गुरु सजणु मेरा मेलि हरे जितु मिलि हरि नामु धिआवा ॥
गुर सतिगुर पासहु हरि गोसटि पूछां करि सांझी हरि गुण गावां ॥
गुण गावा नित नित सद हरि के मनु जीवै नामु सुणि तेरा ॥
नानक जितु वेला विसरै मेरा सुआमी तितु वेलै मरि जाइ जीउ मेरा ॥5॥
हरि वेखण कउ सभु कोई लोचै सो वेखै जिसु आपि विखाले ॥
जिस नो नदरि करे मेरा पिआरा सो हरि हरि सदा समाले ॥
सो हरि हरि नामु सदा सदा समाले जिसु सतगुरु पूरा मेरा मिलिआ ॥
नानक हरि जन हरि इके होए हरि जपि हरि सेती रलिआ ॥6॥1॥3॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
अति ऊचा ता का दरबारा ॥
अंतु नाही किछु पारावारा ॥
कोटि कोटि कोटि लख धावै ॥
इकु तिलु ता का महलु न पावै ॥1॥
सुहावी कउणु सु वेला जितु प्रभ मेला ॥1॥ रहाउ ॥
लाख भगत जा कउ आराधहि ॥
लाख तपीसर तपु ही साधहि ॥
लाख जोगीसर करते जोगा ॥
लाख भोगीसर भोगहि भोगा ॥2॥
घटि घटि वसहि जाणहि थोरा ॥
है कोई साजणु परदा तोरा ॥
करउ जतन जे होइ मिहरवाना ॥
ता कउ देई जीउ कुरबाना ॥3॥
फिरत फिरत संतन पहि आइआ ॥
दूख भ्रमु हमारा सगल मिटाइआ ॥
महलि बुलाइआ प्रभ अंम्रितु भूंचा ॥
कहु नानक प्रभु मेरा ऊचा ॥4॥1॥
धनु सु वेला जितु दरसनु करणा ॥
हउ बलिहारी सतिगुर चरणा ॥1॥
जीअ के दाते प्रीतम प्रभ मेरे ॥
मनु जीवै प्रभ नामु चितेरे ॥1॥ रहाउ ॥
सचु मंत्रु तुमारा अंम्रित बाणी ॥
सीतल पुरख द्रिसटि सुजाणी ॥2॥
सचु हुकमु तुमारा तखति निवासी ॥
आइ न जावै मेरा प्रभु अबिनासी ॥3॥
तुम मिहरवान दास हम दीना ॥
नानक साहिबु भरपुरि लीणा ॥4॥2॥
तू बेअंतु को विरला जाणै ॥
गुर प्रसादि को सबदि पछाणै ॥1॥
सेवक की अरदासि पिआरे ॥
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।
अर्जन देव की वाणी पढ़ने पर पता चलता है कि वो एक संगठक-कवि थे। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। आदि ग्रंथ के संकलन के दो साल बाद, 1606 में, उन्होंने मुगल यंत्रणा में अपनी जान दे दी, और सिख-शहादत की परम्परा यहीं से शुरू होती है।
इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे नानक ! (कह) धन्य है मेरा गुरू।”
पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।