एक ओखल, और दो वृक्ष जो वर्षों से मुक्ति की राह देख रहे थे
बालक अब चलने-फिरने लगा था, और उसकी शरारतें भी बढ़ गई थीं। वह मक्खन चुराता, मटकियाँ फोड़ता, और पकड़े जाने पर ऐसी भोली मुस्कान देता कि क्रोध भी पिघल जाता। एक दिन यशोदा सचमुच तंग आ गईं। उन्होंने सोचा, आज तो इसे थोड़ी देर बाँध ही देती हूँ, ताकि यह एक जगह बैठा रहे और मैं अपना काम कर सकूँ।
उन्होंने एक रस्सी ले कर उसे एक भारी ओखल से बाँधना चाहा। पर अजीब बात हुई, रस्सी छोटी पड़ गई। उन्होंने और रस्सी जोड़ी, फिर भी दो उँगली कम। बार-बार जोड़ती गईं, और हर बार वही दो उँगली कम रह जातीं, मानो वह नन्हा शरीर किसी नाप में बँधने को था ही नहीं। आख़िर बालक ने स्वयं, माँ का परिश्रम देख कर, बँध जाना स्वीकार कर लिया, और यशोदा ने उसे ओखल से बाँध दिया।
दो पेड़, और एक पुराना शाप
उस घर के आँगन के पास दो विशाल अर्जुन वृक्ष खड़े थे, इतने ऊँचे और पुराने कि किसी को उनकी कथा याद नहीं थी। पर उन वृक्षों में एक रहस्य छिपा था। कहते हैं वे कभी दो गर्वीले यक्ष-पुत्र थे, जो अपने धन और रूप के मद में चूर रहते थे, और एक बार उन्होंने एक महर्षि का अपमान कर दिया था। उस अपमान के फल में वे वृक्ष बन कर खड़े कर दिए गए थे, इस आश्वासन के साथ कि किसी दिन वह आएगा जिसके स्पर्श से उनकी मुक्ति होगी। वर्षों से वे उसी की प्रतीक्षा में खड़े थे।

बँधा हुआ बालक, और गिरते वृक्ष
ओखल से बँधा वह बालक रेंगता हुआ आँगन से बाहर निकला, उन्हीं दो वृक्षों की ओर। ओखल उसके पीछे घिसटता गया। फिर वह उन दोनों पेड़ों के ठीक बीच से निकलने लगा, और ओखल, जो उससे चौड़ा था, दोनों तनों के बीच आ कर अटक गया।
बालक रुका नहीं। उसने आगे बढ़ने को ज़ोर लगाया, बस एक नन्हा-सा ज़ोर, और वे दोनों विशाल वृक्ष, जो युगों से अडिग खड़े थे, जड़ से उखड़ कर भयानक गर्जना के साथ भहरा कर गिर पड़े। और कहते हैं, उनके गिरते ही उनमें से दो दिव्य पुरुष प्रकट हुए, अपने पुराने रूप में, मुक्त, चमकते हुए। उन्होंने उस बालक को प्रणाम किया, जिसके स्पर्श ने उनका युगों पुराना शाप तोड़ दिया था, और कृतज्ञ हो कर अपने लोक लौट गए।
और गोकुल ने वृन्दावन की राह ली
उस भयानक आवाज़ पर पूरा गोकुल दौड़ आया। दो विशाल पेड़ गिरे पड़े थे, और उनके बीच वह नन्हा बालक, ओखल से बँधा, सुरक्षित बैठा मुस्कुरा रहा था। किसी को समझ नहीं आया कि यह हुआ कैसे, बस इतना सब जान गए कि इस बालक के चारों ओर कुछ ऐसा है जो साधारण नहीं।

इन बार-बार के संकटों और चमत्कारों से गोकुल के बड़े-बूढ़े चिन्तित भी हुए। उन्होंने विचार किया कि यह स्थान शायद अब सुरक्षित नहीं, और तय किया कि सब मिल कर एक नए, हरे-भरे वन की ओर चलें, जहाँ गायों के लिए घास हो और बच्चों के लिए शान्ति। और इस तरह पूरा गोकुल अपने घर-बार समेट कर वृन्दावन की ओर चल पड़ा, उस वन की ओर जहाँ आगे की सबसे सुन्दर और सबसे साहसी लीलाएँ घटित होनी थीं।
आधार: हरिवंश (महाभारत का खिल-पर्व), विष्णु पर्व, अध्याय 52 से 53; समीक्षित संस्करण (पी. एल. वैद्य, भांडारकर प्राच्यविद्या संस्थान, पुणे)। कहानी-रूप में, मूल कथा-क्रम का अनुसरण करते हुए।