अध्याय 5 · परशुराम व अयोध्या-वापसी

वाल्मीकि रामायण · बालकाण्ड
परशुराम व अयोध्या-वापसी · सर्ग 74 से 77

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विवाह की मंगल-वेला बीत चुकी थी, और मिथिला से लौटने का समय आया। विश्वामित्र राजाओं से विदा ले कर अपने मार्ग पर बढ़े; दशरथ अपने पुत्रों और नववधुओं को साथ ले कर अयोध्या की ओर चले। पर मार्ग में ही, धूल और अन्धकार के एक भयानक झोंके के बीच, क्षत्रियों के उस चिर-शत्रु से उनका सामना होना था, जिसके कन्धे पर परशु धरा था और जिसके भीतर इक्कीस बार पृथ्वी को नक्षत्रियाणी कर देने वाला रोष अभी सुलगता था। यहीं से वह घटना आरम्भ होती है, जिसमें राम का दिव्य स्वरूप पहली बार सब देवों और ऋषियों के सम्मुख प्रकट हुआ।

विदा, दहेज और लौटती बारात

रात बीतने पर महामुनि विश्वामित्र ने दोनों राजाओं, जनक और दशरथ, से अनुमति ले कर सीधा उत्तर की ओर, हिमालय पर्वत की ओर प्रस्थान किया। विश्वामित्र के जाते ही, विदेहों के अधिपति मिथिलानरेश जनक से विदा माँग कर, यशस्वी राजा दशरथ भी तुरन्त अपनी राजधानी की ओर चल पड़े।

उस अवसर पर विदेह-देश के अधिपति जनक ने अपनी पुत्रियों को विपुल कन्या-धन (दहेज) दिया। मिथिलानरेश ने अनेक लाख गौएँ दीं, उतने ही श्रेष्ठ कम्बल, असंख्य रेशमी वस्त्र, और एक करोड़ सूती वस्त्र; हाथी, घोड़े, रथ और पैदल सैनिक; अपनी पुत्रियों की संगिनी बनने योग्य दिव्य रूप वाली, भली प्रकार सजी 100 दासियाँ; उत्तम दास और दासियाँ; तथा बहुत-सी चाँदी, सोना, मोती और मूँगा। अत्यन्त प्रसन्न मन से यह उत्तम कन्या-धन दे कर, और दशरथ से विधिपूर्वक विदा ले कर, मिथिलानरेश अपनी नगरी मिथिला को लौट गए।

समझने की कुंजी (कन्या-धन के अंक): ये संख्याएँ पुरातन काव्य की वैभव-गणना हैं, अक्षरशः नहीं तौलनी चाहिए। “एक करोड़ सूती वस्त्र” का अर्थ है अगणित, पैमाने पर “करोड़ों”; “अनेक लाख गौएँ” का अर्थ है गौ-सम्पदा का सागर। प्राचीन भारत में किसी राजा का बल उसकी गौ-संख्या, अश्व-गज की सेना और दान की उदारता से ही आँका जाता था, इसी से वाल्मीकि इन अंकों को बढ़ा-चढ़ा कर रखते हैं।

आगे-आगे उन सब ऋषियों को रखकर, जो मिथिला तक उनके साथ आए थे, और अपनी सेना तथा परिजनों के साथ अयोध्यापति दशरथ अपने महात्मा पुत्रों के साथ अयोध्या की ओर बढ़े। नरश्रेष्ठ दशरथ ज्यों ही ऋषि-समूह और अपने चारों रघुवंशी पुत्रों के साथ मार्ग में चले, त्यों ही उनके चारों ओर भयानक पक्षी कर्कश शब्द करने लगे; और दूसरी ओर भूमि के सब मृग उनके मार्ग को बाईं ओर से काटते हुए निकलने लगे।

इन अपशकुनों को देख कर राजाओं में सिंह दशरथ ने आदर से वसिष्ठ से पूछा कि एक ओर ये अमंगलकारी पक्षी चीख रहे हैं, जो किसी घोर अनिष्ट का संकेत है; और उसी समय मृग मेरे मार्ग को बाईं ओर से काट रहे हैं, जो शुभ शकुन है। यह क्या है, जो मेरे हृदय को कँपा रहा है? मेरा मन व्याकुल हो उठा है। दशरथ का यह प्रश्न सुन कर महर्षि वसिष्ठ ने मधुर वाणी में कहा कि सुनिए, इसका फल क्या है। आकाश में चीखते पक्षियों का संकेत यह है कि कोई घोर भय निकट आ खड़ा हुआ है। किन्तु ये मृग उस भय को शान्त कर देते हैं; अतः इस चिन्ता को त्याग दीजिए।

सार: मिथिला से सम्पूर्ण दहेज ले कर बारात अयोध्या लौटती है, पर मार्ग में पक्षियों के अपशकुन और मृगों के शुभ शकुन साथ-साथ उठते हैं, मानो कोई भय आ कर भी टल जाने वाला हो।

आँधी, अन्धकार और परशुराम का प्रकट होना

वे मार्ग में यों बातें कर ही रहे थे कि एक प्रचण्ड आँधी उठी, जिसने सारी पृथ्वी को कँपा दिया और बड़े-बड़े वृक्षों को धराशायी कर दिया। सूर्य अन्धकार से ढक गया, और किसी को दिशाओं का बोध न रहा। राख-सी धूल से सब कुछ आच्छन्न हो गया, और दशरथ की वह सेना मानो मूर्च्छित-सी हो गई। उस समय केवल वसिष्ठ, अन्य ऋषिगण, तथा राजा अपने चारों पुत्रों सहित सचेत रहे; शेष सब उस स्थान पर मानो संज्ञाहीन हो गए।

परशुराम धनुष लिए क्रोध में आगे बढ़ते हुए, सामने राम, लक्ष्मण, ऋषि और हाथ जोड़े घुटनों पर बैठे राजा दशरथ।

उस घोर अन्धकार में, धूल से ढकी उस सेना और राजा ने एक भयंकर रूप वाले तपस्वी को देखा, जो जमदग्नि के पुत्र, भृगु-वंश में उत्पन्न, क्षत्रियों के संहारक परशुराम थे। वे सिर पर जटाओं का मुकुट धारण किए हुए थे, कैलास पर्वत के समान दुर्धर्ष (जिस पर चढ़ना दुष्कर हो), प्रलयकाल की कालाग्नि के समान दुःसह, तेज से जलते-से, और साधारण जनों के लिए जिनकी ओर आँख उठाना तक कठिन हो। दाहिने कन्धे पर परशु (कुल्हाड़ा) और बाएँ कन्धे पर धनुष लिए, और हाथ में बिजली की रेखाओं-सा एक उग्र बाण धारण किए, वे त्रिपुर-संहारक भगवान् शिव के समान प्रतीत हो रहे थे।

एक उप-कथा: भृगु ऋषि के वंश में ऋचीक हुए, उनके पुत्र जमदग्नि, और जमदग्नि के पुत्र राम, जो परशु (कुल्हाड़े) के धारण से परशुराम कहलाए। हैहयवंशी सहस्रबाहु अर्जुन ने उनके पिता जमदग्नि का वध कर दिया था; उसी का प्रतिशोध लेने के लिए परशुराम ने इक्कीस बार पृथ्वी को क्षत्रिय-रहित किया, ऐसा बाद की परम्परा भी विस्तार से कहती है। भृगु-वंश के होने से उन्हें भार्गव, और जमदग्नि के पुत्र होने से जामदग्न्य भी कहते हैं।

वृद्ध ऋषि स्वर्ण कलश से परशुराम के हाथों पर जल अर्पित करते हुए, पास घुटनों पर बैठे दशरथ प्रार्थना करते हैं।

अग्नि के समान जलते उस भयंकर रूप वाले तपस्वी को देख कर, वसिष्ठ-प्रमुख जप और होम में लगे रहने वाले सब ब्राह्मण-ऋषि एक स्थान पर एकत्र हो कर आपस में बातें करने लगे कि कहीं अपने पिता के वध के क्रोध में भर कर यह फिर से क्षत्रिय-कुल को तो नष्ट नहीं कर देंगे। यह तो उनका अभिप्राय नहीं प्रतीत होता कि वे क्षत्रियों को फिर मिटाएँ, क्योंकि पहले क्षत्रियों का संहार कर के उनका क्रोध शान्त हो चुका है और पिता के वध का सन्ताप भी मिट चुका है। यों बातें करते हुए, उन ऋषियों ने हाथ धोने के लिए अर्घ्य-जल ले कर, भयंकर दर्शन वाले उस भार्गव का “राम, हे राम!” कह कर मधुर वचनों से स्वागत किया।

ऋषियों के दिए उस सत्कार को स्वीकार करते हुए, प्रतापी जमदग्नि-पुत्र परशुराम ने अग्नि-से जलते अपने भयंकर रूप के साथ, दशरथ के ज्येष्ठ पुत्र श्रीराम से वचन कहना आरम्भ किया।

सार: प्रलय-सी आँधी और अन्धकार में भृगुवंशी परशुराम परशु और धनुष लिए प्रकट होते हैं; ऋषि उन्हें शान्त करने को सत्कार करते हैं, और वे सीधे राम को सम्बोधित करने लगते हैं।

परशुराम की चुनौती और दशरथ की प्रार्थना

परशुराम विशाल स्वर्णिम धनुष उठाकर राम के सम्मुख प्रस्तुत करते हुए, पास दशरथ हाथ जोड़े विनती करते हैं।

परशुराम ने कहा कि हे दशरथ-पुत्र राम, हे वीर, आपका पराक्रम अद्भुत सुना जाता है, और शिव के धनुष को तोड़ने का आपका वह पराक्रम भी मैंने पूरे विस्तार से सुना है। धनुष को इस प्रकार तोड़ देना सचमुच अद्भुत है, और दूसरों की कल्पना से भी परे है। उसे सुन कर ही मैं एक दूसरा श्रेष्ठ धनुष ले कर यहाँ आया हूँ। यह जमदग्नि का घोर रूप वाला महान् धनुष है; इसे बाण से सज्जित कर के, खींच कर, अपना बल दिखाइए। इस धनुष को भी पूर्ण रूप से खींचने में आपका वह बल देख कर मैं आपको ऐसा द्वन्द्व-युद्ध दूँगा, जो आपके पराक्रम का गौरव बढ़ाएगा।

समझने की कुंजी (द्वन्द्व-युद्ध और क्षत्रिय-धर्म): द्वन्द्व-युद्ध एक-के-विरुद्ध-एक की वीरोचित ललकार है। क्षत्रिय-धर्म में यह विधान है कि धर्मसंगत कारण से दी गई योद्धा की ऐसी ललकार को स्वीकार करना ही उचित है; यही कारण है कि आगे राम भी इसे “क्षत्रिय-धर्म को सर्वोपरि रख कर” स्वीकार करते हैं।

राजा दशरथ घुटनों पर हाथ फैलाकर राम की रक्षा की विनती करते हुए, सामने फरसाधारी परशुराम खड़े हैं।

परशुराम का यह चुनौती-भरा वचन सुन कर राजा दशरथ अत्यन्त दुखी हुए, और मलिन मुख से, हाथ जोड़ कर बोले कि आप क्षत्रियों के प्रति अपना क्रोध त्याग कर अब परम शान्त हो चुके हैं; ब्राह्मण और महान् तपस्वी होते हुए आपको मेरे इन बालक पुत्रों को अभय-दान देना चाहिए। वेदों के स्वाध्याय और पवित्र व्रतों के लिए विख्यात भार्गव-वंश में आप उत्पन्न हुए हैं; आपने इन्द्र (सहस्राक्ष) के समक्ष वचन दे कर शस्त्र त्याग दिए थे। धर्मपरायण हो कर आपने कश्यप को सारी पृथ्वी दान कर दी और वन में जा कर महेन्द्र पर्वत पर अपना निवास बना लिया। हे महामुनि, अब क्या आप मेरे सम्पूर्ण विनाश के लिए ही यहाँ आ पधारे हैं? यदि आपके हाथों केवल राम भी मारा गया, तो हम सब के सब जीवित न रह सकेंगे।

दशरथ के यों प्रार्थना करते रहने पर भी, उनके वचन की कुछ भी अवहेलना (उपेक्षा) करते हुए, प्रतापी जमदग्नि-पुत्र राम से ही सम्बोधित करते रहे।

सार: परशुराम राम को विष्णु के धनुष पर बाण चढ़ा कर बल दिखाने की ललकार देते हैं; दशरथ अपने बालक पुत्रों के लिए गिड़गिड़ाते हैं, पर परशुराम उनकी अनसुनी कर के राम से ही बात करते रहते हैं।

दो धनुषों की कथा: शिव और विष्णु

आकाश में दो दिव्य धनुषों का तेजोमय दर्शन, नीचे परशुराम उँगली उठाकर राम को उनकी कथा बताते हुए।

परशुराम ने कहा कि ये दोनों श्रेष्ठ, दिव्य, लोक-पूजित, सुदृढ़, बलवान् धनुष विश्वकर्मा के बनाए हुए थे, और समस्त लोक इनकी पूजा करते थे। इनमें से एक, जिसे आपने उस दिन तोड़ा, हे ककुत्स्थ-कुल के राजकुमार, उसे देवों ने त्रिपुर-दैत्य से युद्ध करने को आतुर त्र्यम्बक (शिव) को दिया था, और उसी से शिव ने त्रिपुर का संहार किया, हे नरश्रेष्ठ। यह दूसरा, दुर्धर्ष धनुष देवों में श्रेष्ठ देवों ने विष्णु को दिया था; मेरे हाथ में जो आप देख रहे हैं, वही शत्रु के नगर को जीत लेने वाला विष्णु का धनुष है, हे राम। यह बल में रुद्र के उस धनुष के बराबर है, जो आपके बल के आगे टूट चुका, यह आगे की कथा से प्रकट होगा।

उस समय, जब शिव ने त्रिपुर का संहार किया था, सब देवता ब्रह्मा के पास गए और शिव तथा विष्णु के बल-अबल की परीक्षा के लिए उनसे एक प्रश्न पूछा। देवताओं का अभिप्राय जान कर सत्यनिष्ठों में श्रेष्ठ ब्रह्मा ने उन दोनों देवताओं में विरोध का बीज बो दिया। उस तनाव के फलस्वरूप एक-दूसरे को जीतने को उत्सुक शिव और विष्णु में एक घोर, रोमांचकारी युद्ध छिड़ गया। उस युद्ध में शिव का वह धनुष, जो घोर बल वाला था, विष्णु की हुंकार-मात्र से निष्क्रिय हो गया, और त्रिनेत्र महादेव भी स्तम्भित हो कर रह गए। तब ऋषियों और चारणों (आकाश-चारी गायक देव) के समूह के साथ आ कर देवताओं ने उन्हें शान्त होने की प्रार्थना की; और तभी वे दोनों श्रेष्ठ देवता परस्पर सन्धि पर आए।

एक उप-कथा: चारण आकाश-चारी देव-गायक माने जाते हैं, जो देव-कथा और स्तुति का गान करते हैं, और देव-असुर के बड़े-बड़े संग्रामों के साक्षी रूप में पुरातन काव्य में बार-बार आते हैं। यहाँ वे ऋषि-समूह के साथ आ कर शिव-विष्णु में सन्धि कराने की प्रार्थना करते हैं।

आकाश में शिव और विष्णु के धनुष-युद्ध का दिव्य दृश्य, नीचे परशुराम राम को वह पुरानी कथा सुनाते हुए।

विष्णु के पराक्रम से शिव का वह प्रसिद्ध धनुष यों निष्क्रिय हुआ देख कर, वहाँ एकत्र ऋषि-समूह सहित देवों ने विष्णु को शिव से श्रेष्ठ मान लिया। इस पर क्रुद्ध हो कर महायशस्वी रुद्र ने वह धनुष बाणों सहित विदेहवंशी राजर्षि देवरात के हाथों में सौंप दिया। और हे राम, विष्णु ने अपना यह श्रेष्ठ धनुष, जो शत्रु के नगर को जीत लेने में समर्थ है, भृगुवंशी ऋचीक के पास धरोहर रूप में सौंप दिया।

समझने की कुंजी (दोनों धनुष कहाँ गए): शिव का धनुष विदेह-राजवंश में राजर्षि देवरात के हाथ आया; यही वह धनुष था, जिसे राम ने मिथिला में तोड़ा (पिछले अध्याय की घटना)। विष्णु का धनुष भृगुवंश में आया, और वही अब परशुराम के हाथ में है। इस प्रकार दोनों धनुषों के सूत्र अन्ततः एक ही क्षण पर, इसी मार्ग पर, आ मिलते हैं।

परशुराम छाती पर हाथ रखे विस्मय से राम से बोलते हुए, बीच में दशरथ घुटनों पर हाथ जोड़े बैठे हैं।

महातेजस्वी ऋचीक ने वह दिव्य धरोहर अपने पुत्र, मेरे महात्मा पिता जमदग्नि को दे दी, जो किसी अन्याय का प्रतिकार करने में असमर्थ-से सरल थे और जिनके लिए उसका कोई प्रयोजन न था। शस्त्र त्याग चुके, और तप से अर्जित आत्म-बल से सम्पन्न मेरे पिता को साधारण जन समझ कर अर्जुन (जो अपनी सहस्र भुजाओं के कारण सहस्रबाहु नाम से अधिक प्रसिद्ध है) ने उनका वध कर दिया। पिता के उस अति-क्रूर और अनुचित वध को सुन कर मैंने क्रोध में, जैसे-जैसे क्षत्रिय उत्पन्न होते गए, उन्हें इक्कीस बार तक उखाड़ फेंका।

इस प्रकार सारी पृथ्वी पर अधिकार पा कर, हे राम, मैंने उसे पुण्य-कर्मा महात्मा कश्यप को, उस यज्ञ की दक्षिणा के रूप में दान कर दी, जो मैंने उस महान् रक्त-स्नान के प्रायश्चित्त में किया था। यों दान कर के मैं महेन्द्र पर्वत पर बस गया। इसी बीच तप के बल से सम्पन्न रहते हुए, धनुष के टूटने का समाचार सुन कर मैं उस दूरस्थ स्थान से शीघ्र यहाँ चला आया। हे राम, अब क्षत्रिय-धर्म को सर्वोपरि रख कर, पिता और पितामह से मुझे प्राप्त यह विष्णु का श्रेष्ठ धनुष अपने हाथ में लीजिए। इस श्रेष्ठ धनुष पर शत्रु-नगर को जीतने वाला बाण चढ़ाइए; यदि आप समर्थ हों, हे ककुत्स्थ-कुल के राजकुमार, तभी मैं आपको द्वन्द्व-युद्ध दूँगा।

सार: परशुराम शिव और विष्णु के दो धनुषों का इतिहास सुनाते हैं, बताते हैं कि किस तरह विष्णु का धनुष भृगुवंश होते हुए उन तक आया, और राम को उसी पर बाण चढ़ा कर द्वन्द्व की चुनौती देते हैं।

राम का धनुष उठाना और परशुराम के तेज का हरण

जमदग्नि-पुत्र का यह वचन सुन कर, जो अब तक अपने पिता के प्रति आदर के कारण मौन रहे थे, दशरथ-पुत्र राम ने परशुराम से कहा कि हे भार्गव, आपने जो कर्म किया, वह मैंने सुना है; अपने पिता के ऋण से उऋण होने के लिए आपने यह किया, इसका हम अनुमोदन करते हैं, हे ब्राह्मण। किन्तु क्षत्रिय-धर्म में निष्ठ होते हुए भी, और ब्राह्मण के सम्मुख वाणी में संयत रहते हुए मुझे, आप वीर्यहीन और असमर्थ-सा समझ कर तिरस्कार करते हैं; तो आज मेरा तेज और पराक्रम देखिए।

परशुराम तेज से दमकता वैष्णव धनुष राम के हाथों में सौंपते हुए, नीचे दशरथ हाथ जोड़े बैठे हैं।

यह कह कर क्रुद्ध राम ने भार्गव के हाथ से वह श्रेष्ठ धनुष और बाण झपट लिया, और साथ ही परशुराम के उस दिव्य तेज का भी हरण कर लिया।

एक उप-कथा: बाद की परम्परा में, पद्म-पुराण के एक श्लोक के आधार पर, यह कहा जाता है कि राम ने लीला से, फिर भी विनय के साथ, विष्णु का वह धनुष उस दिव्य शक्ति-तेज सहित ग्रहण कर लिया, जो अब तक परशुराम में निवास करती थी। इसी कारण आगे परशुराम स्वयं को निस्तेज पाते हैं, और राम को साक्षात् विष्णु पहचान लेते हैं।

राम झुककर धनुष पर बाण जोड़ते हुए, पास परशुराम और हाथ जोड़े ऋषि उन्हें देख रहे हैं।

धनुष को चढ़ा कर राम ने उस पर बाण सज्जित किया, और क्रुद्ध हो कर जमदग्नि-पुत्र से कहा कि आप ब्राह्मण हैं, और विश्वामित्र के सम्बन्धी होने के कारण भी मेरे लिए पूज्य हैं, जो आपके पिता के मातुल (मामा) हैं; इसी से, हे राम, मैं आप पर यह प्राण-हरण करने वाला बाण नहीं छोड़ सकता। पर मैं या तो तप के बल से अर्जित आपकी इस तीनों लोकों में अबाध गति का हरण कर लूँगा, या तप से कमाए हुए आपके उन अनुपम (दिव्य) लोकों के स्वामित्व का अन्त कर दूँगा; यही मेरा विचार है। विष्णु का यह दिव्य बाण, जो शत्रु-नगर को जीतने और शत्रु के बल तथा गर्व को चूर्ण करने में समर्थ है, अपने अद्वितीय वेग से कभी व्यर्थ नहीं गिरता, अपना लक्ष्य भेदे बिना नहीं लौटता।

सार: राम परशुराम के हाथ से धनुष और बाण ले लेते हैं, उनका दिव्य तेज भी हर लेते हैं, धनुष चढ़ा कर बाण सज्जित कर देते हैं; पर ब्राह्मण और विश्वामित्र के सम्बन्धी होने से प्राण न ले कर उनकी दिव्य गति या तप-अर्जित लोक ही हरने की बात कहते हैं।

देवों का संगम और परशुराम का राम को विष्णु पहचानना

आकाश में रथों पर देवता और अप्सराएँ एकत्र होकर नीचे आमने-सामने खड़े परशुराम और राम को देख रहे हैं।

विष्णु का वह श्रेष्ठ अस्त्र धारण किए राम को देखने के लिए, ब्रह्मा को आगे रख कर, ऋषि-समूह सहित सब देवता वहाँ अपने विमानों में हर ओर से एकत्र हो गए। गन्धर्व और अप्सराएँ, सिद्ध, चारण और किन्नर, तथा यक्ष, राक्षस और नाग भी उस महान् अद्भुत दृश्य को देखने वहाँ आ जुटे।

उस समय राम के श्रेष्ठ धनुष धारण कर लेने पर सब लोक मानो जड़ हो गए, यह सोच कर कि राम के इस पराक्रम-प्रदर्शन से कौन-सा भीषण परिणाम निकलेगा। अब निस्तेज हो चुके जमदग्नि-पुत्र परशुराम विस्मय से राम को देखते रह गए। निस्तेज हो जाने के कारण राम की दीप्ति से चकित हो कर, उस कमलपत्र-से नेत्रों वाले राम से जमदग्नि-पुत्र मन्द-मन्द स्वर में बोले।

परशुराम अपनी हथेली पर प्रकाशमान तेजपुंज राम को दिखाते हुए, बीच में दशरथ हाथ उठाए बैठे हैं।

उन्होंने कहा कि जब पूर्व काल में मैंने पृथ्वी का राज्य कश्यप को दे दिया था, तब कश्यप ने मुझ से कहा था कि अब आप मेरे राज्य में निवास न करें। तभी से, अपने गुरु कश्यप की आज्ञा का पालन करते हुए, मैं रात्रि में पृथ्वी पर नहीं रहता, हे ककुत्स्थ-कुल के राजकुमार; क्योंकि कश्यप के समक्ष मैंने यह प्रतिज्ञा की थी, यह प्रसिद्ध बात है। अतः हे वीर रघुनन्दन, मेरी इस त्रिलोकगति का हनन करना उचित नहीं; मैं मनोवेग (मन की गति) से महेन्द्र पर्वत को, पर्वतों में श्रेष्ठ, चला जाऊँगा। हे राम, मैंने तप से अनुपम लोक जीते हैं; उन्हीं को आप अपने श्रेष्ठ बाण से हर लीजिए, समय का अपव्यय न हो।

आपके इस धनुष को न केवल उठा कर, बल्कि उस पर प्रत्यंचा चढ़ा कर खींच लेने से, जिसे और कोई नहीं चढ़ा सकता था, मैं आपको अविनाशी, देवेश्वर, मधु-दैत्य के संहारक विष्णु के अतिरिक्त और कुछ नहीं समझता। हे शत्रु-तापक, आपका कल्याण हो! ये जो सब देव-समूह एकत्र हुए हैं, ये आपको देख रहे हैं, जिनके कर्म अनुपम हैं और जो युद्ध में अप्रतिद्वन्द्वी हैं। हे ककुत्स्थ-कुल के राजकुमार, आपके द्वारा, जो तीनों लोकों के स्वामी हैं, मेरा यों विमुख कर दिया जाना मेरे लिए लज्जा की बात नहीं है, क्योंकि मैं किसी और से नहीं, साक्षात् त्रिलोक-नाथ से ही परास्त हुआ हूँ।

एक उप-कथा: “मधु” एक दैत्य था, जिसका विष्णु ने संहार किया था, इसी से विष्णु को “मधुसूदन” या मधु-संहारक कहते हैं। परशुराम के मुख में यह सम्बोधन यही संकेत करता है कि वे राम को साक्षात् विष्णु के रूप में पहचान चुके हैं, और यह पहचान वाल्मीकि के बालकाण्ड में राम के दिव्य स्वरूप के प्रथम स्पष्ट उद्घाटनों में से एक है।

उन्होंने आगे कहा कि हे श्रेष्ठ-व्रती राम, अब आप अपना यह अनुपम बाण छोड़ दीजिए। बाण के छूटते ही मैं पर्वतों में श्रेष्ठ महेन्द्र पर्वत को चला जाऊँगा।

हाथ जोड़े परशुराम स्वर्णिम प्रकाश में आकाश की ओर उठते हुए, नीचे राम दिव्य बाण ऊपर उठाए खड़े हैं।

परशुराम के यों कहते-कहते ही, प्रतापी और श्रीमान् दशरथ-पुत्र राम ने वह श्रेष्ठ बाण छोड़ दिया। राम के द्वारा तप से अर्जित अपने भावी लोकों को नष्ट हुआ देख कर जमदग्नि-पुत्र परशुराम तुरन्त पर्वतों में श्रेष्ठ महेन्द्र पर्वत को लौट गए। तब सब दिशाएँ और विदिशाएँ (कोने) अन्धकार से मुक्त हो गईं; और ऋषि-समूह सहित देवताओं ने ऊपर उठाए धनुष के साथ खड़े राम की स्तुति की। राम द्वारा अति-सम्मानित परशुराम, राम की प्रदक्षिणा कर के, महेन्द्र पर्वत पर अपने धाम को लौट गए।

सार: देव और ऋषि साक्षी होते हैं जब राम बाण छोड़ कर परशुराम के तप-अर्जित लोक हर लेते हैं; परशुराम राम को साक्षात् विष्णु पहचान कर, बिना अपमान माने, महेन्द्र पर्वत लौट जाते हैं।

अयोध्या में प्रवेश और भरत-शत्रुघ्न का केकय जाना

समुद्र तट पर राम जल से प्रकट वरुण देव को वैष्णव धनुष सौंपते हुए, पीछे परशुराम और ऋषि खड़े हैं।

परशुराम के चले जाने पर, पूर्णतः शान्त चित्त वाले महायशस्वी राम ने अपने हाथ का वह धनुष अपरिमित बल वाले जल-देवता वरुण को धरोहर रूप में सौंप दिया। फिर वसिष्ठ-प्रमुख ऋषियों को प्रणाम करके, और अपने पिता को व्याकुल देख कर (दशरथ ने परशुराम की पराजय और प्रस्थान को मानो लक्ष्य ही न किया था) राम ने पिता से कहा कि जमदग्नि-पुत्र परशुराम जा चुके हैं; अब आपके द्वारा रक्षित यह चतुरंगिणी सेना अयोध्या की ओर प्रस्थान करे। राम का वचन सुन कर राजा दशरथ ने अपने पुत्र, रघुवंश में श्रेष्ठ राम को बाँहों में भर कर स्नेह से उसका मस्तक सूँघा। परशुराम के जा चुकने का समाचार सुन कर हर्षित और प्रमुदित राजा ने उस अवसर पर अपने पुत्र को और स्वयं को मानो पुनर्जन्म पाया-सा माना।

समझने की कुंजी (चतुरंगिणी सेना): चतुरंगिणी सेना के चार अंग होते हैं: हाथी, रथ, घुड़सवार और पैदल सैनिक। यही “चार अंगों वाली सेना” आगे चल कर शतरंज (चतुरंग) के चार मोहरों की कल्पना का भी मूल बनी।

फूलों की वर्षा के बीच रथ पर सवार राजा दशरथ शोभायात्रा में नगरवासियों का अभिवादन स्वीकार करते हुए।

राजा ने सेना को आगे बढ़ने की प्रेरणा दी, और फिर शीघ्र अपनी मनोहर राजधानी पहुँचे। राजा ने ध्वजा-पताकाओं से सजी, तुरही-वादकों की ध्वनि से गूँजती उस नगरी में राजसी प्रवेश किया। उसके राजमार्ग जल से सींचे और फूलों के ढेरों से बिछे, अति-रमणीय लग रहे थे। राजा के लौटने पर खिले हुए मुख वाले, हाथों में मंगल-द्रव्य लिए नागरिकों से वह नगरी भरी थी, और जन-समूहों से सुसज्जित थी। नागरिकों और राजधानी में बसे ब्राह्मणों ने दूर तक आगे बढ़ कर राजा की अगवानी की; और अपने यशस्वी पुत्रों से अनुगत वह श्रीमान् महायशस्वी राजा हिमालय-सी (श्वेत और ऊँची) अपनी प्रिय राजमहल में प्रविष्ट हुआ।

अपने स्वजनों से सब इच्छित वस्तुओं द्वारा भली प्रकार सत्कृत राजा अपने महल में आनन्दित हुआ। कौसल्या, सुमित्रा, और सुन्दर कटि वाली कैकेयी तथा जो अन्य रानियाँ थीं, सब वधुओं के स्वागत-सत्कार में लग गईं। तब रानियों ने महाभाग्यवती सीता, यशस्विनी ऊर्मिला, और कुशध्वज की दोनों पुत्रियों, माण्डवी और श्रुतकीर्ति को अन्तःपुर में पहुँचाया। उन सब रानियों ने तुरन्त वधुओं से अन्तःपुर के भीतर और बाहर के देव-मन्दिरों में पूजा कराई; पुरोहितों की मंगल-आशीषों से अभिनन्दित वे वधुएँ, अन्तःपुर-प्रवेश के मांगलिक संस्कार में अग्नि को आहुति दे कर, रेशमी वस्त्रों में सुशोभित हो उठीं। उस अवसर पर वन्दनीय जनों को प्रणाम करके सब राजकुमारियाँ अपने-अपने पतियों के साथ अपने एकान्त भवनों में सुख से रहने लगीं।

संध्या के प्रकाश में एक वृद्ध पुरुष घुटनों पर बैठकर राम की ओर हाथ बढ़ाए हुए, पास परिजन खड़े हैं।

विधिवत् विवाहित, अनेक अस्त्र-शस्त्रों के प्रयोग में निपुण, और धन से सम्पन्न वे राजकुमार, जो नरों में रत्न थे, अपने मित्रों और बन्धुओं के साथ रहते हुए अपने पिता की सेवा में लगे रहे। इसी बीच एक दिन रघुनन्दन राजा दशरथ ने कैकेयी के पुत्र भरत से कहा कि हे पुत्र, यह केकयराज का पुत्र, आपका वीर मातुल युधाजित्, आपको अपने पिता की राजधानी ले जाने यहाँ आया है, और यहीं ठहरा हुआ है। दशरथ का यह वचन सुन कर कैकेयी-पुत्र भरत शत्रुघ्न के साथ तुरन्त प्रस्थान को उद्यत हो गए। अपने पिता दशरथ से, बिना अधिक श्रम के बड़े-बड़े कार्य करने वाले श्रीराम से, और अपनी तीनों माताओं, कौसल्या, सुमित्रा तथा कैकेयी से विदा ले कर, नरों में रत्न वीर भरत शत्रुघ्न के साथ केकय-देश को चल पड़े। भरत को शत्रुघ्न-सहित पा कर अत्यन्त हर्षित वीर युधाजित् अपने नगर पहुँच कर विधिपूर्वक नगर में प्रविष्ट हुए, और उनके पिता इस पर सन्तुष्ट हुए।

समझने की कुंजी (युधाजित् और केकय): युधाजित् केकय-देश के राजा (कैकेयी के पिता) के पुत्र, अर्थात् भरत के मातुल (मामा) हैं। केकय एक पश्चिमोत्तर जनपद था। भरत और शत्रुघ्न का यों ननिहाल चले जाना आगे की कथा (अयोध्याकाण्ड) के लिए महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि राज्याभिषेक के समय भरत अयोध्या में उपस्थित न रहेंगे।

भरत और शत्रुघ्न के चले जाने पर, महाबली राम और लक्ष्मण अवसर के अनुसार अपने देव-तुल्य पिता की सेवा करते रहे। पिता की आज्ञा को सर्वोपरि रख कर राम नागरिकों से सम्बन्धित सब कार्य करते, जो उन्हें प्रिय और उनके हित में भी होते। परम संयमी राम अपनी तीनों माताओं के सब कार्य उनके लिए करते, और समय-समय पर अपने गुरुजनों के महत्त्वपूर्ण कार्यों में भी ध्यान देते। इस प्रकार राजा दशरथ, ब्राह्मण, व्यापारी, और अयोध्या-राज्य की सारी प्रजा राम के स्वभाव और आचरण से प्रसन्न रहती। सच्चे, अमोघ पराक्रम वाले राम कीर्ति में अपने सब भाइयों से बढ़ कर थे, और स्वयम्भू ब्रह्मा के समान सब प्राणियों में गुणों से श्रेष्ठ थे।

चाँदनी रात में महल की छत पर राम और सीता दीपों और फूलों के बीच साथ बैठे हुए।

उच्च-मन वाले राम, जिनका हृदय अपनी पत्नी में रमा था और जो उसके हृदय में प्रतिष्ठित थे, अनेक मासों तक उसके साथ सुख से रहे। सीता राम को पिता द्वारा दी गई जीवन-संगिनी रूप में प्रिय थीं; और उनके अनेक गुणों तथा रूप-सौन्दर्य के कारण उनके प्रति राम का स्नेह और भी बढ़ता गया। उनके पति भी, अपने गुणों और मनोहर रूप के कारण, उनके हृदय में दूना दृढ़ स्थान पा गए। जनक की पुत्री, मिथिला की राजकुमारी सीता, जो शरीर-सौन्दर्य में देवियों के समान और मानो साक्षात् सौन्दर्य-मूर्ति थीं, राम के अन्तरतम हृदय में जो छिपा था, उसे भी अपने मन से सूक्ष्मता-पूर्वक पढ़ लेती थीं। उस परम प्रिय श्रेष्ठ राजकन्या के साथ विवाह-सूत्र में बँधे राजर्षि-पुत्र राम अत्यन्त प्रसन्न और सुशोभित हुए, जैसे सम्पदा की देवी श्री के साथ देवेश्वर सर्वव्यापी विष्णु शोभा पाते हैं।

सार: राम विष्णु के धनुष को वरुण को सौंप कर बारात अयोध्या लौटती है; वधुएँ अन्तःपुर में बसती हैं, भरत-शत्रुघ्न ननिहाल केकय जाते हैं, और सीता-सहित राम का यश तथा प्रेम बढ़ता जाता है। यहीं बालकाण्ड समाप्त होता है।

मूल: श्रीमद्वाल्मीकि-रामायण, बालकाण्ड, सर्ग 74-77 (गीता प्रेस गोरखपुर)।