हरिवंश · अक्रूर और मथुरा की राह

विष्णु पर्व · प्रसंग 13 · अध्याय 66 से 72

एक रथ जो विदा भी था और नियति भी

कंस का धनुष-यज्ञ का बहाना, अक्रूर का भक्ति से भरा मन, और मथुरा में प्रवेश के वे संकेत, एक टूटा घमण्ड, एक सीधी हुई कुबड़ी, और एक धनुष जो उठते ही टूट गया

कंस के डर ने अब एक योजना का रूप ले लिया था। उसे वृन्दावन की कथाएँ मिल चुकी थीं, पूतना का अन्त, गोवर्धन का उठना, और वह नीला बालक जो हर दूत को निगल जाता था। उसने समझ लिया कि अब और दूत भेजने से कुछ नहीं होगा; उन भाइयों को स्वयं मथुरा बुलाना होगा, अपने ही मैदान में, जहाँ उसके मल्ल, उसके हाथी, उसका पूरा बल था।

उसने धनुष-यज्ञ का बहाना बनाया, एक बड़ा आयोजन जिसमें दूर-दूर के लोग आमन्त्रित थे, और इसी बहाने उसने कृष्ण और बलराम को बुलवा भेजने का निश्चय किया। इस काम के लिए उसने अक्रूर को चुना, एक यादव, जो रथ ले कर वृन्दावन जाएगा।


अक्रूर का मन

अक्रूर के मन में भक्ति बसती थी, और यह आमन्त्रण उनके लिए कर्तव्य और सौभाग्य, दोनों था। रास्ते भर वे यही सोचते रहे कि जिन्हें वे लेने जा रहे हैं, वे कोई साधारण ग्वाले नहीं; वे वही हैं जिनकी कथाएँ सुन-सुन कर उनका हृदय वर्षों से भीगता रहा है। आज वे उन्हें अपनी आँखों से देखेंगे, अपने रथ पर बैठाएँगे, यह सोच कर ही उनकी आँखें भर आतीं।

वृन्दावन पहुँच कर जब अक्रूर ने उन दोनों भाइयों को देखा, तो उनकी आँखें छलक पड़ीं। पर यह विदा का क्षण वृन्दावन के लिए भारी था। जिस बालक ने उनके जीवन को भर दिया था, वह अब अपने असली पथ की ओर जा रहा था, मथुरा की ओर, और वृन्दावन जानता था कि शायद वह अब लौट कर वैसा न रहे। पर नियति का रथ खड़ा था, और उस पर चढ़ना ही था।


नगर के संकेत

मथुरा में घुसते ही दोनों भाइयों ने वह सब किया जो आगे की कथा का संकेत था। राह में एक घमण्डी धोबी मिला, जो कंस के लिए रंगे हुए सुन्दर वस्त्र ले जा रहा था। कृष्ण ने उससे कुछ वस्त्र माँगे, और उसने अकड़ कर, अपमान कर के इनकार किया, गाँव के ग्वाले राजा के वस्त्र पहनेंगे? उसका वह घमण्ड वहीं चूर हो गया, और भाइयों ने सुन्दर वस्त्र पहन लिए।

फिर एक कुबड़ी स्त्री मिली, कुब्जा, जो राजा के लिए चन्दन और अंगराग ले जा रही थी। औरों ने शायद उसकी टेढ़ी देह का उपहास किया होगा, पर कृष्ण ने उससे प्रेम से अंगराग माँगा, और उसने वह सहर्ष अर्पित किया। कृष्ण ने उसकी सेवा के बदले उसकी टेढ़ी देह को सीधा और सुन्दर कर दिया, मानो कह रहे हों कि जो प्रेम से देता है, उसे प्रकृति लौटा देती है।


धनुष टूटा, और नगर जाग गया

फिर वे उस यज्ञशाला तक पहुँचे जहाँ वह विशाल धनुष रखा था, जिसे देखने दूर-दूर से लोग आते थे, और जिसे उठाना तो दूर, हिला पाना भी किसी के बस का नहीं था। उसकी रखवाली के लिए पहरेदार खड़े थे। कृष्ण आगे बढ़े, और उस धनुष को खेल-खेल में उठा लिया, और चढ़ाते-चढ़ाते उसे दो टुकड़े कर डाला।

उसकी टनकार पूरे नगर में गूँज गई, बादल की गरज जैसी, और मथुरा सहम कर जाग गया। पहरेदार दौड़े, पर भाइयों ने उन्हें भी पीछे धकेल दिया। और कंस तक यह ख़बर पहुँच गई कि जिनसे वह डरता था, वे उसकी अपनी देहरी पर आ चुके हैं, और उन्होंने आते ही उसका वह धनुष तोड़ डाला जो उसके बल का प्रतीक था। उस रात कंस को नींद नहीं आई; उसने बुरे स्वप्न देखे, अपशकुन देखे, और जान लिया कि कल का दिन उसके जीवन का सबसे बड़ा दिन होगा, या आख़िरी। अगला प्रसंग उसी अखाड़े का है।

आधार: हरिवंश (महाभारत का खिल-पर्व), विष्णु पर्व, अध्याय 66 से 72; समीक्षित संस्करण (पी. एल. वैद्य, भांडारकर प्राच्यविद्या संस्थान, पुणे)। कहानी-रूप में, मूल कथा-क्रम का अनुसरण करते हुए।