एक स्वप्न से छिड़ा महायुद्ध, जिसमें प्रभु और भक्त आमने-सामने आए
यह कथा किसी राज्य या मणि के लोभ से नहीं, एक स्वप्न से शुरू होती है। कृष्ण के पौत्र अनिरुद्ध और बाणासुर की पुत्री उषा, दोनों ने एक-दूसरे को सपने में देखा, और जागते ही एक ऐसे प्रेम में बँध गए जिसका सिरा उन्हें ख़ुद भी पता नहीं था। उषा बेचैन थी, क्योंकि उसने जिसे देखा था उसका नाम तक नहीं जानती थी, बस एक चेहरा, जो आँखें मूँदते ही लौट आता, और खुली आँखों ओझल हो जाता।
उसकी सखी चित्रलेखा, जो अपनी कला से किसी भी व्यक्ति का चित्र बना सकती थी, उसकी मदद को आगे आई। उसने देवों, गन्धर्वों, और यादवों के अनेक चित्र बनाए, और एक-एक कर उषा को दिखाए। आख़िर उषा की उँगली एक चित्र पर ठहर गई, यही है। वह अनिरुद्ध थे, कृष्ण के पौत्र। तब चित्रलेखा ने अपनी माया से, रात के अँधेरे में, सोते हुए अनिरुद्ध को द्वारका से उठा कर उषा के महल तक पहुँचा दिया। दो स्वप्न अब आमने-सामने थे।
पिता का क्रोध
पर यह बात अधिक समय छिपी न रह सकी। जब बाणासुर को पता चला कि उसकी अविवाहित पुत्री के महल में कोई युवक रह रहा है, तो उसका क्रोध फट पड़ा। उसने अपने पहरेदार भेजे, पर अनिरुद्ध अकेले ही, बिना किसी सेना के, उनसे भिड़ गए, और एक के बाद एक को पीछे धकेलते रहे। उनका पराक्रम देख कर बाण भी चकित हुआ।
आख़िर बाण ने अपनी माया का सहारा लिया, और अनिरुद्ध को नागपाश में बाँध लिया। और यहीं से वह संग्राम छिड़ा जिसमें द्वारका और शोणितपुर आमने-सामने आ खड़े हुए। जब द्वारका में अनिरुद्ध के लापता होने और फिर बाण के यहाँ बन्दी होने की ख़बर पहुँची, तो कृष्ण, बलराम और प्रद्युम्न अपनी सेना ले कर शोणितपुर की ओर चल पड़े।

जब महादेव ढाल बने
पर यह कोई साधारण युद्ध नहीं था। बाणासुर सहस्र भुजाओं वाला था, अपार बलशाली, और सबसे बड़ी बात, वह शिव का परम भक्त था। उसने अपनी भक्ति के बल पर शिव से यह वरदान पा रखा था कि संकट के समय स्वयं महादेव उसकी रक्षा करेंगे। इसलिए जब कृष्ण की सेना शोणितपुर पहुँची, तो सामने केवल बाण नहीं था, स्वयं शिव अपने गणों समेत उसकी ढाल बन कर खड़े थे।
यह युद्ध इसलिए अनोखा था कि इसमें दोनों ओर वही दिव्य शक्ति थी, बस अलग-अलग भूमिकाओं में। शिव अपने भक्त को दिए वचन को निभा रहे थे; कृष्ण धर्म और अपने पौत्र के अधिकार की रक्षा कर रहे थे। दोनों ओर के अस्त्र टकराते, और सृष्टि काँप उठती। आकाश से धरती तक वह संग्राम छा गया, और कुछ क्षणों को तो ऐसा लगा मानो सृष्टि का सन्तुलन ही दाँव पर लग गया हो।
गर्व का कटना, और वचन का बचना
अन्ततः कृष्ण ने बाण का गर्व तोड़ा। उन्होंने उसकी हज़ार भुजाओं को, जो उसके अहंकार का प्रतीक थीं, एक-एक कर काट डाला, बस कुछ ही शेष रहने दीं, इतनी कि वह जीवित तो रहे पर अपने मद से सदा के लिए मुक्त हो जाए।

और तब, जैसा कृष्ण का स्वभाव था, उन्होंने शिव के मान का पूरा ध्यान रखा। अपने भक्त के लिए उतरे महादेव के सम्मान में, और उनके वचन को बचाते हुए, उन्होंने बाण को प्राणदान दे दिया। भक्त बच गया, उसका गर्व मिट गया, और प्रभु का वचन भी रह गया, तीनों एक साथ। अनिरुद्ध और उषा मुक्त हुए, और जो कथा एक स्वप्न से शुरू हुई थी, वह एक विवाह पर आ कर ठहरी। द्वारका लौटती उस बारात में मानो वह सब समाया था जो कृष्ण के जीवन का मर्म रहा, कि सबसे कठिन युद्ध भी अन्ततः किसी को जोड़ने के लिए ही लड़े जाते हैं, तोड़ने के लिए नहीं।
आधार: हरिवंश (महाभारत का खिल-पर्व), विष्णु पर्व, अध्याय 105 से 113; समीक्षित संस्करण (पी. एल. वैद्य, भांडारकर प्राच्यविद्या संस्थान, पुणे)। कहानी-रूप में, मूल कथा-क्रम का अनुसरण करते हुए।