नानक गुरमुखि तिनी नामु धिआइआ जिन कंउ धुरि पूरबि लिखिआसि ॥2॥
हरि नामु हमारा भोजनु छतीह परकार जितु खाइऐ हम कउ त्रिपति भई ॥
हरि नामु हमारा पैनणु जितु फिरि नंगे न होवह होर पैनण की हमारी सरध गई ॥
हरि नामु हमारा वणजु हरि नामु वापारु हरि नामै की हम कंउ सतिगुरि कारकुनी दीई ॥
हरि नामै का हम लेखा लिखिआ सभ जम की अगली काणि गई ॥
हरि का नामु गुरमुखि किनै विरलै धिआइआ जिन कंउ धुरि करमि परापति लिखतु पई ॥17॥
जगतु अगिआनी अंधु है दूजै भाइ करम कमाइ ॥
दूजै भाइ जेते करम करे दुखु लगै तनि धाइ ॥
गुर परसादी सुखु ऊपजै जा गुर का सबदु कमाइ ॥
सची बाणी करम करे अनदिनु नामु धिआइ ॥
नानक जितु आपे लाए तितु लगे कहणा किछू न जाइ ॥1॥
हम घरि नामु खजाना सदा है भगति भरे भंडारा ॥
सतगुरु दाता जीअ का सद जीवै देवणहारा ॥
अनदिनु कीरतनु सदा करहि गुर कै सबदि अपारा ॥
सबदु गुरू का सद उचरहि जुगु जुगु वरतावणहारा ॥
इहु मनूआ सदा सुखि वसै सहजे करे वापारा ॥
अंतरि गुर गिआनु हरि रतनु है मुकति करावणहारा ॥
नानक जिस नो नदरि करे सो पाए सो होवै दरि सचिआरा ॥2॥
धंनु धंनु सो गुरसिखु कहीऐ जो सतिगुर चरणी जाइ पइआ ॥
धंनु धंनु सो गुरसिखु कहीऐ जिनि हरि नामा मुखि रामु कहिआ ॥
धंनु धंनु सो गुरसिखु कहीऐ जिसु हरि नामि सुणिऐ मनि अनदु भइआ ॥
धंनु धंनु सो गुरसिखु कहीऐ जिनि सतिगुर सेवा करि हरि नामु लइआ ॥
तिसु गुरसिख कंउ हंउ सदा नमसकारी जो गुर कै भाणै गुरसिखु चलिआ ॥18॥
मनहठि किनै न पाइओ सभ थके करम कमाइ ॥
मनहठि भेख करि भरमदे दुखु पाइआ दूजै भाइ ॥
रिधि सिधि सभु मोहु है नामु न वसै मनि आइ ॥
गुर सेवा ते मनु निरमलु होवै अगिआनु अंधेरा जाइ ॥
नामु रतनु घरि परगटु होआ नानक सहजि समाइ ॥1॥
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर वर्ष की आयु में गुरु-गद्दी सँभाली, 1552 में, और 1574 तक रहे। उनकी वाणी में बुढ़ापे, समाज की संरचना, और संगति की चिन्ताएँ बार-बार लौटती हैं। उन्होंने ही लंगर (साझा-भोजन) की व्यवस्था मज़बूत की, और देश-भर में बाईस मंजी (केन्द्र) स्थापित किए।
इस अंग पर 7 शबद हैं, क्रम-से बँधे।
एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।