हरिवंश · उपसंहार: आने वाले युग

उपसंहार · प्रसंग 20 · अध्याय 114 से 118

और वह वाणी, जो अमृत-सी थी, धीरे-धीरे थम गई

जनमेजय के अन्तिम प्रश्न, आने वाले युगों का वह सच्चा पर कठोर चित्र, और वह क्षण जहाँ सृष्टि के पहले क्षण से उठी कथा अपने विश्राम तक पहुँचती है

कृष्ण के सम्पूर्ण जीवन की कथा सुन कर भी जनमेजय का मन अभी एक अन्तिम प्रश्न लिए था, वही प्रश्न जो हर युग का मनुष्य पूछता है, आगे क्या। जो हुआ वह तो सुन लिया, पर जो होने वाला है, वह कैसा होगा? मनुष्य किस ओर जा रहा है? और वैशम्पायन ने उन्हें वह चित्र दिखाया जिससे कथा अक्सर मुँह मोड़ लेती है, पर यह कथा नहीं मोड़ती।


आने वाले युगों का चित्र

उन्होंने आने वाले युगों का वर्णन किया, वह समय जब धर्म धीरे-धीरे क्षीण होगा। उन्होंने बताया कि कैसे, युग दर युग, मनुष्य की आयु घटेगी, उसकी मर्यादा घटेगी, उसका सन्तोष घटेगा। कैसे लोभ बढ़ेगा, छल बढ़ेगा, और प्रजा छोटे होते जाते धर्म के पीछे चलेगी, उसी को पूरा मान कर जितना उसके युग में बचा होगा।

यह कोई सुखद चित्र नहीं था। पर इसमें एक गहरी सान्त्वना छिपी थी, कि यह घटना-बढ़ना भी काल के उसी बड़े पहिये का अंग है जिससे यह कथा शुरू हुई थी। जैसे रात के बाद भोर निश्चित है, वैसे ही क्षीण होते धर्म के बाद उसका फिर उठना भी निश्चित है; और जब-जब वह सबसे नीचे गिरेगा, वही तेज, किसी न किसी रूप में, फिर उतरेगा।


अमृत-सी वाणी का विश्राम

और फिर वह वाणी, जिसे अमृत के स्वाद और चन्द्रमा की शीतल प्रभा-सा कहा गया है, सुनने वालों के कानों को तृप्त कर के धीरे-धीरे थम गई। जनमेजय की वह प्यास, जो इस पूरी कथा के आरम्भ में थी, अब बुझ चुकी थी। उन्होंने वह कुल जान लिया था जिसमें कृष्ण उतरे, उसका आदि भी, और उसका मर्म भी।

यहीं हरिवंश विश्राम लेता है। जिस सृष्टि के पहले, नाम-रहित क्षण से यह कथा उठी थी, वह अब कृष्ण के सम्पूर्ण जीवन से होती हुई, जन्म से, गोकुल से, मथुरा और द्वारका से, काल के उस छोर तक पहुँच गई है जहाँ हर कथा अन्ततः पहुँचती है।


जो पीछे छूट जाता है

महाभारत की यह पूँछ, जो अपने आप में एक पूरा महाकाव्य है, यहाँ पूरी होती है। पर हर बड़ी कथा अपने पीछे कुछ छोड़ जाती है, और हरिवंश भी एक आश्वासन छोड़ जाता है।

वह आश्वासन यही है, कि जब-जब धरती का भार असह्य होता है, जब-जब अधर्म अपने चरम पर पहुँचता है, और जब-जब कोई गाय बन कर रोती धरती किसी द्वार पर पहुँचती है, तब वह तेज किसी न किसी रूप में, किसी न किसी कारागार की अँधेरी कोठरी में, किसी न किसी आधी रात को, फिर से जन्म लेता है। यही इस सम्पूर्ण कथा का सार है, और यही उसका वरदान।

आधार: हरिवंश (महाभारत का खिल-पर्व), उपसंहार, अध्याय 114 से 118; समीक्षित संस्करण (पी. एल. वैद्य, भांडारकर प्राच्यविद्या संस्थान, पुणे)। कहानी-रूप में, मूल कथा-क्रम का अनुसरण करते हुए।