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और वह नृत्य जिसने पाँच फनों का मद एक एक थाप में निचोड़ कर उतार दिया
वृन्दावन सुन्दर था, और उसमें एक मरा हुआ कोना था। व्रज से एक कोस उत्तर, यमुना का एक गहरा कुण्ड, पूरे एक योजन का, काला और ठहरा हुआ, जैसे समुद्र का पानी बिना लहर के पड़ा हो। उसका जल विष था। जो पक्षी उसके ऊपर से उड़ने की चूक करता, वह बीच आकाश से गिर पड़ता; जो घास उड़ कर उसकी सतह पर आ जाती, वह एक साँस में जल कर राख हो जाती; जो पशु भूल से उसका पानी पी लेता, वह वहीं ढेर हो जाता। देवता तक उस कुण्ड से दूर रहते थे। उसके किनारों पर विष से झुलसे पेड़ों का एक घेरा धुआँ छोड़ता रहता था, और जो ऋषि संध्या के जल के लिए यमुना पर आते, उन्हें कहीं और जाना पड़ता। व्रज के लोगों के लिए वह कुण्ड मौत का दरवाज़ा था, और उन्होंने यह मान लेना सीख लिया था कि वह है ही नहीं।
वह कुण्ड कालिय का था, नागों के राजा का, और वह समुद्र से यहाँ आया था। गरुड़, वह महान पक्षी जो साँपों को खा जाता है, उसे सागर से भगा लाया था, और इस गहरे जल में कालिय को एक ऐसा राज्य मिल गया था जहाँ कोई पाँव नहीं रखता था। उसके विष ने नदी का वह पूरा हिस्सा दूषित कर दिया था। उस अँधेरे जल में वह निर्भय रह रहा था, इस निश्चय के साथ कि संसार में कोई उसके विष के सामने टिक नहीं सकता, और यही निश्चय बढ़ते बढ़ते उसका सबसे गहरा मद बन गया था, वह अहंकार जो मान बैठता है कि उसकी शक्ति के आगे सारा संसार झुकेगा।
विषैला कुण्ड, और एक छलाँग
एक दिन गायें चराते हुए कृष्ण यमुना के तट पर आ निकले। लताओं से लदे पेड़ों के बीच नदी बह रही थी, उसके घाट सधे हुए थे, पानी मीठा था, हंस और सारस उसके किनारों पर बोल रहे थे, और कृष्ण उसे निहारते हुए चलते चले गए। फिर आगे उन्हें वह कुण्ड दिखा। गहरा, विशाल, बादलों से ढके आकाश जैसा, और उसके चारों ओर वैसा ही सन्नाटा जैसा किसी ऐसी जगह पर होता है जहाँ से जीवन उठ कर चला गया हो। वे किनारे पर खड़े हो कर उसे देखते रहे, और सोचने लगे। “यह कुण्ड किसका है? वह नागराज कालिय, काजल के ढेर जैसा काला, जिसकी बात हमने पहले सुनी है, जो गरुड़ के डर से समुद्र छोड़ आया है, वही यहाँ रहता होगा। उसी ने सागर की ओर बहती इस यमुना को दूषित किया है, और उसी के भय से यहाँ कोई नहीं बसता।” समझते ही उन्हें यह भी समझ आ गया कि यहाँ कोई पक्षी क्यों नहीं उड़ता और इन घाटों पर कोई बालक क्यों नहीं खेलता।
और यहीं उनके मन में वह बात उठी जिसके लिए वे आए थे। “इसी तरह के दुष्टों का दमन करने के लिए हमने ग्वालों के बीच जन्म लिया है और उन्हीं के बीच रह रहे हैं। इस नाग को हम ऐसे हराएँगे कि इस कुण्ड का जल व्रज के लोगों के काम आए, यहाँ फिर से सुहावनी हवा चले, और ये घाट फिर से बरतने लायक हों। सो बालक की तरह खेलते हुए हम इस कदम्ब पर चढ़ेंगे, कुण्ड में कूदेंगे, और कालिय को वश में करेंगे। और सब जान लेंगे कि इन भुजाओं में क्या बल है।”
उन्होंने अपना वस्त्र कस कर बाँधा, तट पर झुके उस ऊँचे कदम्ब पर चढ़े, और उसकी सबसे ऊपर की डाल तक जा पहुँचे। फिर सिंह की तरह एक गर्जना की और सिर के बल सीधे उस काले कुण्ड में कूद पड़े। पानी उछला और फटे बादलों की तरह चारों ओर बिखर गया। नीचे, गहराई में, नाग का घर उस आवाज़ से हिल उठा। किनारे पर खड़े ग्वाल बालकों ने बस इतना देखा कि सतह उनके ऊपर बन्द हो गई, और वे रोते हुए व्रज की ओर भागे, दबी हुई आवाज़ में पुकारते हुए कि कृष्ण नादानी में कालिय के कुण्ड में डूब गए हैं, नागराज उन्हें खींच रहा है, और नन्द बाबा तक तुरन्त ख़बर पहुँचे। वज्र गिरने जैसी वह बात सुन कर नन्द शोक से टूट गए और दौड़ते हुए उस कुण्ड की ओर चले। उनके पीछे सारा व्रज उमड़ पड़ा, बालक, बूढ़े, युवतियाँ, और उनके साथ किशोर बलराम भी। और जब वे उस मरे हुए काले जल के किनारे पहुँचे और कहीं बालक का चिह्न नहीं दिखा, तो उनकी टाँगों से बल ही निकल गया।
फनों पर नृत्य
नीचे, गहराई में, कालिय जागा। किसी ने उसके राज्य में, उसके विष में, घुस कर उसे ललकारा था। वह बादल जैसा काला, क्रोध से लाल आँखें लिए, पानी चीरता हुआ ऊपर उठा, उसके पाँच फन फैले हुए और आग की लपटों की तरह जलते हुए, और उसके पाँच विशाल मुख कुण्ड की सतह के ऊपर आ गए। उसके फनों की आग से पूरा कुण्ड ढक गया। उसके तेज और क्रोध से पानी मानो खौलने लगा, और यमुना डर के मारे सिकुड़ कर उलटी बहने लगी। कृष्ण को कुण्ड में बालक की तरह खेलते देख उसने अपने मुखों से क्रोध की आग में सनी हवा छोड़ी; चिनगारियाँ और धुआँ उसके मुखों से निकलने लगे। उसके साथ उसका पुत्र और उसके सेवक नाग भी उठे, विष और धुआँ उगलते हुए, और सबने मिल कर कृष्ण को अपने फनों के घेरे में ले लिया, कुण्डलियों में ऐसा लपेटा कि वे हाथ पाँव हिला न सकें। वे उनके बीच पर्वत की तरह अचल खड़े रहे। नागों ने अपने दाँतों के विष से गँदला पानी उन पर छिड़का, और वह विष उन पर पड़ कर टूट गया; कृष्ण को कुछ नहीं हुआ।
किनारे पर शोक अब खुल कर विलाप बन चुका था। कोई “हाय पुत्र” कह कर रो रहा था, कोई “हाय, हम सब मारे गए।” स्त्रियाँ यशोदा से चिल्ला कर कह रही थीं, “देखिए, आपका बेटा नागराज के वश में है, वह उसके फन के नीचे ऐसे काँप रहा है जैसे मथा जा रहा हो; आपका हृदय पत्थर का है जो यह देख कर भी नहीं फटता; हम आपके पीछे इसी कुण्ड में उतर जाएँगी, पर दामोदर के बिना व्रज नहीं लौटेंगी; कृष्ण के बिना व्रज वैसा ही होगा जैसा सूरज के बिना दिन, जैसा बछड़े के बिना गाय।” और नन्द किनारे पर ऐसे खड़े थे जैसे सुध खो बैठे हों, आँखें पानी पर, अपने बेटे के चेहरे पर टिकी हुईं।
केवल बलराम नहीं रोए। रोहिणी के पुत्र, जो कृष्ण के साथ एक मन, एक बुद्धि थे और फिर भी एक अलग देह में खड़े थे, अकेले जानते थे कि उनका भाई कौन है। उन्होंने रोष में पानी के पार पुकारा, स्वर स्थिर और थोड़ा तीखा: “कृष्ण, महाबाहु, ग्वालों के आनन्द को बढ़ाने वाले, इस विषधर नागराज का अन्त अब कीजिए। भाई, हमारे ये सब सम्बन्धी मनुष्य की समझ रखते हैं, ये आपको मनुष्य का बालक मान कर आपके लिए रो रहे हैं।”
भाई की वह बात सुनते ही कृष्ण हिले। उन्होंने खेल में ही अपनी भुजाएँ फैलाईं, और नागों के बन्धन गीले धागे की तरह टूट गए। उसी गति में वे पानी से ऊपर उठे, और पानी के ऊपर उठे हुए कालिय के फनों पर पाँव रखा। एक विशाल सिर को हाथों से थामा, और बल से अपने को पाँचों के बीच वाले फन पर चढ़ा लिया। और वहाँ, उस मँझले फन पर, वे नाचने लगे। यह पूरे अर्थ में नृत्य था, भार और ताल और सधा हुआ सन्तुलन, और उनकी एड़ियों के नीचे वे जलते हुए फन पीले पड़ने लगे, उनसे रक्त बहने लगा। हर थाप के साथ नाग के भीतर से विष निचुड़ता गया, और विष के साथ मद भी। कालिय का दम घुटने लगा। उसके मुखों से रक्त और विष एक साथ बहे, और उसने आख़िर समझा कि जो बालक उसके सिरों पर खड़ा है, वह उसके बस के बिलकुल बाहर है।
प्राणदान, और एक शर्त
तब कालिय ने स्वयं कहा, और उसका स्वर टूटा हुआ आया। “सुन्दर मुख वाले कृष्ण”, उसने कहा, “हमने आपको जाने बिना आप पर क्रोध किया। अब आपने हमें हरा दिया है, वश में कर लिया है, और हमारा विष नष्ट हो गया है। हमें प्राण दीजिए, और आज्ञा दीजिए कि हम अपनी पत्नी, अपनी सन्तान और अपने कुटुम्ब सहित किसकी सेवा करें।” उस पाँच फन वाले नागराज को देख कर और उसकी व्यथा सुन कर कृष्ण ने, जिनके वाहन स्वयं नागों के शत्रु गरुड़ हैं, ऐसे उत्तर दिया जैसे उनमें क्रोध कभी रहा ही न हो।
“अब हम आपको इस यमुना के जल में रहने नहीं देंगे”, कृष्ण ने कहा। “अपनी पत्नी और अपने कुटुम्ब को साथ लेकर समुद्र को लौट जाइए। इसके बाद आपके पुत्रों या सेवकों में से जो भी इस जल में या इस प्रदेश की भूमि पर दिखाई दिया, वह हमारे हाथों मारा जाएगा। यह जल अब सबके लिए निर्मल रहे, और आप गहरे सागर को चलिए; यहाँ रहे तो आप पर ऐसी विपत्ति आएगी जो आपके प्राण ले लेगी। और समुद्र में गरुड़ से न डरिए: जब वे आपके सिर पर हमारे पैरों के चिह्न देखेंगे, तो आपको नहीं मारेंगे।” कालिय ने सिर झुकाया, और अपने फनों पर कृष्ण के चरण-चिह्न लिए हुए, सब देखते ग्वालों के सामने, चुपचाप उस कुण्ड से निकल गया, और अपने पूरे कुल समेत उसी गहरे सागर की ओर चला जहाँ से वह कभी भागा था।
जल निर्मल हो गया। पक्षी फिर उसके ऊपर से उड़ने लगे, और गायें पानी पीने घाटों तक उतर आईं। कृष्ण कुण्ड से निकल कर तट पर खड़े हुए, और ग्वाले विस्मय में उन्हें घेर कर खड़े हो गए, उनकी परिक्रमा की, और उनका यश गाने लगे, यह आधा समझते हुए कि उन्होंने क्या देखा है, और उस आग को भाँपते हुए जो राख के नीचे दबी रहती है। उन्होंने नन्द से कहा, “आप धन्य हैं, देवताओं के प्रिय हैं, जिनका ऐसा पुत्र है। आज से यह कृष्ण विपत्ति में ग्वालों का आश्रय होंगे और गोशाला में गायों के रक्षक। यमुना का जल अब हर ओर मीठा और निर्मल हो गया है, और अब हमारी गायें हर घाट पर सुख से घूमेंगी। सच में हम ग्वाले ही हैं, कि इतने दिन व्रज में रह कर भी हम इन्हें पहचान नहीं पाए, जैसे राख से ढकी आग को कोई नहीं पहचानता।” और अमर कृष्ण की स्तुति करते हुए वे सब अपनी बस्ती को लौट गए, और उनके पीछे यमुना अपने रास्ते पर लौट कर बहती रही, साफ़ और मीठी।
आधार: हरिवंश (महाभारत का खिल-पर्व), विष्णु पर्व, अध्याय 55 से 56; अध्याय-संख्या समीक्षित संस्करण (पी. एल. वैद्य, भांडारकर प्राच्यविद्या संस्थान, पुणे) की। कथा मन्मथनाथ दत्त के अंग्रेज़ी अनुवाद (1897) के अध्याय 66 से 67 से, जो प्रचलित पाठ पर आधारित है, उसी के कथा-क्रम में।
यही कथा वहाँ भी
- कालिय नाग
श्रीमद्भागवत (स्कन्ध 10): कालिय नाग का दमन