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हरिवंशविष्णु पर्व · प्रसंग 9 · अध्याय 52 से 53

हरिवंश · यमलार्जुन

एक ओखल, और दो पुराने वृक्ष जिन्हें सारा व्रज देवता मान कर पूजता था

माँ ने जब उसे बाँध दिया, तो उस नन्हे बँधे बालक ने रेंगते हुए वह कर दिखाया जो किसी के बस का नहीं था, और दो विशाल पेड़ों के गिरने में व्रज ने अपना तीसरा अपशकुन देखा

चुना हुआ पुनर्कथनपढ़ने में लगभग 11 मिनट4 पत्र


बालक अब चलने-फिरने लगा था, और उसकी शरारतें भी बढ़ गई थीं। वह गोशालाओं में घुस जाता, गोबर और राख में लोट कर लौटता, व्रज-वासियों को छेड़ता, और पकड़े जाने पर ऐसी भोली मुस्कान देता कि क्रोध भी पिघल जाता। एक दिन यशोदा सचमुच तंग आ गईं।

उन्होंने क्रोध में उस कमल-नयन बालक को गाड़ी के पास ले जा कर उसकी कमर में रस्सी बाँधी, और रस्सी का दूसरा सिरा उस भारी काठ के ओखल से कस दिया जिसमें घर का धान कूटा जाता था। बार-बार उसे डाँटते हुए उन्होंने कहा कि बस का हो तो इसे घसीट कर दिखाए, और फिर वे अपने घर के काम में लग गईं, यह मान कर कि अब यह एक जगह बैठा रहेगा। पर बालक के मन में कुछ और था, व्रज-वासियों को चकित करने का एक खेल।


दो पेड़, जिन्हें व्रज पूजता था

उस बस्ती के छोर पर, वन की ओर, दो विशाल अर्जुन वृक्ष खड़े थे, इतने पास-पास उगे कि लोग उन्हें यमलार्जुन, जुड़वाँ अर्जुन कहते थे, और इतने ऊँचे और पुराने कि गाँव की सीमा उन्हीं से नापी जाती थी। व्रज के गोप उन्हें देवता मान कर पूजते थे; उनके तनों पर मनौतियाँ बाँधते थे और कहते थे कि उनसे जो माँगा जाए, वे दे देते हैं। किसी को उनकी कोई कथा याद नहीं थी, किसी ने उन्हें कभी हिलते नहीं देखा था, और किसी ने यह भी नहीं सोचा था कि ये कभी गिर सकते हैं। जितना गाँव खड़ा था, उससे कहीं पुराने ये दोनों तने वहीं, उसी छोर पर, चुपचाप खड़े थे।


बँधा हुआ बालक, और गिरते वृक्ष

ओखल से बँधा वह बालक रेंगता हुआ आँगन से बाहर निकला, उन्हीं दो वृक्षों की ओर। ओखल उसके पीछे घिसटता गया। फिर वह उन दोनों पेड़ों के ठीक बीच से निकलने लगा, और ओखल, जो उससे चौड़ा था, दोनों तनों के बीच आ कर अटक गया।

बालक रुका नहीं। उसने उन दोनों पेड़ों को पूरे बल से खींचा, और वे दोनों विशाल वृक्ष, जो युगों से अडिग खड़े थे, जड़ से उखड़ कर भयानक गर्जना के साथ भहरा कर गिर पड़े। और गोपों को यह दिखाने के लिए कि यह क्या हुआ है, वह बालक अपने दिव्य बल में वहीं खिलखिला कर हँसने लगा; उसके बल से वह रस्सी टूटने की जगह और कस गई थी। यमुना-तट की ओर जाती गोपियों ने उसे इस दशा में देखा और रोती हुई यशोदा के पास दौड़ीं, कि “दोनों पूजे जाने वाले वृक्ष आपके पुत्र पर गिर पड़े हैं, और वह गाय के पेट के नीचे बँधे बछड़े की तरह उन दोनों के बीच हँस रहा है, मानो मृत्यु के मुख से छूट कर आया हो।”


और व्रज ने अपना तीसरा अपशकुन देखा

यह अचरज देखने व्रज के सब ग्वाले और गोपियाँ, बूढ़े और जवान, दौड़े आए। दो विशाल पेड़ गिरे पड़े थे, और उनके बीच वह नन्हा बालक, ओखल से बँधा, सुरक्षित बैठा मुस्कुरा रहा था। किसी को समझ नहीं आया कि यह हुआ कैसे, बस इतना सब जान गए कि इस बालक के चारों ओर कुछ ऐसा है जो साधारण नहीं।

वन में घूमने वाले ग्वाले आपस में कहने लगे, “न आँधी आई, न वर्षा हुई, न वज्र गिरा, न किसी हाथी ने उत्पात किया, फिर ये दोनों पेड़ अचानक कैसे गिर पड़े? नन्द, ये अर्जुन वृक्ष आप पर सदा कृपालु रहे हैं; इतने बड़े हो कर भी ऐसे गिरे कि आपके बालक के देह पर खरोंच तक नहीं आई। पहले पूतना मारी गई, फिर गाड़ी टूटी, और अब इन पेड़ों का उखड़ना, व्रज में यह तीसरा अपशकुन है; अब इस गाँव में और रहना ठीक नहीं।” नन्द ने बालक को ओखल से छुड़ाया, गोद में उठाया, और उसे बार-बार ऐसे निहारते रहे मानो वह मृत्यु के लोक से लौटा हो; फिर यशोदा को उलाहना दे कर वे सब ग्वालों के साथ व्रज लौट आए। जिस दिन वह रस्सी से बँधा था, उसी दिन से व्रज के ग्वाले उसे दामोदर कहने लगे। वृन्दावन की राह व्रज ने उस दिन नहीं ली; वह बरसों बाद की बात है, जब ये दोनों भाई सात बरस के हो चुके थे।

उन दिनों दोनों भाई गौएँ चराने वन जाने लगे थे। नीले और पीले वस्त्र पहनते, देह पर पीले और श्वेत रंग की लकीरें खींचते, बालों में कौए के पंख खोंसते; कभी कानों पर मोर-पंख, सिर पर पत्तों का मुकुट और छाती पर जंगली फूलों की माला, कभी कमल का मुकुट, रस्सी को ही जनेऊ बना कर और डोरी से बँधी सूखी लौकी हाथ में लिए, वे पणव बजाते, बाँसुरी बजाते, एक-दूसरे से हँसी-ठिठोली करते, और थक कर पत्तों के बिछौने पर सो रहते। दो नन्हे घोड़ों की तरह इधर-उधर कुलाँचें भरते हुए उन दोनों से वह वन और सँवर गया था।

एक दिन दामोदर ने संकर्षण से कहा कि “भैया, खेलते-खेलते हमने यह वन लगभग उजाड़ दिया है; अब यहाँ ग्वाल-बालों के साथ खेलने को कुछ बचा नहीं। घास और टहनियाँ चुक गईं, गोपों ने पेड़ उखाड़ डाले, और जो झुरमुट घने थे वे अब आकाश की तरह खाली दिखते हैं। पानी, पेड़ और छाँह के ठिकाने दुर्लभ हो गए; पक्षी इन ठूँठों को छोड़ कर उड़ गए, और पक्षियों के बिना यह वन वैसा ही फीका है जैसा बिना दाल-साग के चावल। जंगल की लकड़ी और साग अब बिकने लगे हैं, घास मिट चुकी, और यह गाँव नगर का रूप लेता जा रहा है। पहाड़ की शोभा गोपों का गाँव है, गाँव की शोभा वन, और वन की शोभा गौएँ, और वही गौएँ हमारा सबसे बड़ा सहारा हैं। जिस घास पर गोबर और मूत्र गिरता रहे उसका रस विष हो जाता है; गौएँ उसे चरना नहीं चाहतीं और दूध भी बिगड़ता है। हमने सुना है कि यमुना के तट पर एक मनोहर वन है, घास से भरा, काँटों और कीड़ों से मुक्त, फलों, जल और कदम्ब के पेड़ों से लदा; उसका नाम वृन्दावन है। वहाँ सदा शीतल हवा चलती है, मानो सारी ऋतुओं ने उसी में शरण ली हो। पास ही गोवर्धन नाम का ऊँचा पर्वत है, जैसा नन्दन-वन के पास मन्दराचल; उस पर्वत के बीच भाण्डीर नाम का विशाल वट है, जिसकी ऊँची शाखाएँ एक योजन तक फैली हैं और जो आकाश में नीले मेघ की तरह दिखता है; और कालिन्दी उसके बीच से यों बहती है जैसे केशों के बीच माँग की रेखा। वहाँ हम रोज़ गोवर्धन, भाण्डीर और कालिन्दी को निहारते हुए सुख से रहेंगे। आप इस रूखे वन को छोड़ कर वहीं गोपों का नया पड़ाव बसाइए; और उन्हें उठाने के लिए अब कोई विपत्ति रच कर डराना होगा।”

यह कहते-कहते वासुदेव ने मन ही मन कुछ सोचा, और उनके देह के रोमों से सैकड़ों भेड़िये निकल पड़े, चर्बी, रक्त और माँस पर जीने वाले। निकलते ही वे चारों ओर दौड़े, मानो व्रज को उजाड़ने आए हों। काले मुँह वाले, छाती पर श्रीवत्स का चिह्न लिए वे भेड़िये पाँच, दस, बीस, तीस और सौ के झुंडों में घूमते, बछड़ों और गौओं पर टूटते, रात में बालकों को उठा ले जाते। फिर कोई वन में घुसने, गौएँ चराने, जंगल से कुछ लाने या नदी तक जाने का साहस न करता; व्रज के लोग भय से इतने जड़ हो गए कि हाथ-पैर हिलाने से भी डरते, और सब एक साथ सिमट कर रहने लगे।

भेड़ियों की गिनती जब दिन-दिन बढ़ती ही गई, तो उस गाँव के सब स्त्री-पुरुषों ने आपस में सलाह की कि “इस वन में अब रहना ठीक नहीं; हमें किसी और बड़े वन में चलना चाहिए जहाँ हम सुख से रहें और गौएँ अपनी इच्छा से चरें। इससे पहले कि ये भयानक भेड़िये सारे व्रज को खा जाएँ, हम आज ही, बिना देर किए, अपनी गौएँ ले कर निकल चलें।” पिंगल अंगों, दाँतों और नाखूनों वाले ये काले मुँह के भेड़िये रात में भयानक गर्जना करते हैं, और हर घर से एक ही पुकार उठती है, “मेरा बेटा, मेरा भाई, मेरा बछड़ा, मेरी गाय, भेड़िये खा गए।” गोपियों की पुकार और गौओं का करुण रँभाना सुन कर इकट्ठे हुए गोपों ने बिना देर किए पड़ाव उठाने की ठानी। गौओं के कल्याण के लिए वृन्दावन चलने का उनका संकल्प जान कर, और उन्हें इस बात पर अटल देख कर, नन्द ने देवगुरु की तरह गम्भीर स्वर में कहा कि “अगर आप सब आज ही चलने पर तुले हैं तो व्रज के सब लोगों से कहिए कि तुरन्त तैयार हो जाएँ।” सेवकों ने गाँव में घोषणा कर दी कि “पड़ाव वृन्दावन जा रहा है, अपनी गौएँ और बछड़े समेट लीजिए, गाड़ियाँ जोत लीजिए, और अपने बर्तन उन पर रख लीजिए।”

नन्द की वह हितकारी बात सुनते ही सब जल्दी से उठ खड़े हुए। “चलिए, निकलिए, देर किस बात की, गाड़ियाँ तैयार कीजिए, उठिए”, ऐसी पुकारों से गाँव गूँज उठा। भाग-दौड़ करते गोपों और गोपियों और असंख्य जुती गाड़ियों से वह गाँव गरजते समुद्र-सा लगने लगा। सिर पर घड़े रखे गोपियाँ पंक्ति बाँध कर व्रज से यों निकलीं जैसे आकाश से तारे निकलते हों; नीली, पीली और चमकीली कंचुकियों में राह चलती वे इन्द्रधनुष-सी दिखती थीं। देह पर रस्सियों के गट्ठर लादे कुछ गोप शाखाओं और पत्तों से लदे पेड़ों जैसे लगते थे, और चारों ओर चलती चमकती गाड़ियों से गोपों का वह गाँव ऐसा समुद्र दिखता था जिसमें हवा ने नावें उलट दी हों। देखते-देखते सब कुछ उठ गया, और कौओं से भरी वह खाली बस्ती मरुभूमि-सी पीछे छूट गई।

धीरे-धीरे वृन्दावन पहुँच कर उन्होंने गौओं के सुख के लिए वहाँ विस्तृत पड़ाव डाले। गाड़ियों के लिए रास्ते काटे गए; पड़ाव अर्धचन्द्र के आकार का था, एक योजन चौड़ा और दो योजन घेरे में, और चारों ओर काँटेदार लताओं, पेड़ों, खाइयों और टहनियों की बाड़ थी। खूँटे गड़े, रस्सियाँ और फंदे बँधे, पानी से भरे घड़े रखे गए, गाड़ियाँ उलट कर खड़ी कर दी गईं, घास-फूस की झोंपड़ियाँ और छप्पर उठे, गोशाले लीपे गए, ओखल अपनी जगह पर रखे गए, पश्चिम की ओर आग जली, और कपड़ों और चमड़े के बिस्तर बिछ गए। गोपियाँ पानी ला कर और टहनियाँ हटा कर वन को बुहारने लगीं, और जवान-बूढ़े गोप कुल्हाड़ियाँ ले कर हलके हाथ से पेड़ छाँटने लगे। वन, सुन्दर घरों, मीठे कन्द-मूल, फलों और जल से भरा वह गोपों का पड़ाव पहले से कहीं सुन्दर लगने लगा। तरह-तरह के पक्षियों के घोंसलों से भरे, नन्दन-वन जैसे उस वृन्दावन को पा कर गौएँ प्रसन्न थीं और जब भी दुही जातीं, दूध देतीं। भयानक ग्रीष्म के अन्तिम मास में देवराज वहाँ अमृत-सी वर्षा करते रहे; किसी को रोग न छुआ, साग-सब्ज़ी भरपूर उगी, क्योंकि जहाँ स्वयं मधुसूदन मनुष्यों के हित में रहते हों वहाँ बछड़ों और भोले लोगों को न कोई रोग होता है, न कोई नाश। इस तरह जहाँ कृष्ण ने पड़ाव जमाने की सोची थी, वहीं किशोर संकर्षण, गोप और गौएँ रहने लगे।

आधार: हरिवंश (महाभारत का खिल-पर्व), विष्णु पर्व, अध्याय 52 से 53; अध्याय-संख्या समीक्षित संस्करण (पी. एल. वैद्य, भांडारकर प्राच्यविद्या संस्थान, पुणे) की। कथा मन्मथनाथ दत्त के अंग्रेज़ी अनुवाद (1897) के अध्याय 62 से 64 से, जो प्रचलित पाठ पर आधारित है, उसी के कथा-क्रम में।