जब धरती गाय बन कर रोने पहुँची
पुराणों में विष्णु बार-बार उतरते रहे हैं, हर बार तब, जब धर्म का पलड़ा हल्का पड़ने लगा। इस बार बोझ असुरों का था। वे मरे नहीं थे, बस रूप बदल कर लौट आए थे, राजाओं के वेश में, और राजा बन कर पृथ्वी को उसी क्रूरता से रौंद रहे थे जो कभी रणभूमि में दिखती थी। प्रजा पिस रही थी, यज्ञ रुक रहे थे, और धरती का धैर्य चुक रहा था।
गाय बनी धरती
आख़िर भार से दबी पृथ्वी ने गाय का रूप लिया, और काँपती हुई, आँखों में आँसू भरे, ब्रह्मा के पास पहुँची। उसकी देह झुकी हुई थी, चाल लड़खड़ाती हुई, मानो सदियों का अन्याय उसकी पीठ पर लदा हो। मैं और नहीं सह सकती, उसने रोते हुए कहा। मुझ पर इतने अधर्मी बैठ गए हैं कि मेरी कमर टूटी जा रही है; अब मुझ में और भार ढोने का बल नहीं। मुझे इस बोझ से मुक्त कराइए, या मैं रसातल में समा जाऊँगी।
ब्रह्मा जानते थे कि यह भार उनके अकेले के बस का नहीं। इसलिए वे सब देवताओं को साथ ले कर वहाँ चले जहाँ हर बड़े संकट का अन्तिम उत्तर मिलता है, क्षीरसागर के उस तट पर, जहाँ अनन्त शय्या पर विष्णु विश्राम करते हैं। धरती की वह पुकार मानो पूरे आकाश को साथ ले कर उस तट तक पहुँची।
देवताओं की स्तुति
तट पर पहुँच कर देवताओं ने हाथ जोड़े और स्तुति की। हे प्रभु, उन्होंने कहा, यह भार आप ही उतार सकते हैं; आप ही लोकों के रचयिता हैं, आप ही उनके स्वामी और रक्षक। पृथ्वी आपकी शरण में है, और उसकी पीड़ा अब असह्य है। इसी प्रसंग में वे पुरानी कथाएँ भी खुलती हैं जिनमें विष्णु ने पहले भी दानवों को परास्त किया था, हर बार किसी न किसी रूप में उतर कर, और जिनसे देवताओं का यह विश्वास और गहरा होता है कि संकट चाहे कितना भी बड़ा हो, वह तेज एक बार फिर अवश्य उतरेगा।

दो बाल, एक श्याम और एक श्वेत
विष्णु ने देवताओं को आश्वासन दिया, और फिर एक अनोखा संकेत किया। उन्होंने अपनी देह से दो बाल निकाले, एक गहरा श्याम, और एक उजला श्वेत। यही दो अंश पृथ्वी पर उतरेंगे, उन्होंने मानो कहा। श्याम वसुदेव और देवकी के घर कृष्ण बन कर जन्मेगा, और श्वेत बलराम बन कर। यहीं यह तय हुआ कि अवतार अकेला नहीं आएगा; उसके साथ वह भाई भी होगा जो हर पग पर उसकी ढाल बनेगा।
देवताओं को भी कहा गया कि वे अपने-अपने अंशों से यादवों के बीच जन्म लें, ताकि अवतार के चारों ओर एक पूरी मण्डली खड़ी हो, मित्र, सम्बन्धी, सहयोगी, जो उस बड़े काम में साथ दें।
योजना मथुरा की ओर
योजना अब आकार ले चुकी थी, और उसका तीर सीधे मथुरा की ओर मुड़ रहा था, उस नगर की ओर जहाँ कंस का अत्याचार अपने चरम पर था। यह अनोखी बात है कि संसार को बचाने वाली योजना का आरम्भ किसी राजमहल में नहीं, एक बन्दीगृह की अँधेरी कोठरी में होना था, उसी कोठरी में जहाँ एक माँ बार-बार अपने बच्चे खोने वाली थी।

देवताओं की पुकार सुनी जा चुकी थी, संकल्प बँध चुका था। अब केवल समय की प्रतीक्षा थी, उस आठवीं रात की, जब वह श्याम अंश एक कारागार में उतरेगा। अगला प्रसंग उसी रात का है।
आधार: हरिवंश (महाभारत का खिल-पर्व), विष्णु पर्व, अध्याय 30 से 45; समीक्षित संस्करण (पी. एल. वैद्य, भांडारकर प्राच्यविद्या संस्थान, पुणे)। कहानी-रूप में, मूल कथा-क्रम का अनुसरण करते हुए।