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अंग 588

अंग
588
राग Vadhans
राग: Vadhans · रचयिता: Guru Amar Daas Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
तिसु गुर कउ सद बलिहारणै जिनि हरि सेवा बणत बणाई ॥
सो सतिगुरु पिआरा मेरै नालि है जिथै किथै मैनो लए छडाई ॥
तिसु गुर कउ साबासि है जिनि हरि सोझी पाई ॥
नानकु गुर विटहु वारिआ जिनि हरि नामु दीआ मेरे मन की आस पुराई ॥5॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।

हिन्दी अर्थ: और जिसने प्रभू की भक्ति की रीत चलाई है। वह प्यारा सतिगुरू मेरे अंग-संग है।हर जगह मुझे (विकारों से) छुड़वा लेता है; शाबाश है उस सतिगुरू को जिसने मुझे परमात्मा की समझ दी है। जिस गुरू ने मुझे परमात्मा का नाम दिया है और मेरे मन की आस पूरी की है मैं नानक उससे सदके हूँ। 5।
सलोक मः 3 ॥
त्रिसना दाधी जलि मुई जलि जलि करे पुकार ॥
सतिगुर सीतल जे मिलै फिरि जलै न दूजी वार ॥
नानक विणु नावै निरभउ को नही जिचरु सबदि न करे वीचारु ॥1॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 3॥ दुनिया तृष्णा की जली हुई दुखी हो रही है।जल जल के बिलख रही है; अगर ये ठंढक देने वाले गुरू से मिल जाए।तो फिर ये फिर दुबारा ना जले; (क्योंकि) हे नानक ! जब तक गुरू के शबद से मनुष्य प्रभू-विचार (चिंतन) ना करे तब तक (नाम नहीं मिलता।और) नाम के बिना किसी का डर भी खत्म नहीं होता (ये डर और सहम ही बारंबार तृष्णा के अधीन करता है)। 1।
मः 3 ॥
भेखी अगनि न बुझई चिंता है मन माहि ॥
वरमी मारी सापु न मरै तिउ निगुरे करम कमाहि ॥
सतिगुरु दाता सेवीऐ सबदु वसै मनि आइ ॥
मनु तनु सीतलु सांति होइ त्रिसना अगनि बुझाइ ॥
सुखा सिरि सदा सुखु होइ जा विचहु आपु गवाइ ॥
गुरमुखि उदासी सो करे जि सचि रहै लिव लाइ ॥
चिंता मूलि न होवई हरि नामि रजा आघाइ ॥
नानक नाम बिना नह छूटीऐ हउमै पचहि पचाइ ॥2॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।

हिन्दी अर्थ: महला 3॥ भेष धारण करने से (तृष्णा की) आग नहीं बुझती।मन में चिंता टिकी रहती है; जैसे साँप की वरमी को मारने से साँप नहीं मरता वैसे ही गुरू की शरण आए बगैर किए गए कर्म व्यर्थ हैं (गुरू की शरण पड़ कर स्वै भाव मिटाए बगैर तृष्णा की आग नहीं मिटती)। अगर (नाम की दाति) देने वाले गुरू के बताए हुए कर्म करें तो गुरू की शबद मन में आ बसता है। मन-तन ठंडा-ठार हो जाता है।तृष्णा की अग्नि बुझ जाती है और मन में शांति पैदा हो जाती है (गुरू की सेवा में) जब मनुष्य अहंकार दूर करता है तब सबसे श्रेष्ठ सुख मिलता है। गुरू के सन्मुख होया हुआ मनुष्य ही (तृष्णा से) त्याग करता है जो सच्चे नाम में सुरति जोड़े रखता है। उसे बिल्कुल ही चिंता नहीं होती।वह प्रभू के साथ ही पूरी तरह तृप्त हो रहता है। हे नानक ! प्रभू का नाम सिमरन के बिना (तृष्णा की आग से) बचा नहीं जा सकता।(नाम के बिना) जीव अहंकार में पड़े सड़ते हैं।
पउड़ी ॥
जिनी हरि हरि नामु धिआइआ तिनी पाइअड़े सरब सुखा ॥
सभु जनमु तिना का सफलु है जिन हरि के नाम की मनि लागी भुखा ॥
जिनी गुर कै बचनि आराधिआ तिन विसरि गए सभि दुखा ॥
ते संत भले गुरसिख है जिन नाही चिंत पराई चुखा ॥
धनु धंनु तिना का गुरू है जिसु अंम्रित फल हरि लागे मुखा ॥6॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ जिन मनुष्यों ने प्रभू का नाम सिमरा है।उनको सारे सुख मिल गए हैं। उनका सारा मानस जीवन सफल हो गया है जिनके मन में प्रभू के नाम की भूख लगी हुई है (भाव।‘नाम’ जिनकी जिंदगी का आसरा हो जाता है)। जिन्होंने गुरू के शबद के माध्यम से प्रभू का सिमरन किया है।उनके सारे दुख दूर हो गए। वे गुरसिख अच्छे संत हैं जिन्होंने (प्रभू के बिना) किसी और की रक्ती भर भी आस नहीं रखी; उनका गुरू भी धन्य है।भाग्यशाली है।जिसके मुँह को (प्रभू की सिफत सालाह रूपी) अमर करने वाले फल लगे हुए हैं (भाव।जिसके मुँह से प्रभू के उस्तति के वचन ही निकलते हैं)। 6।
सलोक मः 3 ॥
कलि महि जमु जंदारु है हुकमे कार कमाइ ॥
गुरि राखे से उबरे मनमुखा देइ सजाइ ॥
जमकालै वसि जगु बांधिआ तिस दा फरू न कोइ ॥
जिनि जमु कीता सो सेवीऐ गुरमुखि दुखु न होइ ॥
नानक गुरमुखि जमु सेवा करे जिन मनि सचा होइ ॥1॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 3॥ दुविधा वाली हालत में (मनुष्य के सिर पर) मौत का सहम टिका रहता है;(पर वह जम भी) प्रभू के हुकम में ही काम करता है। जिन्हें गुरू ने (‘कलि’ से) बचा लिया है वे (जम के सहम से) बच जाते हैं।मन के पीछे चलने वाले बँदों को (सहम की) सजा देता है। जगत (भाव। प्रभू से विछुड़ा हुआ जीव) जमकाल के वश में बँधा पड़ा है।उसका कोई रक्षक नहीं बनता; अगर गुरू के सन्मुख हो के उस प्रभू की बँदगी करें जिसने जम को पैदा किया है (तो फिर जम का) दुख नहीं व्यापता। (बल्कि) हे नानक ! जिन गुरमुखों के मन में सच्चा प्रभू बसता है उनकी यम भी सेवा करता है। 1।
मः 3 ॥
एहा काइआ रोगि भरी बिनु सबदै दुखु हउमै रोगु न जाइ ॥
सतिगुरु मिलै ता निरमल होवै हरि नामो मंनि वसाइ ॥
नानक नामु धिआइआ सुखदाता दुखु विसरिआ सहजि सुभाइ ॥2॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।

हिन्दी अर्थ: महला 3॥ ये शरीर (अहंकार के) रोग से भरा पड़ा है।गुरू के शबद के बिना अहंम रोग रूपी दुख दूर नहीं होता; अगर गुरू मिल जाए तो मनुष्य का मन पवित्र हो जाता है (क्योंकि गुरू के मिलने से मनुष्य) परमात्मा का नाम मन में बसाता है। हे नानक ! जिन्होंने सुखदाई हरी-नाम सिमरा है उनका अहम्-दुख सहज सुभाय ही दूर हो जाता है। 2।
पउड़ी ॥
जिनि जगजीवनु उपदेसिआ तिसु गुर कउ हउ सदा घुमाइआ ॥
तिसु गुर कउ हउ खंनीऐ जिनि मधुसूदनु हरि नामु सुणाइआ ॥
तिसु गुर कउ हउ वारणै जिनि हउमै बिखु सभु रोगु गवाइआ ॥
तिसु सतिगुर कउ वड पुंनु है जिनि अवगण कटि गुणी समझाइआ ॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ मैं उस गुरू से सदा कुर्बान हूँ जिसने जगत का सहारा नजदीक करके दिखा दिया है। जिसने अहंकार दैत्य को मारने वाले प्रभू का नाम सुनाया है (भाव।नाम-सिमरन की शिक्षा दी है)। जिसने अहम् रूपी जहर व अन्य सारे (विकारों का) रोग दूर किया है। जिस गुरू ने (जीव के) पाप काट के गुणों के खजाने प्रभू की समझ दी है।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।

अमरदास जी ने एक ऐसी उम्र में गुरु-गद्दी पायी जब अधिकांश लोग रिटायर हो जाते हैं। उनकी रचनाओं में एक बड़े आदमी की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध उनका सीधा रुख़ बाद की सिख-परम्परा का foundational-वाक्य बना।

इस अंग पर 7 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “और जिसने प्रभू की भक्ति की रीत चलाई है।”

इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।