जब एक बालक ने पूरा पर्वत उँगली पर उठा लिया
वर्षा का मौसम पास था, और हर बरस की तरह वृन्दावन इन्द्र की पूजा की तैयारी में जुट गया था। इन्द्र वर्षा के देवता थे, और गोप मानते थे कि अच्छी वर्षा, हरी घास, भरी हुई गायें, यह सब इन्द्र की कृपा है, इसलिए उनकी पूजा होनी ही चाहिए। बड़े-बूढ़े बड़े उत्साह से सामग्री जुटा रहे थे।
तभी कृष्ण ने एक प्रश्न उठाया, जो सीधा-सा था पर जिसने सबको सोचने पर विवश कर दिया। हम इन्द्र की पूजा क्यों करें, उन्होंने पूछा। हमारा जीवन तो इस गोवर्धन पर्वत से चलता है। इसी की ढलानों पर हमारी गायें चरती हैं, इसी के वन हमें लकड़ी और फल देते हैं, इसी से बहते झरने हमें जल देते हैं। यदि किसी की पूजा होनी है, तो उसकी, जो सचमुच, हर दिन, हमारा भरण करता है। उपकार का बदला उसी को मिलना चाहिए जो उपकार करता है।
पर्वत की पूजा
गोपों को बात जँची। उस वर्ष इन्द्र के लिए जुटाई सामग्री गोवर्धन को अर्पित हुई। गायों को सजाया गया, पर्वत की परिक्रमा की गई, और जो भोग चढ़ा, वह सब में बाँटा गया। कहते हैं स्वयं पर्वत ने एक विशाल रूप ले कर वह भोग स्वीकार किया, और गोपों को आशीर्वाद दिया। वृन्दावन में उत्सव था, हँसी थी, सन्तोष था।
पर ऊपर स्वर्ग में, इन्द्र इस अपमान से तिलमिला उठे। एक गाँव-भर के ग्वालों ने, एक बालक के कहने पर, उनकी अवहेलना कर दी थी, और उनकी पूजा एक पर्वत को दे दी थी। देवराज का अहंकार चोट खा गया, और उन्होंने वह किया जो शक्ति अक्सर अपमान के क्षण में करती है, उन्होंने दण्ड देने का निश्चय किया, और प्रलय के बादलों को आदेश दे दिया।

आकाश फट पड़ा
जो वर्षा आई, वह वर्षा नहीं, प्रलय थी। आकाश मानो फट पड़ा। मूसलाधार जल बरसने लगा, बर्फ़ीली हवाएँ चलने लगीं, बिजली कड़कने लगी, और देखते-देखते पानी चढ़ने लगा। गायें काँपने लगीं, बछड़े बहने को हुए, और लोग भयभीत हो कर अपने घर छोड़ कर कृष्ण के पास दौड़े। हमें बचाइए, वे चिल्लाए; आपके कहने पर हमने इन्द्र की पूजा छोड़ी, अब यह प्रलय हम पर टूट पड़ा है।
कृष्ण शान्त रहे। डरिए मत, उन्होंने कहा; यह क्रोध एक झूठे गर्व का है, और इसका उत्तर भय नहीं, धैर्य है।
सात दिन का छत्र
और फिर कृष्ण ने वह किया जिसकी किसी ने कल्पना भी नहीं की थी। वे उस विशाल गोवर्धन पर्वत के पास गए, और उसे अपनी एक उँगली पर, खेल-खेल में, उठा लिया, जैसे कोई बच्चा छाता उठा ले। उन्होंने पूरे वृन्दावन को, उसके घरों, पशुओं, और लोगों समेत, उस पर्वत के नीचे आ जाने को कहा। सब उस विशाल छत्र के नीचे आ गए, और बाहर प्रलय बरसती रही।

एक दिन, दो दिन, सात दिन, मूसलाधार वर्षा होती रही, और सात दिन वह बालक वैसे ही, बिना थके, बिना हिले, उस पर्वत को अपनी उँगली पर थामे खड़ा रहा, मानो वह कोई भार ही न हो। नीचे लोग सुरक्षित थे, सूखे, और चकित। उन्होंने जिस बालक के साथ खेला था, मक्खन खिलाया था, डाँटा था, वही आज उनके ऊपर एक पर्वत को छत्र बना कर खड़ा था।
आख़िर इन्द्र को समझ आ गया कि यह कोई साधारण ग्वाला नहीं। उनका सारा क्रोध, सारा गर्व, उस अटल उँगली के सामने पिघल गया। वर्षा थमी, बादल छँटे, और इन्द्र स्वयं, अपने ऐरावत पर सवार, नीचे उतर आए। उन्होंने उस बालक के सामने सिर झुका दिया, और अपने अहंकार के लिए क्षमा माँगी। कृष्ण ने पर्वत को धीरे से उसकी जगह रख दिया, और सब अपने घर लौट गए। उस गर्व का यह झुकना ही इस पूरी लीला का असली मर्म था, कि सच्ची सत्ता गरजने में नहीं, थाम लेने में है।
आधार: हरिवंश (महाभारत का खिल-पर्व), विष्णु पर्व, अध्याय 60 से 63; समीक्षित संस्करण (पी. एल. वैद्य, भांडारकर प्राच्यविद्या संस्थान, पुणे)। कहानी-रूप में, मूल कथा-क्रम का अनुसरण करते हुए।