वह मणि जिसने कृष्ण को एक रीछ की गुफा तक पहुँचा दिया
वृष्णि और अन्धक का यदुवंश अब अपने पूरे बल पर था, और इसी कुल में वसुदेव थे, कृष्ण के पिता। पर इस समृद्ध कुल को एक ऐसी परीक्षा से गुज़रना था जो तलवार से नहीं, सन्देह से लड़ी जाती है, और जिसमें कृष्ण के अपने चरित्र पर प्रश्न उठा।
यादवों में सत्राजित नाम का एक व्यक्ति था, जिसने अपने तप से सूर्य को प्रसन्न कर के एक अद्भुत मणि पाई, स्यमन्तक। यह कोई साधारण रत्न नहीं था। यह हर दिन ढेर-सा सोना उगलती थी, और जहाँ रहती, वहाँ रोग और अकाल नहीं फटकते थे। ऐसी निधि स्वाभाविक ही अनेक आँखों में चुभने लगी।
एक सुझाव, और एक खटास
कृष्ण ने एक बार सत्राजित को सुझाया कि ऐसी मणि, जो पूरे राज्य का कल्याण कर सकती है, किसी एक के घर नहीं, राजकोष में रहनी चाहिए, ताकि उसका लाभ सब को मिले। यह सुझाव लोक-कल्याण का था, पर सत्राजित ने इसे लोभ समझा। उसने साफ़ मना कर दिया, और मन में एक खटास पाल ली कि कृष्ण उसकी मणि पर नज़र रखते हैं। एक नेक सुझाव कैसे एक सन्देह का बीज बन गया, यह मनुष्य के मन की वह कमज़ोरी है जो आगे एक बड़ा संकट खड़ा करने वाली थी।
शिकार, सिंह, और रीछ
एक दिन सत्राजित का भाई प्रसेन वही मणि गले में पहन कर शिकार पर निकला। वन में उसे एक सिंह ने मार डाला और मणि उठा ली। फिर उसी सिंह को रीछों के राजा जाम्बवान ने मार गिराया, और चमकती मणि उठा कर अपनी गुफा में, अपने नन्हे बच्चे के पालने पर खेलने को टाँग दी। वन की गहराई में हुई यह पूरी घटना किसी मनुष्य ने नहीं देखी।

बाहर जो दिखा, वह बस इतना था, प्रसेन मणि पहन कर गया और लौटा नहीं। और जिसने पहले वह मणि माँगी थी, वह कृष्ण थे। उँगलियाँ सीधे उनकी ओर उठ गईं। लोग फुसफुसाने लगे कि इतने बड़े पुरुष ने एक रत्न के लोभ में प्रसेन को मरवा दिया और मणि हड़प ली। यह आरोप किसी अस्त्र से अधिक गहरा घाव करता था।
गुफा में, दिन पर दिन
कृष्ण के लिए यह क्षण कठिन था, क्योंकि बल से किसी का मुँह बन्द किया जा सकता है, पर सन्देह नहीं मिटाया जा सकता। और उन्होंने वही चुना जो उनका स्वभाव था, आरोप को तलवार से नहीं, सच की खोज से काटने का निश्चय। वे स्वयं उस वन में निकले जहाँ प्रसेन गया था। उन्होंने प्रसेन का शव पाया, पास ही उस सिंह का, जिसे किसी और ने मारा था, और फिर रीछ के पैरों के निशान, जो एक गुफा तक जाते थे।
भीतर मणि एक पालने पर झूल रही थी। जैसे ही कृष्ण ने उसे लेना चाहा, जाम्बवान भड़क उठा, और फिर वह हुआ जो किसी ने सोचा न था। कृष्ण और जाम्बवान में युद्ध छिड़ गया, और चलता रहा, दिन पर दिन, रात पर रात। दोनों थकते नहीं थे। जाम्बवान, जो स्वयं एक युग पुराना था और जिसने कभी राम की सेवा की थी, चकित रह गया कि कोई उससे इतने दिन कैसे भिड़ सकता है।
और तब उसके भीतर वह पुरानी पहचान जागी, कि यह बल, यह तेज, किसी साधारण मनुष्य का नहीं हो सकता; यह तो वही है जिसकी उसने युगों पहले सेवा की थी। उसने हाथ जोड़ दिए, युद्ध रोक दिया, मणि कृष्ण को सौंप दी, और साथ में अपनी पुत्री जाम्बवती का हाथ भी, यह कह कर कि ऐसे वर के योग्य और कौन होगा।

नाम धुल गया
कृष्ण लौटे, और भरी सभा में वह मणि सबके सामने रख दी। बिना एक भी कठोर शब्द कहे, बिना किसी को दोष दिए, वह आरोप धुल गया जो उन पर लगा था। सत्राजित लज्जा से भर उठा, कि उसके सन्देह ने एक निर्दोष पर इतना बड़ा लांछन रखा। अपनी भूल सुधारने को उसने अपनी पुत्री सत्यभामा का विवाह कृष्ण से कर दिया, और मणि भी उन्हें ही देनी चाही।
यह छोटा-सा प्रसंग आगे की उस पूरी कथा की भूमिका है जिसमें कृष्ण बार-बार बल से कम और धैर्य तथा सत्य से अधिक जीतते दिखेंगे। उन्होंने सीख दे दी थी कि लांछन का उत्तर क्रोध नहीं, सच की खोज है। यदुवंश का मंच अब पूरी तरह सज चुका है। और अब कथा सीधे उस सबसे बड़े प्रश्न पर जाती है, यह सब किसके लिए, कृष्ण इस धरती पर आख़िर आए ही क्यों।
आधार: हरिवंश (महाभारत का खिल-पर्व), हरिवंश पर्व, अध्याय 23 से 29; समीक्षित संस्करण (पी. एल. वैद्य, भांडारकर प्राच्यविद्या संस्थान, पुणे)। कहानी-रूप में, मूल कथा-क्रम का अनुसरण करते हुए।