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हरिवंशविष्णु पर्व · प्रसंग 14 · अध्याय 73 से 78

हरिवंश · कंस-वध

वह अखाड़ा जहाँ अत्याचार मंच से खींच कर गिरा दिया गया

द्वार पर खड़ा एक मदमस्त हाथी, भीतर प्रतीक्षा करते दो महाबली मल्ल, और एक छलाँग जिसने वर्षों के संचित भय को एक पल में फाड़ कर रख दिया

चुना हुआ पुनर्कथनपढ़ने में लगभग 18 मिनट5 पत्र


धनुष टूटने की उस घटना को सोचते-सोचते भोजवंशी कंस शोक और विक्षेप में डूब गया। वह सोचता रहा कि एक बालक पहरेदारों से घिरे लोहे के धनुष को निर्भय हो कर कैसे तोड़ गया और निकल गया; पुरुषार्थ से कोई विधि को रोक नहीं सकता, नारद ने जो कहा था वही घटने लगा है, और उसी भय में उसने देवकी के छह वीर पुत्रों को मार कर वह घोर, निन्दनीय कर्म किया था। यही सोचता हुआ वह अखाड़े के मंच देखने गया और आज्ञा दी कि कल धनुष-यज्ञ होगा; मंच और गलियारे मालाओं, ध्वजों और चँदोवों से सजें, भरपूर गोबर और जल से भरे सोने के कलश रखे जाएँ, और युद्ध-कला के पारखी और नगर के लोग बुलाए जाएँ।

अपने कक्ष में लौट कर कंस ने चाणूर और मुष्टिक को बुलवाया, अपने दरबार के वे दो मल्ल जिनके बल की कहीं जोड़ न थी। वे दोनों प्रसन्न मन से आए, और कंस ने उनसे कहा कि “जो सम्मान हमने आप पर बरसाए हैं वे याद हों, तो अब हमारे लिए एक बड़ा काम कीजिए। व्रज में पले, वन-वन घूमने वाले इन दो ग्वाल-बालकों, कृष्ण और संकर्षण, से अखाड़े में लड़ कर आप उन्हें धरती पर पटकेंगे और मार डालेंगे; पर उन्हें मारने में पूरी सावधानी रखिएगा, चंचल स्वभाव के बालक समझ कर उनकी उपेक्षा न कीजिएगा। अगर ये दोनों अखाड़े में मारे गए तो हमारा कल्याण इस लोक में भी है और परलोक में भी।” लड़ाई के भूखे उन दोनों मल्लों ने हर्ष से उत्तर दिया कि “गोपों के पाप जैसे वे दोनों असहाय बालक अगर हमारे सामने आए, तो उन्हें मरा हुआ ही समझिए, प्रेत के देह में घूमते हुए; और अगर क्रोध में भरे हम लोगों के आगे वे टिक भी गए, तो हम उन्हें आपकी आँखों के सामने ही नष्ट कर देंगे।” यह विष भरी बात कह कर वे अपने घर लौट गए। तब कंस ने अपने महामात्र, हाथी के महावत, से कहा कि “अखाड़े के द्वार पर कुवलयापीड को खड़ा कीजिए, वह बलवान हाथी जो दूसरे हाथियों को रौंदता है, जिसकी कनपटियाँ मद से भीगी रहती हैं और जो मनुष्यों पर सदा क्रुद्ध रहता है; वसुदेव के वे नीच वनवासी पुत्र जब आएँ, तो हाथी को उन पर ऐसे चढ़ाइए कि उनके प्राण वहीं निकल जाएँ। दोनों को मरा देख कर वसुदेव जड़ से कट कर पत्नी समेत नष्ट हो जाएगा, सब मूर्ख यादव आशा छोड़ देंगे, और हम मथुरा को यादवों से खाली कर के सुख से रहेंगे; नारद ने सच ही कहा था कि दुर्बल उग्रसेन से हमारा जन्म हुआ ही नहीं।” महामात्र के पूछने पर कंस ने वह कथा कह सुनाई जो नारद ने उसे बताई थी, कि वह उग्रसेन का क्षेत्रज पुत्र है, राजा की पत्नी से किसी और पुरुष द्वारा जन्मा, और सौभ के दानव-राज द्रुमिल ने उग्रसेन का रूप धर कर उसकी माता को छला था; माता-पिता दोनों उससे घृणा करते हैं और उसके सम्बन्धी उससे भी अधिक, पर वे सब उसे छोड़ दें तो भी वह अपने ही बल से राजसिंहासन पर बना रहेगा। फिर उसने महावत से कहा कि “अंकुश, तलवारें और तोमर ले कर हाथी पर चढ़िए और अखाड़े के द्वार पर प्रतीक्षा कीजिए; देर न कीजिए।”

अगली सुबह अखाड़ा सजा। ऊँचे मंचों पर नगर के लोग उमड़ आए, उत्सुक, भयभीत, और कुछ आशा से भरे। सबसे ऊँचे आसन पर कंस अपने दरबार समेत बैठा, भीतर ही भीतर यह गिनता हुआ कि यह असमान मुक़ाबला कैसे उसके पक्ष में जाएगा। उसने हर वह चाल चली थी जो उसे सूझ सकती थी।


द्वार पर हाथी

जैसे ही कृष्ण और बलराम द्वार पर पहुँचे, महावत ने हाथी को उन पर झपटा दिया। कृष्ण मुस्कुराए और उस दुष्ट-बुद्धि की योजना पर बोले कि “कंस हमें इस हाथी से मरवाना चाहता है; लगता है उसे यमलोक पहुँचने की बड़ी जल्दी है।” पर कृष्ण उस विशाल पशु के सामने ऐसे खेले मानो कोई बड़ा खेल हो। वे उछले, भुजाएँ ठोक कर सिंह की तरह गरजे, उसकी गीली सूँड़ अपनी छाती पर झेली, और उसके दाँतों और पाँवों के बीच ऐसे घूमे जैसे सागर में हवा घूमती है; उसकी पूँछ खींच कर उन्होंने धरती में गाड़ दी, और फिर उसके निचले होंठ पर पाँव जमा कर, दोनों हाथों से, उसके दोनों दाँत उखाड़ लिए।

उन्हीं उखड़े दाँतों से उन्होंने हाथी पर प्रहार किया, बलराम उसे पूँछ से ऐसे घसीटने लगे जैसे गरुड़ किसी सर्प को खींचते हैं, और कृष्ण के एक ही वार से महावत उल्वण घायल हुआ; तब टूटे दाँतों वाला वह हाथी महावत समेत गिर पड़ा, और दोनों भाइयों ने तोरण और दूसरे शस्त्र उठा कर हाथी के पीछे के रक्षकों को भी मार डाला। और फिर वे दोनों भाई, उन दाँतों को हाथ में लिए, हाथी के रक्त और मद से सने, सिंह की तरह छलाँगें भरते अखाड़े में घुसे। वृष्णि, अन्धक और भोज उन्हें देख कर यही समझे कि दोनों अश्विनीकुमार स्वर्ग से उतर आए हैं, और नगर के लोगों का यह स्नेह और आनन्द देख कर कंस शोक से भर गया।


मल्लयुद्ध

तब कंस ने क्रोध से लाल आँखें किए महाबली चाणूर को कृष्ण से लड़ने का आदेश दिया, और बलराम पर अन्ध्र, निकृति और मुष्टिक, पर्वत जैसे तीन मल्ल छोड़े। ऊपर से यह असमान लग रहा था, एक ओर अनुभवी, विशाल, मँजे हुए मल्ल, दूसरी ओर अभी-अभी गाँव से आए दो युवक। तब चुप रहने की राजाज्ञा के बीच यादवों ने एकत्र हो कर मल्लयुद्ध की मर्यादा सुनाई, कि इसमें शस्त्र नहीं चलते, निर्णायक रहते हैं, और बराबर वाला बराबर वाले से भिड़ता है; और कहा कि कृष्ण अभी बालक हैं और सामने का मल्ल प्रौढ़, इस पर विचार होना चाहिए। कोलाहल उठा, और कृष्ण उछल कर बोले, “हम बालक सही, फिर भी इसी पर्वत जैसे मल्ल से लड़ना चाहते हैं, और मर्यादा का उल्लंघन नहीं करेंगे।”

उन्होंने कहा कि “गोबर, जल और अंग मलने की जो विधियाँ मल्लों के कुल ने ठहराई हैं, वे सब मानी जाएँ; अखाड़े में सफलता संयम, धैर्य, पुरुषार्थ, अभ्यास, सदाचार और बल से मिलती है, ऐसा जानकार कहते हैं। हमारे मन में कोई वैर न था; यह मल्ल आज वह वैर जगाने चला है, और इसे हरा कर हम संसार को प्रसन्न करेंगे। करूष देश में जन्मा यह विशालकाय चाणूर मल्ल तो है, पर इसके कर्म तोले जाने चाहिए: अखाड़े में धाक जमाने की लालसा में इसने हारे हुए कई मल्लों को मार कर मल्लों की रीति पर कलंक लगाया है। शस्त्रधारियों की जीत शत्रु को काटने में है और मल्ल की जीत उसे पटकने में; युद्ध में जीतने वाला अमर यश पाता है और मरने वाला देवलोक जाता है, इसलिए पुण्यात्मा उस प्राण लेने वाले युद्ध को सराहते हैं। पर मल्लों की यह रीति बल और कर्म दोनों से परे है; यहाँ मरे हुए को कौन-सा स्वर्ग और जीते हुए को कौन-सा यश? और जो राजा अपनी विद्या के घमंड में, बल दिखाने के लिए, अपने ही आदमियों से मल्लों को मरवाता है, उस हत्या का पाप करने वाले और कराने वाले, दोनों पर पड़ता है।” इतना कहते ही दोनों भिड़ गए, जैसे वन में दो हाथी भिड़ते हैं: एक-दूसरे को लपेटना, पकड़ना, छोड़ना, धरती पर पटकना और हवा में उठाना, खींचना और धकेलना, मुक्के, कोहनी, बाँह और घुटनों के वार, पत्थर जैसी चोटें, और वे दोनों वीर मानो चट्टान के सार से गढ़े हों। उनका यह बाहुबल देख कर सभा में हर्ष की लहर उठी और मंचों से लोग उस करतब की सराहना करने लगे। कृष्ण पर दृष्टि जमाए, पसीने से भीगे मुँह वाले कंस ने दाहिना हाथ उठा कर तुरही रुकवा दी; पर उसकी तुरहियाँ चुप हुईं तो आकाश में देवता अपनी तुरहियाँ बजाने लगे, और जहाँ कमल-नयन हृषीकेश लड़ रहे थे वहाँ चारों ओर अपने आप नगाड़ों का नाद उठा। विद्याधरों के साथ इच्छा से रूप धरने वाले देवता अदृश्य हो कर कृष्ण की विजय की कामना करने लगे, और आकाश में खड़े सप्तर्षियों ने पुकारा कि “कृष्ण, चाणूर मल्ल के रूप में जो दानव है, उसे जीतिए।”

पर देखते-देखते पासा पलट गया। देर तक लड़ते हुए कृष्ण ने चाणूर का बल सोख लिया, धरती काँपी, मंच डोले और कंस के मुकुट से उसका सबसे बड़ा रत्न खिसक कर गिर पड़ा; अन्ततः कृष्ण ने चाणूर को पटक कर उसकी छाती पर घुटना रखा और उसके सिर पर मुक्का मारा, यहाँ तक कि उसकी आँखें बाहर निकल आईं और प्राण छूट गए। चाणूर के मरने पर कृष्ण तोशल से भिड़े और उसे सौ बार घुमा कर धरती पर रगड़ दिया, और बलराम ने मुष्टिक और अन्ध्र से देर तक दाँव पेच खेलने के बाद वज्र जैसे एक मुक्के से उसका सिर फोड़ दिया। अखाड़ा मल्लों से खाली हो गया, और पूरा अखाड़ा स्तब्ध रह गया, मानो किसी को अपनी आँखों पर विश्वास न हो।

नन्द और उनके साथ आए गोप दर्शक सब अंग काँपते हुए खड़े रहे। देवकी के अंग भी काँप रहे थे, छाती में दूध उतर आने की टीस थी और आँखें आनन्द के आँसुओं में भीगी थीं, और वे कृष्ण को निहारती रहीं; और वसुदेव, कृष्ण को देखते हुए आँसुओं से भरे, ऐसे युवा हो उठे मानो बुढ़ापा उतार कर रख दिया हो।


मंच से खिंचा हुआ अन्त

अब वह क्षण आया जिसके लिए यह सारा प्रपंच रचा गया था। कंस के माथे का पसीना बह चला, होंठ क्रोध से काँपने लगे। उसका सारा बल, उसके मल्ल, उसका हाथी, सब उसकी आँखों के सामने मिट चुके थे। उसने क्रोध से आदेश दिया, “वन में घूमने वाले इन दोनों पापी ग्वालों को अखाड़े से बाहर निकाल दिया जाए, हम इन्हें देखना नहीं चाहते; दुष्ट नन्द गोप को लोहे की साँकलों में जकड़ा जाए; वसुदेव हमारा सम्बन्धी हो कर भी बड़ा दुष्ट है, उसे आज ही दण्ड मिले; और कृष्ण के भक्त बाक़ी ग्वालों की गायें और धन छीन लिए जाएँ।”

पर इससे पहले कि कोई हिलता, कृष्ण एक ही छलाँग में उस ऊँचे मंच पर जा पहुँचे जहाँ कंस बैठा था। उन्होंने उसके केश पकड़े, हीरों जड़ा मुकुट धरती पर गिरा, और वे उसे केशों से पकड़े मंच से नीचे उतरे और अखाड़े में घसीटते ले चले, यहाँ तक कि उसके देह ने रेत में एक खाई सी खींच दी। उसी घसीटने में, सबके सामने, उस अत्याचारी का अन्त हो गया, जैसे वर्षों का संचित भय एक पल में फाड़ कर बाहर आ गया हो। धूल से सना, मुकुट से रहित उसका देह अखाड़े में पड़ा था, और उसका साँवला मुख बिना पँखुड़ियों के कमल-सा श्रीहीन हो गया था।

वह न युद्ध में मरा, न किसी बाण ने उसका देह छुआ; केशों से घसीट कर मारा गया कंस वीरों के मार्ग से हटा दिया गया, और उसके देह पर एक साथ केशव के नाखूनों के वे चिह्न उभर आए जिन्होंने उसका माँस चीर कर उसके प्राण लिए थे। काँटा निकल जाने से दुगुने तेज से दमकते कमल-नयन कृष्ण ने पहले वसुदेव के चरण छुए, फिर माँ के चरणों में सिर झुकाया, और देवकी ने आनन्द के आँसुओं की धार से उन्हें भिगो दिया। फिर उन्होंने पद और आयु के क्रम से हर यादव का कुशल पूछा। बलदेव ने कंस के अभिमानी भाई उर्गित को दोनों हाथों से जकड़ कर मार डाला, और व्रज में पले वे दोनों वीर, शत्रु जीत कर और क्रोध शान्त कर, प्रसन्न मन से अपने पिता के घर गए।


विजय के बाद का संयम

कंस की रानियाँ उसके देह को घेर कर यों खड़ी हो गईं जैसे बुझते हुए ग्रह। अपने सिंह जैसे स्वामी को धरती पर पड़ा देख कर वे विलाप करने लगीं कि “हे महाबाहु, आप जैसे वीर-व्रती के मारे जाने पर हम वीर की पत्नियाँ निराश्रित हो गईं, हमारी सब आशाएँ टूट गईं; वह सूर्य जैसा रत्न-जड़ित मुकुट कहाँ गया जो आपके सिर की शोभा बढ़ाता था? आपके परलोक चले जाने पर अन्तःपुर की ये सहस्र पत्नियाँ अपने दिन कैसे काटेंगी? जिसने जरासंध की सेना को हराया, जो बाणों के युद्ध में इन्द्र से भी न हारा, जिसने पाशधारी वरुण को जीता और वासव के न बरसने पर अपने बाणों से मेघ बेध कर नगर के लिए वर्षा उतारी, वह एक साधारण मनुष्य के हाथों कैसे मरा? जिस स्त्री को जीवित रहना हो वह रोए और पछताए; हम तो अपने स्वामी के पीछे जाने वाली हैं, हम क्यों रोएँ?”

इसी बीच कंस की माता काँपती हुई, “मेरा बेटा कहाँ है, मेरा बच्चा कहाँ है”, पुकारती हुई वहाँ आईं। चन्द्रमा की तरह निष्प्रभ अपने पुत्र को देख कर उनका हृदय मानो फट गया, वे बार-बार मूर्च्छित हुईं, और फिर बहुओं के साथ विलाप करने लगीं। बेटे का सिर गोद में रख कर वे कहने लगीं कि “हे वीर-व्रती पुत्र, कुटुम्ब का आनन्द बढ़ाने वाले, आप इतनी जल्दी क्यों चले गए, सब लोगों के सामने आप क्यों सोए पड़े हैं, राजाओं को इस तरह धरती पर नहीं पड़ना चाहिए। पुराने दिनों में रावण ने सब राक्षसों के सामने वह श्लोक कहा था जिसे ऋषि सराहते हैं, कि ‘महाबली हो कर भी मुझ पर अटल विपत्ति अपने कुटुम्ब से आएगी, और मेरे पुत्र पर भी अपने ही सम्बन्धियों से।’” फिर बछड़े से बिछुड़ी गाय की तरह रोती हुई वे अपने पति, वृद्ध राजा उग्रसेन, से बोलीं कि “हे धर्मात्मा राजा, आइए, देखिए, आपका यह राजपुत्र वज्र से टूटे पर्वत की तरह वीर-शय्या पर पड़ा है; यमलोक गए इस पुत्र की अन्त्येष्टि आपको ही करनी है। राज्य वीरों के भोगने की वस्तु है और हम हार चुके; जाइए, कृष्ण से कंस की अन्त्येष्टि की बात कीजिए। वैर मृत्यु के साथ समाप्त हो जाता है, शत्रु के मरते ही मिट जाता है; इस मृत देह ने क्या अपराध किया है?” यह कह कर वे फिर पुत्र का मुख देख कर रोने लगीं कि “हे पुत्र, हम आपकी माँ हैं, हमसे बोलते क्यों नहीं?” रानियों के इस विलाप के बीच सन्ध्या की किरणों से रँगा सूर्य डूब गया।

विष पिए मनुष्य की तरह साँस लेते हुए, पुत्र-शोक में जलते उग्रसेन कृष्ण के पास पहुँचे। उन्होंने देखा कि कृष्ण यादवों से घिरे बैठे हैं और कंस-वध के लिए स्वयं को ही कोस रहे हैं। कंस की पत्नियों का हृदय चीरता विलाप सुन कर कृष्ण यादवों की उस सभा में अपने को धिक्कारते हुए कह रहे थे कि “हाय, बालकों की चपलता और क्रोध के वश में हो कर हमने कंस को मार कर इन सहस्र स्त्रियों को विधवा कर दिया; इन निष्कपट स्त्रियों का रोना सुन कर स्वयं कृतान्त का, मृत्यु के स्वामी का, हृदय भी दया से भर उठे। फिर भी हमने पहले ही ठान लिया था कि धर्मात्माओं को सताने वाला, सदा अधर्म में रत कंस मारा जाए। जो इस संसार में गिरे हुए आचरण का, निर्दय स्वभाव का और मन्द बुद्धि का हो और जिससे प्रजा घृणा करे, उसके लिए जीने से मरना अच्छा है। कंस महापापी था, धर्मात्माओं को कभी प्रिय न था और हर कोई उससे घृणा करता था; उस पर दया कैसी? हमारे हाथों कंस का मारा जाना धर्म ही समझिए, क्योंकि इससे उसके कुकर्मों की जड़ कट गई। अब आप शोक में डूबी स्त्रियों को, नगरवासियों को और व्यापारियों को धीरज दीजिए।”

कृष्ण के यह कहने पर उग्रसेन अपने पुत्र के कुकर्मों के भय से सिर झुकाए यादवों के साथ भीतर आए और यदुओं की उस सभा में कमल-नयन कृष्ण से शोक की भाप से धुँधलाए दीन शब्दों में बोले कि “हे पुत्र, आपका क्रोध शान्त हुआ, आपका शत्रु यमलोक पहुँचा और आपका नाम संसार में फैल गया; इस कर्म से आपने यादवों की जड़ें मज़बूत कीं और मित्रों का सिर ऊँचा किया। हाथियों, घोड़ों, रथों और पैदलों से भरी कंस की यह अमर सेना आप स्वीकार कीजिए; उसका धन, अन्न, रत्न, सोना, वस्त्र, स्त्रियाँ और जो कुछ उसका था, वह सब आपके लोग ले लें। अब यादवों का सुख और दुःख आप ही से चलेगा। अगर आपकी अनुमति हो तो आपके क्रोध की आग में जले पापी कंस की अन्त्येष्टि हो जाए। इस विपत्ति में पड़े राजा का और्ध्वदैहिक कर्म कर के हम अपनी पत्नी और बहुओं के साथ वन में पशुओं के बीच रहेंगे। मृतक की अन्त्येष्टि करना मनुष्यों का धर्म है; चिता रच कर, उसे अग्नि दे कर और जल दे कर हम कंस का ऋण चुका देंगे। हे कृष्ण, बस यही एक प्रार्थना है, इतनी कृपा कीजिए; अन्त्येष्टि हो जाने पर हमारा पापी पुत्र सद्गति पाए।”

उग्रसेन की बात सुन कर कृष्ण को अचरज हुआ, और उन्हें धीरज देते हुए उन्होंने कहा कि “हे तात, राजाओं में श्रेष्ठ, आपने जो कहा वह आपकी आयु, आपके कुल और आपके स्वभाव के योग्य है। जो होना था वह हो चुका, अब आप यह क्यों कहते हैं? मरा हुआ भी कंस राजा के योग्य अन्त्येष्टि पाएगा। आप महान कुल में जन्मे हैं और जो जानने योग्य है सब जानते हैं; फिर यह क्यों नहीं समझते कि विधि अटल है? चर और अचर सब प्राणियों के पुराने कर्म समय पा कर पकते हैं। जो राजा उदार और धनी हों, दीनों पर दयालु, महेन्द्र जैसे पराक्रमी और श्रुतियों के ज्ञाता, उन्हें भी मृत्यु उठा ले जाती है, यह आप भी जानते हैं। सबके हृदय में बसी माया का सच्चा स्वरूप देवता भी नहीं समझ पाते; कर्म ही वह साधन है जिससे लोग मोहित होते हैं। अपने पुराने कर्मों से प्रेरित कंस समय आने पर मरा है। उसका कारण हम में न खोजिए; कर्म और काल ही उसके साधन हैं। सूर्य, चन्द्र और चर-अचर से भरा यह जगत समय में विलीन होता है और समय में फिर उपजता है, और सब प्राणी काल के अधीन हैं। हे राजन, आपका पुत्र अपने ही पाप से भस्म हुआ है और काल उसका कारण है; वह अपने ही कर्मों से मारा गया, और हम उसमें केवल निमित्त हैं। अब इसे जाने दीजिए और जो हम कहते हैं वह कीजिए। हमें राज्य या राजसिंहासन की कामना नहीं है; हमने किसी देश के लिए कंस को नहीं मारा। सब लोकों के हित के लिए हमने इस कुल के अभिशाप, आपके पुत्र, को उसके सेवकों समेत मारा है। इच्छा से उड़ने वाले पक्षी की तरह हम फिर गोपों के साथ गौओं के बीच वन में आनन्द से विचरेंगे। हे राजाओं में श्रेष्ठ, हम सौ बार शपथ ले कर कहते हैं कि हमें राज्य की कोई आवश्यकता नहीं; यह बात सबको बता दीजिए। आप यादवों के नेता और स्वामी हैं, इसलिए हमारे आदर के पात्र हैं; सिंहासन पर बैठिए, राजा बन कर विजय पाइए, और अगर इसमें आपको पीड़ा न हो तो हमारा छोड़ा हुआ यह राज्य सदा के लिए स्वीकार कीजिए।”

यदुओं की सभा में कृष्ण की यह बात सुन कर उग्रसेन लज्जा से सिर झुकाए रहे और कोई उत्तर न दे सके। तब धर्म के ज्ञाता गोविन्द ने उन्हें सिंहासन पर बैठा दिया। सिर पर मुकुट धारण किए सुन्दर, तेजस्वी राजा उग्रसेन ने कृष्ण के साथ कंस के अन्त्येष्टि-कर्म आरम्भ किए, और जैसे देवता इन्द्र के पीछे चलते हैं वैसे ही कृष्ण की आज्ञा से सब प्रमुख यादव नगर के राजमार्ग पर उग्रसेन के पीछे चले। रात बीती और सूर्य निकला तो यादवों ने विधि के अनुसार कंस का देह पालकी में रख कर यमुना के उत्तर तट पर पहुँचाई और क्रम से चिता को अग्नि दी। कृष्ण की अनुमति से उन्होंने कंस के महाबाहु भाई सुनामा की अन्त्येष्टि भी की। फिर बार-बार यह कहते हुए कि “गया हुआ सनातन गति पाए”, वृष्णियों, अन्धकों और यादवों ने दोनों के लिए जल दिया, और उग्रसेन को आगे कर के सब यादव दुःखी हृदय से मथुरा लौट आए। मथुरा से वह काला साया हट गया। पर नगर के बाहर एक संकट अभी खड़ा था: मगध के राजा जरासंध, जिन्होंने अपनी दो सुन्दर, युवा पुत्रियाँ, अस्ति और प्राप्ति, कंस को ब्याही थीं।

आधार: हरिवंश (महाभारत का खिल-पर्व), विष्णु पर्व, अध्याय 73 से 78; अध्याय-संख्या समीक्षित संस्करण (पी. एल. वैद्य, भांडारकर प्राच्यविद्या संस्थान, पुणे) की। कथा मन्मथनाथ दत्त के अंग्रेज़ी अनुवाद (1897) के अध्याय 83 से 87 से, जो प्रचलित पाठ पर आधारित है, उसी के कथा-क्रम में।