सर्पयज्ञ समाप्त हो चुका था। कृष्ण के सम्पूर्ण जीवन की कथा जनमेजय सुन चुके थे, और अब उनका मन एक नये यज्ञ की ओर था। परीक्षित के इस पुत्र ने अश्वमेध की सामग्री जुटाई और ऋत्विजों, पुरोहितों और आचार्यों को बुलाकर कहा, “मैं अश्वमेध करना चाहता हूँ, इन घोड़ों को यज्ञ के लिए संकल्पित कीजिए।” तभी, बिना बुलाए, स्वयं कृष्ण द्वैपायन व्यास वहाँ आ पहुँचे, वह यज्ञ देखने। राजा ने उन्हें अर्घ्य दिया, आसन दिया, पाँव धोने को जल दिया, और जब दोनों बैठ गए तो सभा में चारों ओर से वेद की बातें छिड़ गईं।
बातें थमीं, तो जनमेजय ने उन मुनि से कहा, जो पाण्डवों के पितामह थे और उनके अपने प्रपितामह। “महाभारत की यह कथा”, उन्होंने कहा, “इतने अर्थों से भरी थी कि लगा मानो एक पल में पूरी हो गई। जैसे मनुष्य अमृत से कभी तृप्त नहीं होता, वैसे मैं इसे सुनकर तृप्त नहीं हुआ।” फिर उन्होंने वह प्रश्न पूछा जो बहुत दिनों से उनके भीतर घूम रहा था। “क्या कुरुओं के नाश की जड़ राजसूय यज्ञ नहीं था? सोम ने राजसूय किया, तो उसके पीछे तारक का युद्ध आया। वरुण ने किया, तो देवों और असुरों का युद्ध। राजर्षि हरिश्चन्द्र ने किया, तो आडीबक का वह संग्राम जिसमें असंख्य क्षत्रिय मारे गए। और अन्त में पाण्डवों ने यह कठिन यज्ञ किया, तो उसके पीछे भारत का महायुद्ध आया। आप भूत और भविष्य दोनों जानते हैं, आप उनके मार्गदर्शक थे, फिर आपने उस यज्ञ को रोका क्यों नहीं?”
व्यास ने कहा, “वे राजा नियति से प्रेरित थे। उन्होंने मुझसे भविष्य के बारे में कुछ नहीं पूछा, और मैं बिना पूछे कुछ नहीं कहता। और कहता भी, तो होनी को कौन टाल सकता है।” फिर उन्होंने राजा को उनके अपने भविष्य की एक झलक दी। “आपके इस अश्वमेध को स्वयं इन्द्र भंग करेंगे, और उसका कारण होगा एक ब्राह्मण का क्रोध भरा शाप।” जनमेजय काँप गए। “मुझ जैसा मनुष्य, जिसने इतने पुण्य किए, किसी शापित काम का निमित्त कैसे बनेगा? मुझे यह कहकर ढाढ़स दीजिए कि अश्वमेध फिर किया जाएगा।” व्यास ने कहा, “रुका हुआ यज्ञ देवताओं और ब्राह्मणों में जीवित रहेगा, और कलियुग में कश्यप के कुल का कोई ब्राह्मण उसे फिर जगाएगा।” तब जनमेजय ने अपना अन्तिम प्रश्न रखा। “मैं नहीं जानता कि मोक्ष का समय दूर है या पास। इसलिए मैं उस कलियुग के बारे में जानना चाहता हूँ, जो द्वापर के पीछे आया है। सहज कर्मों से पुण्य कमाने की इच्छा लिए हम इसी कलियुग में जन्मे हैं।” और व्यास ने कलियुग में मनुष्य की दशा को ध्यान में लाकर उसका वह चित्र खींचा, जिससे कथाएँ अक्सर मुँह मोड़ लेती हैं।
आने वाले युगों का चित्र
“जब कलि आएगा”, उन्होंने कहा, “तो राजा प्रजा की रक्षा नहीं करेंगे, वे बस अपनी रक्षा करेंगे और प्रजा से कर वसूलने में लगे रहेंगे। ब्राह्मण शूद्रों की तरह जीविका चलाएँगे और शूद्र ब्राह्मणों की तरह बरतेंगे, वेद जाननेवाले बाण उठा लेंगे, यज्ञों से हवि छूट जाएगी, और सब लोग एक ही पंक्ति में बैठकर खाएँगे। मनुष्य झूठे होंगे, मद्य और माँस के भूखे, और मित्रों की स्त्रियों पर नज़र रखनेवाले। चोर राजाओं की तरह रहेंगे और राजा चोरों की तरह बरतेंगे। धन की बड़ाई होगी, सज्जनों की हँसी उड़ेगी, और पतित को कोई टोकेगा नहीं। गाँव अन्न बेचेंगे, ब्राह्मण वेद बेचेंगे, और स्त्रियाँ अपना देह। ऋतुएँ उलट जाएँगी, बादल बेढंगे बरसेंगे, लोग तालाबों के पानी से खेत सींचेंगे। हर आदमी व्यापारी बन जाएगा, बेटे बाप की दी हुई सम्पत्ति बाँट लेंगे, और लोभ और झूठ से लोग आपस में लड़कर एक-दूसरे का धन लूटेंगे। हर कोई माँगेगा, और कोई देगा नहीं। राजा, चोर और आग, इन तीनों से सताए हुए लोग मिटते जाएँगे। खेत फसल नहीं देंगे, जवानों पर बुढ़ापा उतर आएगा, वर्षा ऋतु में हवा धूल बरसाएगी, और लोगों को परलोक पर सन्देह होगा।”
और वह चित्र यहीं नहीं रुका। “लोग अपने व्रत और वचन नहीं निभाएँगे। उनका सुख निष्फल होगा और क्रोध सफल। शास्त्र न जाननेवाले अपनी विद्या के घमंड में शास्त्र की व्याख्या करेंगे, बड़ों के पास बैठे बिना हर कोई हर विद्या का ज्ञाता बन जाएगा, और ऐसा कोई न बचेगा जो कवि न हो। ब्राह्मण ज्योतिषी बन जाएँगे और राजा चोर। तारे अपने ग्रहों से बिछड़ जाएँगे और दिशाएँ उलटी दिखेंगी। बेटा बाप से काम कराएगा, बहू सास पर हुकुम चलाएगी, और शिष्य गुरु को शब्दों के बाण से घायल करेंगे। लोग अतिथि को खिलाए बिना स्वयं खा लेंगे। सोते हुए पति को छलकर स्त्रियाँ दूसरे पुरुषों के पास जाएँगी, और सोती हुई पत्नियों को छोड़कर पुरुष दूसरी स्त्रियों के पास। रोग, मन की पीड़ा और ईर्ष्या लोगों को घेर लेंगी, और वे अपने कर्मों का कोई उपाय नहीं करेंगे।”
जनमेजय ने पूछा, “जब पूरा संसार इस तरह मैला हो जाएगा, तब मनुष्यों की रक्षा कौन करेगा? वे कैसे जिएँगे, कितने दिन जिएँगे, और किस छोर पर पहुँचकर फिर सत्ययुग पाएँगे?” व्यास ने उत्तर दिया। “जब धर्म डगमगाएगा और सदाचार मिट जाएगा, तब मनुष्य अल्पायु होंगे। आयु घटेगी तो बल घटेगा, बल घटेगा तो देह का रंग बिगड़ेगा और रोग जन्म लेंगे, रोग से पश्चाताप उपजेगा, पश्चाताप से भगवान का बोध, और उस बोध से फिर धर्म। इसी छोर से वे सत्ययुग में पहुँचेंगे। बीच के दिनों में कुछ लोग अपनी विद्या के घमंड में नास्तिक बनेंगे और वेदों को झुठलाएँगे, और कुछ दान और सत्य से दया के काम करेंगे। बड़े युद्ध, बड़े कोलाहल, बड़ी वर्षा और बड़े भय, इन्हें पाप के लक्षण जानिए। राक्षस ब्राह्मणों का रूप धरेंगे, कठोर बोलनेवाले राजा धरती भोगेंगे, और तपस्वी स्वयं को छिपा लेंगे। लोग अन्न, कपड़ा, यहाँ तक कि सूखा गोबर भी चुराएँगे। चोर चोरों का धन चुराएँगे, हत्यारे हत्यारों को मारेंगे, और जब चोर चोरों को मारेंगे, तभी लोगों का कुछ भला होगा। करों के बोझ से दबे लोग वनों में चले जाएँगे, और अपने ही चोर बने राजा युग के दुखों से लदे देश-देश में चक्कर काटेंगे।”
फिर व्यास ने वह दृश्य कहा, जो सुननेवालों के मन में सबसे देर तक टिका। “भय और भूख से खदेड़े हुए लोग अपने बेटों को कन्धों पर बिठाकर कौशिकी नदी पार करेंगे और अंग, बंग, कलिंग, काश्मीर और मेकल की ओर बिखर जाएँगे। कुछ हिमालय की तलहटी में म्लेच्छों के साथ रहेंगे, कुछ खारे समुद्र के किनारे, कुछ जंगलों में। धरती बसी हुई भी होगी और उजड़ी हुई भी। लोग हिरन, मछली, पक्षी, फल और कन्द पर जिएँगे, मुनियों की तरह छाल, पत्ते और मृगचर्म पहनेंगे, पहाड़ की गुफाओं में रहकर गाँव के धान की चिन्ता करेंगे, और भेड़, बकरी, गधे और ऊँट पालेंगे। बेटे पूँजी के बँटवारे पर लड़ेंगे। और वे एक गिरे हुए पुरुष का बताया गिरा हुआ धर्म मानेंगे। मनुष्य की पूरी आयु तीस वर्ष की रह जाएगी। ज्वर उन्हें निर्बल कर देगा, रोग उनकी इन्द्रियों को क्षीण कर देंगे, और घटती आयु का शोक उन्हें घेर लेगा।”
“और ठीक वहीं से”, व्यास ने कहा, “पहिया फिर ऊपर मुड़ेगा। वे लोग सज्जनों की सेवा में लगेंगे। इच्छाओं की चीज़ें नहीं मिलेंगी, इसलिए वे पुण्य करेंगे, और अपनों के नाश से निर्बल होकर अत्याचार से पीछे हटेंगे। दान, सत्य और अपने ही जीवन के प्रति आदर से वे कल्याण पाएँगे। जैसे पतन धीरे-धीरे होता है, वैसे उत्थान भी, और जब मनुष्य धर्म को पूरा-पूरा निभाने लगेंगे, तब कृतयुग लौट आएगा। जैसे चन्द्रमा शुक्ल पक्ष में बढ़ता है और कृष्ण पक्ष में घटता है, वैसे सदाचार कृतयुग में बढ़ता है और कलि में घटता है। पर काल एक ही है, सत्य, त्रेता, द्वापर और कलि उसके घटने-बढ़ने की चार अवस्थाएँ भर हैं।” और उन्होंने एक पुरानी उपमा दी। “जैसे कोई मनुष्य अपने पुरखों का सोने का डला धूल से ढका देखकर उसे सोना नहीं मानता और स्वयं को निर्धन समझता है, और उसी डले को धोकर सोना पाता है तो स्वयं को धनी, वैसे ही जब महान आत्मा माया से ढकी होती है, तब लोग उसे जीव कहते हैं, और जब वह माया से छूट जाती है, तब उसे शुद्ध चैतन्य। जैसे विधाता के स्वभाव से युगों का चक्र घूमता है, वैसे संसार में उत्थान और पतन होते रहते हैं, क्योंकि यह संसार एक क्षण भी ठहरकर नहीं रह सकता।”
अमृत-सी वाणी का विश्राम
महर्षि इस तरह राजा को ढाढ़स दे रहे थे, और भूत और भविष्य की उनकी वे बातें सभा में बैठे हर एक ने सुनीं। उनके कान उस महर्षि के शब्दों का रस ऐसे पी रहे थे, जैसे चन्द्रमा की अमृत भरी किरणें। जिस भारत-युद्ध में इतने वीर मारे गए थे, उसकी वह कथा सुनकर सभा में कोई रो पड़ा, और कोई ध्यान में उतर गया। उस पूरे इतिहास को ऋषि ने ऐसे कह दिया था, मानो वह उनकी हथेली पर लिखा हो। फिर भगवान व्यास ने सभा के सब लोगों की परिक्रमा की, उनसे विदा माँगी और यह कहकर चल पड़े कि “मैं आप सबसे फिर मिलूँगा।” बड़े-बड़े तपस्वी उनके पीछे चले, और उनके जाने पर पुरोहित और राजा जहाँ से आए थे, वहीं लौट गए। जनमेजय की वह प्यास, जो इस पूरी कथा के आरम्भ में थी, अब बुझ चुकी थी। जिस कुल में कृष्ण उतरे थे, उसका आदि भी वे जान चुके थे, और उसका मर्म भी।
जनमेजय ने अपना क्रोध ऐसे उतार फेंका, जैसे साँप अपना विष छोड़ देता है। नागों से बदला लिया जा चुका था, और मुनि आस्तीक जलते फन वाले तक्षक को बचाकर अपने आश्रम लौट चुके थे। राजा हस्तिनापुर लौटे और सन्तुष्ट प्रजा पर आनन्द से राज करने लगे। कुछ ही दिनों बाद उन्होंने विधिपूर्वक, भरपूर दान के साथ, वह अश्वमेध आरम्भ कर दिया। और वहीं व्यास की कही हुई बात सच हुई। शास्त्र की विधि से स्वयं को साधकर काशी की राजकन्या, रानी वपुष्टमा, यज्ञ में मारे गए घोड़े के पास जाकर बैठीं। उस परम सुन्दरी को चाहते हुए इन्द्र उस मरे हुए घोड़े के देह में समा गए और छल से रानी का संग किया। घोड़े में हलचल देखकर जनमेजय ने पुरोहित से कहा, “यह घोड़ा मरा नहीं है, इसे अभी मारिए।” इन्द्र की यह करतूत जानकर पुरोहित ने राजा को बताया और इन्द्र को शाप दिया। जनमेजय ने क्रोध में शपथ ली कि आज से क्षत्रिय उस चंचल इन्द्र को अश्वमेध से नहीं पूजेंगे, अपने पुरोहितों को राज्य से निकल जाने को कहा, और रानियों को आज्ञा दी कि “वपुष्टमा को घर से निकाल दीजिए, क्योंकि उसने मेरा यश और मेरा मान नष्ट कर दिया है।” यह कहते हुए परीक्षित का पुत्र रो पड़ा।
तब गन्धर्व विश्वावसु ने उनसे कहा। “राजन, आपने तीन सौ यज्ञ किए हैं, इसीलिए वासव आपको क्षमा नहीं कर पा रहे। आपकी विधिपूर्वक ब्याही यह रानी निर्दोष है। वह पहले अप्सरा रम्भा थी और अब काशी के राजा की बेटी बनकर जन्मी है। यज्ञों के फल में आप उन्हें पीछे छोड़ देंगे, इस डर से देवराज ने छिद्र ढूँढ़कर यह माया रची। उन्हें आपसे और ब्राह्मणों से सदा डर था, और आपने क्रोध में अपने तीन सौ यज्ञों के पुरोहितों को निकाल दिया, तो वे दोनों भयों से छूट गए। इसलिए इन्द्र को, गुरुओं को, वपुष्टमा को और स्वयं को दोष मत दीजिए। होनी को लाँघना उतना ही कठिन है जितना धारा के विरुद्ध नदी पार करना। सूर्य की किरणें, आग की लपट, यज्ञ की वेदी, हवि, और वह स्त्री जिसका मन किसी और से बँधा नहीं, ये दूसरों के छूने से कभी मैले नहीं होते। इस निर्दोष रत्न जैसी रानी के साथ निश्चिन्त होकर सुख से रहिए।”
जनमेजय ने वपुष्टमा को अपना लिया, पाप-शान्ति का अनुष्ठान किया, और ब्राह्मणों की पूजा, यज्ञ, दान और राज्य की देखभाल से कभी नहीं हटे। महातपस्वी ऋषियों ने जो कहा था, कि होनी के काम को लाँघा नहीं जा सकता, उसी को निश्चिन्त मन से बार-बार सोचते हुए उन्होंने अपना क्रोध छोड़ दिया। और वह वाणी, जिसे अमृत के स्वाद और चन्द्रमा की शीतल किरणों जैसा कहा गया है, सुननेवालों के कानों को तृप्त करके धीरे-धीरे थम गई। यहीं हरिवंश विश्राम लेता है। जिस सृष्टि के पहले, नाम-रहित क्षण से यह कथा उठी थी, वह कृष्ण के पूरे जीवन से होती हुई, कारागार की उस आधी रात से, गोकुल से, मथुरा और द्वारका से, काल के उस छोर तक पहुँच गई है जहाँ हर कथा अन्त में पहुँचती है।
जो पीछे छूट जाता है
महाभारत का यह खिल-पर्व, जो अपने आप में एक पूरा महाकाव्य है, यहाँ पूरा होता है। और जाते-जाते वह अपने सुननेवालों के हाथ में कुछ रख जाता है, जिसे कथा कहनेवाले सूत ने शौनक और नैमिषारण्य के ऋषियों के सामने गिनाया। जो महर्षि के इन महान वचनों को पढ़ता है, वह मनुष्यों में आदरणीय होता है, लम्बी आयु पाता है, पापों से छूटता है, और वह फल पाता है जो दूसरों को कठिनाई से मिलता है।
जैसे पेड़ फूलों से फल देता है और उन्हीं फलों से फिर उगता है, वैसे महर्षि के मुख से निकले ये वचन सुननेवाले को फिर से हरा कर देते हैं। इनके बल से पुत्रहीन को बलवान पुत्र मिलते हैं, जिसने संसार में अपना स्थान खो दिया हो वह उसे फिर पाता है, रोगी रोग से और बँधा हुआ बन्धन से छूटता है। कन्याएँ मनचाहे पति पाती हैं, क्षत्रिय अपने शत्रुओं को जीतते हैं, वैश्य सम्पत्ति पाते हैं, और शूद्र ऊँची दशा। और सूत ने अपने सुननेवालों से कहा, “ब्राह्मणों की इस मण्डली में जो प्रसंग आपको सुनाया गया है, उसे याद रखकर, धैर्य और शान्ति का सहारा लेकर, संसार में सुख से विचरिए। अद्भुत कर्मों वाले महर्षियों के जीवन और आचरण की यह कथा मैंने आपको सुना दी। अब कहिए, और क्या सुनना चाहते हैं। मैं वह भी कहूँगा।”
आधार: हरिवंश (महाभारत का खिल-पर्व), उपसंहार, अध्याय 114 से 118; अध्याय-संख्या समीक्षित संस्करण (पी. एल. वैद्य, भांडारकर प्राच्यविद्या संस्थान, पुणे) की। कथा मन्मथनाथ दत्त के अंग्रेज़ी अनुवाद (1897) के भविष्य पर्व के अध्याय 2 से 6 से, जो प्रचलित पाठ पर आधारित है, उसी के कथा-क्रम में।