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हरिवंशविष्णु पर्व · प्रसंग 16 · अध्याय 87 से 90

हरिवंश · रुक्मिणी-हरण

एक मौन निश्चय, और एक स्त्री का अपने जीवन पर अपना अधिकार

विदर्भ की राजकुमारी ने कृष्ण को मन ही मन वर लिया, पर पिता भीष्मक उन्हें किसी और को देने का वचन दे चुके थे …

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पढ़ने से पहले

और विवाह की पूर्व-संध्या पर कृष्ण कुण्डिन पहुँचे और जुटे हुए राजाओं के सामने से उसे ले निकले


द्वारका के इन्हीं दिनों में विदर्भ की राजकुमारी रुक्मिणी की कथा आती है। उन्होंने कृष्ण को कभी देखा नहीं था, पर उनके गुणों, उनके कर्मों, उनके चरित्र की कथाएँ सुन-सुन कर मन ही मन उन्हें अपना वर मान लिया था। उनके बारे में जो कुछ उन्होंने सुना, वह सब उनके हृदय को भा गया था, और उसी से उनका निश्चय बना।

पर उनके बड़े भाई रुक्मी को यह स्वीकार नहीं था। कृष्ण ने स्वयं उनका हाथ माँगा था, पर रुक्मी ने मना कर दिया; कंस की मृत्यु का शोक उनके मन में था, और वे कृष्ण को अपना शत्रु मानते थे। मगध-सम्राट जरासन्ध ने, जिनका दामाद कंस था, भीष्मक से वह कन्या चेदिराज शिशुपाल के लिए माँगी, जिसे जरासन्ध ने अपने पुत्र की तरह पाला था, और भीष्मक ने वचन दे दिया। विवाह का दिन तय हो चुका था।


एक मौन निश्चय, और भाई का गर्व

रुक्मिणी के मन में एक ही बात तय थी, जो उन्होंने कृष्ण के तेज और बल की कथा सुन कर ठानी थी: “मेरे पति वही होंगे।”

और भाई के पास अपने को अजेय मानने के कारण थे। रुक्मी एक प्रचण्ड योद्धा थे; द्रुम से उन्होंने दिव्य अस्त्र पाए थे और जमदग्नि-पुत्र परशुराम से ब्रह्मास्त्र। जब भी कृष्ण से भेंट होती, वे अपने पराक्रम की बात सुनाना नहीं भूलते थे।


रथ, और ऐन मौक़े पर

विवाह निकट आया तो राजा कुण्डिन में जुटने लगे। जरासन्ध आए, वर शिशुपाल आए, दन्तवक्र आए, और उनके पीछे अंग, बंग, कलिंग और पौण्ड्र के राजा अपनी-अपनी सेनाओं के साथ। कृष्ण भी आए, और साथ में बलराम और वृष्णि वीर, अपनी बुआ का मान रखने को; वे नगर के बाहर ठहरे, जहाँ कैशिक-राज क्रथ ने उनका विधि से स्वागत किया। सब यही मान कर चल रहे थे कि बात तय है और बस विधि बाक़ी है। विवाह से एक दिन पहले, मंगल-विधियों से सजी रुक्मिणी चार घोड़ों के रथ पर, सैनिकों से घिरी, इन्द्र के मन्दिर की ओर निकलीं, जहाँ उन्हें इन्द्राणी शची की पूजा करनी थी। कृष्ण ने उन्हें वहीं देखा। मन्दिर के पास रथ पर बैठी वह सुन्दरियों में श्रेष्ठ कन्या अग्नि की जलती लौ जैसी थी, मानो स्वयं श्री अपने कमल से उतर कर उनकी पत्नी बनने धरती पर आई हों; श्याम वर्ण, बड़ी-बड़ी आँखें, नीला वस्त्र, चन्द्रमा जैसा मुख, काले घुँघराले केश, लाल नाखून, सम और श्वेत दाँतों की पंक्ति से दमकता चेहरा; देवता भी उन्हें मन से न देख पाते, पर कृष्ण ने देखा। घी पा कर भड़कती आग की तरह उनकी कामना बढ़ी, और वृष्णियों के सामने बलराम से एक शब्द कह कर उन्होंने उसी क्षण अपना मन बना लिया।

पर ठीक उस क्षण, जब रुक्मिणी शची की पूजा कर के मन्दिर से बाहर निकल रही थीं, और चारों ओर जुटे राजा देख रहे थे, कृष्ण आगे बढ़े, रथ के रक्षकों को तितर-बितर किया, और सबके देखते-देखते उन्हें अपने रथ पर बैठा कर द्वारका की ओर ले निकले। जरासन्ध, शिशुपाल और उनके साथी राजा क्रोध में हथियार ले कर पीछे पड़े, और बलराम ने एक विशाल वृक्ष उखाड़ कर वृष्णियों के साथ उन्हें रोके रखा।

युद्ध का भार बलराम और वृष्णि-अन्धक वीरों पर छोड़ कर, युयुधान, अक्रूर, विपृथु, गद, कृतवर्मा, चक्रदेव, सारण, विदूरथ, उग्रसेन-पुत्र कंक, श्वफल्क, सत्यक और बाक़ी सब पर, मधु के हन्ता केशव रुक्मिणी को ले कर तेज़ी से द्वारका की ओर निकल गए। कवच पहने दन्तवक्र, शिशुपाल और जरासन्ध क्रोध में जनार्दन को मारने निकले, और चेदिराज के साथ अंग, बंग, कलिंग और पौण्ड्र के राजा और उनके महारथी भाई भी; संकर्षण के नेतृत्व में वृष्णियों ने उन्हें वैसे ही युद्ध दिया जैसे देवता अपने शत्रुओं को देते हैं। अक्रूर ने दन्तवक्र को नौ बाण मारे तो करूष-राज ने दस से उत्तर दिया; विपृथु के सात बाणों का शिशुपाल ने आठ से बदला लिया, और गवेषण, अतिदन्त और बृहद्दुर्ग के बाणों से बिंधे चेदिराज ने चार बाणों से विपृथु के चारों घोड़े मार डाले, भल्ल से बृहद्दुर्ग का सिर काट दिया और गवेषण के सारथी को यमलोक भेज दिया; घोड़े खो चुके विपृथु बृहद्दुर्ग के रथ पर चढ़ गए। यादवों ने रथ पर नाचते शिशुपाल को बाणों की वर्षा से ढक दिया। चक्रदेव ने दन्तवक्र की छाती बेधी, शिशुपाल के भाई बलि ने चक्रदेव और विदूरथ को घायल किया, कृतवर्मा ने पौण्ड्र वासुदेव का सारथी मारा और ध्वज गिराया, कलिंग-राज ने लोहे की गदा निवृत्तशत्रु के कन्धे पर मारी, और कंक का हाथी अंग-राज के हाथी पर टूट पड़ा। बलराम ने क्रोध में एक वृक्ष फेंक कर बंग के राजा को उसके हाथी समेत मार डाला; फिर रथ पर चढ़ कर, धनुष उठा कर, उन्होंने अपने भयानक बाणों से कितने ही कैशिकों को यमलोक भेजा, छह बाणों से करूष के महाधनुर्धरों को मारा, मगध की सेना के सौ घोड़े गिराए और जरासन्ध पर दौड़े। मगध-राज ने तीन बाणों से उन्हें काटा; बलराम ने आठ से उत्तर दिया और भल्ल से उनका सोने का ध्वज गिरा दिया। एक-दूसरे पर बाण बरसाते उन दोनों में देवों और दानवों जैसा घमासान छिड़ गया; हाथी हाथियों से, रथी रथियों से, घुड़सवार घुड़सवारों से और पैदल पैदलों से भिड़े, कवचों पर तलवारों और बाणों की चोट पक्षियों के कलरव जैसी सुनाई देती थी, और तुरही, शंख और नगाड़ों का नाद शस्त्रों की झनकार और धनुषों की टंकार को ढके जा रहा था। और इस सबके बीच कृष्ण का रथ रुक्मिणी को लिए द्वारका की राह पर दूर निकलता जा रहा था।


रुक्मी का टूटा गर्व

रुक्मी यह अपमान सह न सके। वे क्रोध में अपनी सेना ले कर पीछा करते आए, यह प्रतिज्ञा कर के कि कृष्ण को मारे और रुक्मिणी को लौटाए बिना वे कुण्डिन नहीं लौटेंगे। शस्त्रों और ध्वजों से लदे रथ पर वे सबसे आगे थे, और दक्षिण के राजा उनके पीछे हो लिए: क्रथ, अंशुमान, श्रुतर्वा और वीर वेणुदारि, और क्रथ-कैशिक के दूसरे महारथी। बहुत दूर निकल आने पर उन्होंने नर्मदा नदी के पास गोविन्द को अपनी प्रिया के साथ देखा। रुक्मी ने अपनी सेना वहीं खड़ी की और रथों के द्वन्द्व के लिए अकेले मधुसूदन के सामने गए। उन्होंने कृष्ण को चौंसठ तीखे बाणों से बेधा, जनार्दन ने सत्तर से उत्तर दिया, और रुक्मी की सारी सावधानी के बावजूद उनके रथ का ध्वज काट दिया और सारथी का सिर धड़ से अलग कर दिया। उन्हें संकट में देख कर दक्षिण के राजा कृष्ण को मारने की ठान कर उन्हें घेरने लगे; अंशुमान ने दस बाण मारे, श्रुतर्वा ने पाँच, वेणुदारि ने सात। गोविन्द ने अंशुमान की छाती बेधी तो वे पीड़ा से अपने रथ पर बैठ गए; चार बाणों से श्रुतर्वा के चारों घोड़े मारे, वेणुदारि का ध्वज काटा और उनकी दाहिनी भुजा घायल की, और फिर पाँच बाणों से श्रुतर्वा को ऐसा बेधा कि वे ध्वज थामे रथ पर बैठ गए। क्रथ, कैशिक और बाक़ी महारथी दौड़े तो जनार्दन ने उनके बाण हवा में काट डाले और चौंसठ बाणों से उन सबको घायल किया, और सेना भागने लगी। अपनी सेना को भागते देख रुक्मी ने क्रोध में पाँच तीखे बाण कृष्ण की छाती में, तीन उनके सारथी में मारे और उनका ध्वज काट दिया; फिर साठ बाण और चलाए, पर केशव ने उनका धनुष काट दिया। रुक्मी ने दूसरा धनुष उठा कर कृष्ण को मारने के लिए दिव्य अस्त्र छोड़े; माधव ने अपने अस्त्रों से उन्हें काटा और तीन बाणों से वह दूसरा धनुष और उसके नीचे का रथ भी तोड़ डाला। धनुष और रथ गँवा कर रुक्मी तलवार और ढाल ले कर रथ से कूद पड़े। कृष्ण ने उनकी तलवार काट दी और तीन बाण उनकी छाती में मारे, और रुक्मी वज्र से मारे गए किसी महादैत्य की तरह अचेत हो कर धरती पर गिर पड़े। बचे हुए राजा उन्हें गिरा देख कर भाग खड़े हुए। कृष्ण चाहते तो उनका अन्त कर सकते थे।

पर उन्होंने ऐसा नहीं किया। भाई को धरती पर अचेत पड़ा देख रुक्मिणी उनके प्राणों के लिए कृष्ण के चरणों में गिर पड़ीं; कृष्ण ने उन्हें उठाया, गले लगाया, ढाढ़स दिया, और रुक्मी को अभय दे कर अपने नगर की ओर चल पड़े। उधर जरासन्ध और बाक़ी राजाओं को हरा कर बलराम के नेतृत्व में वृष्णि भी प्रसन्न मन से द्वारका की ओर चले। कृष्ण के चले जाने पर राजा श्रुतर्वा रुक्मी को अपने रथ पर उठा कर अपने नगर ले गए। रुक्मी की प्रतिज्ञा टूट चुकी थी; वे फिर कुण्डिन नहीं लौटे, और विदर्भ में भोजकट नाम का नया नगर बसा कर वहीं से दक्षिण पर राज करने लगे। द्वारका में कृष्ण ने विधि से रुक्मिणी से विवाह किया, और वे कृष्ण की पहली पत्नी हुईं। उनसे कृष्ण के दस पुत्र हुए, सब के सब महारथी, जिनमें सबसे पहले महाबली प्रद्युम्न थे, और एक पुत्री हुई, चारुमती। कृष्ण उनके साथ वैसे रहे जैसे राम सीता के साथ रहे, और जैसे इन्द्र शची के साथ रहते हैं।

आधार: हरिवंश (महाभारत का खिल-पर्व), विष्णु पर्व, अध्याय 87 से 90; अध्याय-संख्या समीक्षित संस्करण (पी. एल. वैद्य, भांडारकर प्राच्यविद्या संस्थान, पुणे) की। कथा मन्मथनाथ दत्त के अंग्रेज़ी अनुवाद (1897) के अध्याय 116 से 117 से, जो प्रचलित पाठ पर आधारित है, उसी के कथा-क्रम में।