दइआल पुरख मेरे प्रभ दाते ॥
जिसहि जनावहु तिनहि तुम जाते ॥2॥
सदा सदा जाई बलिहारी ॥
इत उत देखउ ओट तुमारी ॥3॥
मोहि निरगुण गुणु किछू न जाता ॥
नानक साधू देखि मनु राता ॥4॥3॥
अंतरजामी सो प्रभु पूरा ॥
दानु देइ साधू की धूरा ॥1॥
करि किरपा प्रभ दीन दइआला ॥
तेरी ओट पूरन गोपाला ॥1॥ रहाउ ॥
जलि थलि महीअलि रहिआ भरपूरे ॥
निकटि वसै नाही प्रभु दूरे ॥2॥
जिस नो नदरि करे सो धिआए ॥
आठ पहर हरि के गुण गाए ॥3॥
जीअ जंत सगले प्रतिपारे ॥
सरनि परिओ नानक हरि दुआरे ॥4॥4॥
तू वड दाता अंतरजामी ॥
सभ महि रविआ पूरन प्रभ सुआमी ॥1॥
मेरे प्रभ प्रीतम नामु अधारा ॥
हउ सुणि सुणि जीवा नामु तुमारा ॥1॥ रहाउ ॥
तेरी सरणि सतिगुर मेरे पूरे ॥
मनु निरमलु होइ संता धूरे ॥2॥
चरन कमल हिरदै उरि धारे ॥
तेरे दरसन कउ जाई बलिहारे ॥3॥
करि किरपा तेरे गुण गावा ॥
नानक नामु जपत सुखु पावा ॥4॥5॥
साधसंगि हरि अंम्रितु पीजै ॥
ना जीउ मरै न कबहू छीजै ॥1॥
वडभागी गुरु पूरा पाईऐ ॥
गुर किरपा ते प्रभू धिआईऐ ॥1॥ रहाउ ॥
रतन जवाहर हरि माणक लाला ॥
सिमरि सिमरि प्रभ भए निहाला ॥2॥
जत कत पेखउ साधू सरणा ॥
हरि गुण गाइ निरमल मनु करणा ॥3॥
घट घट अंतरि मेरा सुआमी वूठा ॥
नानक नामु पाइआ प्रभु तूठा ॥4॥6॥
विसरु नाही प्रभ दीन दइआला ॥
तेरी सरणि पूरन किरपाला ॥1॥ रहाउ ॥
जह चिति आवहि सो थानु सुहावा ॥
जितु वेला विसरहि ता लागै हावा ॥1॥
तेरे जीअ तू सद ही साथी ॥
संसार सागर ते कढु दे हाथी ॥2॥
आवणु जाणा तुम ही कीआ ॥
जिसु तू राखहि तिसु दूखु न थीआ ॥3॥
तू एको साहिबु अवरु न होरि ॥
बिनउ करै नानकु कर जोरि ॥4॥7॥
तू जाणाइहि ता कोई जाणै ॥
तेरा दीआ नामु वखाणै ॥1॥
तू अचरजु कुदरति तेरी बिसमा ॥1॥ रहाउ ॥
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।
गुरु अर्जन देव जी ने ही 1604 में आदि ग्रंथ का प्रथम संकलन तैयार किया, और हरमंदिर साहिब में स्थापित किया। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय। जहाँगीर के दरबार में 1606 में, चालीस-तीन वर्ष की आयु में, उन्हें यंत्रणा देकर मारा गया। वो सिख-इतिहास के पहले शहीद हैं।
इस अंग पर 6 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “(मेहर कर) हे प्रभू ! आपके चरण हृदय में बसा के मैं आत्मिक जीवन प्राप्त करूँ।”
बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।