समझते थे। जो कल्याण न करे, उस कर्म में उनकी रुचि न थी; धर्म-विरुद्ध बातों में उनका मन न लगता था। तर्क और प्रति-तर्क प्रस्तुत करने में वे वाचस्पति (बृहस्पति, वाणी के स्वामी) के समान थे। वे रोग-रहित, युवा, वक्ता, सुगठित शरीर वाले, और देश-काल के ज्ञाता थे; संसार में वे ऐसे एकमात्र साधु-पुरुष थे, जो अपने सम्मुख आए हर व्यक्ति के मूल्य को पहचान लेते थे।
सार: भरत और शत्रुघ्न ननिहाल में हैं; चारों पुत्र दशरथ को अपनी चार भुजाओं-से प्रिय हैं, पर सब गुणों से सम्पन्न ज्येष्ठ राम सब में अग्रणी हैं। वाल्मीकि यहाँ विस्तार से राम के गुण गिनाते हैं, और साथ ही यह संकेत भी देते हैं कि वे रावण-वध के लिए अवतरित विष्णु ही हैं।
समस्त गुणों का धाम, और पृथ्वी की कामना
राम सब वेदों को उनके अंगों सहित यथावत् पढ़ चुके थे, सब विद्याओं और व्रतों में स्नातक थे, और बाण-विद्या तथा मन्त्र-शक्ति से चलाए जाने वाले अस्त्रों में अपने पिता दशरथ से भी श्रेष्ठ थे, जो स्वयं अद्वितीय धनुर्धर थे। धर्म, अर्थ और काम के तत्त्व के ज्ञाता, तीव्र स्मृति वाले, और सूक्ष्म-दृष्टि वाले राम लौकिक व्यवहार में निपुण और वैदिक कर्म में भी पारंगत थे। वे विनम्र थे, अपने भावों और मन्त्रणाओं (गुप्त परामर्शों) को छिपा कर रखते थे, और बहुत-से सहायक जुटा लेते थे; उनका क्रोध और प्रसन्नता दोनों अमोघ थे, और वे धन के त्याग तथा संयम का काल जानते थे।
वे दृढ़-भक्ति वाले, स्थिर-बुद्धि थे; अयोग्य लोगों को अपने पास न जुटाते, न दुर्वचन बोलते; आलस्य और प्रमाद से रहित हो कर अपने और दूसरों, दोनों के दोषों को पहचानते थे। शास्त्रों के ज्ञाता, कृतज्ञ, मनुष्यों के अन्तर को पढ़ लेने वाले, और दण्ड देने तथा अनुग्रह करने में न्यायानुसार विचक्षण थे। कल्याणकारी कुल में उत्पन्न, साधु, कभी न दीन होने वाले, सत्यवादी और सरल राम को धर्म और अर्थ की दृष्टि रखने वाले श्रेष्ठ ब्राह्मणों ने भली प्रकार शिक्षित किया था। वे आय के स्रोतों को जानते थे, और शास्त्रों के अनुसार धन-व्यय की कला में भी निपुण थे।
एक उप-कथा: राजा के राज-कोष पर महाभारत में नारद युधिष्ठिर से पूछते हैं कि क्या आपका व्यय आपकी आय के आधे, चौथाई या तीन-चौथाई भाग से ही चलता है, उससे अधिक तो नहीं? श्रीमद्भागवत में भी गृहस्थ के लिए विधान है कि अपनी आय को पाँच भागों में बाँट कर वह धर्म, यश, और अधिक धन, भोग, तथा अपने जनों के पालन में लगाए। यही राज-धन-नीति राम में सहज सिद्ध थी।
वे विभिन्न शास्त्रों में और मिश्रित भाषा में रचे ग्रन्थों (नाटक आदि) में पारंगत थे, धर्म और अर्थ को अक्षुण्ण रखते हुए भोग भोगते थे, और कभी आलस्य में न पड़ते थे। वे अपने मनोरंजन के कलाओं के मर्मज्ञ, धन के यथोचित विभाजन के ज्ञाता, और हाथी-घोड़ों के आरोहण तथा उन्हें वश में करने में निपुण थे। धनुर्वेद के ज्ञाताओं में श्रेष्ठ राम संसार में अतिरथियों (अनेक महारथियों से अकेले लड़ने वाले योद्धाओं) में गिने जाते थे; वे शत्रु-दुर्ग में प्रवेश करना, युद्ध में आक्रमण करना, और सेना की व्यूह-रचना, सब जानते थे। क्रुद्ध हुए देवता और असुर भी संग्राम में उन्हें परास्त नहीं कर सकते थे। वे दोष-दृष्टि से रहित, क्रोध को जीते हुए, न कभी अहंकार करने वाले और न ईर्ष्या करने वाले थे।
उन्हें कोई भी प्राणी अवहेलना से नहीं देख सकता था, और वे काल के वश में भी नहीं थे। इन श्रेष्ठतम गुणों से सम्पन्न दशरथ-पुत्र राम केवल अयोध्या में ही नहीं, तीनों लोकों में सम्मानित थे; वे क्षमा आदि गुणों में पृथ्वी के, बुद्धि में बृहस्पति के, और पराक्रम में शची-पति इन्द्र के समकक्ष थे। जैसे सूर्य अपनी किरणों से देदीप्यमान होता है, वैसे ही राम इन सब गुणों से प्रकाशित होते, पिता को आनन्द देते, और अयोध्या की समस्त प्रजा के प्रिय थे। ऐसे लोकपालों के समान पराक्रमी, उत्तम-शील-सम्पन्न नाथ को स्वयं पृथ्वी-देवी अपना रक्षक चाहती थीं।

इन अनेक अनुपम गुणों से युक्त अपने ज्येष्ठ पुत्र को देख कर शत्रु-दमनकारी राजा दशरथ मन-ही-मन विचार करने लगे: “मेरे जीवित रहते ही राम कैसे राजा हों, यह कैसे सम्भव हो? यही मेरे हृदय में घूमती हुई परम कामना है कि मैं अपने प्रिय पुत्र को अभिषिक्त हुआ कब देखूँगा। समस्त प्राणियों पर दया करने वाला, सब का हित चाहने वाला यह पुत्र वर्षा करने वाले बादल की भाँति मुझसे भी अधिक संसार को प्रिय है। पराक्रम में यम और इन्द्र के समान, बुद्धि में बृहस्पति के समान, धैर्य में पर्वत के समान, और गुणों में मुझसे भी बढ़कर है। इस सम्पूर्ण पृथ्वी पर शासन करते हुए अपने इस पुत्र को इस अवस्था में देख कर मैं स्वर्ग को प्राप्त करूँ।”
ऐसा विचार कर के, दूसरे राजाओं में दुर्लभ इन नाना गुणों तथा अन्य असंख्य लोकोत्तर गुणों से युक्त राम को देख कर, और मन्त्रियों के साथ निश्चय कर के, सम्राट ने उन्हें युवराज-पद पर अभिषिक्त करने का संकल्प कर लिया। बुद्धिमान् राजा ने मन्त्रियों से आकाश, अन्तरिक्ष और भूमि पर प्रकट होते घोर उत्पातों के भय की, तथा अपने शरीर पर आते बुढ़ापे की भी चर्चा की; और उधर मन्त्रियों से ही उन्होंने पूर्ण-चन्द्र-से मुख वाले महात्मा राम की लोकप्रियता को जाना, जिसने सम्राट के उस शोक को शान्त कर दिया।
समझने की कुंजी (पुष्य-नक्षत्र और मुहूर्त): प्राचीन भारत में राज्याभिषेक जैसे मंगल-कार्य के लिए नक्षत्र का विशेष विचार होता था। पुष्य नक्षत्र सब कार्यों के लिए परम शुभ माना जाता है। आगे दशरथ इसी पुष्य-योग की वेला को अभिषेक के लिए चुनते हैं, और ज्योतिषी अगले दिन इसी योग के निश्चित होने की घोषणा करते हैं।

अपनी प्रजा और सब का हित चाहने वाले धर्मात्मा राजा ने उचित समय आते ही मन्त्रियों को शीघ्रता करने को प्रेरित किया। पृथ्वीपति ने अनेक नगरों के निवासियों तथा भिन्न-भिन्न जनपदों के प्रधान पुरुषों को अपनी राजधानी में बुलवा भेजा। वस्त्र और आभूषणों से उनका यथायोग्य सत्कार कर के, स्वयं भी अलंकृत हो कर राजा ने उन्हें वैसे ही देखा, जैसे प्रजापति ब्रह्मा अपनी सन्तान को देखते हों। किन्तु शीघ्रता में उन्होंने न तो केकय-नरेश को बुलाया, न मिथिलापति जनक को; उन्होंने यह सोच कर मन को सान्त्वना दे ली कि वे दोनों यह प्रिय समाचार पीछे सुन लेंगे।
एक उप-कथा: केकय-नरेश और जनक को न बुलाने के पीछे एक गूढ़ कारण छिपा था। यदि वे दोनों आते, तो भरत और शत्रुघ्न भी अपने नाना के साथ अवश्य आते, और सब के समक्ष राम का अभिषेक निर्विघ्न हो जाता; तब न राम वन जाते, न अवतार का प्रयोजन सिद्ध होता। बाद की परम्परा में कहा जाता है कि इसी संकट को टालने के लिए देवों ने दशरथ के मन को फेर दिया, और उन्होंने अपने इन परम निकट सम्बन्धियों को निमन्त्रण ही न भेजा।

परपुर-विजयी सम्राट के आसन ग्रहण करते ही, शेष लोक-सम्मत राजा भी सभा में प्रविष्ट हुए, और राजा द्वारा दिए विविध आसनों पर अनुशासित भाव से सम्राट की ओर मुख कर के बैठ गए। सत्कार पाए हुए विनम्र राजाओं तथा अयोध्या और दूसरे जनपदों से आए प्रमुख जनों से घिरे हुए, जो उनकी बात स्पष्ट सुनने को निकट बैठे थे, सम्राट दशरथ देवों के बीच सहस्राक्ष इन्द्र के समान शोभायमान हुए।
सार: राम के असंख्य गुणों को देख कर दशरथ उन्हें युवराज बनाने का निश्चय करते हैं, राजाओं और जनपद-प्रमुखों की सभा बुलाते हैं, पर सोच-समझ कर केकय-नरेश और जनक को निमन्त्रण नहीं भेजते। सभा में सम्राट इन्द्र-से शोभा पाते हैं।
सभा में दशरथ की घोषणा, और सब की सहमति
उस समस्त सभा को सम्बोधित कर के पृथ्वीपति दशरथ, दुन्दुभि के गम्भीर और प्रतिध्वनित स्वर के समान अपनी महान् वाणी से, मेघ की भाँति गरजते हुए, राज-लक्षणों से युक्त, कान्त, अनुपम और रस-भरे स्वर में राजाओं से यह हितकर और स्पष्ट वचन बोले: “आप सब को विदित है कि मेरा यह उत्तम राज्य पूर्ववर्ती राजेन्द्रों ने अपने पुत्र की भाँति हर प्रकार से पालित किया था। मैं भी, अपने पूर्वजों के चले हुए मार्ग का अनुसरण करते हुए, सदा अनिद्र रह कर यथाशक्ति प्रजा की रक्षा करता रहा हूँ।

“समस्त लोक के हित में लगे रहते हुए, श्वेत छत्र की छाया में मेरा यह शरीर जीर्ण हो गया है। सहस्रों वर्षों की आयु पा कर, मनुष्य-आयु के अनेक चक्र पूरे कर चुके इस जीर्ण शरीर को अब मैं विश्राम देना चाहता हूँ। राजोचित प्रभाव से ही सहने योग्य, और अजितेन्द्रियों के लिए दुर्वह इस भारी धर्म-धुरी (शासन के भार) को वहन करते-करते मैं थक चुका हूँ। अपने ज्येष्ठ पुत्र राम को प्रजा के हित में नियुक्त कर के, और अपने पास बैठे इन सब श्रेष्ठ ब्राह्मणों की अनुमति ले कर, मैं अब विश्राम चाहता हूँ।
“मेरा ज्येष्ठ पुत्र राम सब गुणों में मेरे ही समान हुआ है, पराक्रम में इन्द्र के तुल्य और शत्रु-नगरों का विजेता है। पुष्य-नक्षत्र से युक्त चन्द्रमा के समान शोभायमान, धर्मधारियों में श्रेष्ठ उस पुरुष-श्रेष्ठ को कल प्रातः मैं युवराज-पद पर अभिषिक्त करना चाहता हूँ। लक्ष्मण के बड़े भाई, लक्ष्मी से सम्पन्न वह राम आप सब के योग्य नाथ हैं; ऐसे नाथ से यह त्रैलोक्य भी आज से कहीं अधिक सुरक्षित हो जाएगा। इस पृथ्वी को इस मंगल से शीघ्र युक्त कर के, और इस पुत्र पर शासन का भार रख कर मैं निश्चिन्त हो जाऊँगा।
“यदि मेरा यह विचार उचित और भली-भाँति सम्मन्त्रित जान पड़े, तो आप सब मुझे अनुमति दें; अथवा बताएँ कि मुझे और किस प्रकार करना चाहिए। यद्यपि यह मेरी प्रीति है, तो भी यदि यह आपको न रुचे, तो कोई दूसरा हितकर मार्ग सोचा जाए; क्योंकि दो विरोधी मतों के मन्थन से उपजने वाली निष्पक्ष मध्यस्थ-चिन्ता का मूल्य कहीं गहरा होता है।”

यों कहते हुए सम्राट का अभिनन्दन वहाँ बैठे राजाओं ने उसी प्रकार आनन्द से किया, जैसे मोर वर्षा-भरे महामेघ को देख कर हर्ष से पंख फैला कर उसका स्वागत करते हैं। तभी हर्ष से प्रेरित एक स्निग्ध प्रतिध्वनि उठी, और सभा में उपस्थित जन-समूह के उद्घोष का वह नाद मानो पृथ्वी को कँपा गया। धर्म और अर्थ के ज्ञाता उस सम्राट के अभिप्राय को भली प्रकार जान कर, अयोध्या तथा अन्य जनपदों के लोगों के साथ परामर्श कर के, और अपने मन में एकमत हो कर ब्राह्मणों और सेनापतियों ने वृद्ध राजा दशरथ से कहा:
“हे पृथ्वीपति, आप अनेक सहस्र वर्ष राज्य कर चुके और वृद्ध हो चुके हैं; अब आप पृथ्वी का शासन करने योग्य राम को युवराज-पद पर अभिषिक्त कीजिए। हम महाबाहु, महाबली रघुवीर राम को विशाल गज पर सवार, और राज-छत्र से ढके मुख वाले देखना चाहते हैं।” उनके इस मनोनुकूल वचन को सुन कर भी, मानो अनजान बनते हुए, उनके अभिप्राय को और भली प्रकार जानने को राजा ने यह वचन कहा: “हे राजाओ, मेरे इस प्रस्ताव को सुन कर आप राघव को अपना स्वामी चाहते हैं, इस पर मुझे एक शंका है; आप इसे ठीक-ठीक उत्तर दें। मेरे धर्मपूर्वक पृथ्वी का शासन करते रहते हुए भी आप राम को युवराज क्यों देखना चाहते हैं?”
समझने की कुंजी (युवराज का अर्थ): “युवराज” का अर्थ है राजगद्दी का उत्तराधिकारी, जो राजा के जीते-जी ही शासन का सक्रिय भार सँभालता है। दशरथ स्वयं राजपद पर बने रहते; राम युवराज के रूप में राज्य की देख-रेख करते। यही कारण है कि सभा में दशरथ यह “शंका” रख कर पूछते हैं कि उनके धर्मपूर्वक राज करते हुए भी प्रजा राम को इस पद पर क्यों देखना चाहती है, ताकि सब के मन की बात स्पष्ट प्रकट हो।
तब अयोध्या और जनपदों के लोगों के साथ उन महात्मा सभासदों ने उत्तर दिया: “हे प्रजापालक, आपके पुत्र राम में अनेक कल्याणकारी गुण हैं; देव-तुल्य, बुद्धिमान् और गुणों के धाम उस राम के प्रिय और आनन्ददायक गुणों को हम अभी गिनाते हैं, सुनिए। राम सब प्राणियों को आनन्द देने में चन्द्रमा के समान, क्षमा में पृथ्वी के समान, बुद्धि में बृहस्पति के समान, और पराक्रम में साक्षात् इन्द्र के समान हैं। संसार में राम ही एकमात्र सत्पुरुष हैं, सत्यनिष्ठ और सत्यपरायण; धर्म और लक्ष्मी भी साक्षात् राम से ही प्रकट हुए-से जान पड़ते हैं।
“वे धर्मज्ञ, सत्य-प्रतिज्ञ, शीलवान्, किसी में दोष न देखने वाले, क्षमाशील, सान्त्वना देने वाले, मृदुभाषी, कृतज्ञ, और जितेन्द्रिय हैं। राम कोमल, स्थिर-चित्त, सदा भव्य, दोष-दृष्टि से रहित, सब प्राणियों से प्रिय बोलने वाले, और सत्यवादी हैं। बहुश्रुत वृद्धों और ब्राह्मणों की वे सेवा करते हैं, और इसी से उनकी अतुल कीर्ति, यश और तेज बढ़ता रहता है। देव, असुर और मनुष्यों के सब अस्त्रों में वे निपुण, विद्या और व्रत के स्नातक, वेदों को उनके छह अंगों सहित जानने वाले, और भूमि पर गन्धर्व-विद्या (संगीत) में श्रेष्ठ हैं; वे शुभ-कुल में जन्मे, साधु, उदार-हृदय और महाबुद्धिमान् हैं।
एक उप-कथा: वेद के छह अंग, जिन्हें वेदांग कहते हैं, ये हैं: शिक्षा (उच्चारण-शास्त्र), व्याकरण, छन्द (छन्द-शास्त्र), निरुक्त (शब्दों की व्युत्पत्ति), ज्योतिष, और कल्प (यज्ञ-विधि का शास्त्र)। इनके यथावत् अध्ययन से ही कोई वेद का पूर्ण अधिकारी माना जाता था; राम इन सब में निष्णात थे।

“जब वे किसी गाँव या नगर के हित के लिए लक्ष्मण के साथ युद्ध को निकलते हैं, तो बिना विजय पाए कभी नहीं लौटते। संग्राम से गज या रथ पर लौट कर वे पुत्र, अग्नि, पत्नी, सेवक और शिष्यगण की कुशल इस प्रकार पूछते हैं, जैसे कोई पिता अपने औरस पुत्रों की पूछता हो। वे हम ब्राह्मणों से पूछते हैं कि क्या आपके शिष्य आपकी सेवा करते हैं, और क्षत्रियों से कि क्या आपके कवचधारी अंगरक्षक आपकी सेवा में रहते हैं। मनुष्यों के दुःख में वे अत्यन्त दुखी हो उठते हैं, और सब उत्सवों में पिता की भाँति आनन्दित होते हैं। राम सत्यवादी, महान् धनुर्धर, वृद्ध-सेवी और जितेन्द्रिय हैं।
“वे मुस्कुरा कर बात आरम्भ करने वाले, सम्पूर्ण मन से धर्म का आश्रय लेने वाले, कल्याणकारी कार्यों को भली प्रकार सिद्ध करने वाले, और विवाद के लिए कही जाने वाली बातों में रुचि न रखने वाले हैं; पर सत्य तक पहुँचने को मित्रभाव से किए तर्क-वितर्क में वे वाचस्पति बृहस्पति के समान वक्ता हैं। धर्म और अर्थ में निपुण श्रेष्ठ ब्राह्मणों ने उन्हें सब प्रकार से शिक्षित किया है। सुन्दर भौंहों और बड़े, कुछ ललाई लिए नेत्रों वाले राम मनुष्य-रूप में साक्षात् विष्णु-से प्रतीत होते हैं।
“राम अपने शौर्य, वीर्य और पराक्रम से समस्त लोक को आनन्द देते हैं; प्रजा-पालन में निरन्तर लगे रह कर भी उनकी इन्द्रियाँ कभी राग से अन्धी नहीं होतीं। वे इस पृथ्वी की तो बात ही क्या, तीनों लोकों के शासन में भी समर्थ हैं; उनका क्रोध और प्रसाद कभी निरर्थक नहीं होते। वे शास्त्र-विधान के अनुसार ही वध्य का वध करते हैं, और अवध्य पर कभी क्रुद्ध नहीं होते; और जिस पर प्रसन्न होते हैं, उसे अत्यन्त हर्षित हो कर धन से सम्पन्न कर देते हैं। आत्म-संयम से युक्त उन गुणों के कारण राम सूर्य की भाँति किरणों से देदीप्यमान हो कर शोभा पाते हैं।
“इन गुणों से सम्पन्न, सत्य-पराक्रमी, लोकपालों के समान राम को पृथ्वी अपना नाथ चाहती है। हे प्रजापालक, आपका यह पुत्र हमारे सौभाग्य से जगत् का हित करने में समर्थ हुआ है; और मरीचि-पुत्र कश्यप की भाँति पुत्र के सब गुणों से युक्त है। देव, असुर, मनुष्य, गन्धर्व और नागों में, राष्ट्र और इस श्रेष्ठ नगरी में, अन्तःपुर के और बाहर के, नगर और जनपद के सब लोग राम के बल, आरोग्य और दीर्घ-आयु की कामना करते हैं। प्रातः, सायं और मध्याह्न में सब वृद्ध और तरुण स्त्रियाँ एकाग्र मन से राम के लिए देवों को नमस्कार करती हैं; हे देव, आपकी कृपा से उनकी वह प्रार्थना सफल हो।
“हे राजश्रेष्ठ, हम आपके इस ज्येष्ठ पुत्र राम को, जो नील-कमल के समान श्याम और समस्त शत्रुओं का संहारक है, युवराज-पद पर प्रतिष्ठित देखना चाहते हैं। हे वरदाता, सम्पूर्ण जगत् के हित में लगे, देव-देव विष्णु के समान, और श्रेष्ठ जनों के द्वारा सेवित अपने इस पुत्र को आप हमारे हित में शीघ्र, और प्रसन्नता से, युवराज-पद पर अभिषिक्त करें।”
सार: दशरथ अपने वृद्ध होने और शासन-भार से थकने की बात कह कर राम को युवराज बनाने का प्रस्ताव रखते हैं। प्रजा के मन की थाह लेने को वे जान-बूझ कर शंका रखते हैं, और सभासद राम के गुणों की लम्बी गणना कर के एक स्वर से अभिषेक की प्रार्थना करते हैं।
वसिष्ठ की आज्ञा, और राम से पिता की भेंट
उन सब के अंजलि-बद्ध प्रणाम को स्वीकार कर के राजा ने उनसे प्रिय और हितकर वचन कहा: “अहो, मैं परम प्रसन्न हूँ, और मेरा सौभाग्य अतुलनीय है कि आप सब मेरे ज्येष्ठ और प्रिय पुत्र राम को युवराज-पद पर चाहते हैं।” इस प्रकार उनका सत्कार कर के राजा ने वसिष्ठ, वामदेव और अन्य ब्राह्मणों से, उन्हीं सब के तथा अयोध्या और जनपद के लोगों के सुनते हुए, कहा: “यह श्रीसम्पन्न, पवित्र चैत्र मास है, जब वन पुष्पों से सज उठे हैं; राम के युवराज-अभिषेक के लिए सब कुछ तैयार किया जाए।”
समझने की कुंजी (चैत्र मास, आधुनिक समतुल्य): चैत्र हिन्दू पंचांग का पहला मास है, जो आधुनिक ग्रेगोरियन कैलेंडर के लगभग मार्च-अप्रैल में पड़ता है, जब वसन्त में वन फूलों से भर जाते हैं। यही पवित्र और शुभ मास अभिषेक के लिए चुना गया।

राजा के वचन समाप्त होते ही जन-समूह का महान् घोष उठा; और वह धीरे-धीरे शान्त होने पर राजा ने मुनि-श्रेष्ठ वसिष्ठ से कहा कि वे राम के अभिषेक के लिए आवश्यक सब विधि और सामग्री की व्यवस्था का आदेश दें। पृथ्वीपति का यह अनुरोध सुन कर मुनि-श्रेष्ठ वसिष्ठ ने राजा के सम्मुख हाथ जोड़े खड़े नियुक्त मन्त्रियों को आज्ञा दी कि वे सोना आदि रत्न, देवताओं को अर्पित होने वाली बलि, सब औषधियाँ, श्वेत पुष्प और खीलें, अलग-अलग मधु और घी, नवीन वस्त्र, रथ और सब प्रकार के आयुध, चतुरंगिणी सेना, शुभ-लक्षणों वाला हाथी, चँवर और व्यजन (पंखे) के जोड़े, ध्वजा और श्वेत छत्र, अग्नि-सा देदीप्यमान सौ स्वर्ण-कलश, स्वर्ण-मढ़े सींगों वाला बैल, और एक पूर्ण व्याघ्र-चर्म, तथा जो भी अन्य अभीष्ट हो, सब कुछ प्रातःकाल राजा के अग्नि-शाला के निकट तैयार रखें।
“अन्तःपुर और सम्पूर्ण नगर के द्वार चन्दन की मालाओं और घ्राण को हरने वाले धूप से सजाए जाएँ। एक लाख ब्राह्मणों के लिए पर्याप्त, दही और दूध से युक्त उत्तम भोजन कल प्रातः श्रेष्ठ ब्राह्मणों को आदर से, उदार दक्षिणा के साथ दिया जाए; घी, दही और खीलें भी विपुल मात्रा में रखी जाएँ। कल सूर्योदय होते ही स्वस्ति-वाचन हो, ब्राह्मण निमन्त्रित किए जाएँ और उनके आसन सजें। पताकाएँ बाँधी जाएँ, राजमार्ग पर जल छिड़का जाए; सब नर्तक और सुसज्जित गणिकाएँ राजभवन की दूसरी ड्योढ़ी पर खड़ी रहें। देवालयों और चौराहों पर मूर्तियों की पुष्प से पूजा हो, उन्हें नैवेद्य और दक्षिणा अर्पित हो। लम्बी तलवार बाँधे, गोह-चर्म के दस्ताने पहने, कवचधारी शूरवीर स्वच्छ वस्त्रों में महाराज के आँगन में प्रवेश करें।” यों आज्ञा दे कर, राजा को सूचित कर के, वसिष्ठ और वामदेव ने शेष कार्य स्वयं पूरे किए, और लौट कर राजा से कहा कि सब आज्ञानुसार सम्पन्न हो गया।

तब तेजस्वी राजा ने सुमन्त्र से कहा कि वे संयमी राम को शीघ्र ले आएँ। “जैसी आज्ञा” कह कर सुमन्त्र राजा के आदेश से रथियों में श्रेष्ठ राम को रथ पर बैठा कर सभा में ले आए। पूर्व, उत्तर, पश्चिम और दक्षिण के राजा, म्लेच्छ (अनार्य) और आर्य, तथा वन और पर्वत के समीप रहने वाले अन्य राजा, जो वहाँ बैठे थे, सब उस सम्राट की वैसे ही उपासना करने लगे, जैसे देवता इन्द्र की। उनके बीच, गन्धर्वराज-से रूप वाले, लोक-विख्यात पराक्रमी, लम्बी भुजाओं वाले, महान् सत्त्व वाले, मदमत्त गज-सी चाल वाले, चन्द्र-से मनोहर मुख वाले, अत्यन्त प्रियदर्शन राम को, जो अपने रूप और उदारता से मनुष्यों के नेत्र और चित्त हर लेते थे, और धूप से तप्त प्रजा को मेघ की भाँति आह्लादित करते थे, अपने ज्येष्ठ पुत्र को आते देख कर दशरथ को तृप्ति न हुई।
सुमन्त्र ने राघव को उत्तम रथ से उतारा, और हाथ जोड़े उनके पीछे-पीछे पिता के समीप तक चले। कैलास-शिखर-से उस प्रासाद पर चढ़ कर, हाथ जोड़े, राम पिता के निकट पहुँच कर प्रणाम करते हुए अपना नाम सुनाते हुए उनके चरणों में झुके। पास खड़े हो कर हाथ जोड़े प्रणाम करते उस प्रिय पुत्र को देख कर राजा ने उन्हें अंजलि से खींच कर हृदय से लगा लिया, और मणि-स्वर्ण से जड़े उत्तम आसन पर बैठाया। उस श्रेष्ठ आसन को पा कर राघव वैसे ही देदीप्यमान हुए, जैसे प्रातःकाल निर्मल सूर्य मेरु पर्वत को अपनी प्रभा से प्रकाशित करता है; और उनसे प्रकाशित वह सभा भी वैसे ही शोभा पा गई, जैसे निर्मल ग्रह-नक्षत्रों वाला शरद् का आकाश चन्द्रमा से। दर्पण में अपने अलंकृत प्रतिबिम्ब को देख कर हर्षित होते मनुष्य की भाँति, राजा अपने प्रिय पुत्र को देख कर सन्तुष्ट हुए।
सुस्थिर बैठे उस पुत्र को सम्बोधित कर के, पुत्रवानों में श्रेष्ठ दशरथ ने वैसे ही कहा, जैसे कश्यप देवराज इन्द्र से कहते हों: “आप मेरी ज्येष्ठ और सर्वथा योग्य पत्नी कौसल्या से, मेरे ही समान योग्य पुत्र के रूप में उत्पन्न हुए हैं। हे राम, गुणों में भी ज्येष्ठ होने से आप मेरे प्रिय पुत्र हैं। आपने अपने गुणों से इन सब प्रजाओं को अनुरंजित कर लिया है; अतः कल पुष्य-योग में आप युवराज-पद प्राप्त कीजिए। आप स्वभाव से ही गुणवान् निश्चित किए गए हैं।

“गुणवान् होते हुए भी, स्नेहवश मैं आपसे हितकर बात कहता हूँ, हे पुत्र: और भी अधिक विनय धारण कर के सदा जितेन्द्रिय रहिए; काम और क्रोध से उत्पन्न दुर्व्यसनों को त्याग दीजिए। परोक्ष (गुप्तचरों द्वारा) और प्रत्यक्ष, दोनों प्रकार की शासन-वृत्ति से चलते हुए मन्त्रियों, सेनापतियों, नगर-रक्षकों और सब प्रजा को प्रसन्न रखिए; भविष्य के लिए कोश-गृहों और आयुध-गृहों में बहुत-से संग्रह कर के रखिए। जो राजा प्रजा को पुत्र-सा पालता है और जिसकी प्रजा उससे अनुरक्त रहती है, उसके मित्र अमृत पा कर हर्षित होते देवों की भाँति आनन्दित होते हैं। अतः हे पुत्र, अपने को संयम में रख कर आप इसी प्रकार आचरण कीजिए।”
एक उप-कथा: मनुस्मृति में काम से उत्पन्न दस व्यसन गिनाए गए हैं: आखेट (शिकार), द्यूत (जुआ), दिन में सोना, परनिन्दा, स्त्री-आसक्ति, मद, गायन-वादन-नृत्य का अति-शौक, और व्यर्थ इधर-उधर घूमना। और क्रोध से उत्पन्न आठ व्यसन हैं: चुगली, हिंसा, द्रोह, ईर्ष्या, असूया (दूसरों के गुणों में दोष देखना), धन का अपव्यय, कठोर वचन, और दण्ड में क्रूरता। दशरथ राम को इन्हीं से बचने का उपदेश दे रहे हैं।
राम के हितैषी मित्रों ने यह सुनते ही शीघ्र जा कर कौसल्या को समाचार सुनाया; स्त्रियों में श्रेष्ठ कौसल्या ने उस प्रिय समाचार के देने वालों को सोना, गौएँ और नाना प्रकार के रत्न दिए। तब राजा को प्रणाम कर के, रथ पर चढ़ कर राम जन-समूहों से सम्मानित होते हुए अपने तेजोमय भवन को लौट गए। राजा की वह घोषणा सुन कर पुर-वासी भी, मानो कोई अभीष्ट लाभ मिल गया हो, अत्यन्त हर्षित हुए; और राजा से विदा ले कर अपने-अपने घर लौट कर उन्होंने देवताओं की पूजा की, ताकि राम का अभिषेक निर्विघ्न सम्पन्न हो।
सार: राजा वसिष्ठ को अभिषेक की विधि और सामग्री जुटाने की आज्ञा देते हैं; सुमन्त्र राम को सभा में ले आते हैं। दशरथ राम को आसन देते, हृदय से लगाते, और शासन-धर्म का स्नेहपूर्ण उपदेश देते हैं। नगर में हर्ष फैल जाता है।
अशुभ स्वप्न, और राम का दूसरी बार बुलाया जाना
पुर-वासियों के लौट जाने पर राजा ने मन्त्रियों के साथ फिर परामर्श किया, और निश्चय के ज्ञाता उन्होंने निश्चय किया कि चूँकि कल ही पुष्य-नक्षत्र होगा, अतः कमल-दल-से नेत्रों वाले राम का अभिषेक कल ही होना चाहिए। तब अन्तःपुर में जा कर राजा दशरथ ने सूत सुमन्त्र से कहा कि वे राम को एक बार फिर यहाँ ले आएँ। उस आज्ञा को स्वीकार कर के सुमन्त्र राम को फिर बुलाने को शीघ्र उनके भवन की ओर गए।
द्वारपालों ने राम को सूचित किया कि सुमन्त्र फिर आए हैं; यह सुनते ही राम शंका से भर उठे। उन्हें शीघ्र भीतर बुला कर राम ने पूछा कि आपके इस दूसरी बार आने का प्रयोजन क्या है, उसे बिना छिपाए कहिए। सुमन्त्र ने कहा कि राजा आपको देखना चाहते हैं; मेरी बात सुन कर अब आप चलें या न चलें, यह आप पर है। यह सुन कर राम भी शीघ्रता से राजा को फिर देखने राजभवन की ओर चले।

राम के आ पहुँचने का समाचार सुन कर राजा दशरथ ने, जो कोई परम प्रिय और मूल्यवान् बात कहना चाहते थे, उन्हें भीतर बुलवाया। पिता के कक्ष में प्रवेश करते ही श्रीमान् राघव ने दूर से ही पिता को देखा, और हाथ जोड़ कर प्रणाम किया। प्रणाम करते हुए ही राम को उठा कर, हृदय से लगा कर, आसन दे कर राजा ने फिर कहा: “हे राम, मैं वृद्ध हो चुका हूँ, दीर्घ-आयु जी चुका हूँ; इच्छित भोग भोग चुका हूँ, और अंगों-दक्षिणा से युक्त सैकड़ों यज्ञों से देवों की आराधना कर चुका हूँ। आप-जैसा अनुपम पुत्र मुझे प्राप्त हो गया; इच्छित दान दे चुका, वेदादि पढ़ चुका। हे वीर, मैंने इच्छित सुख भोग लिए; यज्ञों से देवों का, स्वाध्याय से ऋषियों का, सन्तान से पितरों का, दान से ब्राह्मणों का, और भोगों से अपना ऋण भी चुका दिया।
“अब आपको युवराज-पद पर अभिषिक्त करने के अतिरिक्त मेरा और कुछ करणीय शेष नहीं; अतः मैं जो कहूँ, वह आप कीजिए। सब प्रजा आज आपको ही अपना राजा चाहती है; इसलिए हे पुत्र, मैं आपको युवराज-पद पर अभिषिक्त करूँगा। हे राघव, इन दिनों मुझे अशुभ स्वप्न दिखाई पड़ते हैं; आकाश से मेघ-रहित, महान् शब्द करती उल्काएँ दिन में ही गिरती हैं। ज्योतिषी बताते हैं कि मेरा जन्म-नक्षत्र सूर्य, मंगल और राहु, इन दारुण ग्रहों से पीड़ित है। ऐसे निमित्तों के उठने पर प्रायः राजा घोर आपत्ति पा कर मृत्यु को प्राप्त होता है।
समझने की कुंजी (उत्पात और ग्रह-दशा): प्राचीन भारत में दिन में उल्का-पात, मेघ-रहित आकाश में गर्जन, और जन्म-नक्षत्र पर अशुभ ग्रहों (सूर्य, मंगल, राहु) की दृष्टि को राजा के लिए घोर अनिष्ट का संकेत माना जाता था। इन्हीं उत्पातों को देख कर दशरथ अभिषेक में शीघ्रता चाहते हैं, मानो किसी आती हुई विपत्ति से पहले ही राम को राजपद सौंप देना चाहते हों।
“अतः जब तक मेरा चित्त किसी दूसरे के विपरीत आग्रह से विचलित न हो, तब तक आप अभिषिक्त हो जाइए; क्योंकि मनुष्यों की बुद्धि चंचल है। आज चन्द्रमा पुष्य से पहले के नक्षत्र पुनर्वसु पर पहुँचा है; कल पुष्य का योग निश्चित है, ऐसा ज्योतिषी कहते हैं। उसी पुष्य-योग में आप अभिषिक्त हो जाइए; मेरा मन मानो मुझे शीघ्रता को प्रेरित कर रहा है। हे परन्तप, कल मैं निश्चय ही आपको युवराज-पद पर अभिषिक्त करूँगा।
“इसीलिए, हे राघव, आज से ही आप संयमी हो कर पत्नी सीता के साथ इस रात का उपवास कीजिए, और दर्भ की शय्या पर शिला का तकिया ले कर सोइए। आपके हितैषी मित्र आज रात सावधान हो कर आपकी चारों ओर से रक्षा करें; क्योंकि ऐसे कार्यों में अनेक विघ्न आ खड़े होते हैं। मेरे मत में आपका अभिषेक तभी तक उचित है, जब तक भरत इस नगर से दूर है। यद्यपि आपका भाई भरत सत्पुरुषों के आचार में स्थित, ज्येष्ठ का अनुगामी, धर्मात्मा, दयालु और जितेन्द्रिय है, फिर भी मनुष्यों का चित्त चंचल है, ऐसा मेरा विश्वास है; और हे राघव, धर्म में सदा रत सत्पुरुषों का मन भी कर्म में ही रमता है, केवल विचार में नहीं।”
एक उप-कथा: दशरथ भरत के सम्बन्ध में जो शंका रखते हैं, उसका मूल एक पुराना वचन है। कैकेयी से विवाह के समय दशरथ ने उनके पिता, केकय-नरेश, को वचन दिया था कि कैकेयी से उत्पन्न पुत्र को ही अयोध्या का राज्य मिलेगा। राम स्वयं आगे भरत से यह कहते हैं। दशरथ को आशंका है कि राम के अभिषेक के समय यदि भरत उपस्थित हुआ, तो कहीं वह उस वचन के बल पर राज्य का दावा न कर बैठे; इसीलिए वे भरत की अनुपस्थिति में ही अभिषेक चाहते हैं।

यों कहे जाने पर, और कल होने वाले अभिषेक की अनुमति “अब जाओ” कह कर पाने पर, पिता को प्रणाम कर के राम अपने भवन को लौटे। राजा द्वारा अभिषेक का आदेश दिए जाने पर राम सीता को यह प्रिय समाचार देने अपने भवन में गए; पर उन्हें अपने कक्ष में न पा कर तुरन्त निकल कर माता के अन्तःपुर की ओर चले। वहाँ देवालय में उन्होंने रेशमी वस्त्र पहने अपनी माता को देखा, जो अनन्य-भाव से अपनी इष्ट-देवता की उपासना में लीन हो कर राम के लिए राज-लक्ष्मी की प्रार्थना कर रही थीं।
सार: अशुभ स्वप्नों और ग्रह-दशा से व्याकुल दशरथ राम को दूसरी बार बुला कर कल ही अभिषेक का निश्चय सुनाते हैं, सीता-सहित उपवास और सावधानी का आदेश देते हैं, और भरत की अनुपस्थिति में ही अभिषेक की मंशा प्रकट करते हैं। राम माता के अन्तःपुर की ओर जाते हैं।
कौसल्या का आशीर्वाद, और लक्ष्मण से राम का स्नेह
उस समय कौसल्या आँखें अध-मुँदी किए, सुमित्रा, सीता और लक्ष्मण से सेवित हो कर बैठी थीं; अपने पुत्र के युवराज-अभिषेक का समाचार सुन कर वे प्राणायाम-पूर्वक उस पुरुष नारायण का ध्यान कर रही थीं। पहले ही, राम के प्रिय अभिषेक का समाचार सुन कर सुमित्रा और उनके पुत्र लक्ष्मण भी वहाँ आ चुके थे, और सीता को भी वहाँ बुला लिया गया था। ध्यान में स्थित माता के निकट जा कर, प्रणाम कर के राम ने उन्हें हर्षित करते हुए यह उत्तम वचन कहा:
“हे अम्ब, पिता ने मुझे प्रजा-पालन के कार्य में नियुक्त किया है; अतः पिता की आज्ञा के अनुसार कल मेरा अभिषेक होगा। इस रात सीता को भी मेरे साथ उपवास करना है; मेरे गुरुजनों का यही विधान है, और पिता ने भी मुझे ऐसा ही आदेश दिया है। कल होने वाले अभिषेक के लिए जो भी मंगल-कार्य उचित हों, वे आज मेरे और सीता के लिए करा दीजिए।” इस चिरकाल से अभीष्ट समाचार को सुन कर कौसल्या ने हर्ष के आँसुओं से अवरुद्ध वाणी में राम से कहा:
“हे वत्स राम, आप चिरंजीवी रहें; आपके शत्रु नष्ट हों। राज-लक्ष्मी से युक्त हो कर आप मेरे और सुमित्रा के सम्बन्धियों को आनन्द दें। हे पुत्र, सौभाग्य है कि मैंने आपको किसी कल्याणकारी नक्षत्र में जन्म दिया, जिससे आपने अपने गुणों से अपने पिता दशरथ को आराधित किया। सचमुच, कमल-नयन पुरुष विष्णु को प्रसन्न करने के लिए मैंने जो तप और उपवास सहे, वे व्यर्थ नहीं गए; उसी के फल से इक्ष्वाकु-कुल की राज-लक्ष्मी आज आपका आश्रय लेने आ रही है, हे पुत्र।”

माता के यों कहने पर, राम ने हाथ जोड़े, विनय से झुक कर बैठे अपने भाई लक्ष्मण की ओर देख कर, मानो मुस्कुराते हुए कहा: “हे लक्ष्मण, इस पृथ्वी पर मेरे साथ मिल कर आप भी शासन कीजिए; आप मेरे दूसरे प्राण हैं, और यह राज-लक्ष्मी आपको भी प्राप्त हुई है। हे सौमित्र, आप इच्छित भोग और राज्य के फल भोगिए; मैं जीवन और राज्य भी आपके ही लिए चाहता हूँ।” लक्ष्मण से यों कह कर, दोनों माताओं कौसल्या और सुमित्रा को प्रणाम कर के, और सीता से भी विदा ले कर राम अपने भवन को लौट गए।
सार: कौसल्या अपने पुत्र को चिरंजीवी रहने और शत्रुओं के नाश का आशीर्वाद देती हैं, अपने तप के सफल होने पर हर्षित होती हैं। राम लक्ष्मण को अपना “दूसरा प्राण” कह कर साथ-साथ शासन का स्नेह-भरा निमन्त्रण देते हैं, और सब से विदा ले कर भवन लौटते हैं।
वसिष्ठ का राम के भवन आना, और सभा का विसर्जन
कल होने वाले अभिषेक के विषय में राम को आदेश दे कर, राजा ने अपने पुरोहित वसिष्ठ को बुला कर कहा: “हे तपोधन, आप-जैसे दृढ़-व्रत और तप में समृद्ध आज जा कर ककुत्स्थ-कुल के राम को, उनकी पत्नी सीता के साथ, विघ्नों के निवारण और राज्य-प्राप्ति के कल्याण के लिए इस रात का उपवास कराइए।” राजा से “जैसी आज्ञा” कह कर, वेदविदों में श्रेष्ठ, मन्त्र के ज्ञाता भगवान् वसिष्ठ ब्राह्मणोचित श्रेष्ठ रथ पर चढ़ कर, उस वीर और मन्त्र-ज्ञाता राम को उपवास का व्रत कराने स्वयं उनके भवन की ओर चले।

श्वेत मेघ-समूह-सी प्रभा वाले राम के भवन को पा कर मुनि-श्रेष्ठ वसिष्ठ रथ पर ही उसकी तीनों ड्योढ़ियों में प्रविष्ट हुए। द्वार पर आए परम सम्मान-योग्य उस ऋषि का सम्मान करने को राम शीघ्रता और सम्भ्रम से भवन से बाहर निकले, मुनि के रथ के पास पहुँच कर, स्वयं हाथ का सहारा दे कर उन्हें रथ से उतारा। विनय से झुके राम को देख कर, उनका कुशल पूछ कर और प्रशंसा कर के, प्रिय वचनों के योग्य राम को हर्षित करते हुए पुरोहित वसिष्ठ ने कहा: “हे राम, आपके पिता आप पर प्रसन्न हैं, इसी से आप कल राज्य प्राप्त करेंगे; अतः आज आप सीता के साथ उपवास कीजिए। हे राम, जैसे नहुष ने अपने पुत्र ययाति को अभिषिक्त किया था, वैसे ही आपके पिता दशरथ प्रेमवश कल प्रातः आपको युवराज-पद पर अभिषिक्त करेंगे।”
एक उप-कथा: नहुष और ययाति चन्द्र-वंश के प्राचीन राजा थे। नहुष ने अपने पुत्र ययाति को युवराज-पद पर अभिषिक्त किया था; ययाति आगे महाभारत की वंश-कथाओं में पुरु-वंश के मूल-पुरुष के रूप में आते हैं। वसिष्ठ इसी प्राचीन उदाहरण से दशरथ के राम-अभिषेक की उपमा देते हैं, मानो यह पिता-पुत्र की उसी मंगल-परम्परा की कड़ी हो।
यों कह कर, दृढ़-व्रत और पवित्र वसिष्ठ ने राम को सीता-सहित शास्त्रोक्त मन्त्रों के साथ उपवास का व्रत कराया। राम द्वारा यथाविधि पूजित हो कर, और ककुत्स्थ-कुल के राम से विदा ले कर राजगुरु वसिष्ठ उनके भवन से लौटे। राम भी वहाँ प्रिय बोलने वाले अपने बाल-सखाओं के साथ बैठ कर, उनसे सम्मानित हो कर, और सब को विदा कर के अन्तःपुर में चले गए। हर्षित स्त्री-पुरुषों से भरा राम का भवन उस समय वैसा ही शोभा पा रहा था, जैसे मतवाले पक्षियों से भरा और खिले कमलों से सजा कोई सरोवर।

राजभवन-सी प्रसिद्धि वाले उस राम-भवन से निकल कर वसिष्ठ ने मार्ग को जन-समूह से भरा देखा। अयोध्या के राजमार्ग चारों ओर कुतूहल से भरे, झुण्ड-के-झुण्ड चलते लोगों से ऐसे ठसाठस भरे थे कि चलना दूभर हो गया। जन-समूहों की लहरों के परस्पर टकराने से उठते हर्ष-नाद से भरा राजमार्ग का वह कोलाहल समुद्र की गर्जना-सा प्रतीत होता था। उस दिन अयोध्या की सब गलियाँ बुहारी और सुगन्धित जल से सींची गई थीं, वन-पुष्पों की मालाओं से सजी थीं, और घरों की छतों पर ऊँची ध्वजाएँ फहरा रही थीं।
स्त्री-बालकों सहित अयोध्या के सब निवासी, राम के अभिषेक की प्रतीक्षा में, सूर्योदय की वैसे ही आकांक्षा कर रहे थे, मानो किसी अमूल्य उदय की राह देख रहे हों। प्रजा का अलंकार-रूप और जन के आनन्द को बढ़ाने वाले उस अयोध्या-महोत्सव को देखने सब उत्सुक थे। जन-समूह से ठसे उस राजमार्ग की भीड़ को मानो चीरते हुए, पुरोहित वसिष्ठ धीरे-धीरे राजकुल की ओर बढ़े, और श्वेत मेघों-से शिखरों वाले हिमालय-से प्रासाद पर चढ़ कर राजा से वैसे ही मिले, जैसे बृहस्पति इन्द्र से मिलते हों।
वसिष्ठ को आते देख कर राजा अपना राज-आसन छोड़ कर उठे, और उनसे पूछा कि उनके मन की बात (अर्थात् राम तक पहुँच कर व्रत कराने का कार्य) कैसी रही; ऋषि ने सूचित किया कि सौंपा गया कार्य पूरा हो गया। उसी समय राजा के पास बैठे सब सभासद भी एक साथ आसनों से उठ कर पुरोहित का सम्मान करने लगे। गुरु से अनुमति पा कर, उस जन-समूह को विदा कर के राजा वैसे ही अन्तःपुर में गए, जैसे सिंह पर्वत की गुफा में प्रवेश करे। श्रेष्ठ वस्त्र पहने युवतियों से भरे, महेन्द्र के भवन-से उस मनोहर अन्तःपुर को राजा ने अपनी प्रभा से वैसे ही प्रकाशित किया, जैसे चन्द्रमा तारों के समूह से भरे आकाश को प्रकाशित करता है।
सार: राजा की आज्ञा से वसिष्ठ राम के भवन जा कर सीता-सहित उन्हें उपवास का व्रत कराते हैं। लौटते हुए वे अयोध्या को सजा-सँवरा, कोलाहल से भरा, सूर्योदय की प्रतीक्षा में उत्सुक पाते हैं। कार्य पूरा होने पर राजा सभा विसर्जित कर के अन्तःपुर लौटते हैं।
व्रत-रात्रि से अभिषेक-प्रभात तक, और उल्लसित नगर

पुरोहित वसिष्ठ के जाने पर राम स्नान कर के, संयमित मन से, विशाल नेत्रों वाली अपनी पत्नी सीता के साथ भगवान् नारायण की उपासना में बैठे। फिर विधिपूर्वक सिर झुका कर हवन की आज्ञ्य-पात्री (घी का पात्र) ले कर, उन्होंने महान् देवता विष्णु के निमित्त प्रज्वलित अग्नि में आज्य (घी) की आहुति दी। उस हवन के शेष को प्रसाद-रूप में ग्रहण कर के, और अपने लिए प्रिय की प्रार्थना कर के, संयमित मन से, मौन रह कर राम सीता के साथ विष्णु के श्रीसम्पन्न मन्दिर के प्रांगण में स्वयं बिछाई कुश की शय्या पर, नारायण देव का ध्यान करते हुए शयन को लेटे।
एक उप-कथा: इस मन्दिर के देव बाद की परम्परा में श्रीरंगनाथ माने गए हैं, जिनकी अयोध्या के राजवंश ने अपने इष्ट-देव के रूप में राजभवन के भीतर एक पृथक् देवालय में चिरकाल पूजा की। पद्म-पुराण में कहा जाता है कि आगे चल कर राम ने यह विग्रह विभीषण को सौंप दिया, और उन्हीं के द्वारा वह दक्षिण भारत के श्रीरंगम् तक पहुँचा, जहाँ वह आज भी परम श्रद्धा से पूजित है।

रात का एक प्रहर शेष रहते राम जाग पड़े, और भवन के प्रांगण को भली प्रकार सजाने की व्यवस्था कराई। वहाँ सूत, मागध (वंशावली-गायक) और वन्दीजनों (स्तुति-पाठकों) के सुखद वचन सुनते हुए, प्रातः की सन्ध्या-उपासना में बैठ कर उन्होंने एकाग्र मन से गायत्री-मन्त्र का जप किया। निर्मल रेशमी वस्त्र पहन कर, सिर झुका कर मधुसूदन विष्णु की स्तुति और प्रणाम कर के, उन्होंने ब्राह्मणों से स्वस्ति-वाचन और पुण्याह-वाचन के मन्त्र कहलवाए। वाद्य-यन्त्रों की प्रतिध्वनि से मिल कर ब्राह्मणों के पुण्याह-वाचन का वह गम्भीर और मधुर घोष सारी अयोध्या में भर गया।
समझने की कुंजी (स्वस्ति-वाचन और पुण्याह-वाचन): किसी बड़े मंगल-कार्य से पहले की दो वैदिक विधियाँ। स्वस्ति-वाचन में ब्राह्मण उस व्यक्ति पर कल्याण और मंगल का आशीर्वाद उच्चारित करते हैं, जिसका कोई संस्कार होने वाला हो। पुण्याह-वाचन में वे उस दिन को “पुण्य दिवस” घोषित करते हुए शुभता की कामना करते हैं। राम अभिषेक से पूर्व प्रातः यही दोनों मन्त्र कहलवाते हैं।
राम ने उस दिन सीता के साथ उपवास किया है, यह सुन कर अयोध्या के सब निवासी अत्यन्त प्रमुदित हुए। राम के अभिषेक का समाचार सुन कर, और रात बीत गई देख कर, सब पुर-वासी नगरी को सजाने लगे। श्वेत मेघ-से शिखरों वाले देवालयों पर, चौराहों, गलियों, चैत्यों और अट्टालिकाओं पर, नाना वस्तुओं से भरी व्यापारियों की दुकानों पर, गृहस्थों के समृद्ध और श्रीसम्पन्न भवनों पर, सब सभा-भवनों पर, और सब प्रमुख वृक्षों के शिखरों पर ध्वजाएँ और पताकाएँ सुन्दर ढंग से ऊँची फहराई गईं।

अयोध्या के निवासी तब नट और नर्तकों के समूहों के संवाद और भाव-अभिनय, और गायकों के मन तथा कानों को सुख देने वाले संगीत को सुनने लगे। चौराहों और घरों में आपस में मिल कर लोग केवल राम के अभिषेक की ही चर्चा करते थे। बालक तक घरों के द्वार पर झुण्डों में खेलते हुए परस्पर राम के अभिषेक की ही बातें करते थे। पुर-वासियों ने राम के अभिषेक के अवसर पर राजमार्ग को पुष्पों से सजाया और धूप की सुगन्ध से सुवासित कर के मनोहर बना दिया। और रात होने तक राम के नगर-भ्रमण की सम्भावना को देख कर, प्रकाश की व्यवस्था के लिए उन्होंने सब गलियों में वृक्षों-से दीप-स्तम्भ (हर डाली पर दीप रखे) खड़े कर दिए।
इस प्रकार नगर को सजा कर, राम के युवराज-अभिषेक की आकांक्षा में, सब पुर-वासी झुण्डों में चौराहों और सभा-भवनों में एकत्र हो कर परस्पर बातें करते हुए राजा दशरथ की प्रशंसा करने लगे: “अहो, इक्ष्वाकु-कुल को आनन्द देने वाला यह राजा दशरथ कैसे महात्मा हैं, जो अपने को वृद्ध जान कर राम को राज्य पर अभिषिक्त कर रहे हैं। हम सब धन्य हैं कि लोक के भले-बुरे को देख चुके राम चिरकाल तक हमारे रक्षक होंगे। अहंकार से रहित, विद्वान्, धर्मात्मा, भ्रातृ-वत्सल राघव जैसे अपने भाइयों पर स्नेह रखते हैं, वैसे ही हम पर भी स्नेह रखते हैं। धर्मात्मा निष्पाप राजा दशरथ चिरंजीवी हों, जिनकी कृपा से हम राम को अभिषिक्त हुआ देखेंगे।”
इस प्रकार बातें करते पुर-वासियों की वे बातें वहाँ आए जनपद-वासियों ने भी सुनीं, जो अभिषेक का समाचार सुन कर चारों दिशाओं से अयोध्या में उमड़ आए थे। राम के अभिषेक को देखने चारों ओर से आए उन जनपद-वासियों ने राम की नगरी को भर दिया। इधर-उधर फैलते उन जन-समूहों से उठता वह कोलाहल पूर्णिमा को वेग से उमड़ते समुद्र की गर्जना-सा सुनाई पड़ता था। और देखने को उत्सुक जनपद-वासियों से चारों ओर भरी, कोलाहल से व्याप्त, इन्द्र की अमरावती-सी वह अयोध्या-नगरी समुद्र के जल-जन्तुओं से भरे महासागर-सी प्रतीत होने लगी।
सार: राम सीता-सहित नारायण की उपासना और हवन कर के कुश-शय्या पर शयन करते हैं, प्रातः जाग कर सन्ध्या-उपासना और स्वस्ति-वाचन कराते हैं। उधर अयोध्या ध्वजा-पताका, पुष्प, दीप-स्तम्भ और संगीत से सज उठती है; नगर और जनपद के लोग राजा दशरथ की प्रशंसा करते हुए अभिषेक की प्रतीक्षा में समुद्र-से उमड़ पड़ते हैं।
मूल: श्रीमद्वाल्मीकि-रामायण, अयोध्याकाण्ड (गीता प्रेस गोरखपुर)।