हरिवंश · कालिय-दमन

विष्णु पर्व · प्रसंग 10 · अध्याय 55 से 56

यमुना के उस कुण्ड में, जहाँ पानी ज़हर बन चुका था

एक नाग जिसके विष ने नदी का एक हिस्सा मौत में बदल दिया था, एक गेंद जो उसी कुण्ड में जा गिरी, और वह नृत्य जिसने सौ फनों के मद को थाप-थाप कर उतार दिया

वृन्दावन सुन्दर था, पर उसमें एक अभिशप्त कोना था। यमुना का एक गहरा कुण्ड, जहाँ कालिय नाग ने डेरा डाल रखा था। उसके विष ने उस कुण्ड का सारा जल काला और घातक बना दिया था। उसके ऊपर से उड़ते पक्षी तक उसकी विषैली भाप से गिर पड़ते थे; जो पशु भूल से उसका पानी पी लेता, वह वहीं ढेर हो जाता। ग्वाले और गायें उस ओर जाने से डरते थे, मानो वह कुण्ड नहीं, मौत का एक दरवाज़ा हो।

कालिय वहाँ निर्भय हो कर रहता था, क्योंकि उसे लगता था कि उसके विष के सामने कोई टिक नहीं सकता। उसका यह निर्भय होना ही उसका सबसे बड़ा मद था, वह अहंकार जो सोचता है कि उसकी शक्ति के आगे सब झुकेंगे।


एक गेंद, और एक छलाँग

एक दिन कृष्ण अपने सखाओं के साथ यमुना के तट पर गेंद खेल रहे थे। खेलते-खेलते गेंद उछली, और सीधे उसी विषैले कुण्ड में जा गिरी। सखाओं के चेहरे उतर गए; वह तो मौत का जल था, वहाँ कौन जाता। पर कृष्ण मुस्कुराए, और तट पर खड़े एक ऊँचे कदम्ब वृक्ष पर चढ़ गए।

ग्वाले समझ ही नहीं पाए कि वे क्या करने वाले हैं, और इससे पहले कि कोई रोकता, कृष्ण ने उस ऊँची डाल से सीधे उसी काले, विषैले कुण्ड में छलाँग लगा दी। पानी में एक ज़ोरदार हलचल हुई, और तट पर खड़े सखा हाहाकार कर उठे, दौड़ कर वृन्दावन में ख़बर पहुँचाई। नन्द, यशोदा, सब दौड़े आए, और उस काले जल को देख कर उनकी जान सूख गई।


फनों पर नृत्य

नीचे, कुण्ड की गहराई में, कालिय अपनी नींद से जागा। किसी ने उसके राज्य में, उसके विष में कूदने का साहस किया था। वह क्रोध से फुफकारता हुआ उठा, और अपने सैकड़ों फनों में कृष्ण को लपेट लिया, इस विश्वास से कि अब यह बालक उसके विष में गल जाएगा। पर कृष्ण उसकी पकड़ से ऐसे फिसले जैसे जल मुट्ठी से फिसलता है, और अगले ही क्षण वे उस नाग के फणों के ऊपर जा चढ़े।

और फिर वह अद्भुत दृश्य हुआ जो सदा के लिए अमर हो गया। कृष्ण उस नाग के फणों पर नाचने लगे, हर थाप के साथ एक फन को दबाते, एक फुफकार को शान्त करते। यह कोई साधारण युद्ध नहीं था; यह एक नृत्य था, जिसमें हर ताल के साथ कालिय का मद, उसका विष, उसका अहंकार, सब कुचलता चला गया। नाग का दम घुटने लगा, उसके मुँह से विष के साथ अब पीड़ा भी बहने लगी, और वह समझ गया कि जिस पर वह चढ़ा है, वह उसके बस का नहीं।


प्राणदान, और एक शर्त

तभी कालिय की पत्नियाँ, नागकन्याएँ, जल से ऊपर आईं, हाथ जोड़े, और कृष्ण के सामने गिड़गिड़ाने लगीं। हे प्रभु, उन्होंने कहा, हमारे स्वामी ने जो किया, अपने स्वभाव से किया; पर अब इसका मद टूट चुका है। इसे प्राणदान दीजिए। कृष्ण का क्रोध करुणा में बदल गया। उन्होंने अपने पैर हल्के किए, और कालिय को साँस लेने दी।

मैं तुम्हें जीवन देता हूँ, कृष्ण ने कहा, पर एक शर्त पर, तुम यह यमुना सदा के लिए छोड़ कर चले जाओगे; यह जल अब इस वन की संतान का है, तुम्हारे विष का नहीं। कालिय ने सिर झुका कर वचन दिया, और अपने पूरे कुल समेत उस कुण्ड को छोड़ कर दूर समुद्र की ओर चला गया। जल फिर निर्मल हो गया, पक्षी फिर उसके ऊपर उड़ने लगे, और वृन्दावन ने राहत की एक लम्बी साँस ली। यहाँ भी वही बात थी, कृष्ण ने किसी का नाश नहीं चाहा; उन्होंने केवल मद उतारा, और जीवन लौटा दिया।

आधार: हरिवंश (महाभारत का खिल-पर्व), विष्णु पर्व, अध्याय 55 से 56; समीक्षित संस्करण (पी. एल. वैद्य, भांडारकर प्राच्यविद्या संस्थान, पुणे)। कहानी-रूप में, मूल कथा-क्रम का अनुसरण करते हुए।