पढ़ने से पहले
और एक नन्ही लात जिसने बिना हवा और बिना बैलों की लड़ाई के वह भारी गाड़ी उलट दी; और नन्द के व्रज ने अपने ही आँगन में एक ऐसा अचरज खड़ा देखा जिसे बच्चों ने अपनी आँखों से देखा था और बड़ों ने मानने से मना कर दिया
यमुना के तट पर, गोवर्धन पर्वत के पास, नन्द का व्रज बसा था। ठंडी हवा वाला गायों का वह गाँव, जहाँ लताओं से लदे विशाल पेड़ खड़े थे और उनके तनों पर बैलों के कूबड़ और सींगों की खरोंचें थीं, जहाँ ज़मीन इतनी समतल थी कि गायें सुख से चरती फिरतीं और तालाबों की सीढ़ियाँ सधी हुई थीं। बस्ती के घेरे में बछड़ों के लिए खूँटे गड़े थे और रस्सियाँ बँधी थीं, कुटियाँ और देवालय घास से छाए थे, और सुबह से शाम तक मथानी की आवाज़ और दही मथती गोपियों के कंगनों की खनक हवा में तैरती रहती थी। नीले वस्त्र पहने युवतियाँ घी बनातीं, और सिर पर जंगली फूलों की मालाएँ सजाए, दूध के घड़े उठाए गोपियाँ यमुना के रास्ते पर आती जातीं। गाड़ियों के लिए वहाँ चौड़ी राहें थीं, और वे भारी छकड़े, जिन पर बैल जोते जाते थे, घरों के आँगनों में खड़े रहते थे। इसी बस्ती में, ग्वालों के बीच, वह रह रहा था जिसके लिए पृथ्वी ने ब्रह्मा की सभा में पुकार लगाई थी, और रह रहा था ऐसे कि किसी को पता न चले। अपने को पूरी तरह प्रकट किए बिना, एक ग्वाल के घर के बालक की तरह, उसने वहाँ एक लम्बा समय बिताया।
दो नाम, और बादल के रंग का एक बालक
नन्द के घर में दो बालक पल रहे थे, और दोनों की उम्र एक थी। एक रोहिणी की गोद का, जिसे वसुदेव ने संकट की उस रात नन्द के हवाले किया था, और दूसरा यशोदा की गोद का, जिसे नन्द और यशोदा अपना ही मानते थे, और सारा व्रज भी। बड़े का नाम संकर्षण रखा गया, छोटे का कृष्ण। वसुदेव ने बिदा के समय नन्द से कहा था कि दोनों की उम्र एक है, दोनों के नामों का अर्थ भी एक ही ओर जाता है, इसलिए दोनों को एक ही आँख से पालिए; और यह भी कि बचपन में हर बालक अपनी राह पकड़ता है, नटखट होता है, भूलें करता है, सो इन्हें बड़े जतन से सँभालिए, और गोशाला में गायों और बछड़ों से इनकी रक्षा कीजिए। नन्द ने वह बात गाँठ बाँध ली थी। दोनों भाई वहाँ बड़े सुख से बढ़ने लगे, गायों की गन्ध और मथानी की आवाज़ के बीच, जैसे किसी ग्वाल के घर के बच्चे बढ़ते हैं।
पर छोटे वाले का रंग कुछ और ही कहता था। बादल जैसा गहरा नीला वह बालक, आँगन की धूप में, गोपियों की गोद में, ऐसा लगता जैसे बरसात का कोई टुकड़ा उतर कर घर में आ बैठा हो। हरि ने कृष्ण का रूप धर कर मेघ का वह श्याम वर्ण अपनाया था, और ग्वालों के बीच वे वैसे ही बढ़ रहे थे जैसे समुद्र के ऊपर कोई बादल बढ़ता है, धीरे धीरे, उसी नीले में घुला हुआ, और फिर भी उससे अलग। व्रज के लोग उसे देखते, उसका रंग निहारते, और मुस्कुरा कर अपने काम में लग जाते। उन्हें यह पता नहीं था कि जिसे वे नन्द का बेटा कह कर बुला रहे हैं, उसी के जन्म की आशंका में मथुरा का राजा कंस बरसों से देवकी की हर सन्तान को गिनता आया था। व्रज को बस इतना दिखता था कि नन्द के आँगन में एक साँवला बच्चा है, जो दूध पीता है, सोता है, और जागने पर रोता है, जैसे हर बच्चा रोता है।
यमुना का घाट, और छकड़े के नीचे की छाया
उन्हीं दिनों की एक दोपहर। नन्द का छकड़ा आँगन में खड़ा था, वह भारी बैलगाड़ी जिस पर घर का बोझ ढोया जाता था, और उसके नीचे की छाया आँगन की सबसे ठंडी जगह थी। यशोदा ने सोते हुए कृष्ण को वहीं, उसी छाया में, लिटा दिया। बालक गहरी नींद में था, साँस की हल्की उठान के सिवा उसमें कोई हरकत नहीं थी, और यशोदा को, जो अपने बेटों पर जान छिड़कती थीं, लगा कि यह घड़ी भर का काम है। कपड़े धोने थे, स्नान बाक़ी था, और यमुना पास ही थी। वे उसे वहीं सोता छोड़ कर घाट की ओर चल दीं, जैसे व्रज की हर माँ रोज़ जाती थी।
उनके पीछे बालक जागा। जागते ही जो पहला अनुभव हुआ, वह भूख का था, और भूख के साथ माँ की गोद का न होना। उसने रोना शुरू किया, जैसे शिशु रोते हैं, और रोते रोते बाँहें हवा में फेंकने लगा। फिर, खेलते हुए, उसने अपने दोनों पाँव ऊपर उठाए, और उनमें से एक पाँव उस गाड़ी के तले से जा टिका। और वह गाड़ी, जिसे हिलाने के लिए बैल जोतने पड़ते थे, एक नन्हे पाँव की उस ठोकर से उठी और उलट गई। उसके दोनों पहिए आकाश की ओर उठ गए, धुरी टूट गई, जुए की लकड़ी चटक गई, और उस पर रखा मटका फूट कर चारों ओर बिखर गया। हवा का एक झोंका तक नहीं था, आँगन में कोई बैल नहीं लड़ रहे थे, और फिर भी वह गाड़ी पीठ के बल पड़ी थी। और उस सारे शोर के बीच वह बालक घुटनों के बल रेंगता हुआ थोड़ी दूर निकल गया और फिर उसी भूख से दूध के लिए रोने लगा, जैसे कुछ हुआ ही न हो।
यमुना के घाट पर यशोदा का स्नान पूरा हो चुका था और कपड़े धुल चुके थे, पर उनका मन घर की ओर खिंच रहा था। एक माँ के देह को अपने बच्चे की भूख का पता उससे पहले चल जाता है जितनी दूर तक उसकी आवाज़ पहुँचती है। उनके स्तनों से दूध बह कर उनका शरीर भिगो रहा था, जैसे उस गाय का बहता है जिसका बछड़ा खूँटे से बँधा हो और वह दूर खड़ी हो। किसी अनजाने डर से भरी हुई वे तेज़ क़दमों से आँगन में लौटीं, और जो देखा, उससे उनके पाँव वहीं जम गए। गाड़ी उलटी पड़ी थी, पहिए ऊपर, और हवा का कहीं नामोनिशान नहीं। उनके मुँह से चीख़ निकली, और उन्होंने दौड़ कर अपने बच्चे को उठा कर छाती से लगा लिया। बालक साबुत था, रो रहा था, और भूखा था। यशोदा उसे दूध पिलाने बैठीं, और उनकी समझ में कुछ नहीं आया कि यह गाड़ी उलटी कैसे। वे उलटी गाड़ी को देखतीं, फिर बच्चे को, फिर आकाश को, और फिर डर ने उनके भीतर बोलना शुरू किया।
“बेटा”, उन्होंने उस नन्हे मुँह से कहा जो दूध में लगा था, “आपके बाबा बड़े क्रोधी हैं। जब उन्हें पता चलेगा कि हम आपको इस गाड़ी के नीचे सुला कर गई थीं और गाड़ी उलट गई, तो वे क्या कहेंगे, हम नहीं जानतीं। हमारे स्नान से क्या मिला? हमें नदी पर जाने का क्या काम था? हमारी इसी मूर्खता से हमने आपको इस उलटी गाड़ी के नीचे देखा।” उस डाँट में डर था, अपराध था, और वह राहत भी जो बच्चे को साबुत पा कर माँ के भीतर उमड़ आती है और जिसे वह डाँट के सिवा किसी और रूप में निकाल नहीं पाती। बालक ने यह सब सुना, और दूध पीता रहा।
ग्वालों का अचरज
नन्द उस दिन रेशमी वस्त्र पहन कर वन में गायें चराने गए थे। शाम ढले, गायों को आगे किए, वे व्रज में अपने घर लौटे, और आँगन में पहली चीज़ जो आँख पड़ी, वह उलटी हुई गाड़ी थी। दोनों पहिए ऊपर उठे हुए, धुरी और जुआ टूटा हुआ, फूटा मटका ज़मीन पर बिखरा हुआ। जिस गाड़ी को उन्होंने सुबह सीधा खड़ा छोड़ा था, वह पीठ के बल पड़ी थी। और उसी क्षण उन्हें याद आया कि उनका बेटा दिन में कहाँ सोता है। डर ने उनका गला पकड़ लिया। आँखों में आँसू भर आए, और वे तेज़ी से भीतर की ओर बढ़े, बार बार एक ही बात पूछते हुए, “हमारा बेटा ठीक तो है? हमारा बेटा ठीक तो है?”
तब उन्होंने देखा कि वह बालक यशोदा की गोद में बैठा, निश्चिन्त, दूध पी रहा है। नन्द की साँस लौटी। और साँस लौटते ही उनके भीतर का ग्वाल जाग गया, जो जानता था कि एक गाड़ी अपने आप नहीं उलटती। उन्होंने पूछा, “यह गाड़ी उलटी कैसे? बैल तो आपस में लड़े नहीं थे?” यशोदा ने डरी हुई, दबी आवाज़ में उत्तर दिया, “आर्य, हम नहीं जानतीं किसने यह गाड़ी उलटी। हम नदी पर कपड़े धोने गई थीं। लौटीं तो यह ऐसे ही उलटी पड़ी थी।”
पति और पत्नी की यह बात चल ही रही थी कि आँगन में मौजूद व्रज के बालक, जो तब से वहीं खेल रहे थे, बीच में बोल पड़े। “हम अपने आप खेलते खेलते यहाँ आ गए थे”, उन्होंने कहा, “और हमने अपनी आँखों से देखा कि इसी बालक ने पाँव से यह गाड़ी उलट दी।” बच्चों की आवाज़ में वह सीधापन था जिसमें झूठ की जगह नहीं होती, और नन्द उसे सुन कर ठिठक गए। उनके भीतर दो चीज़ें एक साथ उठीं, एक प्रसन्नता जिसका कारण वे बता नहीं सकते थे, और एक डर जिसका कारण वे समझना नहीं चाहते थे। वे सोचते रह गए कि ऐसा हो कैसे सकता है। गोद में दूध पीता एक शिशु, और आँगन में उलटी पड़ी एक गाड़ी, इन दोनों को जोड़ने वाली कोई रेखा उनके अनुभव में नहीं थी।
तब तक आस पास के और ग्वाले भी आ जुटे थे, और बच्चों की बात उन्होंने भी सुनी। पर वे मनुष्य थे, और मनुष्य की जितनी समझ होती है, उतनी ही उनकी थी; बच्चों की बात पर उन्होंने भरोसा नहीं किया। इतनी भारी गाड़ी और एक दूध पीता बच्चा, यह बात उनके तर्क में कहीं बैठती नहीं थी, और जो बात तर्क में नहीं बैठती, उसे बड़े लोग बच्चों की कल्पना कह कर टाल देते हैं। फिर भी उनकी आँखें अचरज से फैली हुई थीं, और कोई उन्हें बन्द नहीं कर पा रहा था। वे उसी अचरज में गाड़ी के चारों ओर खड़े हुए, उसे मिल कर सीधा किया, और उसके पहिए फिर से बाँध दिए। और शाम की मथानी की आवाज़ फिर से व्रज में उठने लगी, जैसे रोज़ उठती थी।
व्रज ने उस उलटी गाड़ी को अपनी स्मृति में रख लिया। आगे जब वन में खड़े वे दो विशाल अर्जुन वृक्ष, जिन्हें सारा व्रज देवता मान कर पूजता था, अपनी जड़ों समेत गिरेंगे, तो वन में घूमने वाले ये ही ग्वाले आपस में कहेंगे कि पूतना का मारा जाना, गाड़ी का टूटना, और अब इन पेड़ों का गिरना, व्रज में यह तीसरा अपशकुन है, और यहाँ अब और रहना ठीक नहीं। पर वह दिन अभी दूर था। अभी तो वह बालक बस घुटनों के बल चलना सीख रहा था, और उसका भाई भी, और व्रज के आँगन उन दोनों की शरारतों के लिए धीरे धीरे तैयार हो रहे थे।
समय बीता, और कृष्ण और संकर्षण नाम के वे दोनों बालक घुटनों के बल चलने लगे। उगते सूर्य जैसे वे दो सुन्दर बालक, मानो एक ही साँचे से ढले हों, दो देहों में एक ही जन, एक ही बिछौने पर सोते, एक ही भोजन पर पलते, एक जैसे वस्त्र पहनते, और वैसे ही खेलते जैसे बालक खेलते हैं। उस खेल के पीछे जो था, वह व्रज में किसी को दिखता न था: दो महान शक्तियाँ, लोकों के साक्षी से अभिन्न, एक ही सत्ता जिसने दानवों के नाश और यज्ञों को फिर से जगाने के उस एक बड़े काम के लिए दो मानव रूप धरे थे; सारे जगत के रक्षक, जो इसी के लिए ग्वालों के घर जन्मे थे। खेलते हुए वे ऐसे लगते जैसे एक ही आकाश में सूर्य और चन्द्रमा, एक दूसरे की किरणों में बँधे हुए। सर्प जैसी भुजाओं वाले वे बालक जहाँ-तहाँ धूल में लोटे दो गर्वीले हाथी के बच्चों जैसे लगते, और कभी राख और सूखे गोबर के चूरे में सने ऐसे चमकते जैसे अग्नि के दो राजकुमार। कभी घुटनों के बल गोशालाओं में घुस जाते और देह और बालों में गोबर लपेटे वहीं खेलते रहते; कभी व्रज के लोगों को छेड़ते और अपनी हँसी से पिता को निहाल कर देते। चन्द्रमा जैसे मुख वाले वे दोनों, जब कौतूहल से भरे होते और लटें आँखों पर आ गिरतीं, और भी सुन्दर लगते। वे इतने चंचल और इतने नटखट हो गए और सारे व्रज में ऐसे घूमने लगे कि नन्द उन्हें किसी उपाय से रोक नहीं पाते थे।
आधार: हरिवंश (महाभारत का खिल-पर्व), विष्णु पर्व, अध्याय 51 से 52; अध्याय-संख्या समीक्षित संस्करण (पी. एल. वैद्य, भांडारकर प्राच्यविद्या संस्थान, पुणे) की। कथा मन्मथनाथ दत्त के अंग्रेज़ी अनुवाद (1897) के अध्याय 60 से 62 से, जो प्रचलित पाठ पर आधारित है, उसी के कथा-क्रम में।