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हरिवंशविष्णु पर्व · प्रसंग 7 · अध्याय 50 से 51

हरिवंश · पूतना-वध

वह दाई जो ममता ओढ़ कर मौत बाँटने आई

कंस की धाय आधी रात को पंछी बन कर व्रज पर उतरी और स्त्री बन कर गाड़ी के पहिये के नीचे बिछ गई, दूध से भरे स्तन और एक लम्बी प्रतीक्षा ले कर …

चुना हुआ पुनर्कथनपढ़ने में लगभग 6 मिनट4 पत्र

पढ़ने से पहले

और जिसे वह सदा के लिए सुलाने आई थी, उसी ने उसे सदा के लिए सुला दिया


निद्रा देवी का वह अट्टहास कंस के भीतर से गया नहीं था। जिस कन्या को उसने शिला पर पटका था, वह आकाश में खड़ी हो कर उसे उसका अन्त सुना गई थी, और अब वह स्वयं मान चुका था कि देवकी की गोद ख़ाली कर के भी उसने कुछ नहीं बचाया, कि उसकी मृत्यु अब किसी और दिशा से आने वाली है। लज्जा में डूबा वह अपनी बहन के पास गया, अपने मारे हुए भानजों के लिए काल को दोष दिया, स्वयं को केवल निमित्त कहा, और उसके पाँव छू कर क्षमा माँगी। देवकी ने उसे क्षमा भी कर दिया। फिर भी जब वह अपने महल में लौटा, तो जलते हुए हृदय और बुझी हुई आँखों के साथ, उदास और अनमना। उसका उद्देश्य विफल हो चुका था। और जो मनुष्य अपने काल को ढूँढ़ नहीं पाता, वह हर दिशा में उसी को देखने लगता है।

उधर यमुना के किनारे, गोवर्धन के पास बसे ग्वालों के उस गाँव में, दो बालक बड़े हो रहे थे। बड़े रोहिणी के पुत्र संकर्षण, और छोटे कृष्ण, जिनका रंग बादल जैसा साँवला था, और जो ग्वालों के बीच ऐसे पल रहे थे जैसे समुद्र के ऊपर कोई बादल तैरता हो, बिना यह प्रकट किए कि वे कौन हैं। दोनों सुख से बढ़ रहे थे। पर वसुदेव ने नन्द को यह भार सौंपते समय जो बात कही थी, वह नन्द भूले नहीं थे: “इस कंस से हमें विशेष भय है, बच्चों को मारते हुए उसे तनिक दया नहीं आती; और इस संसार में बच्चों पर और भी अनेक विपत्तियाँ मँडराती हैं, इसलिए रोहिणी के पुत्र को अपने पुत्र की तरह सँभालिए।” व्रज में और कोई नहीं जानता था कि नन्द के आँगन में सोता हुआ बालक कौन है। पर मथुरा के उस डर ने अपना रास्ता खोज लिया था, और एक रात वह डर पंख लगा कर व्रज की ओर उड़ा।


आधी रात का पंछी

वह आधी रात थी। कंस की धाय, वह भयंकर पूतना, मन चाहा रूप धरने में समर्थ, एक पंछी का रूप ले कर पंख फड़फड़ाती हुई ग्वालों के गाँव पर उतरी, और उसके पंखों की उस फड़फड़ाहट में प्राणों का भय था। व्रज की सीमा में घुसते हुए वह बाघ की तरह गरजी। और उस गर्जन के बाद उसने वह रूप उतार दिया। अब आँगन में एक स्त्री खड़ी थी, जिसके स्तन दूध से भरे हुए और भारी थे, देखने में वैसी ही जैसी किसी ग्वाल-बस्ती की कोई भी थकी हुई स्त्री, जिस पर सन्देह करने का कारण किसी के पास न हो।

उसने वह जगह ढूँढ़ ली जहाँ बालक सोता था। नन्द की गाड़ी आँगन में खड़ी थी। पूतना उसी गाड़ी के पहिये के नीचे लेट गई, जैसे घर की ही कोई स्त्री रात के लिए वहीं बिछ गई हो। और फिर उसने प्रतीक्षा की। एक एक कर के घरों के दीये बुझे, गायों की रँभाहट थमी, मथानी की आवाज़ें रुक गईं, और जब व्रज का हर प्राणी नींद में डूब गया, तब उसने नन्हे कृष्ण को अपनी ओर खींचा और अपना स्तन उनके मुँह से लगा दिया।


जिसे सुलाने आई, उसी ने प्राण खींच लिए

पर जिस मुँह से उसने स्तन लगाया था, वह किसी साधारण शिशु का मुँह नहीं था। कृष्ण ने दूध पीना आरम्भ किया, और दूध के साथ साथ पूतना के प्राण भी उनके भीतर खिंचने लगे, एक साँस, फिर दूसरी, फिर वह सब कुछ जिसके सहारे वह जीती थी। जो पीना शुरू हुआ था, वह पूरा हो कर ही रुका, और जब रुका तो पूतना में पीने के लिए कुछ बचा नहीं था।

और तब उस बालक ने एक भयंकर शब्द किया, ऐसा जो सोते हुए पूरे गाँव को चीरता चला गया। पूतना का वह स्तन, जहाँ से वह दूध पिला रही थी, फट गया, और वह वहीं धरती पर गिर पड़ी। जो स्त्री पहिये के नीचे लेटी थी, वह अब उसी मिट्टी पर निष्प्राण फैली पड़ी थी, साँस और चेतना दोनों उसे छोड़ गए थे, जैसे उस साफ़ रात में आकाश से वज्र उतरा हो और उसे वहीं कुचल गया हो।


जो व्रज समझ न सका

उस शब्द से नन्द जागे, दूसरे ग्वाले जागे, और यशोदा जागीं, और वे सब भय से सुध-बुध खो बैठे। बुझे हुए दीये फिर जले। लोग आँगन में दौड़े आए और उन्होंने देखा कि एक स्त्री धरती पर पड़ी है, चेतना गई हुई, स्तन फटा हुआ, जैसे किसी वज्र ने उसे कुचल दिया हो। यह क्या है? यह किसने किया? नन्द को आगे किए हुए सब ग्वाले उसके चारों ओर घेरा बना कर खड़े हो गए, और उस घेरे में कोई नहीं था जिसके पास उत्तर हो।

उन्होंने बहुत सोचा, और कारण किसी तरह हाथ न आया। एक एक कर के, “आश्चर्य है, आश्चर्य है”, कहते हुए वे अपने घरों को लौट गए, और व्रज में उस रात कोई ऐसा नहीं था जो कह पाता कि नन्द के आँगन में क्या हुआ है और क्यों।

जब सब चले गए और आँगन फिर ख़ाली हुआ, तब नन्द यशोदा के पास आए और धीमे, आदर भरे स्वर में बोले। “हम बड़े आश्चर्य में पड़े हैं”, उन्होंने कहा, “और इसका कारण हम किसी तरह खोज नहीं पा रहे। यह जो भी हो, सच यह है कि हमें डर लग रहा है। क्या हमारे बेटे पर कोई संकट है?” यशोदा स्वयं डरी हुई थीं। “हम तो अपने बेटे के साथ सो रही थीं”, उन्होंने कहा, “और इसी भयंकर शब्द से हमारी नींद टूटी। इससे पहले क्या हुआ, हम नहीं जानतीं।”

नन्द ने वह उत्तर सुना, और अपने मित्रों के साथ बैठ कर देर तक उस पर सोचते रहे। जितना सोचते, आश्चर्य उतना बढ़ता, और आश्चर्य के नीचे, धीरे धीरे, एक नाम आ कर बैठ गया जिसे किसी ने पुकारा नहीं था। मथुरा। कंस। जिस राजा से वसुदेव ने उन्हें सावधान किया था, उसी की छाया उन्हें अपने आँगन में दिखने लगी। किसी ने उस बालक की ओर नहीं देखा जो यह सब कर चुका था; सब उस स्त्री को देखते रहे, और डरते रहे। और नन्द की गाड़ी वहीं खड़ी रही, अपने पहिये के नीचे उस रात की गवाही लिए हुए।

आधार: हरिवंश (महाभारत का खिल-पर्व), विष्णु पर्व, अध्याय 50 से 51; अध्याय-संख्या समीक्षित संस्करण (पी. एल. वैद्य, भांडारकर प्राच्यविद्या संस्थान, पुणे) की। कथा मन्मथनाथ दत्त के अंग्रेज़ी अनुवाद (1897) के अध्याय 61 से, जो प्रचलित पाठ पर आधारित है, उसी के कथा-क्रम में।