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हरिवंश · कृष्ण-जन्म

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विष्णु पर्व · प्रसंग 6 · अध्याय 46 से 50

आधी रात, एक कारागार, और एक शिशु जो पार ले जाया गया

एक आकाशवाणी जिसने एक भाई को बहन का हत्यारा बना दिया, छह शिशुओं की हत्या, और आठवें का वह जन्म जिसके बाद वसुदेव उसे अँधेरे में गोकुल पार ले गए

कहानी एक हँसी से बिगड़ती है। देवकी का विवाह वसुदेव से हुआ था, और कंस, जो देवकी से बहुत स्नेह रखता था, स्वयं उनका रथ हाँक रहा था, बहन को ससुराल पहुँचाने। मार्ग ख़ुशियों से भरा था, बाजे बज रहे थे, और तभी आकाश से एक वाणी गूँजी, जिसने उस पूरे उत्सव को पत्थर कर दिया। हे कंस, उस वाणी ने कहा, जिस बहन को तू इतने चाव से लिए जा रहा है, उसी का आठवाँ पुत्र तेरे प्राण लेगा।

डर मनुष्य के भीतर के स्नेह को सबसे पहले मारता है। कंस ने उसी क्षण, उसी रथ पर, तलवार खींच ली, अपनी प्यारी बहन को मार डालने को। वसुदेव ने बीच में आ कर उसे रोका, और एक वचन दिया जो आगे उनके जीवन का सबसे भारी बोझ बनने वाला था, मैं देवकी के हर पुत्र को जन्मते ही तुम्हें सौंप दूँगा, उन्होंने कहा; तुम्हें इसके प्राण लेने की क्या आवश्यकता। कंस रुक गया, पर भरोसा नहीं किया। उसने दोनों को अपने ही कारागार में डलवा दिया, जहाँ प्रेम पहरेदार बन गया, और रिश्ते ज़ंजीरें।


छह बार टूटती एक माँ

फिर वह आरम्भ हुआ जिसे शब्दों में बाँधना कठिन है। देवकी का पहला पुत्र जन्मा, और वसुदेव ने, अपने वचन के बँधे, उसे कंस को सौंप दिया। कंस ने उसे शिला पर पटक कर मार डाला। फिर दूसरा, फिर तीसरा। एक-एक कर छह शिशु उस कोठरी में जन्मे, और एक-एक कर उसी क्रूरता से मिटा दिए गए।

एक माँ का हृदय छह बार टूटा, और हर बार उसे यह भी सहना पड़ा कि जो हाथ उसके बच्चे को छीन रहे थे, वे उसके अपने भाई के थे। इस अँधेरी प्रतीक्षा में सातवें गर्भ के समय एक अनोखी बात हुई, योगमाया उस गर्भ को देवकी से खींच कर दूर गोकुल में, वसुदेव की दूसरी पत्नी रोहिणी के गर्भ में पहुँचा गई। बाहर कह दिया गया कि देवकी का गर्भ गिर गया, और इस तरह संकर्षण, बलराम, उस कारागार से सैकड़ों कोस दूर, सुरक्षित जन्मे।


वह आठवीं रात

और फिर वह रात आई। आधी रात का गहरा अँधेरा कारागार पर बैठा था, और उसी अँधेरे में देवकी के गर्भ से वह आठवाँ शिशु जन्मा। कहते हैं जन्मते ही उसने अपने माता-पिता को अपना वह रूप दिखाया जिसे देख कर दोनों स्तब्ध रह गए, और फिर वसुदेव से कहा, मुझे गोकुल ले चलिए, नन्द के घर, जहाँ इसी रात एक कन्या ने जन्म लिया है; मुझे वहाँ रख कर उस कन्या को यहाँ ले आइए।

वसुदेव ने उस आज्ञा को सिर झुका कर माना। पुत्र को गोद में लिए वे कारागार से निकले और मथुरा की उन सूनी, अँधेरी गलियों से होते हुए नगर के बाहर की ओर बढ़ चले, हर आहट पर ठिठकते, हर छाया से सहमते, पर उस छोटे-से बोझ को छाती से लगाए, जैसे सारा संसार उसी एक शिशु में सिमट आया हो।


यमुना के उस पार, गोकुल

नगर की सीमा पर यमुना बह रही थी, और उसे पार किए बिना गोकुल नहीं पहुँचा जा सकता था। वसुदेव उस शिशु को छाती से लगाए जल में उतरे और धीरे-धीरे, सँभल-सँभल कर, उस पार की ओर बढ़े। रात की चुप्पी में केवल पानी की आहट थी और उनकी अपनी साँसों की, और उस पार गोकुल की मद्धम रोशनियाँ धीरे-धीरे पास आती गईं।

उस पार नन्द के घर, उसी रात यशोदा ने एक कन्या को जन्म दिया था, और प्रसव की थकान से गहरी नींद में सो गई थीं। वसुदेव चुपचाप भीतर गए, अपने पुत्र को यशोदा के पास रखा, उस सोई हुई कन्या को उठाया, और जिस राह से आए थे उसी राह लौट पड़े, यमुना को फिर से पार करते हुए, मथुरा की ओर।


और सुबह, कंस का भ्रम

कारागार लौट कर वसुदेव ने उस कन्या को देवकी की गोद में रख दिया, और प्रतीक्षा करने लगे। थोड़ी देर में शिशु के रोने की आवाज़ पहरेदारों ने सुनी, और दौड़ कर कंस को ख़बर दी कि देवकी ने आठवीं सन्तान को जन्म दिया है। कंस तलवार लिए दौड़ा आया, और देवकी की गोद से उस कन्या को छीन लिया। देवकी गिड़गिड़ाईं, यह तो कन्या है, इससे तुझे क्या भय; इसे छोड़ दे। पर डर तर्क नहीं सुनता।

कन्या होने पर भी कंस ने उस पर दया न की। यह तो जन्मते ही मरी समझो, ऐसा कह कर उसने उसे पैरों से पकड़ा, घुमाया, और पूरे बल से शिला पर दे मारा। पर वह कन्या कोई साधारण शिशु तो थी नहीं। शिला से टकरा कर भी वह चूर न हुई; उसी क्षण वह कंस के हाथ से छूट कर ऊपर उठ गई, आकाश में, अपने भयंकर दिव्य रूप में, चार भुजाओं वाली, बिजली-सी दीप्त, दिव्य मालाओं से सजी। वह हँसी, और वह अट्टहास उस अँधेरी रात में किसी अभिशाप-सा गूँजा। रे कंस, उसने कहा, मुझे शिला पर पटक कर तूने अपना ही नाश बुलाया है; जिस दिन तेरा शत्रु तुझ पर टूटेगा, उसी दिन मैं अपने हाथों तेरी देह को चीर कर तेरा गरम लहू पीऊँगी। इतना कह कर वह अन्तर्धान हो गई, और कंस के पाँव तले की धरती जैसे खिसक गई। वह जान गया कि उसका काल कहीं बाहर, इसी संसार में, साँस ले रहा है, और वह उसे रोक नहीं सका। कथा, अब गोकुल पहुँच चुकी थी।

आधार: हरिवंश (महाभारत का खिल-पर्व), विष्णु पर्व, अध्याय 46 से 50; समीक्षित संस्करण (पी. एल. वैद्य, भांडारकर प्राच्यविद्या संस्थान, पुणे)। कहानी-रूप में, मूल कथा-क्रम का अनुसरण करते हुए।

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