पहली नीरवता, और पहली ध्वनि
महाभारत का पूरा आख्यान सुन चुकने के बाद भी जनमेजय का मन भरा नहीं था। जिस कथा में कुरुओं का उत्थान और पतन, अठारह दिन का वह महायुद्ध, और कृष्ण की हर लीला समाई थी, उसे सुन कर भी एक कोना ख़ाली रह गया था। उन्होंने वैशम्पायन की ओर हाथ जोड़ कर कहा, हे विप्र, आपने कुरुओं का जन्म तो विस्तार से सुनाया, पर वह कुल जिसमें स्वयं वासुदेव कृष्ण उतरे, वह वृष्णि और अन्धक का यदुवंश, उसकी कथा अभी अधूरी रह गई। मुझे वही आदि से सुनाइए, एक-एक नाम, एक-एक कर्म।
वैशम्पायन मुस्कुराए, क्योंकि यह प्यास उन्हें अच्छी लगी। जो इस वंश-कथा को धारण करता है या मन लगा कर सुनता है, उन्होंने कहा, वह अपने ही वंश को थामे रहता है और पुण्य का भागी होता है। पर इस वंश तक पहुँचने के लिए, राजन्, बात बहुत पीछे से उठानी होगी, इतनी पीछे से कि वहाँ अभी न कोई नाम है, न रूप, न समय। और तब उन्होंने वह कथा छेड़ी जो सृष्टि के पहले क्षण से शुरू होती है।
अव्यक्त, और उससे फूटा संसार
आरम्भ में, वैशम्पायन ने कहा, केवल वह था जो अव्यक्त कहलाता है, न सत् न असत्, न दिन न रात, बस एक नित्य और निराकार कारण, जिससे आगे सब कुछ निकलना था। वह कोई आकाश में तैरता विचार नहीं था; वह वह गहरी नीरवता थी जिसमें से एक दिन पहली ध्वनि उठनी थी, वह ख़ाली पट जिस पर अभी पूरा संसार चित्रित होना था।
उसी अनादि से एक हलचल जागी, जिसे प्रकृति और पुरुष कहते हैं, और उसी से यह विश्व परत-दर-परत खुलने लगा। उसी से ब्रह्मा प्रकट हुए, अमित तेज वाले, सब प्राणियों के रचयिता। उनसे एक बड़ी चेतना फूटी, उससे अहंकार का वह पहला भाव कि मैं हूँ, और उसी से धीरे-धीरे पाँच महाभूत बने, और भूतों से असंख्य प्राणी। यही वह सनातन क्रम है जो हर कल्प के आरम्भ में दुहराया जाता है, मानो कोई बार-बार वही धुन छेड़ देता हो, और हर बार उसी धुन पर एक नया संसार नाच उठता हो।

दक्ष, और सृष्टि की हज़ार धाराएँ
ब्रह्मा ने पहले अपने ही मन से कुछ पुत्र रचे, और फिर सृष्टि का असली भार दक्ष को सौंप दिया। दक्ष ने प्रजा रची, और उन्हीं की कन्याओं से देव, दानव, गन्धर्व, नाग, यक्ष और मनुष्य, सृष्टि की हर दिशा भर गई। धर्म से शतरूपा का जन्म हुआ, और इसी क्रम में वे दो बड़ी धाराएँ बहीं जो आगे चल कर सूर्यवंश और चन्द्रवंश कहलाईं।
देवताओं ने सोम को, चन्द्रमा को, एक विशेष अधिकार सौंपा, ब्राह्मणों का, औषधियों का, नक्षत्रों और ग्रहों का, यज्ञों और तपों का स्वामित्व। सोम ने बड़ा यज्ञ किया, ऐश्वर्य पाया, पर उसी ऐश्वर्य के मद में एक ऐसी भूल कर बैठा जिसका फल पूरे चन्द्रवंश को भुगतना पड़ा। शक्ति जब बढ़ती है तो अक्सर अपने साथ एक अन्धापन ले आती है, और सोम भी उससे अछूता न रहा। पर वही चन्द्र-धारा आगे बढ़ती रही, और बहुत आगे जा कर उसी में यदु जन्मने थे।
और काल का पहिया घूमता रहा
इतना कह कर वैशम्पायन ने जनमेजय को वह दिखाया जो हर कथा के पीछे चुपचाप घूमता रहता है, काल का बड़ा पहिया, मन्वन्तरों का चक्र। कितने मनु हो चुके, कितने और होंगे, और हर मनु के साथ कैसे एक पूरा युग-समूह उठता है, फलता है, और फिर ढल जाता है। इसी विराट प्रवाह में वे सब वंश तैरते हैं जिनकी कथा आगे आनी है, छोटे-से बुलबुलों की तरह, और फिर भी हर बुलबुले में एक पूरा जीवन, एक पूरा संसार।

सृष्टि का यह विशाल ढाँचा खड़ा हो चुका था। अब इसी ढाँचे के भीतर पहली बड़ी कथा उठनी थी, एक ऐसे राजा की कथा जो अधर्म का पर्याय बन गया, और एक ऐसे राजा की, जो उसी के शरीर से धर्म बन कर निकला।
आधार: हरिवंश (महाभारत का खिल-पर्व), हरिवंश पर्व, अध्याय 1 से 4; समीक्षित संस्करण (पी. एल. वैद्य, भांडारकर प्राच्यविद्या संस्थान, पुणे)। कहानी-रूप में, मूल कथा-क्रम का अनुसरण करते हुए।