राग वडहंस
अपराह्न का राग, शुभ-अवसरों का।
वडहंस राग अपराह्न का है, समारोह-योग्य। पंजाबी विवाह-संस्कारों में इसकी ध्वनि सुनाई देती रही है, सदियों से।
नाम का अर्थ "बड़ा हंस" है, जो इसकी राजसी प्रकृति का संकेत है। ग्रंथ में इस राग की रचनाएँ कुल-मिला कर बहुत हैं, मगर जो हैं वो विशेष-अवसर-स्मरण की भावना से भरी हैं।
"बाबा आइआ है उठि चलणा अध पंधै है संसारोवा ॥" वडहंस M1, अलाहणी
इस राग के सब अंग
इस राग के शबद
हर शबद अपनी पहली पंक्ति से, वाणी के अनुसार। पंक्ति पर जाने से वह शबद अपने अंग पर खुलता है।
महला 1 (13)
- अमली अमलु न अंबड़ै मछी नीरु न होइ ॥अंग 557
- गुणवंती सहु राविआ निरगुणि कूके काइ ॥अंग 557
- मोरी रुण झुण लाइआ भैणे सावणु आइआ ॥अंग 557
- काइआ कूड़ि विगाड़ि काहे नाईऐ ॥अंग 565
- करहु दइआ तेरा नामु वखाणा ॥अंग 566
- धंनु सिरंदा सचा पातिसाहु जिनि जगु धंधै लाइआ ॥अंग 578
- आवहु मिलहु सहेलीहो सचड़ा नामु लएहां ॥अंग 579
- सचु सिरंदा सचा जाणीऐ सचड़ा परवदगारो ॥अंग 580
- जिनि जगु सिरजि समाइआ सो साहिबु कुदरति जाणोवा ॥अंग 581
- बाबा आइआ है उठि चलणा इहु जगु झूठु पसारोवा ॥अंग 581
- जालउ ऐसी रीति जितु मै पिआरा वीसरै ॥अंग 590
- घर ही मुंधि विदेसि पिरु नित झूरे संम्हाले ॥अंग 594
- नानक गाली कूड़ीआ बाझु परीति करेइ ॥अंग 594
महला 3 (60)
- मनि मैलै सभु किछु मैला तनि धोतै मनु हछा न होइ ॥अंग 558
- नदरी सतगुरु सेवीऐ नदरी सेवा होइ ॥अंग 558
- माइआ मोहु गुबारु है गुर बिनु गिआनु न होई ॥अंग 559
- सोहागणी सदा मुखु उजला गुर कै सहजि सुभाइ ॥अंग 559
- अंम्रित नामु सद मीठा लागा गुर सबदी सादु आइआ ॥अंग 559
- गुरमुखि सचु संजमु ततु गिआनु ॥अंग 559
- रसना हरि सादि लगी सहजि सुभाइ ॥अंग 560
- पूरे गुर ते नामु पाइआ जाइ ॥अंग 560
- हउमै नावै नालि विरोधु है दुइ न वसहि इक ठाइ ॥अंग 560
- अनदिनु सचु सलाहणा धनु धनु वडभाग हमारा ॥1॥अंग 564
- मनूआ दह दिस धावदा ओहु कैसे हरि गुण गावै ॥अंग 565
- आपणे पिर कै रंगि रती मुईए सोभावंती नारे ॥अंग 567
- गुरमुखि सभु वापारु भला जे सहजे कीजै राम ॥अंग 568
- कालु जालु जमु जोहि न साकै साचै सबदि लिव लाए ॥अंग 569
- रतन पदारथ वणजीअहि सतिगुरि दीआ बुझाई राम ॥अंग 569
- सचा सउदा हरि नामु है सचा वापारा राम ॥अंग 570
- ए मन मेरिआ आवा गउणु संसारु है अंति सचि निबेड़ा राम ॥अंग 571
- प्रभु सचड़ा हरि सालाहीऐ कारजु सभु किछु करणै जोगु ॥अंग 582
- सुणिअहु कंत महेलीहो पिरु सेविहु सबदि वीचारि ॥अंग 583
- रोवहि पिरहि विछुंनीआ मै पिरु सचड़ा है सदा नाले ॥अंग 584
- इहु सरीरु जजरी है इस नो जरु पहुचै आए ॥अंग 584
- सबदि रते वड हंस है सचु नामु उरि धारि ॥अंग 585
- मै जानिआ वड हंसु है ता मै कीआ संगु ॥अंग 585
- हंसा वेखि तरंदिआ बगां भि आया चाउ ॥अंग 585
- सतिगुरि सेविऐ हरि मनि वसै तिथै भउ कदे न होइ ॥अंग 586
- इकि सजण चले इकि चलि गए रहदे भी फुनि जाहि ॥अंग 586
- सतिगुर की सेवा चाकरी सुखी हूं सुख सारु ॥अंग 586
- होर विडाणी चाकरी ध्रिगु जीवणु ध्रिगु वासु ॥अंग 586
- सतिगुरि मिलिऐ भुख गई भेखी भुख न जाइ ॥अंग 586
- सतिगुरि सेविऐ सदा सुखु जनम मरण दुखु जाइ ॥अंग 587
- सजण मिले सजणा जिन सतगुर नालि पिआरु ॥अंग 587
- इकि सदा इकतै रंगि रहहि तिन कै हउ सद बलिहारै जाउ ॥अंग 587
- त्रिसना दाधी जलि मुई जलि जलि करे पुकार ॥अंग 588
- भेखी अगनि न बुझई चिंता है मन माहि ॥अंग 588
- कलि महि जमु जंदारु है हुकमे कार कमाइ ॥अंग 588
- एहा काइआ रोगि भरी बिनु सबदै दुखु हउमै रोगु न जाइ ॥अंग 588
- भगति करहि मरजीवड़े गुरमुखि भगति सदा होइ ॥अंग 589
- सतिगुर की सेव न कीनीआ किआ ओहु करे वीचारु ॥अंग 589
- रतना पारखु जो होवै सु रतना करे वीचारु ॥अंग 589
- सतिगुर की सेव न कीनीआ हरि नामि न लगो पिआरु ॥अंग 589
- बिनु सतिगुर सेवे जीअ के बंधना विचि हउमै करम कमाहि ॥अंग 589
- भगत जना कंउ आपि तुठा मेरा पिआरा आपे लइअनु जन लाइ ॥अंग 590
- सुणि सिखिऐ सादु न आइओ जिचरु गुरमुखि सबदि न लागै ॥अंग 590
- नानक नामु निधानु है गुरमुखि पाइआ जाइ ॥अंग 590
- कंचन काइआ निरमली जो सचि नामि सचि लागी ॥अंग 590
- मनमुखु काइरु करूपु है बिनु नावै नकु नाहि ॥अंग 591
- गुरमुखि सदा दरि सोहणे गुर का सबदु कमाहि ॥अंग 591
- सतिगुर की परतीति न आईआ सबदि न लागो भाउ ॥अंग 591
- ए मन ऐसा सतिगुरु खोजि लहु जितु सेविऐ जनम मरण दुखु जाइ ॥अंग 591
- बिनु सतिगुर सेवे जगतु मुआ बिरथा जनमु गवाइ ॥अंग 591
- इसु जग महि पुरखु एकु है होर सगली नारि सबाई ॥अंग 591
- जिन कंउ सतिगुरु भेटिआ से हरि कीरति सदा कमाहि ॥अंग 592
- हंउमै अंदरि खड़कु है खड़के खड़कि विहाइ ॥अंग 592
- गुरमुखि सेव न कीनीआ हरि नामि न लगो पिआरु ॥अंग 592
- इको सतिगुरु जागता होरु जगु सूता मोहि पिआसि ॥अंग 592
- जगतु अगिआनी अंधु है दूजै भाइ करम कमाइ ॥अंग 593
- हम घरि नामु खजाना सदा है भगति भरे भंडारा ॥अंग 593
- मनहठि किनै न पाइओ सभ थके करम कमाइ ॥अंग 593
- सतिगुर नो सभु को वेखदा जेता जगतु संसारु ॥अंग 594
- सतिगुरू न सेविओ मूरख अंध गवारि ॥अंग 594
महला 4 (30)
- सेज एक एको प्रभु ठाकुरु ॥अंग 560
- मेरा हरि प्रभु सुंदरु मै सार न जाणी ॥अंग 561
- मै मनि वडी आस हरे किउ करि हरि दरसनु पावा ॥अंग 561
- मेरै मनि मेरै मनि सतिगुरि प्रीति लगाई राम ॥अंग 572
- हंउ गुर बिनु हंउ गुर बिनु खरी निमाणी राम ॥अंग 572
- हरि सतिगुर हरि सतिगुर मेलि हरि सतिगुर चरण हम भाइआ राम ॥अंग 573
- हरि किरपा हरि किरपा करि सतिगुरु मेलि सुखदाता राम ॥अंग 574
- देह तेजणि जी रामि उपाईआ राम ॥अंग 575
- देह तेजनड़ी हरि नव रंगीआ राम ॥अंग 575
- तू आपे ही आपि आपि है आपि कारणु कीआ ॥अंग 585
- तिसु मिलीऐ सतिगुर सजणै जिसु अंतरि हरि गुणकारी ॥अंग 586
- सो सतिगुरु सेविहु साध जनु जिनि हरि हरि नामु द्रिड़ाइआ ॥अंग 586
- तितु जाइ बहहु सतसंगती जिथै हरि का हरि नामु बिलोईऐ ॥अंग 587
- तिसु गुर कउ हउ वारिआ जिनि हरि की हरि कथा सुणाई ॥अंग 587
- जिनी हरि हरि नामु धिआइआ तिनी पाइअड़े सरब सुखा ॥अंग 588
- जिनि जगजीवनु उपदेसिआ तिसु गुर कउ हउ सदा घुमाइआ ॥अंग 588
- तू करता सभु किछु जाणदा सभि जीअ तुमारे ॥अंग 589
- जिसु अंतरु हिरदा सुधु है तिसु जन कउ सभि नमसकारी ॥अंग 589
- हरि इको दाता सेवीऐ हरि इकु धिआईऐ ॥अंग 590
- गुरसिखां मनि हरि प्रीति है गुरु पूजण आवहि ॥अंग 590
- से गुरसिख धनु धंनु है जिनी गुर उपदेसु सुणिआ हरि कंनी ॥अंग 590
- गुरमुखि प्रहिलादि जपि हरि गति पाई ॥अंग 591
- जिस कै घरि दीबानु हरि होवै तिस की मुठी विचि जगतु सभु आइआ ॥अंग 591
- जिन कै हरि नामु वसिआ सद हिरदै हरि नामो तिन कंउ रखणहारा ॥अंग 592
- हरि नामु हमारा प्रभु अबिगतु अगोचरु अबिनासी पुरखु बिधाता ॥अंग 592
- हरि नामु हमारा भोजनु छतीह परकार जितु खाइऐ हम कउ त्रिपति भई ॥अंग 593
- धंनु धंनु सो गुरसिखु कहीऐ जो सतिगुर चरणी जाइ पइआ ॥अंग 593
- धनु धनु सत पुरखु सतिगुरू हमारा जितु मिलिऐ हम कउ सांति आई ॥अंग 594
- जिनि उपाए जीअ तिनि हरि राखिआ ॥अंग 594
- तू आपे आपि आपि सभु करता कोई दूजा होइ सु अवरो कहीऐ ॥अंग 594
महला 5 (19)
- अति ऊचा ता का दरबारा ॥अंग 562
- धनु सु वेला जितु दरसनु करणा ॥अंग 562
- तू बेअंतु को विरला जाणै ॥अंग 562
- अंतरजामी सो प्रभु पूरा ॥अंग 563
- तू वड दाता अंतरजामी ॥अंग 563
- साधसंगि हरि अंम्रितु पीजै ॥अंग 563
- विसरु नाही प्रभ दीन दइआला ॥अंग 563
- तू जाणाइहि ता कोई जाणै ॥अंग 563
- मेरै अंतरि लोचा मिलण की पिआरे हउ किउ पाई गुर पूरे ॥अंग 564
- गुर मिलि लधा जी रामु पिआरा राम ॥अंग 576
- किआ सुणेदो कूड़ु वंञनि पवण झुलारिआ ॥अंग 577
- तिन घोलि घुमाई जिन प्रभु स्रवणी सुणिआ राम ॥अंग 577
- लोइण लोई डिठ पिआस न बुझै मू घणी ॥अंग 577
- जिनी हरि प्रभु डिठा तिन कुरबाणे राम ॥अंग 577
- देह अंधारी अंध सुंञी नाम विहूणीआ ॥अंग 577
- तिन खंनीऐ वंञां जिन मेरा हरि प्रभु डीठा राम ॥अंग 577
- जो लोड़ीदे राम सेवक सेई कांढिआ ॥अंग 578
- मिलि जलु जलहि खटाना राम ॥अंग 578
- प्रभ करण कारण समरथा राम ॥अंग 578