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अंग 562

अंग
562
राग Vadhans
राग: Vadhans · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
धनु धंनु गुरू गुर सतिगुरु पूरा नानक मनि आस पुजाए ॥4॥
गुरु सजणु मेरा मेलि हरे जितु मिलि हरि नामु धिआवा ॥
गुर सतिगुर पासहु हरि गोसटि पूछां करि सांझी हरि गुण गावां ॥
गुण गावा नित नित सद हरि के मनु जीवै नामु सुणि तेरा ॥
नानक जितु वेला विसरै मेरा सुआमी तितु वेलै मरि जाइ जीउ मेरा ॥5॥
हरि वेखण कउ सभु कोई लोचै सो वेखै जिसु आपि विखाले ॥
जिस नो नदरि करे मेरा पिआरा सो हरि हरि सदा समाले ॥
सो हरि हरि नामु सदा सदा समाले जिसु सतगुरु पूरा मेरा मिलिआ ॥
नानक हरि जन हरि इके होए हरि जपि हरि सेती रलिआ ॥6॥1॥3॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: हे नानक ! (कह) धन्य है मेरा गुरू।शाबाश है मेरे पूरे गुरू को।जो मेरे मन में (प्रभू मिलाप की टिकी हुई) आस पूरी करता है। 4। हे हरी ! मुझे मेरा मित्र गुरू मिला।जिस (के चरणों) में लीन हो के मैं हरी-नाम सिमरता रहूँ। गुरू से मैं हरी-मिलाप (की बातें) पूछता रहूँ।गुरू की संगति करके मैं हरी गुण गाता रहूँ। हे हरी ! आपका नाम सुन के मेरा मन आत्मिक जीवन प्राप्त करता है। हे नानक ! (कह) जब मुझे मेरा मालिक प्रभू भूल जाता है।उस वक्त मेरी जीवात्मा आत्मिक मौत मर जाती है। 5। परमात्मा के दर्शन करने के लिए हरेक जीव तमन्ना तो कर लेता है।पर वही मनुष्य दर्शन कर सकता है जिसको परमात्मा खुद दर्शन करवाता है। प्यारा प्रभू जिस मनुष्य पर मेहर की नजर करता है वह मनुष्य सदा परमात्मा को अपने हृदय में बसाए रखता है। (हे भाई !) जिस मनुष्य को पूरा गुरू मिल जाता है वह मनुष्य परमात्मा का नाम सदा अपने हृदय में बसाता है। हे नानक ! मनुष्य परमात्मा का नाम जप जप के परमात्मा के साथ मिल जाता है (इस तरह) परमात्मा और परमात्मा के भक्त एक-रूप हो जाते हैं। 6। 1। 3।
वडहंसु महला 5 घरु 1
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
अति ऊचा ता का दरबारा ॥
अंतु नाही किछु पारावारा ॥
कोटि कोटि कोटि लख धावै ॥
इकु तिलु ता का महलु न पावै ॥1॥
सुहावी कउणु सु वेला जितु प्रभ मेला ॥1॥ रहाउ ॥
लाख भगत जा कउ आराधहि ॥
लाख तपीसर तपु ही साधहि ॥
लाख जोगीसर करते जोगा ॥
लाख भोगीसर भोगहि भोगा ॥2॥
घटि घटि वसहि जाणहि थोरा ॥
है कोई साजणु परदा तोरा ॥
करउ जतन जे होइ मिहरवाना ॥
ता कउ देई जीउ कुरबाना ॥3॥
फिरत फिरत संतन पहि आइआ ॥
दूख भ्रमु हमारा सगल मिटाइआ ॥
महलि बुलाइआ प्रभ अंम्रितु भूंचा ॥
कहु नानक प्रभु मेरा ऊचा ॥4॥1॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: वडहंसु महला 5 घरु 1 ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। हे भाई ! परमात्मा का दरबार बहुत ही ऊँचा है। उसके इस पार उस पार के किनारों का कोई अंत ही नहीं लगाया जा सकता। मनुष्य लाखों बार करोड़ों बार यत्न करे। (पर अपने प्रयत्नों से) परमात्मा की हजूरी रक्ती भर भी हासिल नहीं कर सकता। 1। हे भाई ! वह कैसा सुंदर समय होता है ! वह कैसी सुंदर घड़ी होती है।जब परमात्मा से मिलाप हो जाता है। 1।रहाउ। हे भाई ! लाखों ही भक्त जिस परमात्मा की आराधना करते हैं। (जिसके मिलाप की खातिर) लाखों ही बड़े-बड़े तपी तप करते रहते हैं। लाखों ही बड़े-बड़े योगी योग साधना करते रहते हैं। लाखों ही बड़े बड़े भोगी (जिसके दिए हुए) पदार्थ भोगते हैं (उसका अंत कोई नहीं पा सका)। 2। हे प्रभू ! आप हरेक शरीर में बसता है।पर बहुत ही थोड़े मनुष्य (इस भेद को) जानते हैं (क्योंकि जीवों के अंदर आपके से दूरी बढ़ानी रहती है) कोई दुर्लभ ही गुरमुख होता है जो (उस) दूरी को दूर करता है। मैं प्रयत्न करता हूँ कि वह गुरमुख मेरे पर दयावान हो। मैं उस गुरमुख के आगे अपनी जिंद भेटा करने को तैयार हूँ। 3। हे भाई ! तलाश करता करता मैं गुरू के पास पहुँचा। (गुरू ने) मेरा सारा दुख और भरम दूर कर दिया। (गुरू की कृपा से प्रभू ने मुझे) अपनी हजूरी में बुला लिया (मुझे अपने चरणों में जोड़ लिया।और) मैंने प्रभू का आत्मिक जीवन देने वाला नाम-रस (अमृत) पीया। हे नानक ! कह, मेरा प्रभू सबसे ऊँचा है। 4। 1।
वडहंसु महला 5 ॥
धनु सु वेला जितु दरसनु करणा ॥
हउ बलिहारी सतिगुर चरणा ॥1॥
जीअ के दाते प्रीतम प्रभ मेरे ॥
मनु जीवै प्रभ नामु चितेरे ॥1॥ रहाउ ॥
सचु मंत्रु तुमारा अंम्रित बाणी ॥
सीतल पुरख द्रिसटि सुजाणी ॥2॥
सचु हुकमु तुमारा तखति निवासी ॥
आइ न जावै मेरा प्रभु अबिनासी ॥3॥
तुम मिहरवान दास हम दीना ॥
नानक साहिबु भरपुरि लीणा ॥4॥2॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: वडहंसु महला 5॥ हे भाई ! वह समय भाग्यशाली होता है जिस वक्त प्रभू के दर्शन होते हैं। (जिस गुरू की कृपा से प्रभू के दर्शन होते हैं) मैं उस गुरू के चरणों से सदके जाता हूँ। 1। हे जिंद देने वाले प्रभू ! हे मेरे प्रीतम प्रभू ! आपका नाम याद कर कर के मेरा मन आत्मिक जीवन हासिल कर लेता है। 1।रहाउ। हे प्रभू ! आपका मंत्र सदा कायम रहने वाला है।आपकी सिफत सालाह की बाणी आत्मिक जीवन देने वाली है। हे शांति के पुँज अकाल-पुरख ! आपकी निगाह खासी परख वाली है। 2। हे प्रभू ! आपका हुकम सदा स्थिर रहने वाला है।आप (सदा) सिंहासन पर बिराजमान रहता है (आप सदा सबका हाकिम है)। (हे भाई !) मेरा प्रभू कभी नाश होने वाला नहीं।वह कभी पैदा होता मरता नहीं। 3। हे प्रभू ! हम जीव आपके अदने से (निमाणे) सेवक हैं।आप हम पर दया करने वाला है। हे नानक ! (कह) हमारा मालिक प्रभू हर जगह मौजूद है।सब में व्यापक है। 4। 2।
वडहंसु महला 5 ॥
तू बेअंतु को विरला जाणै ॥
गुर प्रसादि को सबदि पछाणै ॥1॥
सेवक की अरदासि पिआरे ॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: वडहंसु महला 5 ॥ हे प्रभू ! आपके गुणों का अंत नहीं पड़ सकता।कोई विरला मनुष्य ही आपके साथ सांझ डालता है। गुरू की कृपा से गुरू के शबद में जुड़ के कोई विरला आपके साथ जान-पहचान बनाता है। 1। हे प्यारे प्रभू ! मुझे सेवक की (आपके दर पर) अरदास है।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।

अर्जन देव की वाणी पढ़ने पर पता चलता है कि वो एक संगठक-कवि थे। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। आदि ग्रंथ के संकलन के दो साल बाद, 1606 में, उन्होंने मुगल यंत्रणा में अपनी जान दे दी, और सिख-शहादत की परम्परा यहीं से शुरू होती है।

इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे नानक ! (कह) धन्य है मेरा गुरू।”

पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।