एक अभेद्य दुर्ग, सोलह हज़ार बंदी, और उससे भी कठिन एक विजय
द्वारका अपने वैभव पर थी, पर दूर पूर्व में, प्राग्ज्योतिष का असुर नरक पूरी धरती के लिए अभिशाप बन चुका था। उसका दुर्ग ऐसा था जैसा किसी ने देखा न हो, पर्वतों के घेरे, जल के घेरे, और अग्नि के घेरे उसकी रक्षा करते थे, और भीतर हज़ारों भयानक योद्धा। उस अभेद्य दुर्ग के बल पर नरक का दम्भ आकाश को छूता था।
उसने किसी को नहीं छोड़ा। उसने राजाओं को लूटा, ऋषियों को सताया, और अपने दुस्साहस में स्वर्ग तक पर हाथ डाला, देवताओं की माता अदिति के दिव्य कुण्डल तक छीन लिए, और वरुण का छत्र भी। पर उसका सबसे क्रूर कर्म यह था कि उसने अलग-अलग देशों से सोलह हज़ार राजकन्याओं को छीन कर अपने दुर्ग में बंदी बना रखा था। उनकी पुकार धरती से उठती रहती थी, पर उस अभेद्य दुर्ग तक पहुँचने का साहस कोई नहीं करता था।
गरुड़ पर एक अभियान
आख़िर देवता और पीड़ित कृष्ण की शरण में आए। कृष्ण सत्यभामा के साथ गरुड़ पर सवार हुए, और उस अभेद्य दुर्ग की ओर चले। यह अभियान आसान नहीं था; नरक की रक्षा-पंक्तियाँ एक के बाद एक सामने आईं।
पहले पर्वतों के घेरे आए, जिन्हें कृष्ण ने तोड़ा। फिर जल के घेरे, फिर अग्नि के। फिर नरक के बड़े-बड़े सेनापति, एक-एक कर सामने आए, और एक-एक कर परास्त हुए। यह एक लम्बा, कठिन संग्राम था, जिसमें सत्यभामा भी पीछे नहीं रहीं। अन्ततः नरक स्वयं सामने आया, अपने पूरे बल के साथ, और एक भीषण युद्ध के बाद उसका वध हुआ। उसके अत्याचार का अन्त हो गया; छीने हुए दिव्य आभूषण देवताओं को लौटा दिए गए, और अदिति के कुण्डल फिर अपनी जगह पहुँचे।

सबसे कठिन विजय
पर असली विजय वध नहीं थी। असली विजय वह क्षण था जब उन बंदी कन्याओं के द्वार खुले। मुक्त हो कर भी उनके सामने एक प्रश्न खड़ा था, जो किसी तलवार से न कटता था, वर्षों असुर के दुर्ग में रहने के बाद अब समाज में उनकी जगह कहाँ; कौन उन्हें अपनाएगा, कौन उनका मान लौटाएगा। वह घाव बाहर का नहीं, समाज की दृष्टि का था, और ऐसे घाव सबसे गहरे होते हैं।
कृष्ण ने वही किया जो बहुत कम विजेता करते हैं। उन्होंने उन सोलह हज़ार स्त्रियों को केवल मुक्त नहीं किया; उन्होंने उन्हें आश्रय दिया, मान दिया, और अपने संरक्षण में ले कर उनके खोए हुए सम्मान को लौटाया, ताकि कोई उन्हें हीन दृष्टि से न देख सके, ताकि वे फिर से सिर उठा कर जी सकें।
विजय का असली अर्थ
यह कृष्ण के चरित्र का वह पक्ष है जो युद्ध की किसी भी जीत से ऊँचा है। एक असुर को मार देना बल का काम है, और बहुत-से वीर वह कर सकते हैं। पर जिन्हें उस असुर ने तोड़ा था, उन्हें फिर से जोड़ देना, उनका गिरा हुआ जीवन फिर खड़ा कर देना, यह बल का नहीं, हृदय का काम है।

कृष्ण ने सिखाया कि विजय का असली अर्थ किसी को मारना नहीं, किसी का गिरा हुआ जीवन फिर से उठा देना है। नरकासुर के अन्त के साथ धरती से एक बड़ा आतंक मिटा, और द्वारका लौटे कृष्ण के साथ वे सब लौटीं जिन्हें संसार ने भुला दिया था। और इसी अभियान के साथ एक और दिव्य प्रसंग जुड़ता है, स्वर्ग के उस पारिजात वृक्ष का, जो अब पृथ्वी पर उतरने वाला था।
आधार: हरिवंश (महाभारत का खिल-पर्व), विष्णु पर्व, अध्याय 91 से 96; समीक्षित संस्करण (पी. एल. वैद्य, भांडारकर प्राच्यविद्या संस्थान, पुणे)। कहानी-रूप में, मूल कथा-क्रम का अनुसरण करते हुए।