वह राजा जो धरती से अन्न छीन कर भागी
वंश की धारा में एक राजा हुआ वेन, मृत्यु की पुत्री सुनीथा के गर्भ से जन्मा, और स्वभाव में मानो अपनी नानी का अँधेरा ले कर आया। जन्म से ही उसके भीतर एक टेढ़ापन था, और जब वह राजा बना, तो वह टेढ़ापन पूरी प्रजा पर बरसने लगा।
राजा बनते ही उसने वह किया जो एक अधर्मी सत्ता सबसे पहले करती है। उसने यज्ञ रोक दिए, दान बन्द कर दिया, और घोषणा कर दी कि अब पूजा केवल उसकी होगी, किसी देवता की नहीं। न कोई हवन, न कोई अर्पण, न कोई परम्परा, बस वेन, और वेन का अहंकार। प्रजा उसके इस घमण्ड की चक्की में पिसने लगी।
ऋषियों का धैर्य, और उसकी सीमा
ऋषि उसे समझाने गए, एक बार नहीं, कई बार। उन्होंने उसे धर्म का मार्ग दिखाया, चेताया, हाथ तक जोड़े, और कहा कि राजा प्रजा का रक्षक होता है, उसका भक्षक नहीं; देवताओं का अपमान पूरी सृष्टि का सन्तुलन बिगाड़ देगा। पर वेन हर बार और अकड़ता गया, हर समझाइश को अपनी सत्ता की चुनौती मान कर और कठोर होता गया।
आख़िर जब यह साफ़ हो गया कि यह एक अकेला आदमी पूरी सृष्टि का धर्म डुबा देगा, तो ऋषियों के धैर्य की सीमा आ गई। उन्होंने अपने तप के बल से उसका अन्त कर दिया, यह जानते हुए कि कभी-कभी एक के मिटने से अनेकों का कल्याण होता है। यह कोई क्रोध का काम नहीं था; यह वह कठोर करुणा थी जो रोगी अंग को काट कर शरीर को बचाती है।

मन्थन से निकला राजा
पर राजा बिना धरती कैसे चले, और अराजकता किसी का भला नहीं करती। ऋषियों ने वेन के निर्जीव शरीर का मन्थन किया। पहले उसमें से एक काला, बौना-सा रूप निकला, जिसमें वेन की सारी बुराई, सारा अँधेरा समा गया; उसे ऋषियों ने दूर, सुदूर भेज दिया, ताकि वह बुराई फिर सत्ता तक न पहुँचे।
फिर उसी मन्थन से एक तेजस्वी पुरुष प्रकट हुआ, पृथु। पृथु वह सब था जो उसका पिता नहीं था, धर्मनिष्ठ, प्रजावत्सल, बलवान, विनम्र। उसके जन्म पर ही ऋषियों और देवताओं ने जान लिया कि अब धरती को उसका सच्चा पालक मिल गया है। एक अधर्मी की राख से एक धर्मी का उदय, यह इस सृष्टि का वह नियम है जो आगे बार-बार लौटेगा।
धरती दुही गई
पृथु के सामने पहली परीक्षा भयानक थी। वेन के अधर्म से रूठी धरती ने अपना अन्न, अपनी औषधियाँ, सब अपने भीतर समेट लिया था, और अकाल पड़ गया था। प्रजा भूख से तड़पने लगी। पृथु ने धनुष उठाया और धरती को ही ललकारा। भयभीत धरती गाय का रूप ले कर भागी, और पृथु ने उसका पीछा किया, दिशा-दिशा, जब तक वह थक कर रुक न गई।

हे राजन्, धरती ने हाँफते हुए कहा, मुझे मारो मत; मुझे मार दोगे तो तुम्हारी प्रजा किस पर खड़ी होगी। मुझे दुहो। एक बछड़ा खड़ा करो, एक पात्र रखो, और मैं तुम्हारी प्रजा के लिए अन्न और औषधियाँ फिर बहा दूँगी। पृथु ने वैसा ही किया। उसने धरती को समतल किया, ऊँच-नीच को साधा, और उसे दुहा, और धरती फिर से जीवन देने लगी।
उसी पृथु के नाम से यह धरती पृथ्वी कहलाई, उसकी अपनी पुत्री की तरह, जिसे उसने साधा और पाला। और यहीं वह बात सदा के लिए बँध गई जो आगे हर अच्छे राजा की कसौटी बनेगी, कि राजा धरती का मालिक नहीं, उसका पालक है; वह उसे दुहता है, उजाड़ता नहीं। अधर्म और धर्म की यह पहली बड़ी कथा कह कर, अब वैशम्पायन सूर्य के घर की ओर मुड़ते हैं।
आधार: हरिवंश (महाभारत का खिल-पर्व), हरिवंश पर्व, अध्याय 5 से 6; समीक्षित संस्करण (पी. एल. वैद्य, भांडारकर प्राच्यविद्या संस्थान, पुणे)। कहानी-रूप में, मूल कथा-क्रम का अनुसरण करते हुए।