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अंग 563

अंग
563
राग Vadhans
राग: Vadhans · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
जपि जीवा प्रभ चरण तुमारे ॥1॥ रहाउ ॥
दइआल पुरख मेरे प्रभ दाते ॥
जिसहि जनावहु तिनहि तुम जाते ॥2॥
सदा सदा जाई बलिहारी ॥
इत उत देखउ ओट तुमारी ॥3॥
मोहि निरगुण गुणु किछू न जाता ॥
नानक साधू देखि मनु राता ॥4॥3॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: (मेहर कर) हे प्रभू ! आपके चरण हृदय में बसा के मैं आत्मिक जीवन प्राप्त करूँ। 1।रहाउ। हे मेरे दाते प्रभू ! हे दया के घर अकाल-पुरख ! जिस मनुष्य को आप खुद समझ बख्शता है। उसी ने ही आपके साथ सांझ डाली है। 2। हे प्रभू ! मैं सदा ही सदा ही आपसे सदके जाता हूँ। इस लोक में व परलोक में मैं आपका ही आसरा देखता हूँ। 3। हे प्रभू ! मैं गुण हीन हूँ।मैं आपके गुण (उपकार) कुछ भी नहीं था समझ सका। हे नानक ! (कह, हे प्रभू !) गुरू के दर्शन करके मेरा मन (आपके प्रेम में) रंगा गया है। 4। 3।
वडहंसु मः 5 ॥
अंतरजामी सो प्रभु पूरा ॥
दानु देइ साधू की धूरा ॥1॥
करि किरपा प्रभ दीन दइआला ॥
तेरी ओट पूरन गोपाला ॥1॥ रहाउ ॥
जलि थलि महीअलि रहिआ भरपूरे ॥
निकटि वसै नाही प्रभु दूरे ॥2॥
जिस नो नदरि करे सो धिआए ॥
आठ पहर हरि के गुण गाए ॥3॥
जीअ जंत सगले प्रतिपारे ॥
सरनि परिओ नानक हरि दुआरे ॥4॥4॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: वडहंसु महला 5 ॥ हे भाई ! वह प्रभू सबके दिल की जानने वाला है।सारे गुणों से भरपूर है। (जिस पर वह मेहर करता है उस को) गुरू के चरणों की धूड़ (बतौर) बख्शिश देता है। 1। हे दीनों पर दया करने वाले प्रभू ! (मेरे पर) कृपा कर (मुझे गुरू के चरणों की धूड़ बख्श)। हे सर्व-व्यापक ! हे सृष्टि-पालक ! मुझे आपका ही आसरा है। 1।रहाउ। हे भाई ! प्रभू पानी में।धरती में।आकाश में।हर जगह ज़ॅरे ज़ॅरे में मौजूद है। वह (हरेक जीव के) नजदीक बसता है।किसी से दूर नहीं। 2। हे भाई ! जिस मनुष्य पर (वह) मेहर की निगाह करता है वह मनुष्य उसका सिमरन करता रहता है। वह मनुष्य आठों पहर (हर वक्त) परमात्मा के गुण गाता रहता है। 3। हे भाई ! परमात्मा सारे जीवों की पालना करता है। हे नानक ! (उस प्रभू के आगे अरदास किया कर और कहा कर-) हे हरी ! मैं आपके दर पर आया हूँ।मैं आपकी शरण पड़ा हूँ (मुझे गुरू के चरणों की धूड़ बख्श)। 4। 4।
वडहंसु महला 5 ॥
तू वड दाता अंतरजामी ॥
सभ महि रविआ पूरन प्रभ सुआमी ॥1॥
मेरे प्रभ प्रीतम नामु अधारा ॥
हउ सुणि सुणि जीवा नामु तुमारा ॥1॥ रहाउ ॥
तेरी सरणि सतिगुर मेरे पूरे ॥
मनु निरमलु होइ संता धूरे ॥2॥
चरन कमल हिरदै उरि धारे ॥
तेरे दरसन कउ जाई बलिहारे ॥3॥
करि किरपा तेरे गुण गावा ॥
नानक नामु जपत सुखु पावा ॥4॥5॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: वडहंसु महला 5 ॥ हे मेरे स्वामी ! हे सर्व-व्यापक प्रभू ! आप सबसे बड़ा दाता है। आप (जीवों के) दिलों की जानने वाला है।आप सबके अंदर मौजूद है। 1। हे मेरे प्रीतम प्रभू ! आपका नाम (मेरी जिंदगी का) आसरा है। आपका नाम सुन सुन के मैं आत्मिक जीवन हासिल करता हूँ। 1।रहाउ। हे मेरे पूरे सतिगुरू ! मैं आपकी शरण आया हूँ। आपके संत-जनों के चरणों की धूड़ से मन पवित्र हैं जाता है (और।परमात्मा का दर्शन होता है)। 2। आपके सुंदर कोमल चरण मैंने अपने हृदय में टिकाए हुए हैं। हे प्रभू ! मैं आपके दर्शनों से कुर्बान जाता हूँ। 3। हे नानक ! (कह, हे प्रभू !) मेहर कर।मैं आपके गुण गाता रहूँ। और आपका नाम जपते हुए आत्मिक आनंद लेता रहूँ। 4। 5।
वडहंसु महला 5 ॥
साधसंगि हरि अंम्रितु पीजै ॥
ना जीउ मरै न कबहू छीजै ॥1॥
वडभागी गुरु पूरा पाईऐ ॥
गुर किरपा ते प्रभू धिआईऐ ॥1॥ रहाउ ॥
रतन जवाहर हरि माणक लाला ॥
सिमरि सिमरि प्रभ भए निहाला ॥2॥
जत कत पेखउ साधू सरणा ॥
हरि गुण गाइ निरमल मनु करणा ॥3॥
घट घट अंतरि मेरा सुआमी वूठा ॥
नानक नामु पाइआ प्रभु तूठा ॥4॥6॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: वडहंसु महला 5 ॥ हे भाई ! गुरू की संगति में आत्मिक जीवन देने वाला हरी-नाम-जल पीया जा सकता है। (इस नाम-जल की बरकति) जीवात्मा ना आत्मिक मौत मरती है।ना ही कभी आत्मि्क जीवन में कमजोर पड़ती है। 1। हे भाई ! पूरा गुरू बड़ी किस्मत से मिलता है। और गुरू की कृपा से परमात्मा का सिमरन किया जा सकता है। 1।रहाउ। हे भाई ! परमात्मा की सिफत सालाह के वचन (मानो) रत्न हैं।जवाहर हैं।मोती हैं।लाल हैं। प्रभू का नाम सिमर-सिमर के सदा पुल्कित रहते हैं। 2। हे भाई ! मैं जिधर-जिधर देखता हूँ।गुरू की शरण ही (एक ऐसी जगह है जहाँ) परमात्मा के गीत गा-गा के मन को पवित्र किया जा सकता है। 3। हे नानक ! (कह) मेरा मालिक प्रभू (वैसे तो) हरेक शरीर में बसता है (पर। जिस मनुष्य पर वह) प्रभू प्रसन्न होता है (वही उसका) नाम (-सिमरन) प्राप्त करता है। 4। 6।
वडहंसु महला 5 ॥
विसरु नाही प्रभ दीन दइआला ॥
तेरी सरणि पूरन किरपाला ॥1॥ रहाउ ॥
जह चिति आवहि सो थानु सुहावा ॥
जितु वेला विसरहि ता लागै हावा ॥1॥
तेरे जीअ तू सद ही साथी ॥
संसार सागर ते कढु दे हाथी ॥2॥
आवणु जाणा तुम ही कीआ ॥
जिसु तू राखहि तिसु दूखु न थीआ ॥3॥
तू एको साहिबु अवरु न होरि ॥
बिनउ करै नानकु कर जोरि ॥4॥7॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: वडहंसु महला 5 ॥ हे दीनों पर दया करने वाले प्रभू ! (मेहर कर। मेरे हृदय से कभी) ना भूल हे सर्व व्यापक ! हे कृपा के घर ! मैं आपकी शरण आया हूँ। 1।रहाउ। हे प्रभू ! जिस हृदय में आप आ बसता है वह हृदय-स्थल सुंदर बन जाता है। जिस वक्त आप (मुझे) भूल जाता है तब (मुझे) हाय-हाय लगती है। 1। (हे प्रभू ! ये सारे) जीव आपके (पैदा किए हुए हैं)।आप (इन जीवों की) सदा ही मदद करने वाला है। (हे प्रभू ! अपना) हाथ दे के (जीवों को) संसार समुंद्र में से निकाल ले। 2। (हे प्रभू ! जीवों के लिए) जनम-मरन के चक्कर आपके ही बनाए हुए हैं। जिस जीव को आप (इस चककर में से) बचा लेता है।उसको कोई दुख नहीं छू सकता। 3। हे प्रभू ! आप ही एक मालिक है।और अनेकों जीव (आपके बनाए हुए हैं।इनमें से) कोई भी (आपके जैसा) नहीं। नानक (आपके आगे ही) हाथ जोड़ के विनती करता है। 4। 7।
वडहंसु मः 5 ॥
तू जाणाइहि ता कोई जाणै ॥
तेरा दीआ नामु वखाणै ॥1॥
तू अचरजु कुदरति तेरी बिसमा ॥1॥ रहाउ ॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: वडहंसु मः 5 ॥ हे प्रभू ! जब किसी मनुष्य को आप सूझ बख्शता है।तब ही कोई आपके साथ गहरी सांझ डालता है। और आपका बख्शा हुआ आपके नाम को उच्चारता है। 1। हे प्रभू ! आप हैरान कर देने वाली हस्ती वाला है।आपकी रची रचना भी हैरानगी पैदा करने वाली है। 1।रहाउ।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।

गुरु अर्जन देव जी ने ही 1604 में आदि ग्रंथ का प्रथम संकलन तैयार किया, और हरमंदिर साहिब में स्थापित किया। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय। जहाँगीर के दरबार में 1606 में, चालीस-तीन वर्ष की आयु में, उन्हें यंत्रणा देकर मारा गया। वो सिख-इतिहास के पहले शहीद हैं।

इस अंग पर 6 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “(मेहर कर) हे प्रभू ! आपके चरण हृदय में बसा के मैं आत्मिक जीवन प्राप्त करूँ।”

बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।