वह अखाड़ा जहाँ अत्याचार मंच से खींच कर गिरा दिया गया
अगली सुबह अखाड़ा सजा। ऊँचे मंचों पर नगर के लोग उमड़ आए, उत्सुक, भयभीत, और कुछ आशा से भरे। सबसे ऊँचे आसन पर कंस अपने दरबार समेत बैठा, भीतर ही भीतर यह गिनता हुआ कि यह असमान मुक़ाबला कैसे उसके पक्ष में जाएगा। उसने हर वह चाल चली थी जो उसे सूझ सकती थी।
अखाड़े के द्वार पर उसने कुवलयापीड नाम का एक मदमस्त हाथी खड़ा करवा दिया था, इस आशा में कि भाई भीतर घुसने से पहले ही उसके पाँवों तले कुचल दिए जाएँ। और भीतर उसने अपने दो सबसे बड़े मल्ल बैठा रखे थे, चाणूर और मुष्टिक, जिनके सामने अच्छे-अच्छे पहलवान काँपते थे।
द्वार पर हाथी
जैसे ही कृष्ण और बलराम द्वार पर पहुँचे, महावत ने हाथी को उन पर झपटा दिया। पर कृष्ण उस विशाल पशु के सामने ऐसे खेले मानो कोई बड़ा खेल हो। वे उसके पाँवों के बीच से निकले, उसे छकाया, उसकी सूँड़ से बचते रहे, और फिर एक झटके में उसका एक दाँत उखाड़ लिया।
उसी उखड़े दाँत से उन्होंने उस मदमस्त हाथी और उसके महावत, दोनों का अन्त कर दिया। और फिर वे दोनों भाई, उस दाँत को कन्धे पर रखे, हाथी के रक्त और मद से सने, धीरे-धीरे अखाड़े में घुसे। हर देखने वाले को वे अलग ही दिखे, किसी को वीर, किसी को काल, किसी को देवता; मल्लों को एक चुनौती, स्त्रियों को एक सौन्दर्य, और कंस को, अपनी आती हुई मृत्यु।

मल्लयुद्ध
मल्लयुद्ध शुरू हुआ। कृष्ण चाणूर से भिड़े, और बलराम मुष्टिक से। ऊपर से यह असमान लग रहा था, एक ओर अनुभवी, विशाल, मँजे हुए मल्ल, दूसरी ओर अभी-अभी गाँव से आए दो युवक। दर्शकों में कुछ का मन इन युवकों के लिए दुखी हुआ, कि ये इन दैत्य जैसे मल्लों के सामने कैसे टिकेंगे।
पर देखते-देखते पासा पलट गया। कृष्ण और चाणूर के बीच का युद्ध लम्बा खिंचा, दाँव-पर-दाँव चले, पर अन्ततः कृष्ण ने चाणूर को उठा कर ऐसे पटका कि उसके प्राण वहीं निकल गए। उधर बलराम ने मुष्टिक को अपने मुक्कों से चूर कर दिया। दोनों महाबली मल्ल अखाड़े की धूल में पड़े थे, और पूरा अखाड़ा स्तब्ध रह गया, मानो किसी को अपनी आँखों पर विश्वास न हो।
मंच से खिंचा हुआ अन्त
अब वह क्षण आया जिसके लिए यह सारा प्रपंच रचा गया था। कंस घबरा कर खड़ा हुआ। उसका सारा बल, उसके मल्ल, उसका हाथी, सब उसकी आँखों के सामने मिट चुके थे। उसने चिल्ला कर आदेश दिया, इन्हें बाहर करो, बाँधो, इनकी गायें छीन लो, इनके माता-पिता को बन्दी बना लो।
पर इससे पहले कि कोई हिलता, कृष्ण एक ही छलाँग में उस ऊँचे मंच पर जा पहुँचे जहाँ कंस बैठा था। उन्होंने उसके केश पकड़े, उसका मुकुट गिरा, और उसे सिंहासन से खींच कर नीचे अखाड़े में ला पटका। और वहीं, सबके सामने, उस अत्याचारी का अन्त हो गया, जैसे वर्षों का संचित भय एक पल में फाड़ कर बाहर आ गया हो। जिस कंस के नाम से माएँ अपने बच्चों को डराती थीं, वह अखाड़े की धूल में पड़ा था।

विजय के बाद का संयम
और यहीं कृष्ण ने वह दिखाया जो उन्हें केवल एक बलवान से कहीं बड़ा बनाता है। उन्होंने विजय का दुरुपयोग नहीं किया। उन्होंने कंस का सिंहासन स्वयं नहीं लिया। उन्होंने कंस के बूढ़े पिता उग्रसेन को, जिन्हें कंस ने ही बन्दी बना रखा था, फिर से राजा बनाया।
और फिर वे उस कारागार की ओर गए जहाँ उनके माता-पिता, देवकी और वसुदेव, वर्षों से बन्दी थे। उन्होंने उनकी ज़ंजीरें खोलीं, और पहली बार देवकी ने अपने उस पुत्र को छू कर देखा जिसे वे जन्म के बाद कभी गोद में नहीं ले पाई थीं, जिसके लिए वे छह बार टूटी थीं। वह मिलन आँसुओं से भरा था, पर वे अब पीड़ा के नहीं, मुक्ति के आँसू थे। मथुरा से वह काला साया हट गया। पर हर अन्त किसी नए आरम्भ का द्वार होता है, और कंस का एक शक्तिशाली ससुर, मगध का जरासंध, अभी बाक़ी था।
आधार: हरिवंश (महाभारत का खिल-पर्व), विष्णु पर्व, अध्याय 73 से 78; समीक्षित संस्करण (पी. एल. वैद्य, भांडारकर प्राच्यविद्या संस्थान, पुणे)। कहानी-रूप में, मूल कथा-क्रम का अनुसरण करते हुए।