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अयोध्या उस सुबह जाग तो रही थी, पर उसकी हर ध्वनि भीतर से खोखली थी। महाराज दशरथ की शय्या के पास सूत (राजगाथा गाने वाले), मागध (वंशावली बखानने वाले) और गायक नित्य की भाँति स्तुति और मंगलगान लेकर आए; वीणा बजी, हाथ बजे, पिंजरों में बंद और वृक्षों पर बैठे पक्षी उस शब्द से जाग उठे। पर जिसके लिए यह सारा कोलाहल था, वह राजा न जागा। यहाँ से आरम्भ होती है अयोध्याकाण्ड की वह कथा जिसमें एक पिता मौन हो जाता है, एक माता पर सारे कुल का शाप उतरता है, और एक पुत्र राजसिंहासन को ठुकराकर अपने ज्येष्ठ भ्राता को वन से लौटा लाने का व्रत लेता है। यह खण्ड आपको सर्ग 65 से 80 तक, दशरथ की मृत्यु से लेकर भरत के चित्रकूट की ओर मार्ग बनवाने तक ले चलता है।
राजा नहीं जागते (सर्ग 65)
रात बीत गई थी। प्रातःकाल उस महाराज के निवास पर परम संस्कारवान सूत, उत्तम ज्ञान वाले मागध, और वीणा के स्वर-भेद पहचानने वाले गायक एकत्र हुए। उनकी स्तुति का शब्द प्रासादों के भीतर प्रतिध्वनि बनकर भर गया। ब्राह्मणों और सारिका-शुक के पवित्र शब्द, वीणा का निःस्वन, और राजा की प्रशंसा में रचे गाथा-काव्यों की आशीर्गाथा से वह भवन गूँज उठा।
फिर शुद्ध आचरण वाली, सेवा में निपुण परिचारिकाएँ, जिनमें स्त्रियाँ और वर्षवर (अन्तःपुर के रक्षक) अधिक थे, यथास्थान खड़ी हुईं। स्नान कराने में निपुण सेवकों ने यथासमय, यथाविधि स्वर्ण-घटों में चन्दन-सुगन्धित जल लाया। पवित्र कुमारियों ने मंगल-स्पर्श और मंगल-पान योग्य वस्तुएँ लाईं। राजा के जागने पर उनके सम्मुख रखने योग्य सब शुभलक्षण-सम्पन्न सामग्री विधिपूर्वक सजाई गई। सूर्योदय तक सारा राज-परिवार उत्सुकता और आशंका से भरा खड़ा रहा कि अन्तःपुर से अभी तक न निकलने वाले राजा को कहीं कुछ हो तो नहीं गया।

तब जो स्त्रियाँ कोसलनरेश की शय्या के निकट थीं, उन्होंने मधुर वचनों से और स्पर्श से उन्हें जगाना चाहा। पर शय्या को विनयपूर्वक छूकर भी उन्हें राजा में जीवन का कोई चिह्न न मिला; हृदय की धड़कन, नाड़ी और अन्य अंगों में कोई स्पन्दन नहीं। वे काँप उठीं, स्रोत के विरुद्ध खड़े सरकंडों के सिरों-सी अस्थिर। तब उन संदेहग्रस्त स्त्रियों के मन में जिस अनिष्ट की आशंका थी, उसका निश्चय हो गया।
पुत्र-शोक से पराजित कौसल्या और सुमित्रा गहरी निद्रा में थीं, मानो काल ने उन्हें भी ग्रस लिया हो। निष्प्रभ, विवर्ण, शोक से अवनत कौसल्या तिमिर से ढकी तारिका-सी अशोभित थी। राजा के पास सोई कौसल्या भी न चमकती थी, और उसके निकट सोई, शोकाश्रु से मुख भिगोए सुमित्रा भी नहीं। शयन-शीलज्ञ उन स्त्रियों ने जब निश्चय किया कि राजा ने सोते-सोते ही प्राण त्याग दिए, तब वे वनवासिनी हथिनियों-सी, जिनके यूथपति बिछुड़ गए हों, ऊँचे स्वर में फूट पड़ीं। उनके रोदन से कौसल्या और सुमित्रा की निद्रा टूटी। राजा को देखते-छूते “हा नाथ!” कहकर दोनों धरती पर गिर पड़ीं। कोसलनरेश की पुत्री कौसल्या धूल में लोटती हुई आकाश से गिरी तारिका-सी हो गई। फिर कैकेयी आदि सारी रानियाँ शोक-संतप्त, अचेत होकर गिर पड़ीं। पूरा अन्तःपुर रुदन से भर उठा।
सार: दशरथ रात्रि में चुपचाप प्राण त्याग चुके थे; प्रभात की स्तुति-गायन उन्हें न जगा सके, और अन्तःपुर शोक के कोलाहल से भर गया।
कौसल्या का विलाप और तैल-द्रोणी (सर्ग 66)
बुझी हुई अग्नि, जलहीन समुद्र और प्रभाहीन सूर्य-से, स्वर्गगत राजा को देखकर शोक से कर्शित कौसल्या ने राजा का सिर अपनी गोद में लेकर, आँखें आँसुओं से भरकर कैकेयी से कहा, “हे क्रूर कैकेयी, हे दुष्ट-आचरण वाली, आपकी कामना पूरी हुई; अब निष्कण्टक राज्य भोगिए। राम मुझे छोड़कर वन चले गए और मेरे स्वामी स्वर्ग सिधार गए; मैं विपथ में संगहीन यात्री-सी जीवित नहीं रह सकती। कैकेयी के अतिरिक्त कौन स्त्री अपने प्राणनाथ को त्यागकर जीना चाहेगी?
“लोभी मनुष्य किम्पाक-फल खाने वाले की भाँति अपने दोष नहीं देखता; मन्थरा के कारण कैकेयी ने रघुवंश का नाश कर डाला। राजा द्वारा कैकेयी के उकसावे पर अयोग्य कर्म में नियुक्त होकर राम सपत्नीक वन गए; यह सुनकर जनक भी मेरे ही समान संतप्त होंगे। कमलनयन धर्मात्मा राम, जो जीवित होते हुए भी यहाँ से चले गए, आज नहीं जानते कि मैं अनाथ-विधवा हो गई। विदेहराज की पुत्री सीता, जो दुःख के अयोग्य है, वन में रात्रि के समय भयंकर गर्जना वाले पशु-पक्षियों के स्वर सुनकर त्रस्त होकर राम से लिपट जाएगी। वृद्ध और अल्प-संतान जनक भी सीता का स्मरण कर शोक में प्राण त्याग देंगे। मैं भी पतिव्रता आज ही अपने स्वामी के शरीर का आलिंगन कर अग्नि में प्रवेश करूँगी।”

तब व्यावहारिक कार्य करने वाले अमात्यों ने विलाप करती, मृत राजा का आलिंगन किए कौसल्या को वहाँ से सादर हटाया। वसिष्ठ आदि कुलपुरोहितों के आदेश से उन्होंने राजा के शरीर को तैल से भरी द्रोणी (तेल-कुंड) में रखकर शव-रक्षा के सब कर्म किए, क्योंकि पुत्र की अनुपस्थिति में सर्वज्ञ मन्त्री दाह नहीं कर सकते थे; इसीलिए उन्होंने शरीर को सुरक्षित रखा। राजा को तैल-द्रोणी में रखा जान, स्त्रियाँ “हा! राजा मर गए!” कहकर विलाप करने लगीं, “हे महाराज, सदा प्रिय बोलने वाले सत्यसंध राम से वंचित हमें आप किसलिए छोड़ चले? दुष्ट-स्वभाव कैकेयी के समीप, विधवा होकर हम कैसे रहेंगी? वही आत्मवान राम हमारे और आपके भी स्वामी थे; राजश्री त्यागकर वन चले गए।”
आँसू और विपुल शोक से ढकी राघव की वर-स्त्रियाँ निरानन्द होकर भूमि पर तड़पने लगीं। पति-विहीन स्त्री-सी, नक्षत्रहीन रात्रि-सी, महात्मा राजा से हीन अयोध्या अशोभित हो गई। पुत्र-शोक से राजा के स्वर्ग सिधारने और रानियों के भूमि पर तड़पने के बीच सूर्य अस्त हुआ, रात्रि उतर आई। नगरवासी संघों में मिलकर भरत की माता की निन्दा करने लगे और नरदेव के क्षय पर आर्त होकर शान्ति न पा सके।
सार: पुत्र की अनुपस्थिति में दाह नहीं हो सकता था, इसलिए दशरथ का शव तैल-द्रोणी में सुरक्षित रखा गया; कौसल्या ने कैकेयी को कुल-नाशिनी कहकर तीव्र विलाप किया।
“राजा बिना राष्ट्र वन हो जाता है” (ऋषियों की पुकार) (सर्ग 67)
विलाप और रुदन से भरी, सौ वर्ष-सी लम्बी प्रतीत होने वाली वह रात्रि अयोध्या में बीती। सूर्योदय पर अन्तराल-काल में राजकार्य चलाने वाले ब्राह्मण सभा में एकत्र हुए। मार्कण्डेय, मौद्गल्य, वामदेव, कश्यप, कात्यायन, गौतम और महायशस्वी जाबालि, ये ब्राह्मण अमात्यों के साथ राजपुरोहित वसिष्ठ की ओर मुख करके बैठे और बारी-बारी से बोले,
“पुत्र-शोक से यह राजा पंचत्व को प्राप्त हुए और वह रात्रि कठिनाई से बीती। राजा स्वर्गस्थ हैं, राम अरण्य में हैं, तेजस्वी लक्ष्मण भी राम के साथ चले गए। दोनों परंतप भरत और शत्रुघ्न केकय देश में, राजगृह में, अपने मातामह के रमणीय भवन में हैं। आज ही इक्ष्वाकु-वंश का कोई राजा नियुक्त किया जाए, क्योंकि राजाहीन राष्ट्र विनाश को प्राप्त होता है।”

फिर उन्होंने राजाहीनता के अनेक चित्र खींचे। राजाहीन देश में मेघ दिव्य जल से धरती नहीं सींचता; बीज नहीं बोए जाते; पुत्र पिता के और भार्या पति के वश में नहीं रहती; धन और सतीत्व सुरक्षित नहीं; सभा-भवन, उद्यान और पुण्य-गृह नहीं बनते; यज्ञ नहीं होते; ब्राह्मण आप्त-दक्षिणा नहीं देते; नट-नर्तक, उत्सव और समाज नहीं फलते; धनवान खुले द्वार से नहीं सोते; कामीजन रथ पर अरण्य-विहार को नहीं जाते; साठ वर्ष के घण्टा-बँधे हाथी राजमार्ग पर नहीं विचरते; वणिक दूर-यात्रा सुरक्षित नहीं करते; योगक्षेम नहीं चलता; सेना शत्रुओं को नहीं जीत पाती। राजा सत्य और धर्म है, राजा माता-पिता और हितकारी है; यम, कुबेर, इन्द्र और वरुण भी सदाचारी राजा से अभिभूत हो जाते हैं। राजा न हो तो लोक अन्धकार में डूब जाता है। जैसे नेत्र शरीर का पथ-प्रदर्शक है, वैसे ही राजा राष्ट्र का। इसी से, हे द्विजवर्य, हमारे आचरण को देखकर, राजाहीन अरण्य-तुल्य राष्ट्र को देखकर, आप ही इक्ष्वाकु के किसी कुमार को, या और किसी को, इस सिंहासन पर अभिषिक्त कीजिए।”
एक उप-कथा: “किम्पाक” की उपमा कौसल्या के विलाप में आई है: जैसे लोभी उसे खाते समय दोष नहीं देखता, वैसे ही कैकेयी ने वरदान-लोभ में कुल का नाश नहीं देखा।
सार: मार्कण्डेय आदि ऋषियों ने राजाहीनता को राष्ट्र का विनाश बताकर वसिष्ठ से तत्काल किसी इक्ष्वाकु-कुमार के अभिषेक की प्रार्थना की।
भरत को बुलाने दूतों का प्रस्थान (सर्ग 68)

उनका यह वचन सुनकर वसिष्ठ ने राजा के मित्रों, अमात्यों और समस्त ब्राह्मणों से कहा, “कैकेयी के उकसावे पर जिस भरत को राज्य दिया गया, वह अपने भाई शत्रुघ्न के साथ मातुल-कुल में सुखी रह रहा है। शीघ्रगामी अश्वों पर वेगवान दूत जाकर दोनों वीर भ्राताओं को ले आएँ। और हमें क्या विचार करना है?” सबने कहा, “दूत जाएँ।” तब वसिष्ठ ने सिद्धार्थ, विजय, जयन्त, अशोक और नन्दन (इन दूतों) को बुलाकर आदेश दिया,
“शीघ्रगामी अश्वों पर राजगृह नगर जाकर, शोक त्यागकर, मेरे शासन से भरत से यह कहना, ‘पुरोहित और सब मन्त्रियों ने आपको कुशल कहा है; शीघ्र प्रस्थान कीजिए, कोई आत्ययिक (अत्यन्त अविलम्ब्य) कार्य है।’ किन्तु वहाँ जाकर न राम का प्रवास बताना, न पिता की मृत्यु, न रघुवंश पर आए इस संकट को। और राजा तथा भरत के लिए कौशेय वस्त्र और उत्तम आभूषण लेकर तुरन्त जाइए।” यात्रा-भोजन की व्यवस्था पाकर, सम्मत अश्वों पर चढ़कर दूत अपने-अपने घर विदा लेने गए, फिर वसिष्ठ की अनुज्ञा लेकर अविलम्ब चल पड़े।

उन्होंने अपरताल पर्वत के दक्षिण और प्रलम्ब के उत्तर के बीच बहती मालिनी नदी को छूते हुए मार्ग किया; हस्तिनापुर में गंगा पार कर पश्चिम मुख होकर कुरुजांगल के बीच से पांचाल देश पहुँचे; फुल्ल-कमलों वाले सरोवर और निर्मल नदियाँ देखते हुए वेग से बढ़े। शरदण्डा के तट तक पहुँचकर वे शीघ्र पार हुए; पश्चिम तट पर खड़े पूज्य “सत्योपयाचन” नामक दिव्य वृक्ष की प्रदक्षिणा कर कुलिंगा नगरी में प्रवेश किया। तेजोऽभिभवन से निकलकर अभिकाल पहुँचे और राजा के पितृ-पैतामह से सम्बद्ध पुण्य इक्षुमती नदी पार की। वेद-पारंगत, अंजलि-जल पीने वाले ब्राह्मणों को देखते हुए बाह्लीक देश के बीच सुदामा पर्वत पहुँचे; उसके शिखर पर विष्णु-पदचिह्न-स्थल, विपाशा (व्यास) और शाल्मली आदि नदियाँ, वापी-तड़ाग, और सिंह-व्याघ्र-मृग-गज देखते हुए, अत्यन्त चौड़े राजमार्ग से बढ़ते रहे। श्रान्त वाहनों पर भी उन्होंने केकय की राजधानी गिरिव्रज नगर शीघ्र पाया, और स्वामी वसिष्ठ की प्रसन्नता तथा कुल-रक्षा के लिए रात्रि में ही उस नगर में प्रवेश किया।
सार: वसिष्ठ ने पाँच दूत भेजे, यह आदेश देकर कि भरत को न पिता की मृत्यु बताई जाए न राम का वनगमन; दूत अनेक नदियाँ-पर्वत पार कर रात्रि में गिरिव्रज पहुँचे।
भरत का अपशकुन-स्वप्न (सर्ग 69)

जिस रात्रि दूतों ने वह नगरी प्रवेश की, उसी रात्रि भरत ने एक अप्रिय स्वप्न देखा। रात्रि के अन्त-पहर में देखे उस स्वप्न से राजाधिराज का पुत्र अत्यन्त संतप्त हुआ। (भारतीय परम्परा में रात्रि के अन्त-पहर का स्वप्न प्रायः सत्य होता माना जाता है।) उसे खिन्न जान, प्रिय बोलने वाले मित्रों ने उसका आयास (व्यथा) दूर करने को सभा में कथाएँ छेड़ीं; कोई वाद्य बजाने लगे, कोई गीत-नृत्य से शान्ति देने लगे, कोई हास्य-प्रधान नाटक पढ़ने लगे। पर महात्मा राघव भरत उन प्रियवादी सखाओं के बीच भी प्रसन्न न हुआ।
एक प्रिय सखा ने पूछा, “हे सखा, मित्रों के बीच बैठकर भी आप हमारे साथ आनन्द क्यों नहीं लेते?” भरत ने उत्तर दिया, “सुनिए, किस कारण यह दीनता मुझ पर आई। स्वप्न में मैंने पिता को मलिन, बिखरे केश वाले, पर्वत-शिखर से गोबर-भरे मलिन गड्ढे में गिरते देखा; वे उसी गड्ढे में तैरते, अंजलि से तेल पीते, बार-बार हँसते-से दिखे। फिर तिल-मिश्रित अन्न खाकर, सारे अंगों में तेल मलकर, सिर के बल बार-बार तेल में डुबकी लगाते रहे। स्वप्न में मैंने समुद्र को सूखा, चन्द्र को धरती पर गिरा, और जगत को राक्षसों से उपद्रुत, अन्धकार से ढका देखा। राजा के औपवाह्य (राज-सवारी) हाथी का दाँत खण्ड-खण्ड हुआ, जलती अग्नियाँ अचानक बुझ गईं। पृथ्वी विदीर्ण, वृक्ष सूखे, पर्वत धुआँ छोड़ते गिरते दिखे। काली-लाल-भूरी स्त्रियाँ काले वस्त्र पहने, लोहे के आसन पर बैठे राजा पर प्रहार करती दिखीं। लाल वस्त्र वाली विकृत-मुख राक्षसी राजा का उपहास करती, उन्हें खींचती दिखी।

“धर्मात्मा राजा लाल माला-अनुलेपन धारण किए, गधों जुते रथ पर, दक्षिण मुख होकर वेग से जाते दिखे। ऐसी ही और रूपों की भयावह दुःस्वप्न-गति मैंने देखी। इससे आभास होता है कि मैं, या राम, या राजा, या लक्ष्मण, कोई मरेगा। जो स्वप्न में गधे जुते यान पर जाता है, उसकी चिता का धूम्र शीघ्र दिखता है। इसी से मैं दीन हूँ, आपके वचन का आदर नहीं कर पाता; मेरा कण्ठ सूख रहा है, मन अस्वस्थ है। भय का कोई स्थान नहीं दिखता, फिर भी भय है; स्वर बिगड़ गया, छाया चली गई, स्वयं से घृणा-सी हो रही है पर कारण नहीं दिखता। पहले कभी न कल्पित इस अनेकरूप दुःस्वप्न-गति को सुनकर, और अब जिनका दर्शन भी असम्भव हो गया उन राजा का स्मरण कर, यह महान भय मेरे हृदय से नहीं जाता।”
सार: भरत ने रात्रि-अन्त में पिता की मृत्यु-सूचक भयानक स्वप्न देखा; मित्रों के मनोरंजन से भी उसका अकारण-सा भय शान्त न हुआ।
दूतों का संदेश और भरत की विदाई (सर्ग 70)
भरत मित्रों को स्वप्न सुना ही रहा था कि क्लान्त वाहनों वाले दूत अजेय-परिखा से घिरे रमणीय राजगृह नगर में पहुँचे। केकयराज और युवराज से सत्कार पाकर, अपने भावी राजा भरत के चरण छूकर उन्होंने कहा, “पुरोहित वसिष्ठ और सब मन्त्री आपको कुशल कहते हैं; शीघ्र प्रस्थान कीजिए, अविलम्ब्य कार्य है। हे विशालाक्ष, ये महार्ह वस्त्र-आभूषण लेकर मातामह और मामा को भी दिलवाइए। इनमें बीस करोड़-मूल्य की वस्तुएँ राजा (मातामह) के लिए, और पूरे दस करोड़ की वस्तुएँ मामा के लिए हैं।”

अनुरक्त भरत ने वह सब लेकर पिता की ओर से मातामह और मामा को दिलवाया, और दूतों को अभीष्ट भोजन-पान से सत्कार कर पूछा, “क्या मेरे पिता राजा दशरथ कुशल हैं? राम और महात्मा लक्ष्मण आरोग्य हैं? धर्मनिरता, धर्मवादिनी, बुद्धिमान राम की माता आर्या कौसल्या नीरोग हैं? लक्ष्मण और वीर शत्रुघ्न की जननी, धर्मज्ञा मेरी मध्यम माता सुमित्रा भी? सदा चण्डी, क्रोधना, स्वयं को बुद्धिमती मानने वाली मेरी माता कैकेयी नीरोग हैं, और उन्होंने मेरे लिए क्या कहा है?”
दूतों ने अत्यन्त विनयपूर्वक कहा, “हे नरव्याघ्र, जिनकी कुशल आप चाहते हैं, वे सब कुशल हैं; पद्महस्ता श्री आपका वरण कर रही हैं; अतः आपका रथ जुतवाइए।” भरत ने कहा, “मैं महाराज मातामह से अनुमति लेता हूँ; दूत मुझे शीघ्रता के लिए कह रहे हैं।” उसने मातामह से कहा, “हे राजन, दूतों के कहने पर मैं पिता के पास जाता हूँ; जब आप स्मरण करेंगे, फिर आऊँगा।” मातामह ने भरत का सिर सूँघकर शुभ वचन कहे, “जाइए तात, मैं अनुमति देता हूँ; कैकेयी आप-सी सुसन्तान वाली है। माता-पिता, पुरोहित और श्रेष्ठ ब्राह्मणों को, और दोनों धनुर्धर भ्राता राम-लक्ष्मण को मेरी ओर से कुशल कहना।”

केकयराज ने भरत को उत्तम हाथी, चित्र-कम्बल, मृगचर्म और धन दिए; अन्तःपुर में पले, व्याघ्र-सी शक्ति वाले बड़े श्वान भी भेंट किए; दो हजार स्वर्ण-निष्क और सोलह सौ अश्व दिए। मामा युधाजित ने भी ऐरावत-कुल और इन्द्रशिर में जन्मे हाथी तथा शीघ्रगामी सुसंयुक्त खच्चर दिए। पर अयोध्या लौटने की उतावली में कैकेयीपुत्र भरत ने उस धन का अभिनन्दन न किया। दूतों की त्वरा और स्वप्न-दर्शन से उसके हृदय में बड़ी चिन्ता थी। अश्वपति के सेवक ऊँट-बैल-अश्व-खच्चरों से जुते सौ रथ लेकर साथ चले। मातामह, मातामही, मामा युधाजित और मामी से विदा लेकर, शत्रुघ्न-सहित रथ पर चढ़कर भरत अयोध्या की ओर, इन्द्रलोक से लौटते सिद्ध-सा, चल पड़ा।
सार: भरत ने कुशल पूछा, उपहार ग्रहण किए, पर अयोध्या लौटने की उतावली में उनका अभिनन्दन न किया; स्वप्न की चिन्ता लिए वह शत्रुघ्न-सहित प्रस्थान कर गया।
सूनी अयोध्या में प्रवेश (सर्ग 71)
राजगृह से पूर्व मुख होकर वीर्यवान भरत ने सुदामा और हृादिनी नदियाँ देखकर पार कीं; पश्चिम-स्रोता शतद्रु (सतलज) पार की। ऐलधान में एक नदी पार कर, अपरपर्वत पहुँचकर, फेंकी वस्तु को शिला बना देने वाली नदी पारकर शल्यकर्षण-प्रदेश पहुँचा। शिलावहा को देख, शुद्ध होकर महाशैल पर्वतों को लाँघकर चैत्ररथ वन की ओर बढ़ा। सरस्वती और गंगा के संगम को युग्म रूप में पारकर वीरमत्स्य देश के उत्तरी भाग से भारुण्ड वन में प्रवेश किया। पर्वतों से घिरी कुलिंगा नदी पारकर यमुना पहुँचकर उसने सेना को विश्राम दिया; श्रान्त अश्वों को स्नान-भोजन देकर, स्वयं स्नान-जलपान कर आगे चला। भद्र रथ पर भद्र राजपुत्र अनभ्यस्त महारण्य को वायु-सा पार कर गया।
अंशुधान नामक गाँव पर दुष्प्रतर भागीरथी (गंगा) को देख, प्राग्वट में, जहाँ सुगमता से पार हो सकती थी, सेना-सहित पारकर धर्मवर्धन गाँव पहुँचा। तोरण के दक्षिण से जम्बूप्रस्थ होते हुए वरूथ गाँव पहुँचा, वहाँ रात बिताकर उज्जिहाना के उद्यान (जहाँ कदम्ब वृक्ष थे) पहुँचा। शीघ्रगामी अश्व लेकर, सेना को धीरे आने की अनुमति देकर भरत तेज बढ़ा। सर्वतीर्थ में रात बिताकर पर्वतीय तुरंगों पर उत्तानिका आदि नदियाँ पारकर हस्तिपृष्ठक पहुँचा; कुटिका और लोहित्य में कपीवती पार की। एकसाल में स्थाणुमती, विनत में गोमती पारकर कलिंगनगर के शाल-वन से होकर, सात रात्रि मार्ग में बिताकर, वैवस्वत मनु की बसाई अयोध्या को उषाकाल में देखा।

आगे अयोध्या देखकर भरत ने सारथि से कहा, “यह यशस्विनी पुण्य-उद्यानों वाली नगरी मुझे अधिक प्रतीत नहीं हो रही। सारथि, अयोध्या दूर से पाण्डु-मृत्तिका-सी (विवर्ण) दिखती है। जो ब्राह्मणों और धनवानों से भरी, राजर्षियों से पालित थी, वही दूर से श्वेत मिट्टी का ढेर-सी दिखती है। पहले यहाँ नर-नारियों का तुमुल शब्द सुनाई पड़ता था, आज नहीं। सायंकाल विहार कर लौटने वालों से चमकते उद्यान आज अन्यथा दिखते हैं; प्रेमियों से त्यक्त वे आज मानो रोते हैं। मत्त पशु-पक्षियों के मधुर स्वर आज नहीं सुनाई देते। चन्दन-अगुरु और धूप की सुगन्ध से युक्त श्रीमान पवन आज पहले-सा क्यों नहीं बहता? भेरी-मृदंग-वीणा का जो शब्द सदा बजता था, आज क्यों थम गया? मैं अनेक अनिष्ट-अमनोज्ञ शकुन देख रहा हूँ; मन व्यथित है। मेरे बन्धुओं की सर्वथा कुशल दुर्लभ जान पड़ती है; अकारण ही हृदय डूब रहा है।”
विषण्ण, श्रान्त-हृदय, त्रस्त, इन्द्रिय-व्याकुल भरत इक्ष्वाकु-पालित नगरी में शीघ्र घुसा। श्रान्त वाहनों के कारण उसने पश्चिमी वैजयन्त-द्वार से प्रवेश किया; द्वारपालों ने जयघोष से उसका स्वागत किया। द्वारपालों को सम्मानपूर्वक लौटाकर उसने अश्वपति के क्लान्त सारथि से कहा, “हे निष्पाप, मुझे बिना कारण बताए उतावली में क्यों लाया गया? हृदय अनिष्ट की आशंका करता है, धैर्य गिरता-सा है। राजाओं की मृत्यु-सूचक जिन लक्षणों की मैंने पहले बातें सुनी थीं, वे सब आज यहाँ देख रहा हूँ: गृह अस्वच्छ, मलिन, श्रीहीन, द्वार खुले; बलि-कर्म और धूप-सुगन्ध से रहित; देवागार सूने, देव-प्रतिमाएँ और यज्ञ-गोष्ठ त्यक्त; माल्य-आपणों में पण्य नहीं चमकता; वणिक भयभीत; पशु-पक्षी दीन। नर-नारियों को मलिन वस्त्र, आँसू-भरी आँखों, ध्यानमग्न, कृश, उत्कण्ठित देख रहा हूँ।” यह कहकर दीनमना भरत राजगृह की ओर चला। इन्द्रपुरी-सी चमकने वाली नगरी के चौराहों-घरों-वीथियों को सूना, द्वार-कपाटों को धूल-मलिन देख वह शोक से भर उठा, और सिर झुकाए पिता के भवन में प्रविष्ट हुआ।
सार: सात रात्रि की यात्रा के बाद भरत ने अयोध्या को श्रीहीन और सूनी पाया; राजाओं की मृत्यु-सूचक सब अपशकुन देखकर वह विषण्ण होकर पिता के भवन में घुसा।
कैकेयी का भयानक समाचार (सर्ग 72)

पिता के भवन में उन्हें न पाकर भरत माता को देखने उनके भवन गया। दूर रहे पुत्र को लौटा देख कैकेयी हर्षित होकर स्वर्ण-आसन छोड़कर उठ खड़ी हुई। धर्मात्मा भरत श्रीहीन गृह में घुसते ही जननी के शुभ चरण पकड़ बैठा। उसका सिर सूँघकर, यशस्वी भरत को गोद में बिठाकर कैकेयी ने पूछा, “आपके मातामह के भवन से चले आज कितनी रातें हुईं? रथ से तेज आते मार्ग-श्रम तो नहीं हुआ? मातामह और मामा युधाजित सुकुशल हैं? प्रवास से सब कुशल रहा? पुत्र, सब बताइए।”
राजीवलोचन भरत ने अपना सब वृत्तान्त बताया, “आज मातामह-भवन छोड़े सातवीं रात्रि है। मातामह और मामा कुशल हैं। राजा ने जो धन-रत्न दिया, वह वाहन मार्ग में थककर पीछे रह गया, इससे मैं पहले आ गया। दूतों ने त्वरा कराई। माता, अब जो पूछना चाहता हूँ वह बताइए; यह स्वर्ण-जटित शय्या राजा से शून्य है; यह इक्ष्वाकु-जन भी प्रसन्न नहीं दिखता। राजा प्रायः इसी अम्बा के भवन में रहते थे; आज उन्हें देखने आया, पर नहीं देखता। पिता के चरण छूऊँगा; बताइए वे कहाँ हैं; क्या ज्येष्ठ माता कौसल्या के भवन में हैं?”

राज्य-लोभ से मोहित कैकेयी ने अनजान पुत्र को वह घोर-अप्रिय समाचार प्रिय-सा कहकर सुनाया, “जो सब प्राणियों की गति है, उसी गति को आपके पिता प्राप्त हुए; वह यायजूक (यज्ञशील), सतों का आश्रय, महात्मा राजा परलोक चला गया।” यह सुनते ही धर्मकुल का निष्कपट भरत पिता-शोक से अभिभूत होकर “हा, मैं मारा गया!” कहता, भुजाएँ भूमि पर पटकता गिर पड़ा। फिर शोक से ढका, मूढ़-चेतन भरत विलाप करने लगा, “उठिए राजन, उठिए महायश! यहाँ क्यों लेटे हैं? आप-से सत्पुरुष शोक नहीं करते। पिता की यह शय्या पहले शरद्-रात्रि के चन्द्र-युक्त गगन-सी सुन्दर थी; आज उस धीमान से हीन होकर चन्द्रहीन आकाश-सी, शुष्क सागर-सी अशोभित है।” गला रुँधते, वस्त्र से मुख ढाँपते वह विजेताओं में श्रेष्ठ रोता रहा।
देव-सा, मातंग-शावक-सा, चन्द्र-सूर्य-सम पुत्र को भूमि पर गिरा देख, उसे उठाकर माता कैकेयी ने कहा, “उठिए बुद्धिमान! सत्पुरुष इस भाँति शोक नहीं करते। आपकी बुद्धि शील-श्रुति-तप के अनुगामी है।” भरत ने कहा, “मैं सोच रहा था कि राजा राम को अभिषिक्त करेंगे या यज्ञ करेंगे, इसी से प्रसन्न होकर आया था; पर सब उल्टा हुआ, मैं नित्य मेरे प्रिय-हित में रत पिता को नहीं देख रहा। माता, मेरे न आने पर किस व्याधि से राजा चल बसे? धन्य हैं राम आदि जिन्होंने स्वयं पिता का संस्कार किया। कीर्तिमान महाराज को नहीं मालूम कि मैं आ गया, अन्यथा झुककर मेरा सिर सूँघ लेते। पिता का वह सुखस्पर्श हाथ कहाँ, जो मुझे धूल-भरा देख बार-बार पोंछता था? जो मेरे भाई, पिता-तुल्य, बन्धु राम हैं, उन्हें शीघ्र मेरा समाचार दीजिए; ज्येष्ठ भाई पिता-तुल्य होता है, उन्हीं के चरण पकड़ूँगा, अब वही मेरी गति हैं। सत्यविक्रम मेरे पिता ने अन्त समय आर्य राम से क्या कहा? अपना अन्तिम साधु-संदेश सुनना चाहता हूँ।”
कैकेयी ने यथातथ्य कहा, “वह महात्मा ‘हा राम, हा सीता, हा लक्ष्मण!’ कहते परलोक गए। पाशों में बँधे महागज-से कालधर्म से घिरे आपके पिता ने अन्तिम वचन कहा, ‘धन्य हैं वे जो राम को सीता-सहित और महाबाहु लक्ष्मण को लौटते देखेंगे।’” यह सुनकर भरत दूसरे अप्रिय समाचार से और विषण्ण होकर पूछ बैठा, “वह धर्मात्मा, कौसल्या के आनन्द-वर्धक राम, लक्ष्मण और सीता-सहित अब कहाँ हैं?” माता ने वह अप्रिय बात भी प्रिय-समाचार के स्वर में कही, “वह राजपुत्र चीर पहने, सीता और लक्ष्मण के साथ दण्डक के महावन को चला गया।”
भ्राता के चरित्र पर तनिक शंका और अपने वंश के माहात्म्य के स्मरण से त्रस्त भरत ने पूछा, “कहीं राम ने किसी ब्राह्मण का धन तो नहीं हरा? किसी निरपराध धनी या दरिद्र की हिंसा तो नहीं की? परस्त्री की कामना तो नहीं की? तो फिर मेरा भाई दण्डकारण्य क्यों भेजा गया?” तब स्त्री-स्वभाव की चपल माता ने अपना सब कुकर्म ज्यों-का-त्यों कह डाला, “राम ने न किसी का धन हरा, न निरपराध की हिंसा की, न परस्त्री को निष्पाप दृष्टि से भी देखा। पुत्र, राम के अभिषेक की बात सुनते ही मैंने आपके पिता से आपके लिए राज्य और राम का वनवास माँगा। सत्यप्रतिज्ञ पिता ने वैसा ही किया; राम सीता-लक्ष्मण-सहित भेज दिए गए। प्रिय पुत्र को न देखकर पुत्र-शोक से दुर्बल महायश राजा पंचत्व को प्राप्त हुए। हे धर्मज्ञ, अब आप राजपद ग्रहण कीजिए; यह सब मैंने आपके ही लिए किया। शोक-सन्ताप मत कीजिए, धैर्य रखिए; नगरी और यह निष्कण्टक राज्य आपके अधीन है। विधिज्ञ वसिष्ठ आदि द्विजेन्द्रों के साथ शीघ्र पिता का संस्कार कीजिए, अदीनसत्त्व होकर स्वयं को पृथ्वी पर अभिषिक्त कराइए।”
सार: कैकेयी ने भरत को पिता की मृत्यु और राम के वनवास का समाचार एक साथ सुनाया, अपनी ही करनी स्वीकार की, और भरत से सिंहासन ग्रहण करने को कहा।
भरत की पहली भर्त्सना और प्रतिज्ञा (सर्ग 73)
पिता का वृत्तान्त और दोनों भाइयों का वनवास सुनकर दुःख-संतप्त भरत बोला, “अब पिता और पिता-तुल्य भ्राता से हीन, शोक करते मुझे राज्य से क्या? दुःख पर दुःख कर, घाव में नमक-सा, आपने राजा को प्रेत और राम को तापस बना डाला। हे पापदर्शिनी, हे कुल-कलंकिनी! आप इस कुल के नाश को कालरात्रि-सी आईं; मेरे पिता ने आपको अंगार समझकर भी छाती से लगाया, पहचाना नहीं। सत्यसंध महायश पिता आपको पाकर तीव्र दुःख से जल-जलकर चल बसे। धर्मवत्सल पिता को आपने मार डाला; किस कारण राम को निकाला, वन भेजा? आपको पाकर कौसल्या और सुमित्रा भी पुत्र-शोक से पीड़ित हैं; यदि जीवित रहीं तो बड़ा दुष्कर काम करेंगी। राम तो आपसे भी अपनी माता-सा बर्ताव करते रहे, और दीर्घदर्शिनी मेरी ज्येष्ठ माता कौसल्या भी आपसे बहन-सा।
“उसी कौसल्या के महात्मा पुत्र को चीर-वल्कल पहनाकर वन भेजकर, हे पापिनी, आपको शोक नहीं होता? आप पाप-निश्चय वाली हैं; मुझे मृत समझकर रोइए। राम को त्यागने में मुझे संकोच न होता यदि वे आपको सदा माता न मानते। ज्येष्ठ का अधिकार छीनकर अनुज को राज्य देने की यह दुष्ट-बुद्धि, जो हमारे पूर्वजों ने निन्दित की, आपके मन में आई कैसे? हमारे कुल में ज्येष्ठ ही अभिषिक्त होता है; अन्य भाई उसी की सेवा करते हैं (यह इक्ष्वाकुओं की विशेष रीति है)। आप राजधर्म नहीं जानतीं। धर्म से रक्षित, कुल-आचार से शोभित उन राजाओं का चारित्र-गौरव आज आपको पाकर लुप्त हो गया। पर मैं आपकी कामना पूरी नहीं करूँगा; आपको अप्रिय करने को ही मैं अपने सकल-प्रिय भ्राता राम को वन से लौटाऊँगा, और उस दीप्त-तेजस्वी राम को लौटाकर, स्थिर अन्तरात्मा से उनका दास होकर रहूँगा।” यह कहकर शोकार्त भरत मन्दर-कन्दर में बैठे सिंह-सा फिर गरज उठा।
सार: भरत ने माता को कुलनाशिनी कहकर तीखी भर्त्सना की, इक्ष्वाकु की ज्येष्ठाधिकार-रीति याद दिलाई, और राम को लौटाकर उनका दास होने की प्रतिज्ञा की।
सुरभि-उपाख्यान और भरत का मूर्च्छित होना (सर्ग 74)

माता की भर्त्सना कर, महान रोष से भरकर भरत फिर बोला, “राज्य से भ्रष्ट हो जाइए, हे क्रूर दुष्ट-आचरण कैकेयी! आप धर्म से त्यक्त हैं; मुझे मृत समझकर रोती रहिए। राम या परम-धार्मिक राजा ने आपका क्या बिगाड़ा था, जिनकी मृत्यु और निर्वासन आपके कारण एक साथ हुए? इस कुल के नाश से आपको ब्रह्महत्या का पाप लगा; आप नरक जाइए, मेरे पिता के स्वर्ग-लोक को नहीं। पिता-वध और प्रिय-धार्मिक पुत्र के निर्वासन का यह घोर पाप कर, सर्वलोक-प्रिय राम को निकालकर आपने मुझ पर भी भय ला दिया। आपके कारण पिता चल बसे, राम वन गए, और मैं जीव-लोक में अपयश को प्राप्त हुआ। हे मातृ-रूप शत्रु, हे पतिघातिनी, आप मुझसे बोलने योग्य नहीं। आप अश्वपति धर्मराज की कन्या नहीं, उसके कुल को ध्वंस करने वाली राक्षसी हैं।
“पुत्र पिता के अंग-प्रत्यंग और माता के हृदय से उत्पन्न होता है, इसी से वह माता को सब बन्धुओं से प्रियतर होता है।” फिर भरत ने सुरभि-उपाख्यान कहा, “पुरानी बात है: देव-सम्मता धर्मज्ञा सुरभि (कामधेनु) ने हल खींचते अपने दो बैल-पुत्रों को आधे दिन की थकान से भूमि पर गिरा देखा, और पुत्र-शोक से, आँसू-भरी आँखों से रोने लगी। नीचे जाते महात्मा इन्द्र के शरीर पर उसके सुगन्धित आँसू-बिन्दु गिरे। ऊपर देखकर इन्द्र ने आकाश में खड़ी, दीन, अत्यन्त दुःखी रोती सुरभि को देखा। उद्विग्न इन्द्र ने अंजलि बाँधकर पूछा, ‘क्या हमें कहीं से कोई बड़ा भय है? हे सर्व-हितैषिणी, आपके शोक का क्या निमित्त है?’ सुरभि बोली, ‘देवराज, आपको कोई भय नहीं; मैं तो अपने दो दुःखी पुत्रों के लिए रोती हूँ, जो दुरात्मा कृषक से सूर्य-ताप में पीड़ित, मारे जा रहे हैं; पुत्र-सा प्रिय कोई नहीं।’
“जिसके सहस्र-सहस्र पुत्रों से यह सारा जगत व्याप्त है, उस सुरभि को भी रोते देख इन्द्र ने जान लिया कि माता को पुत्र-सा प्रिय कुछ नहीं। जब अपरिमित-संतान सुरभि भी रोती है, तो राम-विहीन कौसल्या, जिसका एक ही पुत्र है, कैसे जीएगी? आपने उस एकपुत्रा साध्वी को विवत्सा (पुत्रहीन) कर दिया; इसी से आप यहाँ और परलोक में नित्य दुःख पाएँगी। मैं भ्राता का यह सकल ऋण और पिता का सम्पूर्ण और्ध्वदेहिक कर्म कर, उनकी कीर्ति बढ़ाऊँगा (सन्देह नहीं)। महाबल कोसलेन्द्र राम को लौटाकर स्वयं मुनि-सेवित वन में जाऊँगा, और उन्हें व्रत-भंग के पाप से बचाऊँगा। हे पाप-निश्चय पापिनी, अश्रु-कण्ठ पौरों के सामने मैं आपका किया पाप वहन न कर सकूँगा। आप चाहे अग्नि में प्रवेश कीजिए, स्वयं दण्डक जाइए, या गले में रस्सी बाँध लीजिए; आपके लिए और कोई गति नहीं। राम के स्वदेश लौटने पर ही मैं कृतकृत्य और निष्कल्मष हूँगा।” यह कहकर, तोमर और अंकुश से बिंधे वन-गज-सा, फुफकारते सर्प-सा भरत क्रुद्ध होकर भूमि पर गिर पड़ा। संरक्त नेत्र, ढीले वस्त्र, बिखरे आभूषण वाला वह राजपुत्र उत्सव-समाप्ति पर गिराई इन्द्र-ध्वजा-सा धरती पर गिरा रहा।
एक उप-कथा: “इन्द्र-ध्वजा” का संकेत प्राचीन इन्द्र-महोत्सव से है: इन्द्र के उत्सव में उनके सम्मान में यन्त्र के सहारे एक ऊँचा इन्द्रध्वज खड़ा किया जाता था, और उत्सव की समाप्ति पर उसे गिरा दिया जाता। वाल्मीकि बार-बार गिरे हुए भरत और शत्रुघ्न की उपमा इसी गिराए जाते इन्द्रध्वज से देते हैं: एक क्षण पहले ऊँचा, गौरवपूर्ण; अगले ही क्षण भूमि पर।
सार: सुरभि-कथा से माता के पुत्र-प्रेम की पराकाष्ठा बताकर भरत ने राम को लौटाकर स्वयं वन जाने का संकल्प दोहराया, और शोकातिरेक में मूर्च्छित होकर गिर पड़ा।
कौसल्या के समक्ष शपथ (सर्ग 75)
दीर्घ काल बाद संज्ञा पाकर वीर्यवान भरत उठा, और आँसू-भरी आँखों वाली दीन माता को देख अमात्यों के बीच उसे फटकारता हुआ बोला, “मैंने न कभी राज्य चाहा, न माता से कोई मन्त्रणा की। राजा द्वारा सोचे राम-अभिषेक को मैं जानता तक नहीं; मैं तो शत्रुघ्न-सहित दूर देश में था। न महात्मा राम का वनवास जानता था, न लक्ष्मण-सीता का निर्वासन कैसे हुआ।”
उसका स्वर पहचानकर कौसल्या ने सुमित्रा से कहा, “क्रूरकर्मा कैकेयी का पुत्र भरत आ गया है; उस दीर्घदर्शी भरत को देखना चाहती हूँ।” विवर्ण-मुख, कृश कौसल्या काँपती हुई भरत की ओर चली। उधर शत्रुघ्न-सहित भरत भी कौसल्या के भवन की ओर चला। मार्ग में दुःख से अचेत गिरी कौसल्या को देख दोनों दुःखित भाइयों ने उसका आलिंगन किया। मनस्विनी कौसल्या रोते-रोते भरत से बोली, “राज्य के अभिलाषी आपको यह निष्कण्टक राज्य मिल गया; कैकेयी ने क्रूर कर्म से शीघ्र दिला दिया। क्रूरदर्शिनी कैकेयी ने मेरे पुत्र को चीर पहनाकर वन भेजकर क्या गुण देखा? कैकेयी मुझे भी शीघ्र वहीं भेज दे जहाँ मेरा महायश पुत्र है। या आप स्वयं मुझे वहाँ ले चलिए जहाँ मेरा वह नरव्याघ्र पुत्र तप कर रहा है। यह विस्तीर्ण, धन-धान्य, हाथी-घोड़े-रथ से भरा राज्य उसी ने आपको दिलाया।”

इन क्रूर वचनों से निष्पाप भरत सूई-बिंधे घाव-सा व्यथित हुआ, और संभ्रान्त-चेतन होकर उसके चरणों में गिर, बार-बार विलाप कर संज्ञा पाई। हाथ जोड़कर बोला, “हे आर्या, अनजान, निष्कल्मष मुझे क्यों फटकारती हैं? राम के प्रति मेरा विपुल प्रेम आप जानती हैं। जिसकी अनुमति से मेरा सत्यसंध आर्य वन गया, उसकी बुद्धि कभी शास्त्र का अनुसरण न करे।” फिर भरत ने एक-के-बाद-एक अनेक कठोर शपथें लीं, “जिसकी सम्मति से मेरा आर्य वन गया, उसे यह-यह पाप लगे” कहकर उसने नीच मनुष्यों की दासता, सूर्य की ओर मल-त्याग, सोई गायों को लात मारने, सेवक से काम कराकर वेतन छीनने, प्रजा-रक्षक राजा से द्रोह, बलि-भाग लेकर भी प्रजा न रक्षने, गुरु-शय्या-गमन, मित्र-द्रोह, अग्निदान-पाप, राज्य-स्त्री-बाल-वृद्ध-वध, गुरुजनों का अनादर, परस्त्री-गमन, जल-दूषण और विष-दान, तृषार्त को जल का झूठा इनकार, पक्षपाती न्याय-दर्शन, इन सब पापों का भागी उसे बताया जिसकी सम्मति से राम वन गए हों। इन कष्ट-शपथों से अचेत-सा होते भरत से कौसल्या ने कहा, “पुत्र, आप शपथ ले-लेकर मेरे प्राण और छीन रहे हैं; पर सौभाग्य से आपकी आत्मा धर्म से नहीं डिगी। सत्यप्रतिज्ञ होकर आप सत्पुरुषों के लोक पाएँगे।” यह कहकर भ्रातृ-वत्सल महाबाहु भरत को गोद में लेकर, गले लगाकर अत्यन्त दुःखी कौसल्या फूट-फूटकर रोई। उस विलाप करते महात्मा का मन मोह और शोक-संरम्भ से विचलित रहा; बार-बार निःश्वास भरते, अचेत-से पड़े भरत की वह रात्रि शोक में बीत गई।
सार: कौसल्या के व्यंग्य पर भरत ने अनेक कठोर शपथों से अपनी निर्दोषता सिद्ध की; उसका हृदय जानकर कौसल्या ने उसे गोद में लेकर रो दिया।
दशरथ का दाह-संस्कार (सर्ग 76)
शोक-संतप्त भरत से वक्ताओं में श्रेष्ठ वसिष्ठ ने कहा, “बस, शोक मत कीजिए, आपका कल्याण हो, हे महायश राजपुत्र! अब समय पर राजा का उत्तम संस्कार कीजिए।” यह सुनकर धर्मज्ञ भरत भूमि पर गिर, फिर पिता के सब और्ध्वदेहिक कर्म कराने लगा। तैल-संस्कार से राजा का शरीर निकालकर, भूमि पर रखे, पीतवर्ण-मुख, मानो गहरी निद्रा में हों ऐसे राजा को नाना-रत्न-जटित अग्र्य शय्या पर लिटाकर पुत्र भरत अत्यन्त दुःखी होकर विलाप करने लगा, “हे राजन, मेरे प्रवास में, मेरे न आने पर आपने क्या निश्चय किया? धर्मज्ञ राम और महाबल लक्ष्मण को निकालकर कहाँ जा रहे हैं? अनायास महाकर्म करने वाले पुरुषसिंह राम से हीन इस दुःखी जन को छोड़कर कहाँ जाएँगे? आपके स्वर्ग जाने और राम के वन जाने पर इस नगरी की योगक्षेम कौन देखेगा? आपसे हीन यह पृथ्वी विधवा-सी अशोभित है; नगरी चन्द्रहीन रात्रि-सी दिखती है।”
महामुनि वसिष्ठ ने फिर कहा, “हे महाबाहु, राजा के जो भी और्ध्वदेहिक कर्म होने हैं, उन्हें अव्यग्र, अविचारित होकर कीजिए।” “तथास्तु” कह भरत ने ऋत्विज्, पुरोहित और आचार्यों को त्वरा कराई। राजा की मृत्यु पर अग्न्यगार से बाहर निकाली पवित्र अग्नियाँ ऋत्विज् यथाविधि हवन करने लगे। अचेत राजा को शिबिका पर चढ़ाकर, कण्ठ-रुँधे विमनस्क सेवक उन्हें कन्धों पर श्मशान ले चले। लोग मार्ग में रजत-सुवर्ण के पुष्प और नाना वस्त्र बिखेरते राजा के आगे चले। चन्दन, अगुरु, सरल, पद्मक और देवदारु की चिता बनाकर, नाना सुगन्ध डालकर ऋत्विजों ने राजा को चिता-मध्य में लिटाया। हवन कर, मन्त्र जपकर, सामगों ने यथाशास्त्र साम-गान किया।

राजा की रानियाँ शिबिकाओं और यानों में यथायोग्य, वृद्ध रक्षकों से घिरी नगर से निकलीं। ऋत्विजों ने अग्निचित राजा की प्रदक्षिणा की; कौसल्या आदि शोक-संतप्त स्त्रियों ने अश्वमेधयाजी राजा की प्रदक्षिणा की। वहाँ सहस्रों क्रौंची-सी आर्त स्त्रियों का करुण रोदन सुनाई पड़ा। फिर विवश रोती, बार-बार विलाप करती रानियाँ सरयू-तट पर रथों से उतरीं। भरत-सहित जलांजलि देकर, आँसू-भरी आँखों से रानियाँ, मन्त्री और पुरोहित नगर लौटे और दस दिनों की अशौच-अवधि भूमि पर सोते दुःख में बिताई।
सार: वसिष्ठ के आग्रह पर भरत ने पिता का तैल-द्रोणी से शव निकालकर सम्राट-योग्य दाह-संस्कार किया और सरयू-तट पर जलांजलि दी।
अस्थि-संचय और भरत-शत्रुघ्न का शोक (सर्ग 77)
दस दिन बीतने पर शुद्ध होकर राजपुत्र ने ग्यारहवें और बारहवें दिन के श्राद्ध-कर्म कराए। ब्राह्मणों को विपुल धन, रत्न, अन्न, महार्ह वस्त्र, नाना रत्न, श्वेत बकरियों का बड़ा समूह, चाँदी और बहुत-सी गायें दीं। पिता के और्ध्वदेहिक हित के लिए दास-दासियाँ, यान और सुमहान भवन भी दान किए।

तेरहवें दिन प्रभात-वेला में, अस्थि-संचय के लिए चिता के मूल पहुँचकर, राख से अरुण और जली अस्थियों से बिखरे उस मण्डल को देख, शोक-मूर्च्छित महाबाहु भरत कण्ठ रुँधते बोला, “हे तात, जिस भ्राता राघव को सौंपकर आप गए, वही जब वन चला गया, तो मैं इस सूने में आपसे त्यक्त-सा रह गया। हे नृप, जिस अनाथा का पुत्र वन गया, उस अम्बा कौसल्या को छोड़कर आप कहाँ चले गए?” वह रोता-दीन भूमि पर गिर पड़ा, यन्त्र से उठाए जाते इन्द्रध्वज-सा। सब अमात्य दौड़े, जैसे ऋषि स्वर्ग से गिरे ययाति की ओर। शोक-प्लावित भरत को देख शत्रुघ्न भी राजा का स्मरण कर अचेत गिर पड़ा। पिता के स्नेह-भरे विविध हाव-भाव स्मरण कर उन्मत्त-सा शत्रुघ्न विलाप करने लगा, “मन्थरा से उपजा, कैकेयी के वचनों-रूपी ग्राहों से भरा, वरदान-रूपी क्षुब्ध शोक-सागर हम सबको डुबो गया। हे तात, सुकुमार, बालक भरत को, जिसे आप सदा दुलारते थे, रोता छोड़कर कहाँ चले गए? जो हमें सब भोज्य-पान-वस्त्र-आभूषणों में से चुनने देते थे, वह अब कौन करेगा? आपसे हीन यह धरती फटने योग्य समय पर भी क्यों नहीं फटती? पिता स्वर्ग गए, राम वन गए; मेरे जीने का क्या प्रयोजन? मैं अग्नि में प्रवेश करूँगा। भ्राता-पिता से हीन सूनी अयोध्या नहीं लौटूँगा, तपोवन जाऊँगा।”
दोनों का विलाप सुन सब अनुगामी और भी आर्त हो उठे। विषण्ण, श्रान्त भरत और शत्रुघ्न टूटे-सींग के बैलों-से भूमि पर लोटने लगे। तब सबके और इनके पिता के पुरोहित, सौम्य-स्वभाव सर्वज्ञ वसिष्ठ ने भरत को उठाकर कहा, “हे विभो, आपके पिता को दिवंगत हुए आज तेरहवाँ दिन है; अस्थि-संचय का शेष कर्म अब क्यों विलम्बित करते हैं? जीवन-मृत्यु, हर्ष-शोक, लाभ-हानि, ये तीन द्वन्द्व सब प्राणियों में समान चलते हैं और अपरिहार्य हैं; इस प्रकार दुःख करना आपको शोभा नहीं देता।” सुमन्त्र ने भी शत्रुघ्न को उठाकर, सान्त्वना देकर, सब प्राणियों के जन्म-मरण की अनिवार्यता सुनाई। उठे हुए दोनों नरव्याघ्र वर्षा और धूप से मलिन, अलग-अलग खड़े इन्द्रध्वजों-से शोभित हुए। आँसू पोंछते, लाल-नेत्र, दीन-वाणी राजपुत्रों को अमात्यों ने शेष क्रियाओं की त्वरा कराई।
एक उप-कथा: “स्वर्ग से गिरे ययाति” का संकेत प्रसिद्ध पौराणिक राजा ययाति की ओर है: पुण्य-क्षय होने पर वे स्वर्ग से गिरने लगे, और अष्टक आदि राजर्षि शीघ्रता से उनके पास आए। वाल्मीकि भरत के पास दौड़ते अमात्यों की उपमा इसी से देते हैं: जैसे श्रेष्ठ-पुरुष भी अपने आश्रय के गिरने पर व्याकुल हो दौड़ पड़ते हैं।
सार: भरत ने श्राद्ध-दान किए; अस्थि-संचय के समय भरत और शत्रुघ्न शोक से मूर्च्छित हुए, और वसिष्ठ-सुमन्त्र ने जन्म-मरण की अनिवार्यता समझाकर उन्हें सँभाला।
मन्थरा का दण्ड (सर्ग 78)
राम से मिलने की यात्रा सोचते शोक-संतप्त भरत से लक्ष्मण के अनुज शत्रुघ्न ने कहा, “जो राम सब प्राणियों के दुःख में, और अपने तथा अपनों की तो विशेष रूप से, आश्रय हैं, उन्हीं सत्त्व-सम्पन्न राम को एक स्त्री ने वन भेज दिया! बलवान, वीर्य-सम्पन्न लक्ष्मण ने भी, चाहे पिता को रोककर ही सही, राम को इस संकट से क्यों न छुड़ाया? नीति-अनीति विचारकर, उत्पथ पर चढ़े और स्त्री के वश हुए राजा को तो प्रारम्भ में ही रोक लेना चाहिए था।”
वह यह कह ही रहा था कि पूर्व-द्वार पर कैकेयी की कुब्जा दासी मन्थरा, सब आभूषणों से सजी, चन्दन-सार लीपे, राज-वस्त्र पहने प्रकट हुई; अनेक मेखला-दामों और श्रेष्ठ भूषणों से बँधी वह रस्सियों से बँधी वानरी-सी लग रही थी। उस घोर पाप की कारिणी को देख द्वारपाल ने उस करुण कुब्जा को पकड़कर शत्रुघ्न को सौंपते हुए कहा, “जिसके कारण राम वन में हैं और आपके पिता ने देह त्यागी, यही वह पापिनी-निर्दयी है; अब जैसी इच्छा हो, इसके साथ कीजिए।” व्रतधारी शत्रुघ्न ने अन्तःपुर के सब जनों से कहा, “जैसा क्रूर कर्म इसने मेरे भाइयों और पिता के साथ किया, वैसा ही तीव्र दुःख रूपी फल यह भोगे।”

यह कहकर सखी-समूह से घिरी कुब्जा को उसने बलपूर्वक पकड़ा; वह चीख से भवन गुँजा उठी। शत्रुघ्न को क्रुद्ध जान सब सखी-जन भाग छूटीं और कहने लगीं, “जिस ढंग से इसने आरम्भ किया, यह हम सबका नाश कर देगा; चलिए, सानुक्रोश, धर्मज्ञा, यशस्विनी कौसल्या की शरण लें; वही हमारी ध्रुव गति हैं।” रोष से भरे शत्रुघ्न ने चीखती कुब्जा को भूमि पर घसीटा; इधर-उधर खिंचने से उसके चित्र-विचित्र भूषण बिखर गए, और उन टूटे भूषणों से राज-भवन तारे-जड़ित शरद्-गगन-सा शोभित हो उठा। उस बलवान पुरुषर्षभ ने मन्थरा को पकड़े-पकड़े, रक्षा को आई कैकेयी को तीखी फटकार सुनाई। उन कठोर वचनों से दुःखी, शत्रुघ्न के भय से त्रस्त कैकेयी अपने पुत्र भरत की शरण गई। शत्रुघ्न को क्रुद्ध देख भरत बोला, “स्त्रियाँ सब प्राणियों के लिए अवध्य हैं; इसे क्षमा कीजिए। मैं स्वयं इस दुष्ट-आचरण पापिनी कैकेयी को मार डालता, यदि धर्मात्मा राम मातृ-घातक समझकर मुझसे रुष्ट न होते। यदि राम जान लें कि हमने इस कुब्जा को भी मारा, तो धर्मात्मा निश्चय ही आपसे और मुझसे कभी न बोलेंगे।” भरत का वचन सुन शत्रुघ्न उस अपराध से लौट आया और मूर्च्छित-सी मन्थरा को छोड़ दिया। मन्थरा कैकेयी के चरणों में गिर, निःश्वास छोड़ती करुण विलाप करने लगी। शत्रुघ्न के घसीटने से विमूढ़-संज्ञा, दीन, जाल में फँसी क्रौंची-सी अपने आश्रय को देखती कुब्जा को भरत की माता ने धीरे-धीरे आश्वस्त किया।
सार: सजी-धजी मन्थरा को घसीटकर शत्रुघ्न ने दण्ड दिया और कैकेयी को फटकारा; पर “स्त्रियाँ अवध्य हैं” और राम-रोष की आशंका से भरत ने हस्तक्षेप कर उसे छुड़वा दिया।
भरत का सिंहासन-अस्वीकार (सर्ग 79)
चौदहवें दिन प्रभात में राजकर्ता (राज्य चलाने वाले) एकत्र होकर भरत से बोले, “हाय! ज्येष्ठ पुत्र राम और महाबल लक्ष्मण को निकालकर हमारे गुरुतर गुरु दशरथ स्वर्ग सिधार गए। हे महायश राजपुत्र, अब आप ही हमारे राजा हों; यह राष्ट्र अनायक है, इसमें कोई अपराध नहीं। पिता-पैतामह राज्य ग्रहण कर, अभिषेक करा, हमारी रक्षा कीजिए।” अभिषेक की सब सामग्री की प्रदक्षिणा कर, व्रतधारी भरत ने उन सभी से कहा, “हमारे कुल में ज्येष्ठ की राजता सदा उचित रही है; आप-से कुशल जन मुझसे ऐसा कहने योग्य नहीं। राम हमारे ज्येष्ठ भ्राता हैं, वही पृथ्वीपति होंगे; मैं ही उनके लिए चौदह वर्ष वन में रहूँगा। चतुरंग महाबल सेना जुतवाई जाए; मैं ज्येष्ठ भ्राता राम को वन से लौटा लाऊँगा।
“यह सब अभिषेक-सामग्री आगे लेकर मैं राम के लिए वन की ओर जाऊँगा; उन नरव्याघ्र को वहीं अभिषिक्त कर, सम्मानपूर्वक राम को अयोध्या लौटाऊँगा, जैसे कोई बड़े अग्निशाला से अग्नि अपने घर लाता है। इस मातृ-गन्ध वाली कैकेयी की कामना मैं पूरी न करूँगा; मैं दुर्गम वन में रहूँगा, राम राजा होंगे। शिल्पियों से मार्ग बनवाया जाए, ऊँची-नीची भूमि समतल की जाए, दुर्गम-संकीर्ण मार्गों को जानने वाले रक्षक साथ चलें।” राम के हित में बोलते भरत से सब बोले, “हे ज्येष्ठ राजपुत्र, जो आप ज्येष्ठ राम को पृथ्वी देना चाहते हैं, उन पर पद्मा श्री सदा बनी रहें!” यह उत्तम वचन सुनकर भरत के मुख पर हर्ष छा गया और प्रहर्ष-जनित आँसू बहने लगे। राम को वन में ही अभिषिक्त कर लौटाने का यह प्रस्ताव सुनकर सामात्य-सपरिषद् सब का शोक मिट गया, और उन्होंने कहा, “हे नरश्रेष्ठ, आपकी आज्ञा से आपमें और राम में भक्तिवान शिल्पी और रक्षक मार्ग बनाने को नियुक्त कर दिए गए हैं।”
सार: भरत ने सिंहासन ठुकराकर घोषित किया कि वही चौदह वर्ष वन रहेगा और राम को लौटाकर राजा बनाएगा; प्रसन्न परिषद् ने मार्ग बनवाने के लिए शिल्पी और रक्षक नियुक्त किए।
गंगा तक का दिव्य मार्ग (सर्ग 80)
तब भूमि-प्रदेश के ज्ञाता, सूत्र-कर्म (नक्शा-निर्माण) में निपुण; अपने कर्म में रत शूर खनक (कुआँ-सुरंग खोदने वाले) और यन्त्रक (नदी-पार करने या जल-रोकने की युक्तियाँ बनाने वाले); कर्मान्तिक (मजदूर), स्थपति (वास्तु-शिल्पी), यन्त्र-कोविद पुरुष; वर्धकि (बढ़ई), मार्गी (मार्ग साफ करने-रक्षने वाले), वृक्ष-तक्षक (वृक्ष काटने वाले); सूपकार (रसोइए), सुधाकार (चूना-पलस्तर करने वाले), बाँस और चर्म के काम करने वाले; और समर्थ द्रष्टा (मार्ग-दर्शक), सब आगे चल पड़े।

राम के निवास की ओर हर्ष से बढ़ता वह विपुल जन-समूह पर्व पर उमड़ते सागर-सा शोभित हुआ। अपने-अपने वर्ग में मिलकर मार्ग-निर्माण-निपुण जन नाना उपकरण लेकर आगे बढ़े। लता-वल्ली-गुल्म, ठूँठ-शिला और नाना वृक्ष काटकर उन्होंने मार्ग बनाया। वृक्षहीन प्रदेशों में कहीं वृक्ष रोपे, कहीं कुठार-टंक-दात्र से वृक्ष काटे। बलवानों ने जड़ें जमाए वीरण-तृण के झुरमुट उखाड़कर ऊँची-नीची भूमि समतल की। दूसरों ने तृणादि से ढके सूखे कुएँ और लम्बे गड्ढे मिट्टी से भरे, निचली भूमि चारों ओर समतल की। जो बाँधने योग्य थे उन स्रोतों पर सेतु बाँधे; जो चूर्ण करने योग्य थे उन कंकड़ों को पीसा, और जल-अवरोधक बाधाएँ तोड़ीं। थोड़े ही समय में बाँध बनाकर उन्होंने जल-स्रोतों को बहु-जल वाले, नाना आकार के, सागर-तुल्य अनेक तालाब बना दिया। निर्जल प्रदेशों में वेदिका से सजे नाना उत्तम कुएँ खुदवाए।
सेना के लिए बना वह राजमार्ग चूने-मिश्रित पक्के तल वाला, पुष्पित वृक्षों से लगा, मत्त पक्षियों के कलरव और पताकाओं से अलंकृत, चन्दन-जल से सिंचित, नाना पुष्पों से सजा देवमार्ग-सा शोभित हुआ। यथाज्ञप्ति आदेश देकर अधिकृत पुरुषों ने रमणीय, स्वादु-फल वाले प्रदेशों में निवेश (पड़ाव) लगवाए, और महात्मा भरत के प्रिय निवेश को आभूषण-सा सजाया। नक्षत्र-शुभ मुहूर्तों में वास्तुज्ञों ने भरत के निवेश स्थापित किए; उनके चारों ओर मिट्टी के ऊँचे टीले और परिखाएँ बनाई गईं, और श्रेष्ठ गलियों से शोभित, इन्द्रनील-सी प्रतिमाओं वाले तम्बू खड़े हुए। प्रासाद-मालाओं से युक्त, चूने-पुती प्राकार-दीवारों से घिरे, पताकाओं से शोभित, सुनिर्मित महापथों से बँटे वे निवेश सात-खण्ड भवनों के साथ, कपोत-गृहों वाले शिखरों से मानो आकाश में उड़ते, इन्द्रपुरी-से चमके। नाना वृक्ष-वनों से घिरे, शीतल-निर्मल जल और बड़े मीनों वाले गंगा-तट तक पहुँचता, समर्थ शिल्पियों का क्रमशः रचा वह रमणीय राजमार्ग रात्रि में चन्द्र-तारागण-मण्डित निर्मल आकाश-सा शोभित हो उठा।
सार: भरत के आदेश पर अनेक प्रकार के शिल्पियों ने अयोध्या से गंगा-तट तक सेतु, कुएँ, तालाब और पड़ावों से युक्त एक दिव्य, सुगम राजमार्ग बना दिया।
सिंहासन से इनकार: भरत की प्रतिज्ञा
दूसरे दिन की रात बीत रही थी, वही रात जो नान्दीमुख (किसी मांगलिक अवसर के आरम्भ में पितरों को दिया जाने वाला श्राद्ध) से पूर्व आती है। वसिष्ठ ने अगली सुबह भरत के राज्याभिषेक की तैयारी की थी, और सूत, मागध तथा बन्दीजन (राजाओं का गुणगान करने वाले स्तुति-पाठक) अपने रिवाज के अनुसार मंगल-स्तुतियों से भरत की वन्दना करने लगे। सोने की छड़ी से वह नगाड़ा बजाया गया जो दिन के हर पहर का अन्त सूचित करता है, और सेवकों ने सैकड़ों शंख तथा भाँति-भाँति के बाजे बजाए। यह विशाल तूर्य-घोष मानो दिशाओं को भर रहा था, परन्तु जो भरत पहले से ही शोक से जल रहे थे, उन्हें इस ध्वनि ने और गहरे शोक में डुबा दिया।
उस घोष से जागते ही भरत ने उसे तुरन्त रुकवा दिया, यह कहते हुए कि “हम राजा नहीं हैं।” फिर उन्होंने शत्रुघ्न से कहा, “देखिए शत्रुघ्न, कैकेयी ने संसार का कितना बड़ा अनिष्ट किया है। राजा दशरथ हमारे ऊपर इतने सारे दुःख छोड़कर चले गए। उस धर्मराज महात्मा की यह राजलक्ष्मी, जो धर्म पर ही टिकी थी, अब बिना खेवैया की नाव की भाँति जल में भटक रही है। जो श्रीराम हमारे परम महान् रक्षक और स्वामी थे, उन्हें भी हमारी ही इस माता ने धर्म को त्यागकर वन भेज दिया।” इस प्रकार विलाप करते अचेत-से भरत को देखकर अन्तःपुर की सब स्त्रियाँ ऊँचे स्वर में करुण रुदन करने लगीं।
उसी समय राजधर्म के ज्ञाता महायशस्वी वसिष्ठ इक्ष्वाकु-नाथ की उस सभा में पधारे। शिष्य-समूह के साथ वे उस मनोहर मन्त्रणा-गृह में बैठे जो स्वर्णमय था, मणि और मोतियों से जड़ा था, और इन्द्र की सुधर्मा-सभा के समान दिखता था। सर्ववेद के ज्ञाता उन ऋषि ने स्वस्तिक-अंकित आसन पर बैठकर दूतों को आदेश दिया, “हमारा कुछ अत्यन्त आवश्यक कार्य है। ब्राह्मणों, क्षत्रियों, योद्धाओं, मन्त्रियों, सेनापतियों, शत्रुघ्न तथा यशस्वी भरत को अन्य राजकुमारों सहित, और युधाजित् (एक प्रमुख मन्त्री, जिनका दूसरा नाम विजय है) तथा सुमन्त्र को, और जो भी भरत के हितैषी जन हैं, सबको शीघ्र और शान्ति से यहाँ ले आइए।” तब रथों, घोड़ों और हाथियों पर आते जनों का एक महान् कोलाहल उठ खड़ा हुआ।
सार: राज्याभिषेक की सुबह जब बन्दीजन भरत को राजा मानकर उनकी स्तुति करने लगे, तब भरत ने मंगलघोष रुकवाकर खुले शब्दों में स्वयं को राजा मानने से इनकार कर दिया। राजधर्मवेत्ता वसिष्ठ ने सभा बुलाई, और भरत राजकुमारों तथा मन्त्रियों के साथ उस इन्द्रसभा-सी मन्त्रणा-सभा में आ बैठे।
वसिष्ठ का आग्रह, भरत का संकल्प
बुद्धिमान् भरत ने उस सभा को देखा, जो श्रेष्ठ पुरुषों और महात्माओं से भरी थी और पूर्ण चन्द्र से प्रकाशित रात्रि के समान शोभायमान थी। पुरोहित वसिष्ठ ने सब मन्त्रियों और प्रजाजनों का मन पढ़कर भरत से मृदु वचन कहा, “तात, राजा दशरथ धर्म का आचरण करते हुए, धन-धान्य से भरी यह समृद्ध पृथ्वी आपको सौंपकर स्वर्ग सिधार गए। सत्यनिष्ठ श्रीराम ने सत्पुरुषों के धर्म को, अर्थात् पिता की आज्ञा-पालन को स्मरण रखते हुए, पिता का आदेश ऐसे ही नहीं छोड़ा जैसे उदित चन्द्रमा चाँदनी को नहीं छोड़ता। पिता और बड़े भाई दोनों ने यह निष्कण्टक राज्य आपको दिया है, अतः प्रसन्न मन्त्रियों के साथ इसका उपभोग कीजिए और शीघ्र अभिषेक करा लीजिए। उत्तर, पश्चिम, दक्षिण और पूर्व के राजा, और सह्य पर्वत के पास के सिंहासन-रहित कोटि-राजा तथा समुद्री व्यापारी आपके लिए अनगिनत रत्न भेंट लाएँ।”
पुरोहित का यह वचन सुनकर भरत शोक में डूब गए। धर्मज्ञ भरत ने मन-ही-मन श्रीराम का स्मरण किया, ताकि बड़े भाई का अधिकार छीनने के स्थान पर उनके सेवक बनकर रहने की सही राह मिले। हंस के समान स्वर में, अश्रु से रुँधे गले से उन युवा राजकुमार ने भरी सभा में विलाप किया और अनुचित सलाह के लिए पुरोहित को धिक्कारा, “जिन्होंने गुरु के घर में नियमपूर्वक ब्रह्मचर्य के साथ वेद पढ़े, विद्या समाप्त कर विधिवत् स्नान किया, और जो धर्म का पालन कर रहे हैं, ऐसे श्रीराम का राज्य मुझ-जैसा कौन समझदार पुरुष हड़पेगा? मैं दशरथ का पुत्र होकर अपने बड़े भाई के सिंहासन का अपहर्ता कैसे बनूँ, जबकि राज्य और मैं स्वयं भी श्रीराम के ही हैं? आप इस सभा में जो ठीक हो वही कहिए।
“श्रीराम हम सबमें ज्येष्ठ ही नहीं, श्रेष्ठ भी हैं। उनका मन धर्म में लगा है, और वे सूर्यवंश के दिलीप तथा चन्द्रवंश के नहुष के समान प्रभावशाली हैं। वे ही दशरथ के समान राज्य पाने योग्य हैं। यदि मैं बड़े भाई का अधिकार छीनने का यह पाप करूँ, जो केवल नीच पुरुष ही करते हैं और जो स्वर्ग नहीं देता, तो मैं इक्ष्वाकु-कुल का कलंक बन जाऊँगा। मेरी माता ने जो पाप किया है, मैं उसका अनुमोदन भी नहीं करता। इसीलिए यहाँ रहते हुए भी मैं हाथ जोड़कर दुर्गम वन में रहने वाले श्रीराम को प्रणाम करता हूँ। मैं श्रीराम का ही अनुसरण करूँगा, वे ही द्विपदों में श्रेष्ठ इस राज्य के स्वामी हैं। राघव तो तीनों लोकों के राज्य के योग्य हैं।”
धर्म से युक्त यह उत्तर सुनकर सब सभासदों ने हर्ष से आँसू बहाए, उनका मन श्रीराम में लीन था। भरत ने आगे कहा, “यदि मैं बड़े भाई को वन से लौटा न सका, तो मैं भी वहीं वन में, जैसे लक्ष्मण रह रहे हैं, वैसे ही रहूँगा। इन सब सज्जनों के समक्ष मैं उन्हें बलपूर्वक लौटाने के सब उपाय करूँगा। मार्ग ठीक करने वाले सब कुशल कारीगर मैंने पहले ही भेज दिए हैं, अतः वन-यात्रा ही मुझे रुचती है।” फिर भ्रातृवत्सल भरत ने पास खड़े मन्त्रणा-कुशल सुमन्त्र से कहा, “सुमन्त्र, उठकर मेरी आज्ञा से जाइए, शीघ्र यात्रा का आदेश दीजिए और सेना भी तैयार कराइए।”
सुमन्त्र अति प्रसन्न हुए और उन्होंने भरत के निर्देशानुसार सबको सूचित किया। प्रजाजन और सेनापति हर्षित हुए। योद्धाओं की पत्नियाँ श्रीराम-दर्शन की उत्कण्ठा में अपने-अपने घरों में पतियों को शीघ्रता के लिए प्रेरित करने लगीं। सेनापतियों ने मन के समान वेगवान् घोड़ों, बैलगाड़ियों और रथों से चलने का आदेश दिया। सेना को तैयार देखकर भरत ने पास खड़े सुमन्त्र से कहा, “मेरा रथ शीघ्र तैयार कराइए।” सुमन्त्र उत्तम घोड़ों से जुता रथ ले आए। श्रीराम को मनाकर लौटा लाने के संकल्प से भरत ने फिर कहा, “उठकर शीघ्र जाइए, सेना-नायकों से सेना को यात्रा के लिए सुसज्जित कराइए, क्योंकि मैं वन में रहने वाले श्रीराम को मनाकर जगत् के हित के लिए लौटा लाना चाहता हूँ।” तब घर-घर से क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र और ब्राह्मण उत्साह से उठ खड़े हुए और ऊँट, रथ, गधे, हाथी तथा कुलीन घोड़े यात्रा के लिए जोत दिए।
सार: वसिष्ठ ने भरत को पिता और भाई की दी हुई निष्कण्टक राजगद्दी स्वीकार करने का आग्रह किया, पर भरत ने उसे ठुकराकर प्रतिज्ञा की कि वे श्रीराम को वन से लौटाएँगे, और न लौटा सके तो स्वयं लक्ष्मण की भाँति वन में रहेंगे। सभा हर्ष के आँसुओं से भर उठी, और सुमन्त्र ने यात्रा के लिए सेना सजा दी।
गंगा-तट तक की यात्रा
अगली सुबह उठकर उत्तम रथ पर सवार होकर भरत श्रीराम-दर्शन की उत्कण्ठा से शीघ्र चल पड़े। सब मन्त्री और पुरोहित सूर्य-रथ के समान चमकीले रथों पर उनके आगे-आगे चले। नौ हजार हाथी विधिवत् सज्जित होकर इक्ष्वाकु-कुल के आनन्द भरत के पीछे चले। साठ हजार रथ, जिन पर भाँति-भाँति के अस्त्रधारी धनुर्धर सवार थे, यशस्वी राजकुमार के पीछे चले। एक लाख घुड़सवार-सहित घोड़े भरत के पीछे चले।
यशस्विनी कैकेयी, सुमित्रा और कौसल्या भी, जो श्रीराम को वन से लौटा लाने के विचार से प्रसन्न थीं, अलग-अलग सुन्दर रथों पर चढ़कर चलीं। द्विजवर्ग के समूह भी श्रीराम को लक्ष्मण और सीता-सहित देखने को प्रसन्न मन से चले, और उन्हीं की चर्चा करते हुए कहते जाते थे, “हम मेघ के समान श्याम, महाबाहु, स्थिरचित्त, दृढ़व्रत, जगत् के शोक को मिटाने वाले श्रीराम को कब देखेंगे? जैसे उदित होता सूर्य सारे जगत् का अन्धकार दूर करता है, वैसे ही दिखते ही राघव हमारा शोक हर लेंगे।” शुभ बातें करते, एक-दूसरे का आलिंगन करते वे चले। अयोध्या के सम्मानित और साधारण, सब अच्छे प्रजाजन श्रीराम से मिलने को निकल पड़े।
जो भी मणिकार, कुशल कुम्भकार, सूत-कर्म के जानकार बुनकर, शस्त्र-निर्माता, मोरपंख से पंखे बनाने वाले, करोंत से जीने वाले, मणि-मोती छेदने वाले, हाथीदाँत के काम करने वाले, चूना तैयार करने वाले, गन्ध-व्यापारी, प्रख्यात स्वर्णकार, कम्बल-बुनकर, स्नान कराने वाले, वैद्य, धूप जलाने वाले, मद्य बनाने वाले, धोबी, दर्जी, ग्राम-मुखिया और स्त्रियों-सहित नर्तक तथा केवट थे, सब इस यात्रा में जुड़ गए। ध्यान में लीन, वेदज्ञ, सदाचार के लिए सम्मानित ब्राह्मण भी सहस्रों की संख्या में बैलगाड़ियों पर भरत के पीछे चले। सुन्दर वेश में, पवित्र वस्त्र पहने, शरीर पर चन्दन और लाल पदार्थ लगाए, सब धीरे-धीरे भाँति-भाँति की सवारियों पर भरत के पीछे चले। हर्षित सेना भी अपने भ्रातृवत्सल भरत के पीछे चली।
रथों, पालकियों, घोड़ों और हाथियों से लम्बा रास्ता तय कर वे शृंगवेरपुर के पास गंगा-तट पर पहुँचे, जहाँ श्रीराम का मित्र वीर गुह अपने ज्ञातिजनों से घिरा सावधानी से उस क्षेत्र पर शासन करता था। चक्रवाक पक्षियों से सुशोभित गंगा-तट पर पहुँचकर भरत के पीछे चलती वह सेना ठहर गई। पुण्य जल वाली गंगा को और निश्चल सेना को देखकर वाक्य-कुशल भरत ने सब मन्त्रियों से कहा, “मेरी सेना सब ओर इच्छानुसार ठहर जाए। आज विश्राम कर कल हम इस समुद्रगामी नदी को पार करेंगे। इस बीच मैं नदी में उतरकर स्वर्गवासी पिता-सम्राट् को उनकी परलोक-शान्ति के लिए जल-तर्पण देना चाहता हूँ।” मन्त्रियों ने “तथास्तु” कहकर सेना को अलग-अलग टुकड़ियों में पड़ाव दिलाया। गंगा के तट पर सेना को व्यवस्थित ठहराकर भरत भी, श्रीराम को कैसे लौटाएँ इसी सोच में, रुक गए।
सार: नौ हजार हाथी, साठ हजार रथ, एक लाख घोड़े, तीनों रानियाँ, ब्राह्मण, कारीगर और प्रजा, सबको लेकर भरत श्रीराम-दर्शन की लालसा में शृंगवेरपुर के गंगा-तट तक पहुँचे, जहाँ गुह का राज्य था। वहीं उन्होंने सेना का पड़ाव लगवाया और पिता के तर्पण के लिए रुक गए।
गुह की शंका, गुह का आतिथ्य

गंगा-तट पर पड़ी इस सेना को देखते ही निषादराज गुह ने अपने पास बैठे ज्ञातिजनों से कहा, “यहाँ से यह विशाल सेना समुद्र-सी दिखती है। बहुत सोचने पर भी मुझे इसका अन्त नहीं दिखता। निश्चय ही दुर्बुद्धि भरत स्वयं आया है, क्योंकि रथ पर कोविदार-वृक्ष के चिह्न वाली वह विशाल ध्वजा दिख रही है। यदि इसका मन बुरा है, तो यह हमें जंजीरों में बाँधेगा या मार डालेगा, क्योंकि हम पिता द्वारा राज्य से निकाले गए दशरथ-पुत्र श्रीराम के भक्त हैं। उस राजा की दुर्लभ राजश्री पाने की इच्छा से कैकेयी-पुत्र भरत श्रीराम को मारने आ रहा है। श्रीराम मेरे स्वामी और मित्र हैं, अतः उनका हित चाहते हुए आप सब कवच पहने इस गंगा-तट पर डटे रहें। मेरे सब केवट सेना-सहित नदी की रक्षा करते हुए, नौकाओं में रखे मांस-कन्द-फल खाते रहें। पाँच सौ नौकाओं में से प्रत्येक पर कवचधारी सौ-सौ नौजवान मछुआरे रहें। यदि भरत श्रीराम के प्रति अनुकूल निकला, तो यह सेना आज गंगा पार कर लेगी।” यह कहकर गुह बतासे, फल-गूदा और मधु की भेंट लेकर भरत से मिलने चला।
उसे आता देखकर समयज्ञ सुमन्त्र ने विनम्र सेवक की भाँति भरत से कहा, “हजारों ज्ञातिजनों से घिरा यह स्थपति (मुखिया) गुह आ रहा है, जो आपके बड़े भाई श्रीराम का पुराना मित्र और दण्डक-वन का जानकार है। हे काकुत्स्थ, इसे अपने दर्शन दीजिए। निस्सन्देह यह जानता है कि श्रीराम और लक्ष्मण कहाँ हैं।” यह शुभ समाचार सुनकर भरत ने तुरन्त कहा, “गुह मुझसे मिले।” अनुमति पाकर अत्यन्त प्रसन्न गुह ने ज्ञातिजनों-सहित आकर विनम्रता से कहा, “यह प्रदेश आपके महल का उपवन ही है, और हम अनजाने में आपके स्वागत का अवसर खो बैठे। हम जो कुछ हमारा है आपको अर्पित करते हैं, आप अपने ही केवट के घर निवास कीजिए। यहाँ निषादों के स्वयं जुटाए हरे और सूखे कन्द-फल, फल-गूदा तथा भाँति-भाँति के जंगली अन्न हैं। मेरी आशा है कि सेना यहाँ अच्छी तरह भोजन कर रात बिताएगी, और आप भी भाँति-भाँति के भोग पाकर कल ही सेना-सहित प्रस्थान करेंगे।”
एक उप-कथा: गुह श्रीराम का वही निषादराज मित्र है जिसने वनवास के आरम्भ में, अयोध्याकाण्ड के पहले के सर्गों में, राम-लक्ष्मण-सीता को गंगा पार उतारा था। निषाद वनवासी मछुआरे और नाविक जाति के लोग हैं। इसीलिए भरत की विशाल सेना देखकर गुह को पहले शंका होती है कि कहीं भरत अपने भाई को हानि पहुँचाने तो नहीं आया, और वह बचाव की तैयारी कर लेता है। भरत के सच्चे मन को जानकर ही उसकी शंका मिटती है।
सार: इतनी बड़ी सेना देखकर निषादराज गुह को शंका हुई कि कहीं भरत श्रीराम को मारने तो नहीं आया, अतः उसने अपने केवटों को नौकाओं की रक्षा के लिए सजग कर दिया। फिर भेंट लेकर वह स्वयं भरत के मन की थाह लेने आया, और सादर आतिथ्य का प्रस्ताव रखा।
गुह की शंका मिटती है
महाप्राज्ञ भरत ने हृदय को छू लेने वाला सार्थक उत्तर दिया, “हे मेरे बड़े भाई के मित्र, आपने मेरी बड़ी इच्छा पूरी की, जो आप मेरी इतनी विशाल सेना का सत्कार करना चाहते हैं।” फिर मार्ग दिखाने का अनुरोध करते हुए भरत ने पूछा, “मैं किस मार्ग से भरद्वाज के आश्रम जाऊँ? गंगा के किनारे का यह प्रदेश वृक्षों से अत्यन्त सघन और दुर्गम है।” यह सुनकर वनों में विचरने वाले गुह ने हाथ जोड़कर कहा, “मेरे प्रदेश के जानकार सावधान केवट निश्चय ही आपके साथ चलेंगे, और मैं स्वयं भी आपके साथ चलूँगा, हे महाबल राजकुमार। पर कहीं आप अनायास-कर्मा श्रीराम के प्रति बुरे मन से तो नहीं जा रहे? आपकी यह विशाल सेना मेरे मन में शंका-सी जगाती है।”
आकाश के समान निर्मल हृदय वाले भरत ने मधुर वाणी में उत्तर दिया, “वह समय कभी न आए जब मुझमें ऐसी दुष्टता हो। आप मुझ पर शंका न कीजिए, क्योंकि वे राघव मेरे ज्येष्ठ भ्राता हैं और मेरे लिए पिता-तुल्य माननीय हैं। मैं वनवासी श्रीराम को लौटाने जा रहा हूँ, मेरा और कोई अभिप्राय नहीं, हे गुह, मैं आपसे सत्य कहता हूँ।” यह सुनकर गुह का मुख हर्ष से खिल उठा और उसने फिर कहा, “धन्य हैं आप! इस भूमण्डल पर मैं आपके समान किसी को नहीं देखता, जो बिना प्रयास मिले राज्य को त्यागना चाहते हैं। आपकी कीर्ति शाश्वत होकर लोकों में फैलेगी, क्योंकि आप विपत्ति में पड़े श्रीराम को लौटाना चाहते हैं।”
इस वार्तालाप के बीच सूर्य अपनी प्रभा खोकर अस्त हो गया और रात्रि आ गई। गुह से सान्त्वना पाकर श्रीमान् भरत सेना को पड़ाव दिलाकर शत्रुघ्न के साथ शय्या पर गए। पर निरपराध, धर्मनिष्ठ भरत को श्रीराम की चिन्ता से उपजा अनोखा शोक घेर लिया। जैसे वन को जलाने वाली आग से झुलसे वृक्ष को उसी की खोखल में छिपी आग भीतर-ही-भीतर जलाती है, वैसे ही पिता की मृत्यु के शोक से पहले से झुलसे भरत को श्रीराम की चिन्ता की आग भीतर जलाने लगी। जैसे सूर्य की किरणों से तपा हिमालय अपना हिम पिघलाकर बहाता है, वैसे ही शोकाग्नि से उपजा पसीना भरत के सब अंगों से बहने लगा। दुःख के विशाल पर्वत से दबे कैकेयी-पुत्र भरत, झुण्ड से बिछड़े बैल के समान, हृदय की पीड़ा से व्याकुल होकर शय्या पर शान्ति न पा सके। तब गुह ने उन अत्यन्त खिन्न भरत को उनके बड़े भाई के विषय में फिर सान्त्वना दी।
सार: भरत ने गुह के आतिथ्य का आभार माना और भरद्वाज के आश्रम का मार्ग पूछा। गुह ने अपनी शंका रखी, और भरत के निष्कपट उत्तर से उसका सन्देह मिट गया। रात आते ही भरत श्रीराम की चिन्ता में जलते रहे, और गुह बार-बार उन्हें सान्त्वना देता रहा।
गुह का वृत्तान्त: लक्ष्मण का जागरण
वनचर गुह ने अप्रमेय भरत को महात्मा लक्ष्मण के उत्तम भाव का वर्णन सुनाया, “जब लक्ष्मण उत्तम धनुष-बाण धारण किए अपने ज्येष्ठ भ्राता और भाभी की रक्षा में जाग रहे थे, तब मैंने कहा था, ‘हे तात, यह सुखद शय्या आपके लिए तैयार है, श्रीराम और सीता की रक्षा से निश्चिन्त होकर सुख से शयन कीजिए, हे राघव-नन्दन। हम सब सेवक कष्ट के अभ्यस्त हैं और आप सुख के योग्य हैं। श्रीराम की रक्षा के लिए हम जागेंगे। पृथ्वी पर मुझे श्रीराम से प्रिय कोई नहीं। उनकी कृपा से मैं इस लोक में महान् यश, विपुल धर्म तथा निष्कलंक अर्थ-काम की आशा करता हूँ। अतः मैं धनुष लेकर अपने सब ज्ञातिजनों के साथ अपने प्रिय मित्र श्रीराम की रक्षा करूँगा। इस वन में मुझसे कुछ अनजाना नहीं, यहाँ हम चतुरंगिणी सेना का भी सामना कर सकते हैं।’
“धर्म को ही देखने वाले महात्मा लक्ष्मण ने हम सबको विनम्रता से उत्तर दिया, ‘जब दशरथ-पुत्र श्रीराम सीता के साथ भूमि पर सो रहे हैं, तब मुझे नींद, जीवन या सुख कैसे भले लग सकते हैं? हे गुह, देखिए, जिन्हें सब देव-असुर मिलकर भी युद्ध में नहीं रोक सकते, वे तृणों पर सीता के साथ सोए हैं। महान् तपस्या और भाँति-भाँति के यज्ञों से प्राप्त दशरथ का यह अनुपम पुत्र भूमि पर पड़ा है। इनके वनवास से राजा अधिक नहीं जिएँगे और यह पृथ्वी शीघ्र ही विधवा हो जाएगी। सम्राट् की मृत्यु पर ऊँचा क्रन्दन कर स्त्रियाँ अब थककर चुप हो गई होंगी, और राजमहल का कोलाहल अब शान्त हो गया होगा। मुझे आशा नहीं कि माता कौसल्या, राजा और मेरी माता सुमित्रा इस रात तक भी जीवित रहेंगी। यदि मेरी माता शत्रुघ्न की प्रतीक्षा में जी भी गईं, तो श्रीराम-जैसे वीर को जन्म देने वाली दुःखिनी कौसल्या अवश्य प्राण त्याग देंगी।
“‘श्रीराम को राजगद्दी पर न बिठा पाने से, अपना चिर-संचित मनोरथ अधूरा छोड़, मेरे पिता “सब बीत गया” कहते हुए प्राण त्याग देंगे। जब इस वनवास का काल पूरा हो जाएगा, तब क्या मैं और सीता प्रतिज्ञा-पूर्ति करके सकुशल लौटे श्रीराम के साथ सुखी होकर अयोध्या लौटेंगे?’ इस प्रकार बैठे-बैठे विलाप करते महात्मा लक्ष्मण की वह रात बीत गई। निर्मल सूर्य के उदय होते ही दोनों भाइयों ने जटाएँ बनाईं, और इसी भागीरथी-तट पर मैंने उन्हें सीता-सहित सुख से पार उतारा। जटाधारी, वृक्षों की छाल पहने, उत्तम तरकश और धनुष धारण किए, चारों ओर का सौन्दर्य देखते वे दोनों गजराज-तुल्य परन्तप राजकुमार सीता के साथ चल दिए।”
सार: गुह ने भरत को बताया कि वनवास के आरम्भ में लक्ष्मण ने सोने से इनकार कर पूरी रात श्रीराम-सीता की रक्षा में बिताई और पिता तथा माताओं के लिए शोक में विलाप किया। प्रातःकाल दोनों भाइयों ने जटाएँ बनाईं और गुह ने उन्हें सीता-सहित गंगा पार उतार दिया।
जटाओं का समाचार सुनकर भरत मूर्च्छित
श्रीराम की जटाओं का यह अत्यन्त अप्रिय समाचार सुनकर भरत वहीं श्रीराम के ध्यान में डूब गए, यह सोचकर व्याकुल कि अब जटाधारी हुए श्रीराम शायद न लौटें। सुकुमार होते हुए भी महासत्त्व, सिंह-कन्धे वाले, महाबाहु, कमल-से विशाल नेत्रों वाले, युवा और प्रियदर्शन भरत, एक क्षण स्थिर रहकर, अंकुश से बिंधे हाथी के समान, सहसा अत्यन्त दुःखी होकर भूमि पर गिर पड़े। भरत को मूर्च्छित देखकर गुह का मुख विवर्ण हो गया और वह भूकम्प में काँपते वृक्ष-सा व्यथित हो उठा। पास खड़े शत्रुघ्न शोक से व्याकुल होकर अचेत भरत को गले लगाकर ऊँचे स्वर में रोने लगे।
तब भरत की सब माताएँ दौड़ी आईं, जो उपवास से कृश थीं और पति-वियोग से पीड़ित थीं। रोती हुई वे भूमि पर गिरे भरत को घेरकर खड़ी हो गईं। कौसल्या ने उनके पास जाकर दुःखी मन से उन्हें गले लगाया। जैसे गाय अपने बछड़े को, वैसे ही उस तपस्विनी ने भरत को छाती से लगाया और शोक में डूबकर रोते हुए पूछा, “पुत्र, कहीं आपके शरीर को कोई व्याधि तो नहीं सता रही? इस सारे राजकुल का जीवन आज आप ही पर टिका है। श्रीराम के भाई-सहित वन जाने और राजा दशरथ के स्वर्गवास के बाद आप ही को देखकर मैं जी रही हूँ, आज आप ही हमारे एकमात्र रक्षक हैं। पुत्र, कहीं आपने लक्ष्मण के विषय में, या मेरे इकलौते पुत्र राम के विषय में, जो पत्नी-सहित वन गया है, कोई अप्रिय समाचार तो नहीं सुना?”
एक क्षण में सँभलकर महायशस्वी भरत ने कौसल्या को आश्वस्त किया कि लक्ष्मण या श्रीराम के विषय में कुछ अप्रिय नहीं सुना, फिर रोते हुए गुह से बोले, “मेरे भाई रात कहाँ ठहरे? सीता कहाँ रहीं, लक्ष्मण कहाँ? किस शय्या पर और क्या खाकर उन्होंने विश्राम किया? यह मुझे बताइए, गुह।” निषादराज गुह ने प्रसन्न होकर बताया कि उन्होंने अपने प्रिय अतिथि के भोजन-शयन का कैसा प्रबन्ध किया था, “श्रीराम के भोजन के लिए मैं भाँति-भाँति का भात, चबाने योग्य अन्न और अनेक प्रकार के फल बहुत-से लाया था। सत्यपराक्रमी श्रीराम ने मेरी प्रसन्नता के लिए वह सब स्वीकार तो किया, पर क्षत्रिय-धर्म स्मरण कर ग्रहण नहीं किया, यह कहते हुए कि ‘मित्र, हम क्षत्रियों को दान लेना नहीं, देना ही उचित है।’ उन महात्मा ने इन शब्दों से हम सबको समझा दिया।
“लक्ष्मण के लाए जल को ही पीकर श्रीराम ने सीता-सहित उस दिन उपवास किया। फिर लक्ष्मण ने भी बचे जल से प्यास बुझाई। श्रीराम, लक्ष्मण और सुमन्त्र, तीनों ने मौन रहकर सन्ध्या-वन्दना की। उसके बाद लक्ष्मण ने स्वयं कुश लाकर शीघ्र श्रीराम के लिए पवित्र शय्या तैयार की। श्रीराम सीता-सहित उस शय्या पर बैठे, और दोनों के चरण धोकर लक्ष्मण थोड़ी दूर हट गए। यह वही इंगुदी-वृक्ष का मूल है, और ये वही कुश हैं जिन पर श्रीराम और सीता उस रात सोए थे। पीठ पर बाणों से भरे दो तरकश बाँधे, हाथों में दस्ताने पहने, महान् धनुष धारण किए परन्तप लक्ष्मण सारी रात अकेले श्रीराम के चारों ओर घूमते रहे। और मैं भी उत्तम धनुष-बाण लिए, अपने सजग ज्ञातिजनों के साथ, जहाँ लक्ष्मण घूम रहे थे वहीं डटा रहा, इन्द्र-तुल्य श्रीराम की रक्षा करता रहा।”
सार: श्रीराम के जटा धारण करने का समाचार सुनकर भरत मूर्च्छित होकर गिर पड़े। चेत आने पर कौसल्या ने आशंका से उन्हें गले लगाया, और भरत ने गुह से श्रीराम की रात्रि का वृत्तान्त पूछा। गुह ने बताया कि श्रीराम ने क्षत्रिय-धर्म से दान ठुकराया, उपवास कर कुश-शय्या पर सोए, और लक्ष्मण तथा गुह सारी रात पहरा देते रहे।
कुश-शय्या के सामने भरत का विलाप
सब ध्यान से सुनकर भरत मन्त्रियों-सहित इंगुदी-वृक्ष के मूल पर पहुँचे और श्रीराम की शय्या देखी। अपनी सब माताओं से उन्होंने कहा, “यहाँ उन महात्मा ने भूमि पर सोकर रात बिताई। ये वही कुश हैं जो उनके शरीर से मसले गए। महाराज दशरथ-जैसे महान् कुल में जन्मे श्रीराम बिना छाया, बिना सेज के भूमि पर सोने योग्य नहीं थे। जो पुरुष-व्याघ्र श्रेष्ठ गलीचों और मृगचर्म से ढकी शय्या पर सोते रहे, वे भूमि पर कैसे सोए होंगे? जो सोने-चाँदी की फर्श वाले, श्रेष्ठ गलीचों से सजे, मेरु-से ऊँचे सात-मंजिले प्रासादों में सोते थे, जिन्हें प्रतिदिन गीत-वाद्य और मधुर मृदंग-ध्वनि से जगाया जाता था, वे ही श्रीराम आज भूमि पर हैं।
“यह संसार में अविश्वसनीय है, मुझे सत्य नहीं लगता। मेरा मन भ्रमित है, मुझे यह स्वप्न-सा प्रतीत होता है। काल से बढ़कर कोई दैव नहीं, जिसके कारण दशरथ-पुत्र श्रीराम और प्रियदर्शना विदेहराज-कन्या सीता भूमि पर सोए। यह मेरे भाई की शय्या है, यहाँ करवटें बदलने के चिह्न हैं, जहाँ कठोर भूमि पर सब कुश उनके अंगों से मसले गए। जान पड़ता है कल्याणी सीता आभूषण पहने इस शय्या पर सोईं, क्योंकि यहाँ-वहाँ सोने के कण लगे दिख रहे हैं, और रेशमी धागे भी कुशों में अटके हैं। मुझे लगता है पति की शय्या, कठोर हो या कोमल, पतिव्रता को सुखद ही लगती है, तभी सुकुमार होकर भी मिथिला-राजकुमारी सीता इस कठोर शय्या पर कोई पीड़ा नहीं जानतीं।
“हाय, मैं मारा गया, मैं नृशंस हूँ कि मेरे कारण श्रीराम पत्नी-सहित ऐसी कठोर शय्या पर अनाथ-से सोए। सार्वभौम-कुल में जन्मे, सब लोकों को सुख देने वाले, सबका प्रिय करने वाले, नीलकमल-से श्याम, लाल नेत्रों वाले, प्रियदर्शन श्रीराम अपना अनुपम प्रिय राज्य छोड़कर भूमि पर कैसे सोए? धन्य और महाभाग हैं शुभलक्षण लक्ष्मण, जो इस विषम काल में अपने भाई का अनुसरण कर रहे हैं। सिद्धार्थ हैं वैदेही सीता, जो पति के साथ वन गईं। पर हम सब उन महात्मा से बिछड़कर संशय में पड़े हैं। पिता के स्वर्गवास और श्रीराम के वनगमन से यह पृथ्वी मुझे खेवैया-रहित नाव-सी सूनी लगती है। वन में बसे श्रीराम की भुजाओं के बल से रक्षित इस पृथ्वी पर कोई मन से भी अधिकार नहीं जताता।
“शत्रु अरक्षित, सूनी, बेसँभाली, अनढकी अयोध्या को भी, जिसकी रक्षा-दीवार बेपहरा है, हाथी-घोड़े स्वच्छन्द घूमते हैं और द्वार कभी बन्द नहीं होते, विषमिश्रित भोजन की भाँति अपनाना नहीं चाहते। आज से मैं भूमि या तृणों पर सोऊँगा, फल-मूल खाऊँगा, सिर पर जटा और देह पर वल्कल धारण करूँगा। शेष वनवास-काल मैं श्रीराम के प्रतिनिधि के रूप में वन में बिताऊँगा, ताकि मेरे आर्य की प्रसिद्ध प्रतिज्ञा झूठी न हो। जब मैं भाई के लिए वन में रहूँगा, तब शत्रुघ्न मेरे साथ रहेंगे और मेरे आर्य लक्ष्मण-सहित अयोध्या की रक्षा करेंगे। ब्राह्मण श्रीराम का अयोध्या में अभिषेक करेंगे, देवता मेरा यह सत्य मनोरथ पूरा करें। यदि सिर झुकाकर अनेक प्रकार से मनाने पर भी वे न लौटें, तो मैं वनचर राघव के साथ चिरकाल तक रहूँगा, वे मेरी उपेक्षा न कर सकेंगे।”
सार: कुश-शय्या देखकर भरत ने श्रीराम के राजसी वैभव से उसकी तुलना करते हुए विलाप किया, स्वयं को इस सबका दोषी माना, और लक्ष्मण तथा सीता की प्रशंसा की। उन्होंने संकल्प किया कि यदि श्रीराम न लौटें तो वे जटा-वल्कल धारण कर श्रीराम के प्रतिनिधि के रूप में वन में रहेंगे।
गंगा-पार और भरद्वाज-आश्रम की ओर
उसी गंगा-तट पर रात बिताकर, प्रातःकाल उठकर भरत ने शत्रुघ्न से कहा, “अब तक क्यों सो रहे हैं? उठिए शत्रुघ्न, आपका कल्याण हो, निषादराज गुह को शीघ्र बुलाइए, वह सेना को पार उतारेगा।” शत्रुघ्न ने उत्तर दिया, “मैं भी आपकी ही भाँति आर्य श्रीराम का चिन्तन करते हुए जाग रहा हूँ, सो नहीं रहा।” इन नरसिंहों की बातचीत के बीच ही गुह ने हाथ जोड़कर आकर कहा, “हे काकुत्स्थ, क्या आपने नदी-तट पर रात सुख से बिताई? आपकी सेना सदा निरोग रहे।”
श्रीराम के वशवर्ती भरत ने उत्तर दिया, “हे बुद्धिमान्, हमारी रात सुखद रही और आपने हमारा आदर किया। अब आपके केवट हमें अनेक नौकाओं से गंगा पार उतारें।” गुह तुरन्त नगर लौटकर अपने ज्ञातिजनों से बोला, “उठिए, जागिए, आपका सदा कल्याण हो, नौकाएँ तट पर खींच लाइए, मैं सेना को पार उतारूँगा।” राजाज्ञा से उठकर उन्होंने चारों ओर से पाँच सौ नौकाएँ और स्वस्तिक नाम की उत्तम नौकाएँ इकट्ठी कीं, जो ध्वजाओं से युक्त, केवटों से सुसज्जित, सुदृढ़ और बड़े घण्टों वाली थीं। गुह स्वयं श्वेत गलीचों से ढकी, उत्सव-वाद्य से शोभित एक स्वस्तिक-नौका ले आया।
उस पर भरत, महाबल शत्रुघ्न, कौसल्या, सुमित्रा और अन्य राजस्त्रियाँ चढ़ीं। पुरोहित वसिष्ठ और वृद्ध ब्राह्मण भरत तथा रानियों से पहले बैठे, उनके बाद अन्य राजस्त्रियाँ तथा बैलगाड़ियाँ और रसद अन्य नौकाओं पर लदीं। पड़ाव की झोपड़ियों में आग लगाने, घाट पर उतरने और बर्तन समेटने का कोलाहल आकाश तक उठा। ध्वजाओं वाली वे नौकाएँ केवटों के संचालन से सवारों को ले मानो स्वयं तीव्र गति से चलीं। कुछ स्त्रियों से, कुछ घोड़ों से, और कुछ बहुमूल्य रथों-गाड़ियों से भरी थीं। हाथी पीठ पर ध्वजाएँ लिए तैरते हुए मानो पंखों वाले पर्वत-से शोभायमान थे। कुछ लोग बेड़ों से, कुछ बड़े-छोटे घड़ों से, और कुछ केवल भुजाओं से तैरकर पार हुए।
स्वयं केवटों द्वारा पार उतारी गई वह पुण्य-सेना मैत्र-मुहूर्त में प्रयाग के निकट के उत्तम वन की ओर चली। दूसरे तट पर पहुँचकर सब लोगों को उतारकर, सेना को आश्वस्त कर, इच्छानुसार पड़ाव दिलाकर, महात्मा भरत पुरोहितों और मन्त्रियों के साथ ऋषिप्रवर भरद्वाज से मिलने चले। देवताओं के पुरोहित महात्मा भरद्वाज के आश्रम के निकट पहुँचकर भरत ने वह विस्तृत मनोहर वन देखा, जिसमें वृक्ष-समूहों के बीच पत्तों की रमणीय कुटियाँ थीं।
समझने की कुंजी: मैत्र-मुहूर्त, अर्थात् सूर्य-देव मित्र को समर्पित मुहूर्त। दिन में पन्द्रह मुहूर्त होते हैं और एक मुहूर्त लगभग 48 आधुनिक मिनट का होता है। बृहस्पति द्वारा बताए ये मुहूर्त क्रम से हैं: रौद्र, सार्प, मैत्र, पैत्र, वासव, आप्य, वैश्व, ब्राह्म, प्राज, ईश, ऐन्द्र, ऐन्द्राग्न, नैऋत, वारुणार्यमण और भगी।
सार: प्रातःकाल भरत और शत्रुघ्न एक-दूसरे को श्रीराम के ध्यान में जागते पाते हैं। गुह की पाँच सौ नौकाओं से सारी सेना, रानियाँ और रसद गंगा पार हुईं, और प्रयाग के पास पड़ाव डालकर भरत वसिष्ठ-सहित ऋषि भरद्वाज के आश्रम की ओर बढ़े।
भरद्वाज से भेंट
भरद्वाज के आश्रम से एक कोस की दूरी पर ही नरश्रेष्ठ भरत ने सब लोगों को रोककर मन्त्रियों के साथ आगे बढ़े। धर्मज्ञ भरत ने शस्त्र और आभूषण उतारकर, केवल रेशमी वस्त्र पहने, पुरोहित वसिष्ठ को आगे रखकर पैदल ही प्रस्थान किया। वसिष्ठ को देखते ही महातपस्वी भरद्वाज शीघ्र आसन से उठे और शिष्यों से अतिथि के लिए अर्घ्य लाने को कहा। वसिष्ठ से गले मिलकर और भरत से अभिवादन पाकर महातेजस्वी ऋषि ने जान लिया कि यह दशरथ का पुत्र है।
दोनों अतिथियों को क्रम से अर्घ्य, पाद्य और फल देकर धर्मज्ञ भरद्वाज ने कुल, अयोध्या, सेना, कोश, मित्र और मन्त्रियों के कुशल पूछे। दशरथ की मृत्यु जानते हुए उन्होंने राजा का कुशल नहीं पूछा। वसिष्ठ और भरत ने भी उनके शरीर, अग्नियों, शिष्यों, वृक्षों, मृगों और पक्षियों की कुशल पूछी। श्रीराम के प्रति स्नेह से बँधे भरद्वाज ने भरत से कहा, “अयोध्या का राज्य करते हुए आपका यहाँ आने का क्या प्रयोजन है? यह सब मुझे बताइए, क्योंकि मेरा मन निःशंक नहीं हो रहा। जिन महायशस्वी श्रीराम को कौसल्या ने जन्म दिया, जो पिता द्वारा स्त्री के निमित्त से चौदह वर्ष वनवास के लिए नियुक्त हुए और भाई तथा पत्नी-सहित वन गए, कहीं आप उन निरपराध श्रीराम और उनके अनुज लक्ष्मण का निष्कण्टक राज्य भोगने के लिए कोई अनिष्ट तो नहीं करना चाहते?”
यह सुनकर भरत ने दुःख से अश्रु बहाते, रुँधे स्वर में उत्तर दिया, “यदि सर्वज्ञ भगवान् भी मुझे ऐसा मानें तो मैं मारा गया। मुझसे श्रीराम को कोई हानि होने की कल्पना भी नहीं की जा सकती, अतः आप मुझे ऐसी कठोर बात न कहें। मेरी अनुपस्थिति में मेरी माता ने जो कहा वह मुझे न इष्ट है, न मैं उससे प्रसन्न हूँ, न मैंने उसका वचन स्वीकार किया है। मैं तो उन नरव्याघ्र श्रीराम को मनाकर अयोध्या लौटाने और उनके चरणों में प्रणाम करने आया हूँ। ऐसा जानकर आप मुझ पर कृपा कीजिए, और बताइए कि सम्राट् राम इस समय कहाँ हैं।”
वसिष्ठादि ऋषियों से प्रार्थित होकर भरद्वाज ने प्रसन्नता से कहा, “हे पुरुष-व्याघ्र, रघुवंशी, गुरु-सेवा, संयम और सत्पुरुषों के मार्ग पर चलना, यह आपके योग्य ही है। मैं अपनी योगशक्ति से आपके मन को पहले ही जानता था, फिर भी आपका संकल्प दृढ़ करने और कीर्ति बढ़ाने को मैंने पूछा। मैं धर्मज्ञ श्रीराम को जानता हूँ, जो सीता और लक्ष्मण-सहित इस समय महान् चित्रकूट पर्वत पर रह रहे हैं। आप कल वहाँ अवश्य जाइए, पर आज मन्त्रियों-सहित यहीं ठहरिए। हे सुप्राज्ञ, मेरी यह इच्छा पूरी कीजिए।” विशाल हृदय वाले, अब श्रीराम-भक्त के रूप में पहचाने गए भरत ने “ऐसा ही हो” कहकर उस रात आश्रम में ठहरने का निश्चय किया।
सार: भरत सेना को पीछे छोड़, शस्त्र-आभूषण उतारकर वसिष्ठ के साथ भरद्वाज के आश्रम में पहुँचे। भरद्वाज ने परीक्षा के लिए पूछा कि कहीं भरत श्रीराम का अनिष्ट तो नहीं चाहते, और भरत ने पश्चात्ताप-भरे शब्दों में अपना सच्चा मन प्रकट किया। ऋषि ने श्रीराम का स्थान चित्रकूट बताकर भरत को उस रात आश्रम में रुकने को कहा।
भरद्वाज का अलौकिक आतिथ्य
ऋषि ने रात रुकने का निश्चय कर चुके कैकेयी-पुत्र भरत को आतिथ्य के लिए आमन्त्रित किया। भरत ने हाथ जोड़कर कहा, “अर्घ्य, पाद्य, फल-मूल के रूप में जो आतिथ्य वन में सम्भव था, वह तो आपने अभी कर दिया।” भरद्वाज ने मानो हँसते हुए कहा, “मैं जानता हूँ आप मुझ पर प्रेम रखते हैं और किसी भी भेंट से सन्तुष्ट हो जाएँगे। पर मैं तो आपकी इस सारी सेना को भोजन कराना चाहता हूँ। आपने सेना को दूर क्यों ठहराया, सबको साथ क्यों नहीं लाए?” भरत ने उत्तर दिया, “भगवन्, आपके भय से ही मैं सेना सहित नहीं आया। राजा या राजकुमार को तपस्वियों के क्षेत्र से दूरी रखनी चाहिए, कहीं वृक्ष, जल, भूमि और कुटियाँ नष्ट न हो जाएँ, इसीलिए मैं अकेला आया।” ऋषि ने आज्ञा दी, “सेना यहाँ ले आई जाए।” भरत ने वैसा ही किया।
अग्निशाला में जाकर, आचमन कर, होंठ पोंछकर भरद्वाज ने आतिथ्य के लिए देव-शिल्पी विश्वकर्मा का आवाहन किया। फिर उन्होंने त्वष्टा को, इन्द्र-प्रमुख तीन लोकपालों (यम, वरुण, कुबेर) को आमन्त्रित किया। उन्होंने सब पूर्व-पश्चिम बहने वाली नदियों को बुलाया, जिनमें कुछ मैरेय और सुरा (मद्य के प्रकार) और कुछ ईख-रस-सा शीतल जल बहाएँ। विश्वावसु, हाहा, हूहू गन्धर्वों और सब अप्सराओं को आमन्त्रित किया, घृताची, विश्वाची, मिश्रकेशी, अलम्बुषा, नागदत्ता, हेमा और सोमा को, तथा इन्द्र और ब्रह्मा की सेवा में रहने वाली सब अप्सराओं को गुरु तुम्बुरु-सहित बुलाया। उन्होंने उत्तर कुरु के दिव्य चैत्ररथ-वन को, सोम-देव से उत्तम भोज्य-भोग्य-चोष्य-लेह्य अन्न को, और भाँति-भाँति की मालाओं, पेय तथा मांस को मँगाया। शिक्षा और स्वर के अनुसार उच्चारित इस आवाहन से समाधि-युक्त, अप्रतिम-तेजस्वी मुनि ने मानो स्वर्ग को ही उतार लाया।
आवाहन की वह दिव्य ध्वनि स्वर्ग, पृथ्वी और प्राणियों के कानों में गूँज उठी। आमन्त्रित देवता एक-एक कर आए। मलय-दर्दुर पर्वतों को छूती सुखद शीतल वायु बही। आकाश से दिव्य पुष्प-वृष्टि हुई और देवदुन्दुभि बजी, अप्सराएँ नाचीं और गन्धर्व गाने लगे। चालीस मील के घेरे की भूमि समतल होकर नीलमणि-सी हरी घास से ढक गई। बेल, कैथ, कटहल, बिजौरा, आँवला और आम फलों से लदे, चैत्ररथ-वन और सौम्य नदी प्रकट हुई। चार कमरों वाले श्वेत भवन, हाथी-घोड़ों के अस्तबल, और श्वेत मेघ-से दिव्य गन्ध से सने राजमहल खड़े हो गए। भरत ने राजसिंहासन को श्रीराम के समान मानकर प्रणाम किया, चँवर लेकर मन्त्री के आसन पर बैठे। सब मन्त्री-पुरोहित क्रम से बैठे।
थोड़ी देर में दूध-भात की नदियाँ बहीं, दोनों तट पर चूना-पुते दिव्य भवन उठ खड़े हुए। ब्रह्मा की भेजी बीस हजार स्त्रियाँ, कुबेर की भेजी बीस हजार रत्न-भूषित स्त्रियाँ, और नन्दन-वन से बीस हजार अप्सराएँ आईं, जिनके आलिंगन से पुरुष मानो उन्मत्त-सा हो जाता था। नारद, तुम्बुरु और गोप गन्धर्वराज भरत के सामने गाने लगे। अलम्बुषा, मिश्रकेशी, पुण्डरीका और वामना नृत्य करने लगीं। बेल-वृक्ष मृदंग बजाने लगे, बहेड़े झाँझ, और पीपल नर्तक बने। देवदार, ताड़, तिलक और तमाल कुब्ज और बौने बनकर सेवा को आए। शिंशपा, आँवला, जामुन, मालती, मल्लिका और जाति लताएँ युवतियों का रूप धरकर सेवा में लगीं।
स्त्रियों ने सैनिकों को कहा, “मद्यपान करने वाले सुरा पिएँ, भूखे दूध-भात खाएँ, जिसे जो चाहिए वही मिलेगा।” सात-आठ युवतियाँ हर पुरुष को सुगन्धित उबटन लगाकर सुन्दर तटों पर नहलातीं, पैर दबातीं और एकान्त में स्वादिष्ट पेय पिलातीं। पशुपालकों ने घोड़े, हाथी, गधे, ऊँट और बैलों को योग्य भोजन खिलाया, ईख और मधु-मिश्रित लावा दिया। सेना मतवाली-सी हो गई, घुड़साल वाला अपना घोड़ा और महावत अपना हाथी पहचान न सका। सब भोग पाकर, रक्तचन्दन लगाए, अप्सराओं से घिरे सैनिक बोले, “अब न अयोध्या जाएँगे, न दण्डक, भरत का और श्रीराम का कल्याण हो।” पैदल, घुड़सवार, महावत, सब मानो स्वतन्त्र होकर “यह तो स्वर्ग है” कहते हुए नाचने-गाने लगे।
हजारों सोने के बर्तन, लाखों स्वर्ण-कड़ाह, करोड़ों स्वर्ण-पात्र भात और व्यंजनों से भरे दिखे। वन-कूप दूध-भात में बदल गए, गायें कामधेनु बनीं, वृक्ष मधु टपकाने लगे। बड़े कूप मैरेय से भर गए और दाँव-तटों पर मृग, मोर, मुर्गे का स्वादिष्ट मांस सजा। दही, मट्ठा, दूध और शक्कर के ढेर लगे। घाटों पर स्नान के तेल, गरम जल, चन्दन-लेप, दातौन, दर्पण, वस्त्र, खड़ाऊँ-जूते, कंघे, छाते, धनुष, कवच और शय्या-आसन रखे थे। पेय जल के कुण्ड और स्वच्छ-जल वाले कमल-कुण्ड भी थे। किसी ने मलिन, भूखा या धूल-धूसरित पुरुष वहाँ न देखा। उस स्वप्न-तुल्य अद्भुत आतिथ्य से सब विस्मित थे। नन्दन-वन में देवताओं की भाँति आनन्द मनाते उन लोगों की वह रात बीत गई। प्रातःकाल नदियाँ, गन्धर्व और अप्सराएँ भरद्वाज की अनुमति लेकर लौट गईं, पर लोग अब भी मद्य से उल्लसित, चन्दन-लेप किए, और दिव्य मालाओं से सजे रहे।
एक उप-कथा: वाल्मीकि की परम्परा में ऋषि का तप ऐसी सिद्धि देता है कि वे संकल्पमात्र से देवलोक का वैभव पृथ्वी पर बुला सकते हैं। यहाँ भरद्वाज अग्निहोत्री ब्राह्मण के रूप में, बृहस्पति के पुत्र होने के कारण देवों के पुरोहित कहे गए हैं। एक स्मृति-वचन के अनुसार जन्म से सब शूद्र होते हैं, ब्राह्मण-वृत्ति से द्विज, वेदाभ्यास से विप्र, और ब्रह्म को जानने पर ही पुरुष यथार्थ ब्राह्मण कहलाता है। यह आतिथ्य-प्रसंग ऋषि-तप की उसी पराकाष्ठा को दर्शाता है, जो किसी सार्वभौम सम्राट् के बस की बात भी नहीं।
सार: भरद्वाज ने अपने तप-बल से विश्वकर्मा, लोकपालों, नदियों, गन्धर्वों और अप्सराओं का आवाहन कर भरत की सारी सेना के लिए ऐसा अलौकिक आतिथ्य रचा, जो स्वर्ग-तुल्य था। दूध-भात की नदियाँ, सोने के भवन, दिव्य भोजन और अप्सराओं की सेवा पाकर सैनिकों को लगा कि यही स्वर्ग है, और वह रात आनन्द में बीत गई।
माताओं का परिचय, चित्रकूट की ओर प्रस्थान
परिवार-सहित आश्रम में रात बिताकर, आतिथ्य पाकर, भरत चित्रकूट की ओर बढ़ने की अनुमति लेने भरद्वाज के पास आए। हाथ जोड़े आते उस पुरुष-व्याघ्र को देखकर अग्निहोत्र-हवन कर चुके भरद्वाज ने पूछा, “हे निष्पाप, क्या हमारे इस आश्रम में आपकी रात सुख से बीती? आपके सब लोग आतिथ्य से सन्तुष्ट हुए?” भरत ने प्रणाम कर कहा, “भगवन्, सम्पूर्ण सेना और वाहनों-सहित मैं सुख से रहा, और आपने मुझे भलीभाँति तृप्त किया। सेवकों तक सब, थकान और कष्ट से मुक्त होकर, उत्तम भवनों में अति सुख से रहे। अब मैं आपसे विदा माँगता हूँ, हे ऋषिसत्तम। बड़े भाई के पास जाते मुझे मैत्रीपूर्ण दृष्टि से देखिए। उन धार्मिक महात्मा का आश्रम किस मार्ग से और कितनी दूर है, यह मुझे बताइए।”
भरद्वाज ने उत्तर दिया, “यहाँ से ढाई योजन दूर, तपस्वियों के अतिरिक्त किसी मनुष्य से रहित वन में, रमणीय झरनों-कुंजों से युक्त चित्रकूट नामक प्रसिद्ध पर्वत है। उसके उत्तर में पुष्पित वृक्षों से ढकी मन्दाकिनी नदी बहती है। उस नदी और चित्रकूट पर्वत के निकट दोनों भाइयों की पत्ती की कुटिया है, वहीं वे निश्चय ही रहते हैं। हे सेनापति, दक्षिण मार्ग से, बाईं ओर मुड़कर हाथी-घोड़ों से भरी सेना ले चलिए, वहाँ आप राघव को देखेंगे।” चित्रकूट-यात्रा की बात सुनकर सम्राट् की रानियाँ रथ छोड़कर ब्राह्मण भरद्वाज को घेरकर खड़ी हो गईं।
वृद्धावस्था और शोक से काँपती, पति-वियोग और श्रीराम-वियोग से कृश कौसल्या ने रानी सुमित्रा-सहित दोनों हाथों से मुनि के चरण पकड़े। पुत्र को युवराज न बना पाने से लोक-निन्दित कैकेयी ने भी लज्जा से ऋषि के चरण छुए। ऋषि की प्रदक्षिणा कर वह खिन्न मन से भरत के समीप ही खड़ी रही। तब महामुनि भरद्वाज ने पूछा, “हे राघव, मैं आपकी माताओं के विषय में विशेष जानना चाहता हूँ।” वाक्य-कुशल धार्मिक भरत ने हाथ जोड़कर कहा, “भगवन्, जिन देवी को आप यहाँ शोक और उपवास से कृश, दीन देख रहे हैं, ये मेरे पिता की पटरानी कौसल्या हैं, जिन्होंने सिंह-सी चाल वाले उन पुरुष-व्याघ्र श्रीराम को वैसे ही जन्म दिया जैसे अदिति ने उपेन्द्र को। इनकी बाईं भुजा से सटी, करणिकार की झड़े-फूल वाली शाखा-सी, यह दुःखार्ता देवी सुमित्रा हैं, राजा की मध्यम रानी, जिनके देवरूप दो पुत्र वीर सत्यपराक्रमी लक्ष्मण और शत्रुघ्न हैं।
“और हे भरत, यह क्रोधी, अदूरदर्शी, घमण्डी, स्वयं को सुन्दर मानने वाली, ऐश्वर्य की लोभी, बाहर से आर्य पर भीतर से अनार्य कैकेयी मेरी माता है। इसे नृशंस और पापनिश्चयी जानिए, क्योंकि इसी के कारण नरव्याघ्र श्रीराम और लक्ष्मण को विपत्ति-भरा वनवास मिला, पुत्रहीन राजा दशरथ स्वर्ग सिधारे, और मैं इसी को अपने महान् कष्ट का मूल देखता हूँ।” आँसुओं से रुँधे स्वर में, क्रोध और शोक से लाल नेत्रों वाले भरत क्रुद्ध सर्प-से फुफकारने लगे। महाबुद्धि भरद्वाज ने कहा, “हे भरत, कैकेयी को आप दोषी न मानें, क्योंकि श्रीराम का यह वनवास सबके सुख का कारण बनेगा। देव, असुर और भावित-आत्मा ऋषि, सबका कल्याण ही श्रीराम के वनवास से होगा।”
ऋषि का अभिवादन और प्रदक्षिणा कर, विदा लेकर, अपना अभीष्ट सिद्ध कर भरत ने सेना को आज्ञा दी, “यात्रा की तैयारी हो।” सोने से सजे दिव्य घोड़ों के रथ जोतकर भाँति-भाँति के लोग चढ़े। सोने की झूल और ध्वजाओं वाले हाथी-हथिनियाँ ग्रीष्मान्त के गरजते मेघ-से चले। बड़े-छोटे बहुमूल्य वाहनों पर लोग चले, पैदल वाले पैदल। कौसल्या-प्रमुख रानियाँ श्रीराम-दर्शन की लालसा में उत्तम रथों पर हर्षित होकर चलीं। श्रीमान् भरत मध्याह्न-सूर्य और पूर्ण-चन्द्र-सी प्रभा वाली शुभ पालकी पर चढ़कर चले। हाथी-घोड़ों से भरी वह विशाल सेना दक्षिण दिशा को घेरते महामेघ-सी प्रस्थान कर गई, और गंगा के दक्षिण-तट के पार वन-पर्वत-नदियाँ लाँघती, मृग-पक्षियों को त्रास देती चित्रकूट के विशाल वन में प्रवेश करती शोभायमान हुई।
सार: भरद्वाज ने पूछने पर भरत ने अपनी तीनों माताओं, कौसल्या, सुमित्रा और कैकेयी, का परिचय दिया, कैकेयी को कठोर शब्दों में अपने कष्ट का मूल बताया। ऋषि ने कहा कि श्रीराम का वनवास सबके कल्याण का कारण बनेगा। फिर भरत ढाई योजन दूर चित्रकूट की ओर रानियों और सेना-सहित प्रस्थान कर गए।
मूल: श्रीमद्वाल्मीकि-रामायण, अयोध्याकाण्ड, सर्ग 65-119; पाठान्तर में गीता प्रेस का क्रम रखा गया है।
आधार: वाल्मीकि रामायण (गीता प्रेस, गोरखपुर)