हरिवंश · पारिजात

विष्णु पर्व · प्रसंग 18 · अध्याय 96 से 104

स्वर्ग का वह वृक्ष जो द्वारका के आँगन में उतर आया

एक दिव्य वृक्ष जिसके फूल कभी नहीं मुरझाते, स्वर्ग का उसे न छोड़ना, और वह क्षण जब पृथ्वी और स्वर्ग की दूरी अचानक बहुत पतली पड़ गई

नरकासुर के वध के बाद कृष्ण स्वर्ग तक गए, छीने हुए दिव्य आभूषण और अदिति के कुण्डल लौटाने। वहाँ देवताओं ने उनका भव्य स्वागत किया, और इन्द्र तथा शची ने उन्हें और सत्यभामा को सम्मान दिया। और वहीं, नन्दन वन में, सत्यभामा की दृष्टि उस वृक्ष पर पड़ी जिसकी सुगन्ध पूरे स्वर्ग में फैली थी, पारिजात।

यह कोई साधारण वृक्ष नहीं था। इसके फूल कभी नहीं मुरझाते थे; इनकी सुगन्ध दूर-दूर तक जाती थी; और जो इसे पाता, उसके आँगन में मानो स्वर्ग का एक टुकड़ा उतर आता। सत्यभामा के मन में इच्छा जागी कि यह वृक्ष द्वारका में, उनके आँगन में हो।


स्वर्ग अपनी निधि सहज नहीं छोड़ता

पर स्वर्ग अपनी निधि सहज नहीं छोड़ता। जब कृष्ण ने वह पारिजात पृथ्वी पर ले जाना चाहा, तो इन्द्र के पक्ष से इस पर आपत्ति हुई। यह स्वर्ग का वृक्ष है, यह तर्क था; यह यहीं रहना चाहिए, मर्त्यलोक में नहीं। इसी बात पर देवराज और कृष्ण के बीच एक तनाव खड़ा हुआ, और बात युद्ध तक पहुँची।

यह एक अनोखा क्षण था, क्योंकि यहाँ टकराव असुरों और देवों के बीच नहीं, बल्कि देवराज और उस अवतार के बीच था जो धर्म की रक्षा को उतरा था। पर यह तनाव अधिक नहीं चला; इन्द्र शीघ्र ही समझ गए कि सामने कौन खड़ा है, और किस उद्देश्य से यह माँग की जा रही है।


आँगन में उतरा स्वर्ग

अन्ततः वह पारिजात द्वारका लाया गया, और सत्यभामा के आँगन में रोप दिया गया। पर कहते हैं इसकी छाया दूर तक पड़ती थी, और इसकी सुगन्ध पूरे नगर में फैल जाती थी, ताकि किसी एक का नहीं, सब का मन उससे महक उठे। जो स्वर्ग का था, वह अब पृथ्वी के एक आँगन में फूल रहा था।

यह प्रसंग कृष्ण की उस लीला का अंग है जिसमें स्वर्ग और पृथ्वी के बीच की दूरी अचानक बहुत पतली पड़ जाती है, मानो दोनों लोक एक ही आँगन में मिल रहे हों। जहाँ कृष्ण हैं, वहाँ स्वर्ग को भी झुक कर उतरना पड़ता है।


द्वारका के भरे-पूरे दिन

द्वारका के इन दिनों में कृष्ण का जीवन अनेक धाराओं में एक साथ बहता है, अनेक रानियाँ, अनेक सन्तानें, राज-काज की अनगिनत गुत्थियाँ, मित्रों और सम्बन्धियों का एक पूरा संसार। यह वह समय था जब अवतार एक गृहस्थ भी था, एक राजा भी, और एक मित्र भी, और इन सब भूमिकाओं को साथ-साथ निभा रहा था।

पर इन सब भरे-पूरे दिनों के बीच भी एक सूत्र अटूट रहता है, बल का प्रयोग सदा रक्षा के लिए, और जीत के बाद भी एक गहरा संयम। और अब कथा अपने अन्तिम बड़े प्रसंग की ओर बढ़ती है, एक ऐसा युद्ध जो किसी राज्य या निधि के लिए नहीं, कृष्ण के अपने पौत्र के एक स्वप्न-भर प्रेम से छिड़ता है, और जिसमें स्वयं महादेव एक ओर खड़े होते हैं।

आधार: हरिवंश (महाभारत का खिल-पर्व), विष्णु पर्व, अध्याय 96 से 104; समीक्षित संस्करण (पी. एल. वैद्य, भांडारकर प्राच्यविद्या संस्थान, पुणे)। कहानी-रूप में, मूल कथा-क्रम का अनुसरण करते हुए।