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अंग 560

अंग
560
राग Vadhans
राग: Vadhans · रचयिता: Guru Amar Daas Ji
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गुरमुखि मन मेरे नामु समालि ॥
सदा निबहै चलै तेरै नालि ॥ रहाउ ॥
गुरमुखि जाति पति सचु सोइ ॥
गुरमुखि अंतरि सखाई प्रभु होइ ॥2॥
गुरमुखि जिस नो आपि करे सो होइ ॥
गुरमुखि आपि वडाई देवै सोइ ॥3॥
गुरमुखि सबदु सचु करणी सारु ॥
गुरमुखि नानक परवारै साधारु ॥4॥6॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।

हिन्दी अर्थ: हे मन ! गुरू की शरण पड़ कर परमात्मा का नाम सदा याद करता रह। ये नाम ही आपके साथ जाने वाला है साथ निभाने वाला है।रहाउ। हे भाई ! गुरू की शरण पड़ कर वह सदा स्थिर हरी का नाम-सिमरन ऊँची जाति व ऊँची कुल (का मूल) है। गुरू के सन्मुख रहने वाले मनुष्य के अंदर परमात्मा आ बसता है।और उसका (सदा का) साथी बन जाता है। 2। पर वही मनुष्य गुरू के सन्मुख हो सकता है जिसको परमात्मा स्वयं (इस लायक) बनाता है। वह परमात्मा खुद मनुष्य को गुरू के सन्मुख करके सम्मान बख्शता है। 3। हे भाई ! गुरू की शरण पड़ कर सदा स्थिर प्रभू की सिफत सालाह की बाणी (हृदय में) संभाल।यही करने योग्य काम है। हे नानक ! गुरू के सन्मुख रहने वाला मनुष्य अपने परिवार के वास्ते भी आसरा देने के काबिल हो जाता है। 4। 6।
वडहंसु महला 3 ॥
रसना हरि सादि लगी सहजि सुभाइ ॥
मनु त्रिपतिआ हरि नामु धिआइ ॥1॥
सदा सुखु साचै सबदि वीचारी ॥
आपणे सतगुर विटहु सदा बलिहारी ॥1॥ रहाउ ॥
अखी संतोखीआ एक लिव लाइ ॥
मनु संतोखिआ दूजा भाउ गवाइ ॥2॥
देह सरीरि सुखु होवै सबदि हरि नाइ ॥
नामु परमलु हिरदै रहिआ समाइ ॥3॥
नानक मसतकि जिसु वडभागु ॥
गुर की बाणी सहज बैरागु ॥4॥7॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।

हिन्दी अर्थ: वडहंसु महला 3 ॥ (हे भाई ! गुरू की शरण पड़ के जिस मनुष्य की) जीभ परमात्मा के नाम के स्वाद में लगती है।वह मनुष्य आत्मिक अडोलता में टिक जाता है।प्रभू-प्रेम में जुड़ जाता है। परमात्मा का नाम सिमर के उसका मन (माया की तृष्णा की ओर से) तृप्त हो जाता है। 1। जिसके सदा स्थिर प्रभू की सिफत सालाह में जुड़ने से विचारवान हो जाते हैं।और सदैव आत्मिक आनंद मिला रहता है। मैं अपने गुरू से सदा कुर्बान जाता हूँ।1।रहाउ। (हे भाई ! गुरू की शरण की बरकति से) एक परमात्मा में सुरति जोड़ के मनुष्य की आँखें (पराए रूप से) तृप्त हो जाती हैं। (अंदर से) माया का प्यार दूर करके मनुष्य का मन (तृष्णा की ओर से) संतुष्ट हो जाता है। 2। (हे भाई ! गुरू के) शबद की बरकति से परमात्मा के नाम में जुड़ने से शरीर में आनंद पैदा होता है। (गुरू की मेहर से) आत्मिक जीवन की सुगंधि देने वाला हरी-नाम मनुष्य के हृदय में सदा टिका रहता है। 3। हे नानक ! जिस मनुष्य के माथे पर उच्च भाग्य जागते हैं वह मनुष्य गुरू की बाणी में जुड़ता है (जिसकी बरकति से उसके अंदर) आत्मिक अडोलता पैदा करने वाला वैराग उपजता है। 4। 7।
वडहंसु महला 3 ॥
पूरे गुर ते नामु पाइआ जाइ ॥
सचै सबदि सचि समाइ ॥1॥
ए मन नामु निधानु तू पाइ ॥
आपणे गुर की मंनि लै रजाइ ॥1॥ रहाउ ॥
गुर कै सबदि विचहु मैलु गवाइ ॥
निरमलु नामु वसै मनि आइ ॥2॥
भरमे भूला फिरै संसारु ॥
मरि जनमै जमु करे खुआरु ॥3॥
नानक से वडभागी जिन हरि नामु धिआइआ ॥
गुर परसादी मंनि वसाइआ ॥4॥8॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।

हिन्दी अर्थ: वडहंसु महला 3 ॥ हे भाई ! पूरे गुरू से (ही) परमात्मा का नाम (-खजाना) मिल सकता है। (जो मनुष्य सदा स्थिर प्रभू की सिफत सालाह वाले गुरू शबद में जुड़ता है।वह) सदा कायम रहने वाले परमात्मा में लीन हो जाता है। 1। हे मेरे मन !गुरू से) नाम-खजाना हासिल कर। (और।) आप अपने गुरू के हुकम में चल। 1। रहाउ। (हे भाई ! जो मनुष्य) गुरू के शबद में (जुड़ता है।वह अपने) अंदर से (विकारों की) मैल दूर कर लेता है। परमात्मा का पवित्र नाम (उसके) मन में आ बसता है। 2। (हे भाई ! गुरू से टूट के) जगत भटकना के कारण (जीवन के सही रास्ते से) भूला फिरता है। जनम-मरण के चक्कर में पड़ा रहता है।यम-राज इसको सदा दुखी करता है। 3। हे नानक !वे भाग्यशाली हो गए परमात्मा का नाम सिमरना शुरू किया। जिन मनुष्यों ने गुरू की कृपा से परमात्मा का नाम अपने मन में बसाया। 4। 8।
वडहंसु महला 3 ॥
हउमै नावै नालि विरोधु है दुइ न वसहि इक ठाइ ॥
हउमै विचि सेवा न होवई ता मनु बिरथा जाइ ॥1॥
हरि चेति मन मेरे तू गुर का सबदु कमाइ ॥
हुकमु मंनहि ता हरि मिलै ता विचहु हउमै जाइ ॥ रहाउ ॥
हउमै सभु सरीरु है हउमै ओपति होइ ॥
हउमै वडा गुबारु है हउमै विचि बुझि न सकै कोइ ॥2॥
हउमै विचि भगति न होवई हुकमु न बुझिआ जाइ ॥
हउमै विचि जीउ बंधु है नामु न वसै मनि आइ ॥3॥
नानक सतगुरि मिलिऐ हउमै गई ता सचु वसिआ मनि आइ ॥
सचु कमावै सचि रहै सचे सेवि समाइ ॥4॥9॥12॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।

हिन्दी अर्थ: वडहंसु महला 3 ॥ हे भाई ! अहंकार का परमात्मा के नाम के साथ वैर है।ये दोनों इकट्ठे (हृदय में) नहीं रह सकते। अहंकार में रह कर परमात्मा की सेवा-भक्ति नहीं हो सकती (जब मनुष्य) अहंकार में रह के भक्ति करता है तब (उसका) मन खाली हो जाता है। 1। हे मेरे मन ! आप (अपने अंदर) गुरू का शबद बसाने की कमाई कर और परमात्मा का नाम सिमरता रह। अगर आप (गुरू का) हुकम मानेगा।तो आपको परमात्मा मिल जाएगा।तो आपके अंदर से अहंकार दूर हैं जाएगा। 1।रहाउ। हे भाई ! शरीर (धारने का ये) सारा (सिलसिला) अहंकार के कारण ही है।अहंकार के कारण जनम-मरण का चक्कर बना रहता है। (मनुष्य के आत्मिक जीवन के रास्ते में) अहंकार बहुत बड़ा घोर अंधकार है।अहंकार (के घुप अंधेरे में) कोई मानव (आत्मिक जीवन का रास्ता) समझ नहीं सकता। 2। हे भाई ! अहंकार (के घोर अंधेरे) में परमात्मा की भक्ति नहीं हो सकती।परमात्मा की रजा समझी नहीं जा सकती। अहंकार (के घोर अंधकार में) जीवात्मा के वास्ते (आत्मिक जीवन के राह में) रुकावटें बनी रहती हैं।(और इसी कारण) परमात्मा का नाम मनुष्य के मन में आ के नहीं बस सकता। 3। (पर) हे नानक ! अगर गुरू मिल जाए तो (मनुष्य के अंदर से) अहंकार दूर हो जाता है।तब सदा स्थिर प्रभू आदमी के मन में आ बसता है। तब आदमी सदा-स्थिर हरी-नाम सिमरन की कमाई करता है।सदा-स्थिर हरी-नाम में टिका रहता है।सेवा-भगती कर के सदा-स्थिर हरी में लीन हो जाता है। 4। 9।
वडहंसु महला 4 घरु 1
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
सेज एक एको प्रभु ठाकुरु ॥
गुरमुखि हरि रावे सुख सागरु ॥1॥
मै प्रभ मिलण प्रेम मनि आसा ॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।

हिन्दी अर्थ: वडहंसु महला 4 घरु 1 ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। (हे माँ ! गुरू के सन्मुख रहने वाले मनुष्य का हृदय) एक (ऐसी) सेज है (जिस पर) ठाकुर प्रभू ही (सदा बसता है)। गुरू के सन्मुख रहने वाले मनुष्य सुखों के समुंद्र हरी को (सदा) अपने हृदय में बसाए रखता है। 1। (हे मेरी माँ !) मेरे मन में प्रभू से मिलने के लिए कसक है आस है।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।

अमरदास जी ने एक ऐसी उम्र में गुरु-गद्दी पायी जब अधिकांश लोग रिटायर हो जाते हैं। उनकी रचनाओं में एक बड़े आदमी की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध उनका सीधा रुख़ बाद की सिख-परम्परा का foundational-वाक्य बना।

इस अंग पर 5 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे मन ! गुरू की शरण पड़ कर परमात्मा का नाम सदा याद करता रह।”

इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।