हरिवंश · सूर्य, संज्ञा और छाया

हरिवंश पर्व · प्रसंग 3 · अध्याय 8 से 9

एक स्त्री जो अपने पति का तेज सह न सकी

सूर्य के घर की वह बहुत मानवीय पीड़ा जिससे सूर्यवंश शुरू हुआ, एक छाया जो पत्नी की जगह घर सँभालती रही, और वह तेज जिसे आख़िर घिसना पड़ा

अब कथा सूर्य के घर पहुँचती है, और वहाँ एक बहुत मानवीय-सी पीड़ा से शुरू होती है। विवस्वान् मार्तण्ड का तेज इतना प्रचण्ड था कि उनकी पत्नी संज्ञा उसके पास टिक ही नहीं पाती थीं। यह विरह प्रेम के अभाव का नहीं था; संज्ञा प्रेम करती थीं, पर उस प्रेम के सामने जो आग जलती थी, उसमें वे झुलसती भी थीं। पास जाना चाहती थीं, और पास जा नहीं पाती थीं।

बहुत दिनों तक उन्होंने यह सहा, यह घुटन कि जिसे चाहो उसी का ताप असह्य हो। फिर एक दिन उन्होंने एक उपाय किया, जो किसी की हार भी थी और किसी की हिम्मत भी।


एक छाया, घर के लिए

संज्ञा ने अपनी ही छाया से, हू-ब-हू अपने जैसी एक प्रतिच्छाया गढ़ी। उन्होंने उसे समझाया, तू मेरे रूप में यहाँ रहना, घर सँभालना, बच्चों का ध्यान रखना, और किसी को बताना मत कि तू असली संज्ञा नहीं है। और फिर वे स्वयं, एक घोड़ी का रूप धर कर, दूर उत्तर के मैदानों में तप करने चली गईं, उस शान्ति की खोज में जो उन्हें अपने ही घर में नहीं मिल रही थी।

आश्चर्य यह कि सूर्य को बहुत समय तक पता ही नहीं चला कि जो उनके साथ है वह उनकी असली पत्नी नहीं, उसकी छाया है। इतने पास रह कर भी एक भेद इतने समय तक छिपा रहा, और इसमें एक चुपचाप-सी बात छिपी है, कि कभी-कभी हम अपने सबसे निकट के लोगों को भी ठीक से नहीं देखते, बस मान लेते हैं कि सब वैसा ही है जैसा दिखता है।


भेद खुला, और तेज घिसा गया

भेद तब खुला जब छाया ने अपने और संज्ञा के बच्चों में अनजाने ही कुछ अन्तर किया, क्योंकि माँ का स्नेह बनावट से नहीं आता। इस अन्तर से सूर्य को सन्देह हुआ, और सच सामने आया, कि उनकी असली पत्नी तो वर्षों पहले उनका ताप सह न कर चली गई थी। सूर्य व्याकुल हुए, और संज्ञा की खोज में निकले।

और तब उस पीड़ा का एक सुन्दर समाधान निकला। सूर्य के तेज को ही घिसा गया, थोड़ा कम किया गया, ताकि वह सह्य हो जाए, ताकि प्रेम के पास रहना सम्भव हो सके। उस घिसन से जो दिव्य अंश निकले, उनसे देवताओं के अनेक अस्त्र और दिव्य वस्तुएँ बनीं। और संज्ञा फिर लौट आईं, अब उस तेज के पास, जिसे प्रेम के लिए थोड़ा झुकना सीख लिया था।


और सूर्यवंश आगे बढ़ा

इसी संज्ञा और छाया से जो सन्तानें हुईं, उन्हीं से वैवस्वत मनु का वंश आगे बढ़ा, वह सूर्यवंश जिसकी जड़ें इतनी गहरी हैं कि आगे चल कर इसी में राम जैसे राजा जन्मेंगे। यहीं से इक्ष्वाकु निकले, और इक्ष्वाकु से अयोध्या का वह कुल जो धर्म का पर्याय बन गया।

मनु के नौ पुत्रों से पृथ्वी के कोने-कोने में राजकुल फैल गए, मानो एक ही बीज से सौ वृक्ष उग आए हों, और हर वृक्ष के साथ कोई न कोई कथा, कोई तप, कोई पतन, कोई वरदान। इन्हीं वंशों से होती हुई कथा अब उस मोड़ की ओर बढ़ती है जहाँ यदु का नाम उठता है, और जहाँ एक मणि कृष्ण के माथे पर पहली छाया डालने वाली है।

आधार: हरिवंश (महाभारत का खिल-पर्व), हरिवंश पर्व, अध्याय 8 से 9; समीक्षित संस्करण (पी. एल. वैद्य, भांडारकर प्राच्यविद्या संस्थान, पुणे)। कहानी-रूप में, मूल कथा-क्रम का अनुसरण करते हुए।