आधी रात, एक कारागार, और एक नदी जो पार हो गई
कहानी एक हँसी से बिगड़ती है। देवकी का विवाह वसुदेव से हुआ था, और कंस, जो देवकी से बहुत स्नेह रखता था, स्वयं उनका रथ हाँक रहा था, बहन को ससुराल पहुँचाने। मार्ग ख़ुशियों से भरा था, बाजे बज रहे थे, और तभी आकाश से एक वाणी गूँजी, जिसने उस पूरे उत्सव को पत्थर कर दिया। हे कंस, उस वाणी ने कहा, जिस बहन को तू इतने चाव से लिए जा रहा है, उसी का आठवाँ पुत्र तेरे प्राण लेगा।
डर मनुष्य के भीतर के स्नेह को सबसे पहले मारता है। कंस ने उसी क्षण, उसी रथ पर, तलवार खींच ली, अपनी प्यारी बहन को मार डालने को। वसुदेव ने बीच में आ कर उसे रोका, और एक वचन दिया जो आगे उनके जीवन का सबसे भारी बोझ बनने वाला था, मैं देवकी के हर पुत्र को जन्मते ही तुम्हें सौंप दूँगा, उन्होंने कहा; तुम्हें इसके प्राण लेने की क्या आवश्यकता। कंस रुक गया, पर भरोसा नहीं किया। उसने दोनों को अपने ही कारागार में डलवा दिया, जहाँ प्रेम पहरेदार बन गया, और रिश्ते ज़ंजीरें।
छह बार टूटती एक माँ
फिर वह आरम्भ हुआ जिसे शब्दों में बाँधना कठिन है। देवकी का पहला पुत्र जन्मा, और वसुदेव ने, अपने वचन के बँधे, उसे कंस को सौंप दिया। कंस ने उसे शिला पर पटक कर मार डाला। फिर दूसरा, फिर तीसरा। एक-एक कर छह शिशु उस कोठरी में जन्मे, और एक-एक कर उसी क्रूरता से मिटा दिए गए।
एक माँ का हृदय छह बार टूटा, और हर बार उसे यह भी सहना पड़ा कि जो हाथ उसके बच्चे को छीन रहे थे, वे उसके अपने भाई के थे। इस अँधेरी प्रतीक्षा में सातवें गर्भ के समय एक अनोखी बात हुई, योगमाया उस गर्भ को देवकी से खींच कर दूर गोकुल में, वसुदेव की दूसरी पत्नी रोहिणी के गर्भ में पहुँचा गई। बाहर कह दिया गया कि देवकी का गर्भ गिर गया, और इस तरह संकर्षण, बलराम, उस कारागार से सैकड़ों कोस दूर, सुरक्षित जन्मे।

वह आठवीं रात
और फिर वह रात आई। बाहर भादों की घनघोर वर्षा थी, बिजली कड़क रही थी, और यमुना अपने कूलों को तोड़ती हुई उमड़ रही थी, मानो सारी प्रकृति जानती हो कि आज क्या होने वाला है। उसी प्रचण्ड अँधेरे में देवकी के गर्भ से वह जन्मा, और कहते हैं उस लोहे की कोठरी का अँधेरा अचानक छँट गया, मानो किसी ने वहाँ एक छोटा-सा सूर्य रख दिया हो।
जो हुआ वह किसी चमत्कार से कम नहीं था। वसुदेव के हाथों-पाँवों की बेड़ियाँ अपने आप खुल कर गिर पड़ीं। द्वार पर खड़े पहरेदार एक अजीब-सी नींद में डूब गए, जिसमें न स्वप्न था न जाग। और कारागार के वे भारी द्वार, जिन्हें कई आदमी मिल कर भी मुश्किल से हिला पाते थे, एक के बाद एक, बिना किसी आहट के, स्वयं खुलते चले गए, मानो कोई अदृश्य हाथ आगे-आगे राह बना रहा हो। एक स्वर ने वसुदेव से कहा, इसे गोकुल ले जाओ, नन्द के घर, और वहाँ जो कन्या जन्मी है, उसे यहाँ ले आओ।
यमुना ने राह दे दी
वसुदेव ने काँपते हाथों से शिशु को एक टोकरी में रखा, सिर पर उठाया, और उस तूफ़ानी रात में निकल पड़े। आगे यमुना उमड़ी हुई थी, फनफनाती, उफनती, और उसे पार करना असम्भव लग रहा था। पर जैसे ही वसुदेव ने पहला पैर जल में रखा, नदी मानो ठिठक गई। जल घटने लगा, और एक राह बनती चली गई।
कहते हैं ऊपर शेषनाग ने अपना विशाल फन फैला कर उस शिशु को मूसलाधार वर्षा से बचा लिया, और वसुदेव उस फन की छाया तले, घुटनों तक पानी में, धीरे-धीरे उस पार पहुँच गए। जिस नदी ने इतने प्राण लिए थे, उसने उस रात झुक कर एक प्राण को पार कराया। उस पार गोकुल में, नन्द के घर, उसी रात यशोदा ने एक कन्या को जन्म दिया था, और थकान से गहरी नींद में सो गई थीं। वसुदेव चुपचाप भीतर गए, अपने पुत्र को यशोदा के पास रखा, उस सोई हुई कन्या को उठाया, और लौट पड़े।

और सुबह, कंस का भ्रम
कारागार में वसुदेव फिर अपनी बेड़ियों में लौट आए, और कन्या देवकी की गोद में रख दी गई। द्वार फिर बन्द हो गए, पहरेदार जागे, और शिशु के रोने की आवाज़ कंस तक पहुँची। वह तलवार लिए दौड़ा आया, और देवकी की गोद से उस कन्या को छीन लिया। देवकी गिड़गिड़ाईं, यह तो कन्या है, इससे तुझे क्या भय; इसे छोड़ दे। पर डर तर्क नहीं सुनता।
और तभी वह कन्या उसके हाथ से छूट कर ऊपर उठ गई, आकाश में, अपने दिव्य रूप में, योगमाया बन कर। वह हँसी, और वह हँसी कंस के लिए किसी अभिशाप से कम नहीं थी। मूर्ख, उसने कहा, जिससे तू डरता है, वह तेरे हाथ नहीं आएगा; वह जन्म ले चुका है, और कहीं और, सुरक्षित, पल रहा है। इतना कह कर वह अन्तर्धान हो गई, और कंस के पाँव तले की धरती जैसे खिसक गई। वह जान गया कि उसका काल कहीं बाहर, इसी संसार में, साँस ले रहा है, और वह उसे रोक नहीं सका। कथा, अब गोकुल पहुँच चुकी थी।
आधार: हरिवंश (महाभारत का खिल-पर्व), विष्णु पर्व, अध्याय 46 से 50; समीक्षित संस्करण (पी. एल. वैद्य, भांडारकर प्राच्यविद्या संस्थान, पुणे)। कहानी-रूप में, मूल कथा-क्रम का अनुसरण करते हुए।