हरिवंश · पूतना-वध

विष्णु पर्व · प्रसंग 7 · अध्याय 50 से 51

वह दाई जो ममता ओढ़ कर मौत बाँटने आई

कंस का पहला दूत एक सुन्दर स्त्री के वेश में गोकुल पहुँचा, गोद में लेने योग्य कोमलता और स्तन में भरा हुआ विष ले कर, और जिसे वह सुलाने आई थी, उसी ने उसे सदा के लिए सुला दिया

योगमाया की वह हँसती चेतावनी कंस के कानों में दिन-रात गूँजती रहती थी, कि उसका काल कहीं बाहर पल रहा है। डर ने उसे और क्रूर बना दिया। उसने अपने राज्य भर में आदेश भिजवाया कि हाल में जन्मे हर शिशु पर नज़र रखी जाए, और जहाँ कहीं कुछ असाधारण दिखे, वहाँ अपने दूत भेजे। और गोकुल की कथाएँ, उस नीले बालक की, धीरे-धीरे उस तक पहुँचने लगीं।

उसने अपनी सबसे विश्वासपात्र राक्षसी को बुलाया, पूतना, जो रूप बदलने में निपुण थी और जिसका काम ही शिशुओं को मारना था। जाओ, उसने कहा, गोकुल में जो भी नया शिशु मिले, उसे सदा के लिए सुला आओ। पूतना ने एक सुन्दर, स्नेहमयी स्त्री का रूप धरा, अपने स्तन में घातक विष भरा, और गोकुल की ओर चल पड़ी, मानो कोई ममतामयी दाई बच्चों को दुलारने जा रही हो।


ममता का छल

गोकुल में उस समय हर घर एक नवजात के आगमन से भरा था, और एक अजनबी सुन्दर स्त्री का बच्चों को गोद में लेना, दुलारना, किसी को अस्वाभाविक नहीं लगा। पूतना घर-घर घूमी, और जिस घर में वह नीला शिशु था, वहाँ जा पहुँची। यशोदा को उसका रूप और स्नेह भला लगा; एक स्त्री जो इतने प्रेम से बच्चे को लेना चाहे, उस पर सन्देह किसे होता।

पूतना ने शिशु को गोद में लिया। उसके चेहरे पर ममता थी, और भीतर एक ही योजना, कि यह दूध पीते-पीते सदा के लिए सो जाए। उसने अपना विषैला स्तन उस नन्हे मुँह से लगाया। यह छल का वह क्षण था जब बुराई अपने सबसे कोमल रूप में सामने थी, और यही उसका सबसे ख़तरनाक रूप भी होता है, जब वह दुलार बन कर आती है।


जिसे मारने आई, उसी ने प्राण खींच लिए

पर जिसे वह मारने आई थी, वह कोई साधारण शिशु नहीं था। उसने वह स्तन मुँह से लगाया, और दूध के साथ-साथ, धीरे-धीरे, पूतना के प्राण भी खींचने लगा। पूतना को पहले समझ ही नहीं आया कि क्या हो रहा है। फिर एक भयानक पीड़ा उसकी देह में दौड़ी। उसने शिशु को छुड़ाना चाहा, पर वह नन्हा हाथ किसी पर्वत-सी पकड़ बन गया था।

पूतना चीख़ी, और उसकी चीख़ से गोकुल काँप उठा। उसका सुन्दर वेश गिर गया, और वह अपने असली, विकराल रूप में लौट आई, एक विशाल, भयानक राक्षसी, और निष्प्राण हो कर गोकुल के बाहर धरती पर ढह पड़ी, इतनी बड़ी कि उसका गिरना ही एक भूकम्प जैसा था। गोपों ने डर और विस्मय से वह दृश्य देखा।


और गोकुल ने पहली बार जाना

यशोदा दौड़ी आईं, काँपती हुई, अपने बालक को उस राक्षसी की छाती से उठा लिया, और छाती से लगा कर रोने लगीं। पर बालक मुस्कुरा रहा था, मानो कुछ हुआ ही न हो। गोपों ने पूतना के विशाल शव को टुकड़े-टुकड़े कर के दूर जला दिया, और कहते हैं उस जलते शव से एक सुगन्ध उठी, क्योंकि जिसे उस बालक ने छू लिया, उसका वैर भी तर गया।

यह कंस का पहला दूत था, और पहली ही बार में गोकुल ने धुँधला-सा यह जाना कि उनके बीच जो बालक खेल रहा है, वह कोई असाधारण है, कि उसकी रक्षा कोई अदृश्य शक्ति स्वयं कर रही है। पर यह तो आरम्भ था। कंस का डर अब और बढ़ने वाला था, और उसके दूत एक के बाद एक आते रहने वाले थे।

आधार: हरिवंश (महाभारत का खिल-पर्व), विष्णु पर्व, अध्याय 50 से 51; समीक्षित संस्करण (पी. एल. वैद्य, भांडारकर प्राच्यविद्या संस्थान, पुणे)। कहानी-रूप में, मूल कथा-क्रम का अनुसरण करते हुए।