हरिवंश · तृणावर्त और शकट

विष्णु पर्व · प्रसंग 8 · अध्याय 51 से 52

एक बवंडर जो उठा ले गया, और एक गाड़ी जो उलट गई

कंस के अगले दो दूत, एक धूल का काला बवंडर बन कर आकाश में उठा, और एक भारी गाड़ी के रूप में झपटा, और दोनों एक शिशु के भार और एक लात के आगे बिखर गए

पूतना की मृत्यु की ख़बर मथुरा पहुँची, और कंस की बेचैनी और गहरी हो गई। उसकी सबसे निपुण राक्षसी एक शिशु के हाथों मारी गई थी, और यह बात उसके डर को तर्क से परे ले जा रही थी। उसने अपने और दूत भेजे, इस बार और भी विकराल, इस आशा में कि इनमें से कोई तो उस बालक को न छोड़ेगा।


काला बवंडर

एक दिन यशोदा अपने बालक को आँगन में लिटा कर अपने काम में लगी थीं। आकाश अचानक काला पड़ गया, और एक भयानक बवंडर उठा, तृणावर्त, धूल और आँधी का एक घूमता हुआ स्तम्भ, जिसने पूरे गोकुल को धुंध में लपेट लिया। आँखें खुलना मुश्किल हो गया, और जब वह आँधी थमी, तो यशोदा ने देखा कि उनका बालक वहाँ नहीं है। वह आँधी उसे उठा कर आकाश में ले गई थी।

यशोदा का करुण क्रन्दन गोकुल में गूँज उठा। पर ऊपर, आकाश में, एक अनोखी बात हो रही थी। जैसे-जैसे वह असुर ऊपर उठता गया, वह बालक भारी होता गया, और भारी, और भारी, जब तक कि उस बवंडर के लिए उसे सँभालना असम्भव न हो गया। शिशु ने उसका गला कस कर पकड़ लिया, और वह असुर, अपने ही बोझ से और उस नन्ही पकड़ से, दम तोड़ता हुआ नीचे आ गिरा। गिरा केवल असुर; बालक उसकी छाती पर सुरक्षित बैठा था, और रो भी नहीं रहा था।


उलटी हुई गाड़ी

एक और अवसर पर, कथा कहती है, बालक को एक भारी छकड़े, एक बैलगाड़ी, के नीचे छाया में लिटा दिया गया था। उसी गाड़ी में एक असुर समा गया, इस ताक में कि वह गाड़ी सोते हुए शिशु पर गिरा कर उसे कुचल दे। पर बालक ने खेल-खेल में, भूख या किसी ज़िद में, अपना नन्हा पाँव ऊपर उठा कर उस गाड़ी को एक लात मारी।

वह भारी गाड़ी, जिसे कई लोग मिल कर मुश्किल से हिलाते, एक शिशु की लात से उलट गई, उसके बर्तन दूर जा गिरे, और उसमें छिपा असुर वहीं चूर हो गया। गोप दौड़े आए, और हैरान रह गए, इतनी भारी गाड़ी एक बच्चे की लात से कैसे उलट गई। पर बच्चे तो बस यही कहते रहे कि उसी ने पाँव मारा था, और बड़े उसे एक बच्चों की कल्पना समझ कर टाल गए।


खेल, और उसके पीछे की रक्षा

हर बार बाहर से यह केवल एक दुर्घटना, एक आँधी, एक उलटी गाड़ी, एक बच्चों का खेल लगता। और हर बार भीतर ही भीतर एक बड़ा संकट टल जाता। गोकुल के लोग धीरे-धीरे यह अनुभव करने लगे थे कि इस बालक के चारों ओर कुछ असाधारण घटता है, कि वह जहाँ है, वहाँ कोई बड़ी शक्ति पहरा देती है।

कंस के दूत एक-एक कर आते रहे, और एक-एक कर मिटते रहे, पर कंस हार मानने वाला नहीं था। और वे भाई अब बड़े हो रहे थे, गायों के साथ दूर के वनों तक जाने लगे थे, जहाँ नए, और बड़े संकट उनकी प्रतीक्षा में थे।

आधार: हरिवंश (महाभारत का खिल-पर्व), विष्णु पर्व, अध्याय 51 से 52; समीक्षित संस्करण (पी. एल. वैद्य, भांडारकर प्राच्यविद्या संस्थान, पुणे)। कहानी-रूप में, मूल कथा-क्रम का अनुसरण करते हुए।