Lulla Family

अंग 591

अंग
591
राग Vadhans
राग: Vadhans · रचयिता: Guru Amar Daas Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
जिना गुरसिखा कउ हरि संतुसटु है तिनी सतिगुर की गल मंनी ॥
जो गुरमुखि नामु धिआइदे तिनी चड़ी चवगणि वंनी ॥12॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।

हिन्दी अर्थ: जिन गुरसिखों पर प्रभू प्रसन्न होता है।वह सतिगुरू की शिक्षा पे चलते हैं। जो मनुष्य सतिगुरू के सन्मुख हो के नाम जपते हैं।उनको (प्रेम की) चौगुनी रंगत चढ़ती है। 12।
सलोक मः 3 ॥
मनमुखु काइरु करूपु है बिनु नावै नकु नाहि ॥
अनदिनु धंधै विआपिआ सुपनै भी सुखु नाहि ॥
नानक गुरमुखि होवहि ता उबरहि नाहि त बधे दुख सहाहि ॥1॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 3 ॥ मन के अधीन मनुष्य डरपोक और बद्शकल होता है।नाम के बिना कहीं उसे आदर नहीं मिलता। हर वक्त माया के चक्कर में फंसा रहता है और (इसके कारण) उसे सपने में भी सुख नहीं होता। हे नानक ! मनमुख मनुष्य अगर सतिगुरू के सन्मुख हो जाए तो (जंजाल से) बच जाते हैं।वरना (माया के मोह में) बँधे हुए दुख सहते हैं। 1।
मः 3 ॥
गुरमुखि सदा दरि सोहणे गुर का सबदु कमाहि ॥
अंतरि सांति सदा सुखु दरि सचै सोभा पाहि ॥
नानक गुरमुखि हरि नामु पाइआ सहजे सचि समाहि ॥2॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।

हिन्दी अर्थ: महला 3॥ सतिगुरू के सन्मुख होए हुए मनुष्य दरगाह में सदा सुशोभित होते हैं (क्योंकि) वे सतिगुरू का शबद कमाते हैं; उनके हृदय में सदा शांति व सुख होता है।(इस के कारण) सच्ची दरगाह में शोभा पाते हैं। हे नानक ! सतिगुरू के सन्मुख मनुष्यों को हरी का नाम मिला हुआ होता है।(इसलिए) वे सहज ही सच्चे में लीन हो जाते हैं। 2।
पउड़ी ॥
गुरमुखि प्रहिलादि जपि हरि गति पाई ॥
गुरमुखि जनकि हरि नामि लिव लाई ॥
गुरमुखि बसिसटि हरि उपदेसु सुणाई ॥
बिनु गुर हरि नामु न किनै पाइआ मेरे भाई ॥
गुरमुखि हरि भगति हरि आपि लहाई ॥13॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी। सतिगुरू के सन्मुख हो के प्रहलाद ने हरी का नाम जप के ऊँची आत्मिक अवस्था प्राप्त की। सतिगुरू के सन्मुख हो के जनक ने हरी के नाम में बिरती जोड़ी। सतिगुरू के सन्मुख हो के वशिष्ट (मुनि) ने हरी का उपदेश (औरों को) सुनाया। हे मेरे भाई ! सतिगुरू के बिना किसी ने नाम नहीं पाया। सतिगुरू के सन्मुख हुए मनुष्य को प्रभू ने अपनी भक्ति स्वयं बख्शी है। 13।
सलोकु मः 3 ॥
सतिगुर की परतीति न आईआ सबदि न लागो भाउ ॥
ओस नो सुखु न उपजै भावै सउ गेड़ा आवउ जाउ ॥
नानक गुरमुखि सहजि मिलै सचे सिउ लिव लाउ ॥1॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 3॥ जिस मनुष्य का सतिगुरू पर भरोसा नहीं बना और सतिगुरू के शबद में जिसका मन न लगा उसे कभी सुख नहीं। चाहे (गुरू के पास) सौ बार आए जाय। हे नानक ! अगर गुरू के सन्मुख हो के सच्चे में लिव जोड़ें तो प्रभू सहज ही मिल जाता है। 1।
मः 3 ॥
ए मन ऐसा सतिगुरु खोजि लहु जितु सेविऐ जनम मरण दुखु जाइ ॥
सहसा मूलि न होवई हउमै सबदि जलाइ ॥
कूड़ै की पालि विचहु निकलै सचु वसै मनि आइ ॥
अंतरि सांति मनि सुखु होइ सच संजमि कार कमाइ ॥
नानक पूरै करमि सतिगुरु मिलै हरि जीउ किरपा करे रजाइ ॥2॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।

हिन्दी अर्थ: महला 3॥ हे मेरे मन ! ऐसे सतिगुरू ढूँढ ले।जिसकी सेवा करने से आपका सारी उम्र का दुख दूर हैं जाए। कभी बिल्कुल ही चिंता ना हैं और (उस सतिगुरू के) शबद से आपका अहंकार जल जाए; आपके अंदर से झूठ की दीवार हट जाए और मन में सच्चा हरी आ बसे।और। हे मन ! (उस सतिगुरू के बताए हुए) संयम में सच्चे कर्म करके आपके अंदर शांति और सुख (का वासा) हैं जाए। हे नानक ! जब हरी अपनी रजा में मेहर करता है तब (ऐसा) सतिगुरू पूरी कृपा से ही मिलता है। 2।
पउड़ी ॥
जिस कै घरि दीबानु हरि होवै तिस की मुठी विचि जगतु सभु आइआ ॥
तिस कउ तलकी किसै दी नाही हरि दीबानि सभि आणि पैरी पाइआ ॥
माणसा किअहु दीबाणहु कोई नसि भजि निकलै हरि दीबाणहु कोई किथै जाइआ ॥
सो ऐसा हरि दीबानु वसिआ भगता कै हिरदै तिनि रहदे खुहदे आणि सभि भगता अगै खलवाइआ ॥
हरि नावै की वडिआई करमि परापति होवै गुरमुखि विरलै किनै धिआइआ ॥14॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी। जिस मनुष्य के हृदय में (सबका) हाकम प्रभू बसता हैं।सारा संसार उसके वश में आ जाता है। उसे किसी की गुलामी नहीं होती।(बल्कि) परमात्मा हाकम ने सभी को ला के उसके चरणों में डाला (होता) है। मनुष्य की कचहरी में से तो मनुष्य भाग के कहीं खिसक सकता है।पर ईश्वर की हकूमत में से कोई भाग के कहाँ जाएगा। ऐसा हाकम हरी भक्तों के दिल में बसा हुआ है।उसने ‘बचे खुचे’ सारे जीवों को ला के भक्त जनों के आगे खड़ा कर दिया है (भाव।चरणों में ला डाला है)। प्रभू की खास मेहर से ही प्रभू के नाम की उपमा (करने का गुण) प्राप्त होता है;सतिगुरू के सन्मुख हो के कोई विरला ही (नाम) सिमरता है। 14।
सलोकु मः 3 ॥
बिनु सतिगुर सेवे जगतु मुआ बिरथा जनमु गवाइ ॥
दूजै भाइ अति दुखु लगा मरि जंमै आवै जाइ ॥
विसटा अंदरि वासु है फिरि फिरि जूनी पाइ ॥
नानक बिनु नावै जमु मारसी अंति गइआ पछुताइ ॥1॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 3॥ सतिगुरू के बताए राह पर चले बिना मानस जनम व्यर्थ गवा के संसार मुर्दे के समान है; माया के प्यार में बहुत कलेश बना हुआ है और (इसमें ही) मरता है फिर पैदा होता है।आता है फिर जाता है; (जब तक जीता है।इसका विकारों के) गंद में वास रहता है।(मर के) पलट-पलट के जूनियों में पड़ता है; हे नानक ! आखिरी समय पछताता हुआ जाता है (क्योंकि उस वक्त याद आता है) कि नाम के बिना जम सजा देगा। 1।
मः 3 ॥
इसु जग महि पुरखु एकु है होर सगली नारि सबाई ॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।

हिन्दी अर्थ: महला 3॥ इस संसार में पति एक परमात्मा ही है।और सारी सृष्टि (उसकी) सि्त्रयां हैं;

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।

गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर वर्ष की आयु में गुरु-गद्दी सँभाली, 1552 में, और 1574 तक रहे। उनकी वाणी में बुढ़ापे, समाज की संरचना, और संगति की चिन्ताएँ बार-बार लौटती हैं। उन्होंने ही लंगर (साझा-भोजन) की व्यवस्था मज़बूत की, और देश-भर में बाईस मंजी (केन्द्र) स्थापित किए।

इस अंग पर 9 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “जिन गुरसिखों पर प्रभू प्रसन्न होता है।”

बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।