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हरिवंशविष्णु पर्व · प्रसंग 5 · अध्याय 30 से 45

हरिवंश · धरती की पुकार

जब धरती अपने ही रूप में मेरु की सभा तक रोने पहुँची

क्षीरसागर के उत्तर में सोए नारायण को ऋषियों ने जगाया, ब्रह्मा देवताओं और धरती को साथ ले कर सुमेरु की सभा में गए …

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पढ़ने से पहले

वहाँ धरती ने अपने जन्म से ले कर अब तक का पूरा दुख कहा, ब्रह्मा ने एक एक देवता का अंश किसी न किसी राजघर में उतारा, और नारद ने भरी सभा में विष्णु से पूछा कि मथुरा के कंस का क्या होगा


क्षीरसागर के उत्तरी किनारे पर, नारायण के उस आश्रम में जहाँ न हवा चलती है, न सूरज पहुँचता है, न चाँद, और जहाँ केवल उनके अपने देह का उजाला रहता है, विष्णु सो रहे थे। वह नींद साधारण नींद नहीं थी। सत्य और त्रेता, दो पूरे युग उस नींद में बीत गए थे, हज़ारों बरस, और इतने बरसों में उनकी नाभि से निकले कमल पर बैठे ब्रह्मा ही सृष्टि का पहिया घुमाते रहे थे। जब विष्णु सोते हैं तो यज्ञ थम जाते हैं और वर्षा का काम इन्द्र सँभालते हैं, और जब वे जागते हैं तो शरद के यज्ञ फिर आरम्भ होते हैं; यह क्रम आकाश जानता है। पर इस बार उन्हें जगाने की ज़रूरत पड़ी। द्वापर अपने अन्त की ओर था, मनुष्यों का कष्ट बढ़ता जा रहा था, और महर्षियों ने उस आश्रम के द्वार पर खड़े हो कर उनकी स्तुति आरम्भ कर दी। “हे प्रभु”, उन्होंने कहा, “जैसे भोगी हुई माला उतार दी जाती है, वैसे ही अपने ही देह से उपजी इस नींद को उतार दीजिए। ब्रह्मा के साथ सब देवता आपको देखने की प्रतीक्षा में खड़े हैं। उठिए, सौ पँखुड़ियों वाले कमल की नाभि वाले; देवताओं का एक बड़ा काम आपकी बाट देख रहा है।”

और जल घटा, अँधेरा छँटा, और हृषीकेश अपने पूरे सौन्दर्य में उठ बैठे। सामने पूरा देवसमाज था, बीच में पितामह ब्रह्मा, और सबके चेहरों पर संसार की कोई चिन्ता, जो कहने को उतावली थी और कहने से डर रही थी। विष्णु ने नींद से हल्की हुई आँखों से उन्हें देखा और सीधा पूछा। “हे देवताओ, झगड़ा किससे है? डर किससे है? किसे क्या चाहिए, और हम क्या कर सकते हैं? क्या दानवों ने संसार पर कोई विपत्ति ढा दी है? क्या मनुष्य अपनी ही निर्बलता से किसी दुख में पड़ गए हैं? हमने अपनी सबसे प्रिय शय्या छोड़ दी है और आपके कल्याण के लिए यहाँ खड़े हैं; बताइए, हम आपके लिए क्या करें।”


ब्रह्मा का उत्तर, और सुमेरु की सभा

ब्रह्मा ने जो उत्तर दिया, वह पहले सुनने में उलटा लगता है। “हे विष्णु”, उन्होंने कहा, “असुरों से देवताओं को कोई भय नहीं; हर युद्ध में आप उनके आगे खड़े होते हैं। और जब आप और देवराज विजयी हैं, तो धर्म में लगे मनुष्यों को भला किस बात का डर। सच तो यह है कि आज के राजा बुरे नहीं हैं। वे प्रजा से छठा भाग ले कर सन्तुष्ट हैं, एक दूसरे से नहीं डरते, कोमल दण्ड देते हैं, चारों वर्णों की रक्षा करते हैं, धनुर्वेद में निपुण हैं, वेद पढ़े हुए हैं, बड़े बड़े यज्ञ करते हैं और सैकड़ों श्राद्धों से पितरों को तृप्त रखते हैं। उनके पुण्य से इन्द्र समय पर बरसते हैं, धूल रहित हवाएँ दसों दिशाओं में बहती हैं, ग्रह अपनी चाल पर हैं, चाँद नक्षत्रों के साथ सुन्दर चल रहा है, सूरज अपने दोनों मार्गों पर है, और आहुतियों से तृप्त अग्नि सुगन्धित हो उठी है। इन राजाओं का मन तो यह है कि सतयुग लौटा लाएँ।

“और यही इस बार का बोझ है। एक के बाद एक, इतने बलवान, इतने यशस्वी राजा, और उनके साथ इतनी सेनाएँ। हर नगर में राजा के चारों ओर एक करोड़ सैनिक, हर राज्य में सैकड़ों हज़ारों फलते फूलते गाँव, और पूरी धरती हज़ारों राजाओं, उनकी सेनाओं और करोड़ों गाँवों से इस तरह ढँक गई है कि उसकी साँस रुक रही है। क्षत्रियों के देह, उनके तेज, उनके बल और उनके फैले हुए राज्यों का भार ढोते हुए धरती बार बार पसीने से भीग रही है, उसके पर्वत हिल रहे हैं, उसके समुद्र क्षुब्ध हैं। वह ऐसी नाव की तरह हमारे सामने आई है जो डूबने के कगार पर हो। काल को आगे कर के, रोगों से मुक्त पर तेज खो चुकी, वह हमारे घर तक चली आई। हमने उसका पूरा हाल सुना है, आपने भी सुना है। वह आपकी ही शरण है, हे मधुसूदन; उस पर अत्याचार बड़ा पाप है, क्योंकि उसके टूटते ही मनुष्य के सारे काम रुक जाएँगे और सृष्टि का चलना बिगड़ जाएगा। उसने अपना धैर्य और अपनी सहनशीलता, दोनों छोड़ दिए हैं। धरती धर्मात्माओं की गति है, और धर्म ही उनका सबसे बड़ा धन; इसलिए उसका भार उतारने के लिए इन राजाओं का नाश करना ही उचित है। चलिए, धरती को आगे कर के हम सब सुमेरु के शिखर पर चलें और वहीं बैठ कर विचार करें।” इतना कह कर ब्रह्मा धरती के पास बैठ कर विश्राम करने लगे।

विष्णु ने कहा, “ऐसा ही हो।” और तब वह दृश्य बना जिसे देवताओं ने आँखें टिका कर देखा। बादल के रंग वाले हरि, सिर पर मणियों और मोतियों से जड़ी चमकती जटाएँ, जैसे बादल में चाँद निकल आया हो, चौड़े वक्ष पर श्रीवत्स का चिह्न, दो पीले वस्त्र, संध्या के बादलों से ढके पर्वत की तरह, गरुड़ की पीठ पर बैठे और आकाश में चले; कमल से जन्मे ब्रह्मा और सारे देवता उनके पीछे पीछे चले। पलक झपकते वे रत्नों के उस पर्वत पर पहुँचे, और सुमेरु के शिखर पर वह सभा भवन देखा जो देवताओं के मन के अनुसार बना था। सूरज जैसा दमकता हुआ, सोने के खम्भे, हीरों से जड़े द्वार, मन से रचे अनगिनत चित्र, रत्नों की जालियों से ढकी खिड़कियाँ, हर धातु के फूलों से सजा हुआ, इच्छा से कहीं भी चल सकने वाला, दिव्य माया से भरा हुआ; उसे विश्वकर्मा ने बनाया था। हर देवता अपने अपने आसन पर बैठा, कोई रथ पर, कोई भद्रासन पर, कोई पीठ पर, कोई कुथ के आसन पर। फिर ब्रह्मा के आदेश पर प्रभंजन वायु सभा के चारों ओर पहरा देने लगी, ताकि कोई आवाज़ भीतर न आए। और जब सब कुछ शान्त हो गया, तो उस सन्नाटे में धरती ने अपना दुख कहना शुरू किया।


धरती की अपनी ज़बानी

“हे देव”, उसने कहा, “हमें थामिए। आपने ही पूरा विश्व थामा हुआ है, आप ही प्राणियों और तीनों लोकों के रक्षक हैं। जो कुछ आप अपने बल और तेज से सँभालते हैं, वही हम आपकी कृपा से बाद में सँभाल पाते हैं; जो आप नहीं थामते, वह हमसे भी नहीं थमता। हे नारायण, युग युग में आपने संसार के भले के लिए हमारा भार उतारा है। आज हम आपके ही तेज से दबे हुए नीचे धँस गए हैं, दुष्ट दानवों और राक्षसों ने हमें रौंदा है, और हम आपकी दया पर हैं। हम सौ बार जानते हैं कि जब तक हम नारायण की शरण नहीं लेते, तब तक हमारे ऊपर एक बड़ा भय बना रहता है।”

और फिर उसने अपनी ही कहानी सुनाई, अपने जन्म से। “जब कमल से जन्मे ब्रह्मा ने खेती और व्यापार जैसे जीवन के साधन अभी बनाए भी नहीं थे, तब हम बहुत छोटी थीं, और हमसे पहले दो बड़े असुर जन्मे थे, मिट्टी के बने। जब यह महात्मा विष्णु गहरे जल में सो रहे थे, तब उनके कानों के मैल से वे दोनों निकले और लकड़ी के दो कुन्दों की तरह पड़े रहे। पितामह ने वायु को प्राण बना कर उनमें भेजा, और वे दोनों दानव आकाश ढँकते हुए बढ़ने लगे। ब्रह्मा ने धीरे से उन्हें छुआ; एक कोमल लगा, दूसरा कठोर। कोमल का नाम मधु रखा गया और कठोर का कैटभ। नाम पाते ही वे अपने बल के घमण्ड में उस एक पानी की चादर बने संसार में युद्ध ढूँढते घूमने लगे, और उन्हें आता देख ब्रह्मा प्रलय के जल में लुप्त हो कर विष्णु की नाभि के कमल में छिप गए। बरसों बीते, और एक दिन वे दोनों वहीं आ पहुँचे जहाँ ब्रह्मा थे। तब ब्रह्मा ने कमल के डण्ठल से नारायण को हिलाया, और वे अपनी शय्या से उठे। तीनों लोक जल में डूबे थे, और उसी एक जल पर नारायण और मधु कैटभ का भयानक युद्ध चला, हज़ार बरस तक, और वे दोनों दानव ज़रा भी नहीं थके। अन्त में उन्होंने प्रसन्न मन से कहा, ‘आपसे लड़ कर हमें बहुत सुख मिला; आप ही हमारी सबसे मनचाही मृत्यु हैं। हमें ऐसी जगह मारिए जो जल से ढकी न हो, और आपके हाथों मर कर हम आपके पुत्र हो जाएँ।’ नारायण ने उन्हें भुजाओं में जकड़ कर मार डाला। उनके देह जल से भीगे, एक में मिल गईं, और लहरों में मथते मथते उनसे मेद निकलने लगा, इतना कि पूरा जल उससे ढक गया। उसी मेद से ढके होने के कारण हमारा नाम मेदिनी पड़ा, और कमलनाभ के तेज से हम यह पूरा विश्व बनीं।

“फिर एक बार, मार्कण्डेय मुनि के सामने, वराह का रूप धर कर प्रभु ने हमें एक दाँत पर उठा कर जल से बाहर निकाला। फिर आप सबके सामने ही विष्णु ने हमें दैत्यराज बलि से छुड़ाया। अग्नि सोने का कारण है, सूरज तारों का, और नारायण हमारा आधार। हम अकेली इस चर और अचर सृष्टि को थामे हैं, और हमें गदाधर थामे हुए हैं। हमारा भार उतारने की इच्छा से ही जमदग्नि के पुत्र राम ने क्रोध में इक्कीस बार हमें क्षत्रियों से रहित कर दिया, अपने पिता के श्राद्ध में राजाओं के रक्त से हमें तृप्त किया, विजय का स्तम्भ खड़ा किया, और फिर हमें कश्यप को सौंप दिया। मेद, मांस और हड्डियों की दुर्गन्ध और क्षत्रियों के रक्त से सनी हम कश्यप के सामने खड़ी हुईं तो ब्रह्मर्षि ने पूछा, ‘धरती, आप इतनी उदास क्यों हैं? एक वीर की पत्नी हो कर आप यह अपमान का व्रत क्यों लिए हैं?’ हमने कहा, ‘हे ब्राह्मण, भार्गव ने हमारे सब पति मार डाले। शस्त्र पर जीने वाले क्षत्रिय हमसे छीन लिए गए, और अब हम अपनी पीठ पर ख़ाली नगर ढोना नहीं चाहतीं। हमें ऐसा राजा दीजिए जो गाँवों और नगरों से भरी, समुद्रों से घिरी इस धरती की रक्षा कर सके।’ कश्यप ने कहा, ‘ऐसा ही हो’, और हमें मनुष्यों के राजा मनु को दे दिया। मनु से निकले इक्ष्वाकु वंश के देवताओं जैसे राजा हमें मिले, और तब से, काल के बल से, हम एक राजा के हाथ से दूसरे राजा के हाथ में जाती रही हैं। कितने वीर क्षत्रिय हमें जीत कर स्वर्ग गए और फिर हममें ही समा गए। युद्ध में सदा विजयी वे क्षत्रिय हमारे लिए आपस में लड़े, और आज भी लड़ रहे हैं। यह उसी नियति का छोर है जो आपने भेजी थी। अगर आपको हम पर दया है, अगर आप हमारा भार उतारना चाहते हैं, तो संसार के भले के लिए राजाओं के विनाश का एक युद्ध रचिए। वह सुन्दर चक्रधारी ही हमारी रक्षा करें, और नारायण हमें आज्ञा दें; हम भार से दबी उन्हीं के पास आई हैं।”


अंशों का बँटवारा: कौन किस घर में उतरेगा

धरती की बात सुन कर और उसके मन्तव्य पर ठहर कर सोच कर देवता ब्रह्मा की ओर मुड़े। “हे प्रभु”, उन्होंने कहा, “सब प्राणियों के देह आपने रचे हैं, सब लोकों के स्वामी आप हैं; धरती का यह भार आप ही उतारिए। अगर आप इस संकट में उसका काम पूरा करना चाहते हैं, तो बिना देर किए तय कीजिए कि किसका क्या काम होगा। इन्द्र का, यम का, वरुण का, कुबेर का, नारायण का, चन्द्रमा का, सूर्य का, वायु का, आदित्यों का, वसुओं का, रुद्रों का, प्रजापतियों का, अश्विनीकुमारों का, साध्यों का, बृहस्पति का, शुक्र का, काल का, कलि का, महेश्वर का, कार्तिकेय का, यक्षों, राक्षसों, गन्धर्वों, चारणों, बड़े नागों, पक्षियों, ऊँचे पर्वतों, और गंगा को आगे किए हुए नदियों की ऊँची लहरों वाले समुद्रों का। हे पितामह, हम अपने अंश कैसे उतारें? आकाश में विचरने वाले राजाओं के कुल में, धरती पर चलने वाले राजाओं के कुल में, और राजसभा के ब्राह्मणों और अन्य राजकुमारों के कुल में हम ऐसे देह रचें जो किसी स्त्री से न जन्मे हों।”

ब्रह्मा को यह संकल्प बहुत भाया। “अपने तेज से धरती पर अपने अंश रचिए”, उन्होंने कहा; “आप सब श्रेष्ठ देवता हैं, उतरिए, तीनों लोकों की समृद्धि पाइए और धरती का भार उतारिए। पर पहले सुनिए कि जब हमें पहली बार इस भार की सूचना मिली थी, तब हमने बहुत पहले ही क्या कर रखा है।” और ब्रह्मा ने वह पुरानी बात सुनाई। “पूर्व समुद्र के पश्चिमी तट पर हम अपने पौत्र महर्षि कश्यप के साथ बैठे थे, वेदों की बातें और पुराणों के प्रसंग कह रहे थे, और आप सब, मरुतों के साथ, अपने रूपों में समुद्र और गंगा को लिए हुए, हमारे पास आए थे। समुद्र दौड़ती लहरों के साथ आया, जलचरों का रंग बिरंगा वस्त्र पहने, शंखों और मोतियों से चमकता देह, मूँगों और रत्नों से सजा, चन्द्रमा को साथ लिए, जल से भरे बादल की तरह गरजता हुआ, और मानो हमें ही परास्त करने आया हो, अपना खारा पानी उछाल कर उसने वह जगह बिगाड़ दी। हमने क्रोध में कहा, ‘शान्त रहिए।’ और कहते ही वह एक रूप में आ गया, लहरें थम गईं, और वह राजाओं की सी शोभा में वहाँ खड़ा रहा। तभी हमने, आप सबके भले के लिए और धरती के भार के लिए, समुद्र और गंगा पर एक शाप रखा। ‘समुद्र, आप राजा के रूप में आए हैं, इसलिए जाइए, राजा बनिए; भरत के महान वंश में जन्म लीजिए, अपने बल से धरती पर बड़े काम कीजिए और मनुष्यों की रक्षा कीजिए। अधीर हो कर भी आप हमारे कहते ही शान्त हो गए, इसलिए सुन्दर देह वाले आप धरती पर शान्तनु नाम से प्रसिद्ध होंगे, और नदियों में श्रेष्ठ यह गंगा, निर्मल अंगों और बड़ी आँखों वाली, सुन्दर रूप धर कर आपके पास आएगी।’

“समुद्र का मन बैठ गया। ‘हे देवों के देव’, उसने कहा, ‘हम सदा आपकी आज्ञा मानते हैं, आपके बनाए हुए हैं, आपके पुत्र हैं; आपने हमें ऐसे कड़े शब्दों में शाप क्यों दिया? आपकी ही कृपा से ज्वार में हमारी लहरें बढ़ीं और हम क्षुब्ध हुए; इसमें हमारा क्या दोष? बहती हवा, बढ़ता बादल और चाँद के साथ आया पर्व, इन तीन साधनों ने हमें हिलाया, और तीनों आपके ही चलाए हुए हैं। अगर हमारा कोई अपराध है तो क्षमा कीजिए, और इस शाप का अन्त कीजिए। आपकी आज्ञा से यह गंगा धरती पर उतरेगी; दोषी हम हैं, पर इस निर्दोष पर तो दया कीजिए।’ तब हमने मीठे स्वर में उस डरे हुए समुद्र से कहा, ‘हे नदियों के स्वामी, निश्चिन्त रहिए, डरिए मत, हम आपसे प्रसन्न हैं; अब इस शाप का भावी प्रयोजन सुनिए। अपना समुद्र देह छोड़ कर भरत के वंश में जाइए, वहाँ राजाओं की शोभा आपको घेरेगी, आप चारों वर्णों पर शासन करेंगे और प्रसन्न रहेंगे। यह गंगा सुन्दर स्त्री का रूप धर कर आपकी सेवा करेगी, और उसके साथ रहते हुए हमारी आज्ञा से आप मनुष्यों के दुख नहीं जानेंगे। स्वर्ग से निकाले हुए वसु रसातल में जा पड़े हैं; उन्हें जन्म देने के लिए हम आपको नियुक्त करते हैं। अग्नि जैसे तेजस्वी वे आठ वसु जाह्नवी के गर्भ में आएँ। वसुओं को जन्म दे कर, कुरुवंश को बढ़ा कर और अपना मनुष्य देह छोड़ कर आप फिर पल भर में अपना समुद्र देह पा लेंगे।’

“तो हे देवताओ”, ब्रह्मा ने कहा, “धरती का यह आने वाला भार देख कर हमने बहुत पहले ही आपके भले के लिए शान्तनु के वंश का बीज बो दिया था, और उसमें वसु जन्म ले चुके हैं। गंगा के पुत्र भीष्म, आठवें वसु, अब भी हैं; बाकी सात अपने अपने लोक लौट गए। शान्तनु की दूसरी पत्नी से तेजस्वी विचित्रवीर्य हुए, विचित्रवीर्य के दो पुत्र धृतराष्ट्र और पाण्डु संसार के दो प्रसिद्ध राजा हुए। पाण्डु की दो सुन्दर पत्नियाँ हैं, कुन्ती और माद्री, देवताओं की पत्नियों जैसी, और धृतराष्ट्र की एक, गान्धारी, जो पति की सेवा से संसार में विख्यात है। यहीं वह घर दो शत्रु दलों में बँटेगा, इन दोनों राजाओं के पुत्रों में भयानक फूट पड़ेगी, और उस फूट में सारे राजवंश नष्ट होंगे, जैसे प्रलय की घड़ी आ गई हो। जब सब राजा अपनी सेनाओं सहित एक दूसरे के हाथों मारे जाएँगे, नगर और राज्य ख़ाली हो जाएँगे और धरती को चैन मिलेगा। हमने पुराणों में पढ़ा है कि द्वापर के अन्त में सब राजा शस्त्रों से नष्ट होंगे, और तब शंकर के अंश अश्वत्थामा शस्त्र की आग से रात में सोए हुए बचे हुए मनुष्यों को जला डालेंगे; और जब मृत्यु जैसे वे क्रूर कर्म वाले शान्त होंगे, तब द्वापर की यह कथा पूरी होगी और महेश्वर का भयानक कलियुग आएगा, जिसमें धर्म का केवल एक अंश बचेगा, सत्य लुप्त होगा, झूठ जमा होगा, लोग केवल महेश्वर और स्कन्द को पूजेंगे और लम्बी आयु के बूढ़े धरती पर नहीं रहेंगे। इसलिए हे देवताओ, अब बिना देर किए अपने अपने अंशों में धरती पर उतरिए। कुन्ती और माद्री धर्म के अंश धारण करें, और गान्धारी उस कलि को, जो सब फूट की जड़ है। नियति से प्रेरित ये राजा दो दल बनाएँगे और धरती के लिए युद्ध ठानेंगे। और सब लोकों को थामने वाली यह धरती अपने मूल स्थान में लौट जाए।” पितामह की बात सुन कर धरती काल के साथ प्रसन्न हो कर लौट गई, राजाओं के नाश की ओर।

तब ब्रह्मा ने देवताओं को अपने शत्रुओं के वध के लिए विदा किया। पुराने ऋषि नर, धरती को थामे रखने वाले शेष, सनत्कुमार, साध्य, अग्नि और दूसरे देवता, वरुण, वसु, सूर्य, चन्द्रमा, गन्धर्व, अप्सराएँ, रुद्र, विश्वेदेव और दोनों अश्विनीकुमार, सब अपने अपने अंशों में धरती पर उतरे। स्त्रियों से या और किसी तरह जन्म ले कर वे पुरुष दैत्यों और दानवों के नाश के लिए धरती पर आए। कोई बरगद की तरह अपना कुल फैलाता गया, किसी का देह वज्र जैसा कठोर था, किसी में दस लाख हाथियों का बल था, कोई तेज़ धारा जैसा प्रचण्ड था, कोई गदा और परिघ चलाने में निपुण; सब पर्वत के शिखर से प्रहार कर सकते थे। परिघ जैसी भुजाओं वाले सैकड़ों हज़ारों वीर वृष्णियों के वंश में जन्मे, देवता कुरु और पांचाल के वंशों में राजा बन कर आए, और यदुओं और ब्राह्मणों के समृद्ध घरों में यज्ञ करने वाले, शास्त्रों में पारंगत, बड़े धनुर्धर उत्पन्न हुए, जो क्रोध में आएँ तो पर्वतों, नदियों और धरती की सतह को हिला दें, आकाश में उठ जाएँ और समुद्र को मथ डालें। इस तरह देवताओं को आज्ञा दे कर भूत, वर्तमान और भविष्य के स्वामी पितामह ने सब लोक नारायण को सौंप दिए, और शान्त हो कर बैठ गए।


नारद का प्रश्न: और आप?

जब देवता भरत के वंश में अपने अंश उतार चुके, जब धर्म, इन्द्र, पवन, दोनों अश्विनीकुमारों और सूर्य के अंश धरती पर जा चुके, देवगुरु का अंश, वसुओं का आठवाँ अंश, मृत्यु का अंश और कलि जा चुके, शुक्र, वरुण, शंकर, मित्र, कुबेर, गन्धर्वों, उरगों और यक्षों के अंश उतर चुके, तब उस भरी सभा में नारायण के ही तेज के एक अंश से नारद प्रकट हुए। आग जैसे दमकते, उगते सूरज जैसी आँखें, चारों ओर फैली बड़ी जटाएँ, चाँदनी जैसा उजला वस्त्र, सोने के आभूषण, बगल में बड़ी वीणा, देह पर मृगचर्म, सोने का यज्ञोपवीत, हाथों में दण्ड और कमण्डलु, मानो दूसरे इन्द्र हों। वे महामुनि झगड़ा उठाने के शौक़ीन थे, गन्धर्ववेद के ज्ञाता, इस संसार की हर फूट का छिपा कारण पकड़ लेने वाले, और अपनी ही इच्छा से अपने शत्रु रच लेने वाले; देवताओं और गन्धर्वों में सबसे पहले बोलने वाले, चारों वेदों के गायक और पहली ऋचा के पाठक। वे उदास मन से विष्णु के सामने खड़े हुए और देवताओं के बीच बोले। “हे नारायण, राजाओं के नाश के लिए देवताओं के ये अवतार व्यर्थ रहे। जब आप स्वयं यहीं बैठे हैं, तो राजाओं की यह फूट कोई फल नहीं देगी; हमें लगता है कि नारायण के योग के बिना उनका काम पूरा नहीं होगा। आप सबकी आँख हैं, बलवानों के स्वामी, योगियों में पहले, सबकी शरण; धरती के लिए ऐसा काम रचना आपको शोभा नहीं देता। देवताओं को धरती पर उतरता देख आपने सबसे पहले अपना अंश क्यों नहीं भेजा? आपको आगे रख कर, आपके साथ एक हो कर और आपसे चल कर ही ये सब देवता धरती पर एक काम से दूसरे काम तक तैर पाएँगे। इसीलिए हम दौड़े हुए इस सभा में आए हैं, आपको भेजने; उसका कारण सुनिए।

“जिस युद्ध की जड़ तारका था, उसमें आपने जिन दैत्यों को मारा था, उनमें से कई अब धरती की सतह पर पहुँच गए हैं। धरती पर यमुना के किनारे एक रमणीय नगर है, मथुरा, समृद्ध गाँवों से घिरा। वहाँ पहले मधु नाम का एक महाबली दानव था, सब प्राणियों का आतंक, और उसके नाम पर ऊँचे पेड़ों वाला एक विशाल भयानक वन था, मधुवन, जहाँ वह रहता था। उसका पुत्र लवण हुआ, उतना ही बलवान, उतना ही डरावना। बरसों वहाँ विहार करते हुए, घमण्ड में डूबे उस दानव ने देवताओं तक को डराया। जब दशरथ के धर्मात्मा पुत्र राम अयोध्या में राज कर रहे थे, तब उस दानव ने एक कटु बोलने वाला दूत राम के पास भेजा। दूत ने कहा, ‘हे राम, दानव लवण आपके राज्य के पास रहता है और आपका शत्रु है; राजा को अपने पास बलवान शत्रु नहीं रखना चाहिए।’ फिर उसने राम को राजधर्म का पाठ पढ़ाया, इन्द्रियों को जीतने का, प्रजा को नीति सिखाने का, और अन्त में कहा कि ‘पत्नी के मोह में आपने रावण को उसकी सेना समेत मार डाला, यह कोई बड़ा और शोभा देने वाला काम नहीं था; वन में व्रत रखते हुए एक नीच राक्षस को मारना धर्मात्माओं का आचरण नहीं; अज्ञान में आपने रावण को मारा और वनवासियों का आदर किया; फिर भी रावण धन्य है कि व्रतधारी आपने साधारण मनुष्य की तरह अपनी पत्नी के लिए उसे युद्ध में मारा। तो आप युद्ध कर सकते हैं; आइए, आज हमसे लड़िए।’ राम मुस्कुराए और क्षमा के भाव में बोले, ‘हे दूत, उस निशाचर के मान में आपने जो कहा है वह अनुचित है, क्योंकि आपने हमें दोष दे कर अपने को निश्चिन्त मान लिया है। धर्म के मार्ग पर चलते हुए अगर हम पर विपत्ति पड़ी, रावण मारा गया और हमारी पत्नी हरी गई, तो इसमें दोष कहाँ? सज्जन शब्दों से भी किसी की निन्दा नहीं करते, और ईश्वर जैसे धर्मात्माओं के लिए जागता है, वैसे ही दुष्टों के लिए भी। आपने दूत का काम कर दिया, अब देर न कीजिए और जाइए; हम जैसे लोग अपने को बहुत बड़ा समझने वाले नीचों को नहीं मारते। यह हमारे छोटे भाई शत्रुघ्न हैं, युद्ध में शत्रुओं को दबाने वाले; वे उस दुष्ट दानव को देखेंगे।’ सुमित्रा के पुत्र शत्रुघ्न तेज़ रथ पर उस दूत के साथ मधुवन पहुँचे और युद्ध की इच्छा से वहीं डेरा डाला। दूत की बात सुन कर लवण क्रोध से पागल हो उठा और मधुवन छोड़ कर लड़ने निकला। दोनों वीर, दोनों महाधनुर्धर, एक दूसरे पर तीखे बाण बरसाते रहे; कोई पीछे नहीं हटा, कोई थका नहीं। पर शत्रुघ्न के बाणों से घिरा लवण दबने लगा, क्योंकि उस समय उसकी गदा उसके पास नहीं थी। तब उसने वरदान में मिला वह दिव्य अस्त्र उठाया जो सब प्राणियों को पीस सकता था, और गरजते हुए उससे शत्रुघ्न की पगड़ी पकड़ कर उन्हें अपनी ओर खींचने लगा। शत्रुघ्न ने सोने की मूठ वाली एक श्रेष्ठ कटार निकाली और उसी युद्ध में लवण का सिर काट दिया। फिर उन्होंने शस्त्रों से वह वन साफ़ किया और उस प्रदेश के भले के लिए वहीं एक नगर बसाया, मथुरा। ऊँचे परकोटे, फाटक, द्वार; कमर की करधनी जैसी खाई; पत्थर और ईंट के भवन केयूर जैसे, सुन्दर महल कुण्डलों जैसे, सुरक्षित द्वार घूँघट जैसे, चौड़े मार्ग मुस्कान जैसे; वीरों, हाथियों, घोड़ों और रथों से भरा, यमुना के तट पर अर्धचन्द्र के आकार में बसा, सुन्दर बाज़ारों वाला, रत्नों पर गर्व करने वाला, खेतों में अन्न लहलहाता, समय पर इन्द्र बरसते, और स्त्री पुरुष सदा प्रसन्न। वहाँ भोजवंश के महाबली राजा उग्रसेन राज करते हैं, महासेन जैसे बलवान।

“और अब, हे विष्णु”, नारद ने कहा, “उन्हीं का पुत्र वह है जिसे आपने पहले मारा था। तारका वाले युद्ध में आपने जिस कालनेमि दैत्य को मारा था, वही भोजवंश में कंस बन कर जन्मा है। सिंह की चाल वाला वह राजा संसार में प्रसिद्ध है, सब राजाओं का आतंक, सब प्राणियों का भय, धर्म की राह से सदा बाहर, हठी और निर्दयी, प्रजा के लिए इतना क्रूर कि उसे देखते ही रोंगटे खड़े हो जाएँ। वह राजधर्म नहीं मानता, अपनों को सुख नहीं देता, राज्य का भला नहीं करता, और मांस पर जीता हुआ दानव के हृदय से सब लोकों को पीस रहा है। जो घोड़े जैसा हयग्रीव था, वह केशी बन कर जन्मा है; अयाल वाला वह दुष्ट अब घोड़े की तरह हिनहिनाता हुआ वृन्दावन में अकेला रहता है और मनुष्यों का मांस खाता है। बलि का पुत्र अरिष्ट इच्छा से रूप बदलने वाला महान असुर ककुद्मी बन कर बैल का रूप धरे गायों का शत्रु बना हुआ है। दिति का पुत्र ऋष्ट कंस का हाथी बन कर आया है। भयानक दानव लम्ब प्रलम्ब बन कर भाण्डीर नाम के वट के नीचे रहता है। जो खर था, वह भयानक असुर धेनुक बन कर तालवन में प्राणियों का संहार कर रहा है। वराह और किशोर नाम के दो श्रेष्ठ दानव चाणूर और मुष्टिक नाम के पहलवान बन कर सदा अखाड़े में रहते हैं। और मय और तार, जो दानवों के लिए भी मृत्यु जैसे थे, भूमि के पुत्र नरक के नगर प्राग्ज्योतिष में बसे हैं। हे नारायण, इन सबको आपने मारा और उनके रूप छीने थे; अब वे मनुष्य का देह धर कर संसार के लोगों को सता रहे हैं, आपके नाम के जप का विरोध करते हैं और आपके भक्तों को मारते हैं। वे स्वर्ग में आपसे डरते हैं, समुद्र में आपसे डरते हैं, धरती पर आपसे डरते हैं, और किसी से नहीं। स्वर्ग से हटाए हुए ये दैत्य धरती पर शरण पाते हैं, और जो स्वर्ग में मारा जा कर मनुष्य देह में फिर उठ खड़ा हो, उसके लिए आपके जागते हुए स्वर्ग लौटना कठिन है। इसलिए संसार में आइए; हम भी उतर रहे हैं। दानवों के नाश के लिए अपना ही एक रूप रचिए। जब आप धरती पर आएँगे, तब कंस राज नहीं कर पाएगा, और जिस काम के लिए धरती आई है, वह पूरा होगा।”

मधुसूदन मुस्कुराए। “हे नारद”, उन्होंने कहा, “तीनों लोकों के भले के लिए आपने जो कहा, उसका ठीक उत्तर सुनिए। हम जानते हैं कि ये सब दानव मनुष्य रूप में धरती पर जन्मे हैं। हम जानते हैं कि कंस उग्रसेन का पुत्र बन कर आया है, केशी घोड़ा बन कर, हाथी कुवलयापीड, पहलवान चाणूर और मुष्टिक, बैल के रूप में अरिष्ट, खर और महान असुर प्रलम्ब, और बलि की पुत्री पूतना भी। हम उस कालिय को भी जानते हैं जो विनता के पुत्र के डर से यमुना के कुण्ड में जा छिपा है, जरासंध को जो सब राजाओं का सिरमौर है, प्राग्ज्योतिष के नरक को, और उस सहस्रबाहु बाण को जो शोणितपुर में मनुष्य बन कर जन्मा है और देवताओं से भी नहीं हारता। हम यह भी जानते हैं कि भारतवर्ष का यह बड़ा भार हम पर ही है, और यह भी कि ये सब राजा कैसे जाएँगे। मनुष्य रूप में आए इन दानवों का नाश और इन्द्र के लोक का उत्सव, दोनों हमने देख लिए हैं। अपने लिए और सबके लिए हम योग में प्रवेश करेंगे, मनुष्यों के लोक में जा कर मनुष्य देह धरेंगे और कंस को आगे किए इन सब महाबली दानवों का अन्त करेंगे, कंस को उसी उपाय से मारेंगे जिससे उसे शान्ति मिले। जिन देवताओं, ऋषियों और गन्धर्वों ने हमारी आज्ञा से धरती पर उतर कर अपने को धरती के लिए सौंपा है, उनके शत्रुओं को हम मारेंगे। यह संकल्प हमने कर लिया है। पितामह वहाँ हमारे लिए एक घर बना दें, और बताएँ कि किस देश में, किस घर में जन्म ले कर हम उन्हें मारेंगे।”

ब्रह्मा ने कहा, “हे नारायण, सफलता की कुंजी और धरती पर आपके माता पिता, दोनों सुनिए। यादवों के वंश में, उनके कुल को यश देने के लिए, आप जन्म लेंगे, इन असुरों को जड़ से उखाड़ेंगे, अपना बड़ा कुल फैलाएँगे और मनुष्यों की मर्यादा स्थापित करेंगे। पुरानी बात है। महात्मा वरुण के बड़े यज्ञ में कश्यप यज्ञ के लिए दूध देने वाली सब गायें ले गए, और उनकी दो पत्नियाँ, अदिति और सुरभि, उन्हें लौटाने को राज़ी नहीं हुईं। वरुण सिर झुका कर हमारे पास आए। ‘हे पूज्य’, उन्होंने कहा, ‘गुरु ने हमारी सब गायें चुरा ली हैं, काम पूरा हो जाने पर भी लौटाने का आदेश नहीं दिया, क्योंकि वे अपनी दो पत्नियों के वश में हैं। हमारी वे गायें जब चाहें दिव्य और अक्षय दूध देती हैं, अपने ही बल से समुद्रों में विचरती हैं, और कश्यप के सिवा उन्हें कोई नहीं बाँध सकता। स्वामी हो, गुरु हो, जो भी हो, जब कोई राह से भटके तो आप ही उसे रोकते हैं; आप हमारी अन्तिम शरण हैं। अगर बलवान अपना काम भूलें और दण्ड न पाएँ, तो संसार की मर्यादा नहीं टिकेगी। हमारी गायें दिलवाइए, फिर हम समुद्र को लौट जाएँगे। ये गायें हमारी आत्मा हैं, हमारा अनन्त बल; आपकी पूरी सृष्टि में गायें और ब्राह्मण ही तेज के शाश्वत स्रोत हैं। पहले गायों की रक्षा हो, वे ब्राह्मणों की रक्षा करती हैं, और गायों और ब्राह्मणों की रक्षा पर ही संसार टिका है।’ जल के राजा वरुण की यह बात सुन कर और गायों की चोरी सच पा कर हमने कश्यप को शाप दिया कि जिस अंश से उन्होंने गायें चुराई हैं, उसी अंश से वे धरती पर ग्वाले बन कर जन्मेंगे, और देवताओं को जन्म देने वाली उनकी दोनों पत्नियाँ, सुरभि और अदिति, उनके साथ जाएँगी।

“तो कश्यप का वह अंश, उन्हीं जैसा बलवान, धरती पर वसुदेव के नाम से गायों के बीच जी रहा है। मथुरा के पास गोवर्धन नाम का एक पर्वत है; कंस को कर देते हुए, गायों में रमे, वे वहीं रहते हैं। अदिति और सुरभि वसुदेव की दो पत्नियाँ बन कर जन्मी हैं, देवकी और रोहिणी। वहाँ ग्वाले के सब लक्षण लिए एक बालक बन कर जन्मिए, और वैसे ही बढ़िए जैसे कभी आप तीन पगों वाले रूप में बढ़े थे। हे मधुसूदन, योग का आवरण ओढ़ कर संसार के भले के लिए वहाँ जाइए; ये सब देवता जय और आशीष के स्वरों में आपको विदा कर रहे हैं। धरती पर उतर कर रोहिणी और देवकी से जन्म ले कर उन्हें सुख दीजिए। हज़ारों गोपियाँ धरती को भर देंगी। जब आप वन में गायें चराते फिरेंगे, तब वे जंगली फूलों की मालाओं से सजा आपका सुन्दर रूप देखेंगी। हे कमलनयन, हे महाबाहु नारायण, जब आप बालक बन कर ग्वालों के गाँवों में जाएँगे, तब सब लोग बालक हो जाएँगे। ग्वाले बने आपके सब भक्त मन से आपके साथ रहेंगे, वन में गायें चराते हुए, चरागाहों में दौड़ते हुए, यमुना के जल में नहाते हुए, और आपसे गहरा स्नेह पा लेंगे; और वसुदेव का जीवन धन्य होगा। आप उन्हें पिता कहेंगे, वे आपको पुत्र। कश्यप के सिवा आप किसे पिता मान सकते हैं, और अदिति के सिवा आपको कौन गर्भ में धर सकती है? इसलिए अपने ही रचे योग से विजय के लिए चलिए। हम सब भी अपने अपने स्थानों को लौटते हैं।”

देवताओं को स्वर्ग भेज कर विष्णु क्षीरसागर के उत्तरी किनारे पर अपने उसी धाम को लौटे। उस दिशा में सुमेरु की एक गुफा है, जहाँ पाँव रखना कठिन है, और जहाँ उनके तीन पगों की पूजा होती है। उसी गुफा में अपना पुराना देह छोड़ कर, सर्वसमर्थ हरि ने अपने आप को वसुदेव के घर की ओर भेज दिया। और जिस क्षण यह हुआ, नारद, जो देवताओं के उतरने और विष्णु के आने की बात जान चुके थे, अपनी वीणा सँभाल कर मथुरा की ओर चल पड़े, कंस को उसकी मृत्यु की सूचना देने।

आधार: हरिवंश (महाभारत का खिल-पर्व), विष्णु पर्व, अध्याय 30 से 45; अध्याय-संख्या समीक्षित संस्करण (पी. एल. वैद्य, भांडारकर प्राच्यविद्या संस्थान, पुणे) की। कथा मन्मथनाथ दत्त के अंग्रेज़ी अनुवाद (1897) के अध्याय 50 से 55 से, जो प्रचलित पाठ पर आधारित है, उसी के कथा-क्रम में।