सो सतिगुरु पिआरा मेरै नालि है जिथै किथै मैनो लए छडाई ॥
तिसु गुर कउ साबासि है जिनि हरि सोझी पाई ॥
नानकु गुर विटहु वारिआ जिनि हरि नामु दीआ मेरे मन की आस पुराई ॥5॥
त्रिसना दाधी जलि मुई जलि जलि करे पुकार ॥
सतिगुर सीतल जे मिलै फिरि जलै न दूजी वार ॥
नानक विणु नावै निरभउ को नही जिचरु सबदि न करे वीचारु ॥1॥
भेखी अगनि न बुझई चिंता है मन माहि ॥
वरमी मारी सापु न मरै तिउ निगुरे करम कमाहि ॥
सतिगुरु दाता सेवीऐ सबदु वसै मनि आइ ॥
मनु तनु सीतलु सांति होइ त्रिसना अगनि बुझाइ ॥
सुखा सिरि सदा सुखु होइ जा विचहु आपु गवाइ ॥
गुरमुखि उदासी सो करे जि सचि रहै लिव लाइ ॥
चिंता मूलि न होवई हरि नामि रजा आघाइ ॥
नानक नाम बिना नह छूटीऐ हउमै पचहि पचाइ ॥2॥
जिनी हरि हरि नामु धिआइआ तिनी पाइअड़े सरब सुखा ॥
सभु जनमु तिना का सफलु है जिन हरि के नाम की मनि लागी भुखा ॥
जिनी गुर कै बचनि आराधिआ तिन विसरि गए सभि दुखा ॥
ते संत भले गुरसिख है जिन नाही चिंत पराई चुखा ॥
धनु धंनु तिना का गुरू है जिसु अंम्रित फल हरि लागे मुखा ॥6॥
कलि महि जमु जंदारु है हुकमे कार कमाइ ॥
गुरि राखे से उबरे मनमुखा देइ सजाइ ॥
जमकालै वसि जगु बांधिआ तिस दा फरू न कोइ ॥
जिनि जमु कीता सो सेवीऐ गुरमुखि दुखु न होइ ॥
नानक गुरमुखि जमु सेवा करे जिन मनि सचा होइ ॥1॥
एहा काइआ रोगि भरी बिनु सबदै दुखु हउमै रोगु न जाइ ॥
सतिगुरु मिलै ता निरमल होवै हरि नामो मंनि वसाइ ॥
नानक नामु धिआइआ सुखदाता दुखु विसरिआ सहजि सुभाइ ॥2॥
जिनि जगजीवनु उपदेसिआ तिसु गुर कउ हउ सदा घुमाइआ ॥
तिसु गुर कउ हउ खंनीऐ जिनि मधुसूदनु हरि नामु सुणाइआ ॥
तिसु गुर कउ हउ वारणै जिनि हउमै बिखु सभु रोगु गवाइआ ॥
तिसु सतिगुर कउ वड पुंनु है जिनि अवगण कटि गुणी समझाइआ ॥
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।
अमरदास जी ने एक ऐसी उम्र में गुरु-गद्दी पायी जब अधिकांश लोग रिटायर हो जाते हैं। उनकी रचनाओं में एक बड़े आदमी की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध उनका सीधा रुख़ बाद की सिख-परम्परा का foundational-वाक्य बना।
इस अंग पर 7 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “और जिसने प्रभू की भक्ति की रीत चलाई है।”
इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।