जो गुरमुखि नामु धिआइदे तिनी चड़ी चवगणि वंनी ॥12॥
मनमुखु काइरु करूपु है बिनु नावै नकु नाहि ॥
अनदिनु धंधै विआपिआ सुपनै भी सुखु नाहि ॥
नानक गुरमुखि होवहि ता उबरहि नाहि त बधे दुख सहाहि ॥1॥
गुरमुखि सदा दरि सोहणे गुर का सबदु कमाहि ॥
अंतरि सांति सदा सुखु दरि सचै सोभा पाहि ॥
नानक गुरमुखि हरि नामु पाइआ सहजे सचि समाहि ॥2॥
गुरमुखि प्रहिलादि जपि हरि गति पाई ॥
गुरमुखि जनकि हरि नामि लिव लाई ॥
गुरमुखि बसिसटि हरि उपदेसु सुणाई ॥
बिनु गुर हरि नामु न किनै पाइआ मेरे भाई ॥
गुरमुखि हरि भगति हरि आपि लहाई ॥13॥
सतिगुर की परतीति न आईआ सबदि न लागो भाउ ॥
ओस नो सुखु न उपजै भावै सउ गेड़ा आवउ जाउ ॥
नानक गुरमुखि सहजि मिलै सचे सिउ लिव लाउ ॥1॥
ए मन ऐसा सतिगुरु खोजि लहु जितु सेविऐ जनम मरण दुखु जाइ ॥
सहसा मूलि न होवई हउमै सबदि जलाइ ॥
कूड़ै की पालि विचहु निकलै सचु वसै मनि आइ ॥
अंतरि सांति मनि सुखु होइ सच संजमि कार कमाइ ॥
नानक पूरै करमि सतिगुरु मिलै हरि जीउ किरपा करे रजाइ ॥2॥
जिस कै घरि दीबानु हरि होवै तिस की मुठी विचि जगतु सभु आइआ ॥
तिस कउ तलकी किसै दी नाही हरि दीबानि सभि आणि पैरी पाइआ ॥
माणसा किअहु दीबाणहु कोई नसि भजि निकलै हरि दीबाणहु कोई किथै जाइआ ॥
सो ऐसा हरि दीबानु वसिआ भगता कै हिरदै तिनि रहदे खुहदे आणि सभि भगता अगै खलवाइआ ॥
हरि नावै की वडिआई करमि परापति होवै गुरमुखि विरलै किनै धिआइआ ॥14॥
बिनु सतिगुर सेवे जगतु मुआ बिरथा जनमु गवाइ ॥
दूजै भाइ अति दुखु लगा मरि जंमै आवै जाइ ॥
विसटा अंदरि वासु है फिरि फिरि जूनी पाइ ॥
नानक बिनु नावै जमु मारसी अंति गइआ पछुताइ ॥1॥
इसु जग महि पुरखु एकु है होर सगली नारि सबाई ॥
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर वर्ष की आयु में गुरु-गद्दी सँभाली, 1552 में, और 1574 तक रहे। उनकी वाणी में बुढ़ापे, समाज की संरचना, और संगति की चिन्ताएँ बार-बार लौटती हैं। उन्होंने ही लंगर (साझा-भोजन) की व्यवस्था मज़बूत की, और देश-भर में बाईस मंजी (केन्द्र) स्थापित किए।
इस अंग पर 9 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “जिन गुरसिखों पर प्रभू प्रसन्न होता है।”
बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।