एक पत्र, और एक स्त्री का अपने जीवन पर अपना अधिकार
द्वारका के इन्हीं दिनों में विदर्भ की राजकुमारी रुक्मिणी की कथा आती है। उसने कृष्ण को कभी देखा नहीं था, पर उनके गुणों, उनके कर्मों, उनके चरित्र की कथाएँ सुन-सुन कर मन ही मन उन्हें अपना वर मान लिया था। उसके लिए यह कोई क्षणिक मोह नहीं था; यह एक सोचा-समझा निर्णय था, उस पुरुष को चुनना जिसके बारे में उसने जो भी सुना, वह उसके हृदय को भा गया।
पर उसके बड़े भाई रुक्मी को यह स्वीकार नहीं था। वे अपनी बहन को अपने मित्र शिशुपाल के हाथ देना चाहते थे, और उनका कृष्ण से एक पुराना बैर भी था। विवाह का दिन तय हो चुका था, और रुक्मिणी की अपनी इच्छा किसी ने नहीं पूछी थी, मानो वह कोई वस्तु हो जिसे एक घर से दूसरे घर भेज दिया जाए।
एक साहसी सन्देश
रुक्मिणी के पास समय कम था और साहस बहुत। उसने हार कर बैठ जाना स्वीकार नहीं किया। उसने हिम्मत कर के एक विश्वासपात्र ब्राह्मण को बुलाया, और उसके हाथ कृष्ण तक अपना सन्देश भेजा, एक ऐसा पत्र जिसमें एक स्त्री का पूरा मन खुला था, और साथ ही एक स्पष्ट योजना भी।
मैंने आपको अपना वर मान लिया है, उसने लिखवाया, और किसी और का होना मुझे स्वीकार नहीं। विवाह से एक दिन पहले, परम्परा के अनुसार, मैं नगर के बाहर देवी के मन्दिर दर्शन को जाऊँगी। वही अवसर है। आप आ कर मुझे वहाँ से ले चलिए, इससे पहले कि मुझे किसी और को सौंप दिया जाए। यह केवल प्रेम का पत्र नहीं था; यह एक स्त्री का अपने जीवन पर अपना अधिकार माँगना था, और उसके लिए स्वयं एक रास्ता बनाना भी।

रथ, और ऐन मौक़े पर
कृष्ण ने विलम्ब नहीं किया। उन्होंने वह पत्र पढ़ा, और उस साहस को पहचाना जो उसमें था। वे अपने रथ पर निकल पड़े, और ठीक उस घड़ी विदर्भ पहुँचे। नगर बारात के लिए सज रहा था, शिशुपाल और उसके पक्ष के राजा आ चुके थे, और सब यही मान कर चल रहे थे कि विवाह तय है।
पर ठीक उस क्षण, जब रुक्मिणी देवी के दर्शन कर के मन्दिर से बाहर निकल रही थीं, और चारों ओर जुटे राजा देख रहे थे, कृष्ण आगे बढ़े और सबके देखते-देखते उन्हें अपने रथ पर बैठा कर ले निकले। यह कोई चोरी-छिपे का काम नहीं था; यह एक खुली घोषणा थी, कि रुक्मिणी ने स्वयं चुना है, और वह चुनाव पूरा हो रहा है। जुटे हुए राजा अवाक रह गए।
रुक्मी का टूटा गर्व
रुक्मी यह अपमान सह न सके। वे क्रोध में अपनी सेना ले कर पीछा करते आए, यह प्रतिज्ञा कर के कि कृष्ण को हराए बिना नगर नहीं लौटेंगे। एक भीषण युद्ध हुआ, पर रुक्मी बुरी तरह हार गए। कृष्ण चाहते तो उनका अन्त कर सकते थे, जैसा युद्ध की रीति थी।

पर उन्होंने ऐसा नहीं किया, क्योंकि सामने रुक्मिणी की आँखें थीं, और वह अपने भाई का वध नहीं देख सकती थीं, चाहे वह भाई कितना ही ग़लत क्यों न रहा हो। बहन के मान का ध्यान रख कर कृष्ण ने रुक्मी को जीवित छोड़ दिया, बस उनका गर्व तोड़ कर। रुक्मिणी द्वारका की महारानी बनीं। यह विवाह केवल एक प्रेम-कथा नहीं था; यह एक स्त्री के अपने निर्णय की, अपने साहस की विजय भी थी, और कृष्ण के उस स्वभाव की भी, जो जीत कर भी सम्बन्धों का मान रखना नहीं भूलता।
आधार: हरिवंश (महाभारत का खिल-पर्व), विष्णु पर्व, अध्याय 87 से 90; समीक्षित संस्करण (पी. एल. वैद्य, भांडारकर प्राच्यविद्या संस्थान, पुणे)। कहानी-रूप में, मूल कथा-क्रम का अनुसरण करते हुए।