वर्षा के महीने ढल रहे थे। कृष्ण और बलराम वन से व्रज लौटे, तो देखा कि पूरा गोकुल किसी तैयारी में डूबा है। सामग्री जुट रही थी, बड़े-बूढ़े उत्साह से इधर से उधर आ-जा रहे थे। हर बरस की तरह इन्द्र के यज्ञ का समय आ पहुँचा था। कृष्ण ने कौतूहल से पूछा, “यह शक्र का कौन-सा उत्सव है, जिसके लिए आप सब इतने प्रसन्न हैं?”
गोपों में एक बुज़ुर्ग ने उन्हें वैसे ही समझाया, जैसे पीढ़ियों से समझाया जाता आया था। “सुनिए”, उन्होंने कहा, “इन्द्र की ध्वजा क्यों पूजी जाती है। इन्द्र देवताओं के राजा हैं और मेघों के अधिपति हैं, इसीलिए अनादि काल से, पिता से पुत्र तक, यह उत्सव चला आता है। उनके आदेश से बादल नई वर्षा बरसाकर अन्न उपजाते हैं। उसी अन्न से हम जीते हैं, उसी से देवता तृप्त होते हैं, और उनकी उपजाई घास से गायें, बैल और बछड़े पुष्ट हैं। जहाँ कहीं बरसता हुआ बादल दिखे, वहाँ न घास से खाली कोई ज़मीन मिलेगी, न कोई भूखा पशु। सूर्य की किरणों से शक्र जो जल दुहते हैं, उसी को बादल अमृत की धार बनाकर धरती पर लौटा देते हैं, और बादलों से जो सिंहनाद वे छोड़ते हैं, उसे लोग मेघ-गर्जन कहते हैं। इसीलिए, कृष्ण, वर्षा ऋतु ही इन्द्र की पूजा का समय ठहराई गई है। राजा और प्रजा सब इसी ऋतु में उनकी पूजा करते हैं, और हम भी करते हैं।”
कृष्ण ने अन्त तक सुना। फिर उन्होंने वह प्रश्न उठाया, जो एक देवता को आकाश से नीचे उतार लाने वाला था। “हम वन में घूमनेवाले ग्वाले हैं”, उन्होंने कहा। “हमारी जीविका गायें हैं। हमें पूजना ही है तो गायों को पूजना चाहिए, पर्वतों को और वनों को। किसान का जीवन खेती है, व्यापारी का व्यापार, और हमारा गाय। तीनों वेदों के ज्ञाता यही कहते हैं कि हर एक की अपनी जीविका ही उसका बड़ा देवता है, वही पूज्य है, वही कल्याण करनेवाला है। जो एक के उपकार से पलता है और पूजा दूसरे की करता है, उस पर दोहरी विपत्ति आती है, इस लोक में भी और मरने के बाद भी।
“फिर देखिए, हमें सचमुच थामे कौन है। खेतों की रक्षा खेती से होती है, खेतों से वन बचे रहते हैं, और वनों को पर्वत सँभाले खड़े हैं। यही पर्वत हमारा एकमात्र आश्रय हैं। मैंने सुना है कि इस वन के पर्वत जो रूप चाहें धर लेते हैं, और कभी सिंह, कभी बाघ बनकर अपनी ही ढलानों पर घूमते हैं, ताकि जो वन उजाड़ने आएँ उन्हें डराकर अपने जंगल बचा सकें। ब्राह्मण मन्त्रों का यज्ञ करते हैं, किसान को हल की रेखा का यज्ञ करना चाहिए, और हम ग्वालों को पर्वत का। इस पर बहस की कोई आवश्यकता नहीं।”
और उन्होंने गोपों को उस शरद की ओर देखने को कहा, जो वर्षा के पीछे-पीछे चली आ रही थी। बादल जल और बिजली से खाली होकर हाथियों के झुण्ड की तरह आकाश में तैर रहे थे, तालाब हंसों की पाँतों से मुस्करा रहे थे, खेत पके हुए कलम धान से नीले पड़ गए थे, और गायें दुगना दूध दे रही थीं। “ऐसे शरद में”, कृष्ण ने कहा, “हम उस श्रेष्ठ पर्वत की पूजा करेंगे, जिस पर सफ़ेद, लाल और नीले पक्षी बसते हैं और जो फलों से लदा है। और विशेष रूप से गायों की पूजा करेंगे। गायों को सींगों के आभूषण, मोरपंख के मुकुट, गले की घण्टियाँ और शरद के फूल पहनाइए, और अपने कल्याण के लिए उन्हें पूजिए। जैसे देवता शक्र को पूजते हैं, वैसे हम पर्वत का यज्ञ करेंगे। यदि आपको मुझसे कुछ भी प्रेम है, यदि मैं आपका मित्र हूँ, तो गायों की पूजा कीजिए। इसमें सन्देह मत रखिए, और मेरी बात पर प्रश्न किए बिना उसे पूरा कीजिए।”
पर्वत की पूजा
दामोदर की ये अमृत जैसी बातें गोपों के मन में उतर गईं, और उन्होंने बिना हिचक उत्तर दिया। “कृष्ण, आप ही हमारी राह हैं, हमारा सुख हैं, हमारा आश्रय हैं। आपकी कृपा से यह पूरा गोकुल शत्रुओं से मुक्त होकर देवताओं के नगर की तरह सुख से बसा है। आपके जन्म से लेकर अब तक आपके जो काम हमने देखे हैं, वे किसी और के बस के नहीं। जैसे देवताओं में पुरन्दर, वैसे मनुष्यों में आप, और बचपन के पराक्रम में केवल कार्तिकेय आपकी बराबरी कर सकते हैं। जैसे महासागर अपना तट नहीं लाँघता, वैसे ही पर्वत-यज्ञ का आपका यह प्रस्ताव कौन टाल सकता है? तो इन्द्र-यज्ञ की जगह अब गायों और ग्वालों के कल्याण के लिए आपका बताया गिरियज्ञ हो। दूध के पकवान बनें, पनघट पर सुन्दर घड़े सजें, नदियों और नाँदों में दूध भर दिया जाए, और पर्वत पर इतना अन्न-पान पहुँचे कि गोप वहाँ तीन रातें बिता सकें।”
पूरा गाँव हर्ष से भर उठा, और गायें भी जैसे सब समझ गई हों। तुरहियों की आवाज़, बैलों की हुंकार और बछड़ों की पुकार के बीच गोप उस पर्वत पर चढ़े। वहाँ दही की झीलें बनीं, घी के भँवर, दूध की नदियाँ, और भात का एक पहाड़ जैसा ढेर। सैकड़ों पंगतें बिछीं, मालाएँ, इत्र और धूप सजे, और शुभ मुहूर्त में गोपों ने ब्राह्मणों के साथ गिरियज्ञ सम्पन्न किया। ब्राह्मण जी भरकर खाकर तृप्त हुए और आशीर्वाद के मन्त्र पढ़ते हुए लौटे।
और तब वह हुआ जिसकी किसी ने कल्पना नहीं की थी। यज्ञ पूरा होते ही पर्वत की चोटी पर एक विराट देह उठा, दिव्य मालाओं और चन्दन से सजा हुआ, और उसने अपने हाथों से वह सारा भोग ग्रहण कर लिया। वह रूप कृष्ण का ही था। अपनी माया से उन्होंने गोवर्धन का रूप धरा था, और जब ऊपर वह विराट आकार पहाड़ के आगे रखा भोग खा रहा था, नीचे वह बालक कृष्ण गोपों के बीच खड़ा उनके साथ झुककर अपने ही छिपे स्वरूप की वन्दना कर रहा था। “मैं तृप्त हुआ”, उस रूप ने मुस्कराकर कहा। चकित गोपों ने उस देव की शरण ली और हाथ जोड़कर पूछा, “प्रभु, हम आपके सेवक हैं, आज्ञा दीजिए, हम क्या करें।”
पर्वत के भीतर से आती आवाज़ में उत्तर मिला। “यदि आपको गायों पर दया है, तो आज से मेरी पूजा कीजिए। मैं आपका हित चाहनेवाला पहला देवता हूँ, और मेरी ही कृपा से आपके पास करोड़ों अनमोल गायें हैं। आप मेरे हो जाएँ, तो मैं इस वन में आपका कल्याण करूँगा, और नन्द और दूसरे बड़े गोपों को वह धन दूँगा जो ग्वालों के योग्य है। अब गायें अपने बछड़ों के साथ मेरी परिक्रमा करें।”
गायों के सींग मालाओं से सजे थे, माथे पर मोरपंख के मुकुट, और वे बैलों समेत झुण्ड बनाकर पर्वत के चारों ओर चल पड़ीं। लाल, किरमिज़ी और पीले वस्त्रों में, बाँहों पर मोरपंख बाँधे गोप उन्हें हाँकते पीछे-पीछे चले, कोई नाचता हुआ, कोई बैल पर सवार। उत्सव पूरा हुआ, तो पर्वत पर खड़ा वह देव अचानक अदृश्य हो गया, और कृष्ण गोपों के साथ व्रज लौट आए। बच्चे और बूढ़े, सब उस दिन का आश्चर्य देखकर मधुसूदन का यश गाते रहे।
पर ऊपर स्वर्ग में शक्र ने इसे अपमान समझा, और भुला न सके। ग्वालों के एक पूरे गाँव ने, एक बालक के कहने पर, देवराज को किनारे करके उनका उत्सव एक पहाड़ को सौंप दिया था। उन्होंने सांवर्तक मेघों को बुलाया, उन काले बादलों को जो युग के अन्त पर सृष्टि को डुबोते हैं, और आज्ञा दी। “वृन्दावन के ये सब लोग दामोदर से बँध गए हैं”, उन्होंने कहा, “और नन्द और बाक़ी गोप मेरे उत्सव के विरोधी हो गए हैं। सात रातों तक वर्षा और आँधी से उन गायों को सताया जाए, जो उन लोगों का पूरा जीवन हैं और जिनके कारण ही वे गोप कहलाते हैं। मैं स्वयं ऐरावत पर बैठकर वज्र और बिजली जैसी भयानक वर्षा बरसाऊँगा। गायों और व्रज के सब लोगों को तभी छोड़ा जाए, जब वे धरती चूम चुके हों।”
आकाश फट पड़ा
इन्द्र ऐरावत पर चढ़े और स्वयं तूफ़ान को नीचे हाँक लाए। पर्वत जैसे बड़े, गहरे नीले बादल गरजते हुए चारों ओर से आकाश पर छा गए, उनमें लगातार बिजली कौंधती थी, और उन्होंने दिन को अँधेरे में लपेट दिया। कोई बादल हाथी जैसा था, कोई मगर जैसा, कोई साँप जैसा, और वे एक-दूसरे से सटकर ऐसे चले जैसे दस लाख हाथी कन्धे से कन्धा मिलाए चल रहे हों। फिर वह छत टूट पड़ी। कहीं धारें आदमी की बाँह जितनी मोटी थीं, कहीं हाथी की सूँड़ जितनी, कहीं बाँस जैसी सीधी। लोगों ने ऊपर देखा तो उन्हें सिर पर एक अथाह समुद्र खड़ा दिखा, जिसका न तल था, न किनारा। पक्षी घोंसलों से नहीं निकल सके, जंगल के पशु दिशाओं में भाग गए। ग्रह और तारे छिप गए, सूर्य और चन्द्रमा से खाली आकाश अपनी चमक खो बैठा। व्रज की ज़मीन एक तालाब बन गई, मोर चीख़ रहे थे, और नदियाँ उफनकर अपने तटों के पेड़ उखाड़ ले गईं। गोप एक-दूसरे से कह रहे थे कि “लगता है संसार का अन्त आ गया, अब सारी पृथ्वी पानी की एक चादर बन जाएगी।”
गायों पर यह प्रलय सबसे भारी पड़ा। वे जड़ होकर खड़ी थीं और रँभा रही थीं। देह भीग चुका था, पाँव हिलते न थे, रोएँ खड़े, पेट और थन सिकुड़े हुए। कुछ थककर गिर पड़ीं, कुछ डर के मारे भागीं, कुछ बछड़ों समेत उस बर्फ़ीले पानी में धँस गईं, और कुछ भूख से पिचके पेट लिए अपने बछड़ों को देह से लपेटकर लेट गईं। कहनेवाले कहते हैं कि काँपती, दीन मुख लिए वे गायें और बछड़े कृष्ण की ओर देखकर पुकार उठे, “बचाइए, हमें बचाइए।” गोपों ने अपने डूबते घर छोड़ दिए और कृष्ण के पास दौड़े। “हमें बचाइए”, वे चिल्लाए, “आपके कहने पर हमने इन्द्र की पूजा छोड़ी, और अब यह प्रलय हमारे सिर पर टूट पड़ा है।”
गायों की यह दुर्दशा और गोपों पर मँडराती मृत्यु देखकर मधुरभाषी कृष्ण के भीतर क्रोध उठा। वे कुछ पल सोचते रहे, और अपने मन से बोले। “मैं जानता था कि यह होगा। इस वर्षा से इन्हें बचाने के लिए मैं वनों समेत इस श्रेष्ठ पर्वत गोवर्धन को उखाड़ लूँगा और उसे गायों का आश्रय बना दूँगा। यह पर्वत, मेरे हाथ पर उठा हुआ, गायों और ग्वालों की रक्षा करेगा, इसमें सन्देह का लेश भी नहीं।” फिर उन्होंने लोगों से कहा, “डरिए मत।” यह बरसात एक चोट खाए गर्व की है, और उसका उत्तर धैर्य है।
सात दिन का छत्र
यह सोचकर उन्होंने अपनी भुजाओं का बल दिखाया। सत्य जिनका पराक्रम था, उन कृष्ण ने उस पहाड़ को हाथों से उखाड़ा और बाएँ हाथ पर थाम लिया, और बादलों से ढका वह पर्वत अपनी गुफाओं के कारण किसी घर जैसा दिखने लगा। उखड़ते ही उसकी ढलानों की चट्टानें हिलीं और पेड़ गिर पड़े। जो कभी हिलता नहीं था, वह घूमती चोटियों और काँपते शिखरों के साथ आकाश में उठ गया। बादल उसके पार्श्व पर पानी उँड़ेल रहे थे, धारों से उसकी चट्टानें ढीली हो रही थीं, और झरनों से मिलकर बादल ऐसे लगे जैसे पर्वत ने मोरपंख पहन लिए हों। विद्याधर, नाग, गन्धर्व और अप्सराएँ चारों ओर से पुकार उठे कि “गोवर्धन को पंख लग गए हैं, वह उड़ रहा है।” उसकी उखड़ी हुई जड़ से सफ़ेद, लाल और काली धातुएँ बह निकलीं। फन वाले साँप अपने बिलों से निकल आए, पक्षी डर के मारे बार-बार ऊपर-नीचे उड़ते रहे, सिंह जल भरे बादलों की तरह दहाड़े। कृष्ण के दण्ड जैसे हाथ पर टिका, नीले बादलों से ढका वह विशाल पर्वत एक छत्र जैसा दिखा। और कहनेवाले कहते हैं कि बादलों की गुनगुनाहट में गोवर्धन को नींद आ गई, और वह अपना गुफा जैसा मुख कृष्ण की बाँह के तकिए पर रखकर सो गया।
फिर गोपों की रक्षा के लिए उन्होंने उस पर्वत को ऊपर उठाकर अपनी उँगली की नोक पर रख लिया, और मुस्कराकर बोले। “देवताओं की समझ से भी परे किसी दिव्य उपाय से मैंने यह पहाड़ का घर बनाया है, गायों का आश्रय, जहाँ हवा नहीं चलती। गायों के झुण्ड शीघ्र इसमें आ जाएँ और सुख से रहें। आप लोग अपने पद और अपने झुण्डों की गिनती के हिसाब से इसके भीतर अपनी-अपनी जगह बाँट लीजिए। यह घर पाँच कोस लम्बा और एक कोस चौड़ा है, इसमें तीनों लोक समा सकते हैं, व्रज की तो बात ही क्या।”
बाहर बादलों की गरज और गायों के रँभाने के बीच गोपों का कोलाहल उठा। ग्वालों ने गायों को पाँतों में लगाया और वे उस पर्वत की विशाल गुफा में चली गईं। व्रज के लोग अपने छकड़े और बरतन लेकर उस पत्थर के घर में आ गए। और कृष्ण उस पर्वत के पाँव में उठते हुए पत्थर के खम्भे की तरह खड़े रहे, एक हाथ पर उस पहाड़ को ऐसे थामे जैसे कोई किसी प्रिय अतिथि को थामे रखता है। बाहर प्रलय बरसता रहा, और उसे बरसने को कुछ न मिला।
एक दिन, दो दिन, सात दिन। बरसात होती रही, और उतने ही दिन वह बालक बिना हिले, बिना थके खड़ा रहा, पर्वत उसकी उँगली पर ऐसे टिका था मानो उसका कोई भार ही न हो। नीचे लोग सूखे थे, सुरक्षित थे, और आश्चर्य से मूक। जिसे वे नन्द का बेटा कहकर पुकारते थे, वह आज सात रातें जागकर उनके सिर पर एक पर्वत की छत ताने खड़ा था।
शतक्रतु ने ऊपर से देखा कि उनकी सात रातों का प्रलय एक उठे हुए पर्वत पर टूटकर व्यर्थ जा रहा है, और नीचे का बालक न थका है, न हिला है। उनका कहा हर शब्द झूठा पड़ चुका था। उन्होंने बादलों को रुकने की आज्ञा दी और स्वर्ग लौट गए। आकाश बादलों से खाली होकर निर्मल हुआ, और सूर्य अपने पूरे तेज में निकला। गायें और ग्वाले उसी रास्ते से बाहर आए जिससे भीतर गए थे, और प्रसन्न मन से कृष्ण ने उस श्रेष्ठ पर्वत को उसकी जगह फिर स्थापित कर दिया।
पर गोवर्धन को उठा हुआ और गायों को बचा हुआ देखकर पुरन्दर के मन में अचरज के साथ कृष्ण को देखने की इच्छा जागी। ऐरावत पर बैठे वे किसी जल-हीन बादल की तरह धरती पर उतरे, और देखा कि कृष्ण गोवर्धन के पाँव में बैठे हैं, ग्वाले के भेस में, अपने तेज से दमकते अविनाशी विष्णु। हज़ार आँखों वाले शक्र ने अपनी सारी आँखों से उन्हें देखा, छाती पर श्रीवत्स का चिह्न, नीले कमल जैसा रंग, मनुष्यों की भूमि पर कोई अमर, और शक्र को लज्जा आई। ऊपर, किसी को दिखे बिना, पक्षिराज गरुड़ अपने पंख फैलाए उन्हें धूप से बचा रहे थे। इन्द्र हाथी को पीछे छोड़कर पैदल उस ओर बढ़े, जहाँ वह बालक मनुष्यों का सा खेल खेल रहा था। माथे पर सूर्य जैसा तेजस्वी मुकुट, कानों में दिव्य कुण्डल, छाती पर पद्मकान्त मणियों का पाँच लड़ का हार, वज्रधारी वासव उपेन्द्र के पास पहुँचकर और भी सुन्दर लगे। फिर उस गहरी आवाज़ में, जो बादलों की गरज जैसी थी और जो देवताओं को आज्ञा देने की अभ्यस्त थी, उन्होंने कहा।
“कृष्ण, महाबाहु, अपनी गायों पर प्रसन्न होकर आपने जो किया, वह देवताओं के बस का नहीं। मेरे रचे उन बादलों से, जो संसार का अन्त करते हैं, आपने गायों को बचा लिया। आपने अपने ही योगबल से इस पर्वत को आकाश में एक घर की तरह थामा, यह देखकर किसका मन अचरज से न भर उठे? मेरा यज्ञ रोका गया तो मैं क्रोध में था। इसीलिए मैंने सात रातों की यह अतिवृष्टि भेजी, जिसे देव और दानव भी नहीं झेल सकते, और आपने मेरे ही सामने, अपने बल से, उसे दबा दिया। देवताओं में, और सब लोकों में, केवल आप सनातन हैं। जो भार आपने उठाया, उसे उठा सकनेवाला दूसरा मुझे कहीं नहीं दिखता। जैसे धातुओं में सोना, वैसे ब्रह्मा की रची यह पूरी सृष्टि आपके देह में बसी है। जैसे कोई लँगड़ा किसी दौड़ते हुए का पीछा नहीं कर सकता, वैसे स्वयं ब्रह्मा भी बुद्धि या आयु में आपके पीछे नहीं चल सकते। पर्वतों में हिमालय, जलों में महासागर, पक्षियों में गरुड़, वैसे देवताओं में आप।”
फिर इन्द्र ने लोकों की सीढ़ी गिनाई, नीचे के जल से लेकर मनुष्यों के लोक, सूर्य के द्वार और उस देवलोक तक जहाँ वे स्वयं राजा हैं, और उसके ऊपर ब्रह्मलोक। “और उससे भी ऊपर”, उन्होंने कहा, “महाकाश में गोलोक है, सब लोकों में श्रेष्ठ, जिसकी रक्षा साध्य करते हैं। वहीं आप रहते हैं, ऐसा तप करते हुए जिसे हम पितामह से पूछकर भी नहीं जान पाते। गोलोक केवल गायों को मिलता है, कठिन से कठिन तप से भी वहाँ कोई और नहीं पहुँचता। उन्हीं गायों की रक्षा के लिए, कृष्ण, आपने गोवर्धन उठाया और मेरी भेजी विपत्ति को रोक दिया। इसलिए पितामह और गायों के कहने पर, और आपके आदर में, मैं यहाँ आया हूँ।
“कृष्ण, मैं भूतों और देवताओं का स्वामी पुरन्दर हूँ, अदिति से जन्मा आपका बड़ा भाई। मैंने बादलों के रूप में जो अपना बल दिखाया, वह भी आपके ही बल का अंश था, उसके लिए मुझे क्षमा कीजिए। अब वह सुनिए जो ब्रह्मा और आकाश की गायों ने कहलाया है। ‘आप गोलोक की और सब गायों की रक्षा करें, तो हमारा वंश बैलों के सहारे बढ़ता रहेगा, और हम किसानों को बैल देंगी, देवताओं को हवि, और लक्ष्मी को बढ़ता हुआ अन्न।’ प्रभु, आप हमारे गुरु हैं और रक्षक। हमारे राजा और स्वामी बनकर, आज इस सोने के कलश के दिव्य जल से, जिसे मैं अपने हाथों से लाया हूँ, स्वयं अपना अभिषेक कीजिए।
“मैं देवताओं का राजा हूँ, और आप, सनातन होकर भी, आज से गायों के राजा हुए। इसलिए इस लोक के लोग आपको गोविन्द कहकर गाएँगे। जैसे इन्द्र का पद मुझे मिला है, वैसे आप गायों के इन्द्र हैं, और देवता आपका नाम उपेन्द्र लेंगे। मेरी वर्षा के चार महीनों में से पिछला आधा, शरद, मैं आपको देता हूँ। पहले दो महीने मेरे रहेंगे, और वर्षा के बीतने पर लोग मेरी ध्वजा उतारकर आपकी पूजा करेंगे। तब मोर मेरे बादलों का गर्व छोड़कर चुप हो जाएँगे, नदियों के तट हंसों और सारसों से भर जाएँगे, गायें भरपूर दूध देंगी, और खेत धान से नीले हो जाएँगे। तब आप अपनी शय्या से उठेंगे। मनुष्य और अमर मुझे महेन्द्र और आपको उपेन्द्र कहकर पूजेंगे, और जो हम दोनों की इस कथा को कहकर हमें प्रणाम करेगा, उस पर कोई दुख नहीं आएगा।”
फिर देवराज ने दिव्य जल के उन कलशों से गोविन्द का अभिषेक किया। उन्हें इस तरह अभिषिक्त देखकर स्वर्ग में खड़ी गायों ने भी, बैलों के साथ, बादलों के बीच से अपने दूध की वर्षा से उन्हें सींचा। निर्मल बादलों ने अमृत बरसाया, पेड़ों से चन्द्रमा जैसी बूँदें टपकीं, आकाश से देवताओं ने सिंहनाद किया, फूल बरसाए और तुरहियाँ बजाईं, और महर्षियों ने मन्त्रों में उनका यश गाया। उस एक फैले हुए समुद्र से पृथ्वी का देह फिर अलग हुआ, हवाएँ संसार के कल्याण के लिए बहीं, सूर्य, चन्द्रमा और तारे अपनी-अपनी राह पर लौट आए, पेड़ पत्तों और फूलों से सजे, वन में हिरन हर्षित हुए, और मनुष्यों की भूमि स्वर्ग की तरह अमृत से तृप्त हुई।
यह राज्याभिषेक पूरा होने पर पुरन्दर ने गायों के राज्य पर बैठे गोविन्द से कहा, “आपको गायों का राजा बनाने का पहला काम हो गया, अब मेरे आने का दूसरा प्रयोजन सुनिए। कंस को, केशी नाम के उस घोड़े को और सदा उपद्रव करनेवाले अरिष्ट को शीघ्र मारकर अपने राज्य को सँभालिए। और आपकी बुआ कुन्ती से मेरे तेज का एक अंश अर्जुन नाम का पुत्र जन्मा है। उससे मित्रता कीजिए और सदा उसकी रक्षा कीजिए, क्योंकि भारत का आनेवाला युद्ध उस पर और आप पर टिका है। उसे मुझ जैसा जानिए, और मुझे अपने जैसा।” ग्वाले बने कृष्ण ने प्रसन्न मन से उत्तर दिया। “शचीपति, आपने जो कहा है, उसमें से कुछ अधूरा नहीं रहेगा। मैं जानता हूँ कि मेरी बुआ पाण्डु को दी गईं और उन्होंने अर्जुन को जन्म दिया, और पाण्डु के बाक़ी पुत्रों को भी मैं जानता हूँ। मेरे सामने अर्जुन को कोई शत्रु छू नहीं सकेगा, और भारत का महायुद्ध पूरा होगा, तब मैं पाण्डु के सब पुत्रों को कुन्ती को सकुशल लौटा दूँगा। आपका पुत्र जो कहेगा, वह मैं सेवक की तरह पूरा करूँगा।”
सत्यवादी कृष्ण की यह बात सुनकर देवराज देवताओं के नगर लौट गए। और गोवर्धन को थामनेवाले वे सुन्दर बालक व्रज में लौटे, जहाँ पूरा गाँव उनके स्वागत में उमड़ पड़ा।
आधार: हरिवंश (महाभारत का खिल-पर्व), विष्णु पर्व, अध्याय 60 से 63; अध्याय-संख्या समीक्षित संस्करण (पी. एल. वैद्य, भांडारकर प्राच्यविद्या संस्थान, पुणे) की। कथा मन्मथनाथ दत्त के अंग्रेज़ी अनुवाद (1897) के अध्याय 70 से 74 से, जो प्रचलित पाठ पर आधारित है, उसी के कथा-क्रम में।
यही कथा वहाँ भी
- गोवर्धन
श्रीमद्भागवत (स्कन्ध 10) का गोवर्धन-प्रसंग