गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।
हिन्दी अर्थ: (उम्र के खत्म होने पर) जब परमात्मा का लिखा हुकम आता है।शरीर के प्यारे साथी जीवात्मा को पकड़ के आगे लगा लिया जाता है।और सारे सजजन-संबंधी रोते हैं। हे मेरी माँ ! जब उम्र के दिन पूरे हो जाते हैं।तो शरीर और जीवात्मा का (सदा के लिए) विछोड़ा हो जाता है। (उस अंत समय से) पहले-पहले जो कर्म जीव ने कमाए होते हैं (उस उस के अनुसार) जैसे जैसे संस्कारों का लेख (उसके माथे पर) लिखा जाता है वैसा ही फल जीव पाता है। जिसने जगत को माया की आहर में लगा रखा है वही सृजनहार पातशाह सराहने-योग्य है वही सदा कायम रहने वाला है। 1। हे मेरे भाईयो ! (सदा स्थिर) मालिक प्रभू का सिमरन करो।(दुनिया से) कूच तो सभी ने करना है। दुनिया में माया का आहर चार दिनों के लिए ही है।(हरेक ने ही) यहाँ से आगे (परलोक में) अवश्य चले जाना है। यहाँ से आगे जरूर (हरेक ने) चले जाना है।(यहाँ जगत में) हम मेहमान की तरह ही हैं।(किसी भी धन-पदार्थ आदि का) गुमान करना व्यर्थ है। उस परमात्मा का ही नाम सिमरना चाहिए जिसके सिमरने से परमात्मा की हजूरी में आत्मिक आनंद मिलता है। (जगत में तो धन-पदार्थ वाले का हुकम चल सकता है।पर) परलोक में किसी का भी हुकम बिल्कुल नहीं चल सकता।वहाँ तो हरेक के सिर पर (अपने-अपने) किए अनुसार बीतती है। हे मेरे भाईयो ! (सदा स्थिर) मालिक प्रभू का सिमरन करो।(दुनिया से) सभी ने ही चले जाना है। 2। जगत के जीवों का उद्यम तो एक बहाना ही है।होता वही कुछ है जो उस सर्व-शक्तिमान प्रभू को भाता है। वह सदा-स्थिर रहने वाला सृजनहार पानी में धरती पर आकाश में हर जगह मौजूद है।वह प्रभू सदा स्थिर रहने वाला है। सबको पैदा करने वाला है।अदृष्ट है।बेअंत है।कोई भी जीव उसके गुणों का अंत नहीं पा सकता। जगत में पैदा उनका ही सफल कहा जाता है जिन्होंने उस बेअंत प्रभू को सुरति जोड़ के सिमरा है। वह परमात्मा स्वयं ही जगत-रचना को गिरा देता है।गिरा के खुद ही फिर बना लेता है।वह अपने हुकम में जीवों को अच्छे जीवन वाले बनाता है। जगत के जीवों का उद्यम तो एक बहाना ही है।होता वही कुछ है जो उस सर्व-शक्तिमान प्रभू को अच्छा लगता है। 3। हे नानक ! (कह,विछुड़े संबन्धियों की मौत पर तो हर कोई वैराग में आ जाता है।पर इस वैराग के कोई मायने नहीं) हे भाई ! उसी मनुष्य को सही (रूप में) वैराग में आया समझो।जो प्यार से (परमात्मा के मिलाप की खातिर) वैराग में आता है। हे भाई ! दुनिया के धन पदार्थों की खातिर जो रोते हैं वह रोना सारा ही व्यर्थ जाता है। परमात्मा से भूला हुआ जगत की माया की खातिर रोता है ये सारा ही रुदन व्यर्थ है। (इस रोने से) मनुष्य को अच्छे-बुरे काम की पहचान नहीं आती।(माया की खातिर रो-रो के) इस शरीर को व्यर्थ ही नाश कर लेता है। हे भाई ! हरेक जीव जो जगत में (जन्म ले के) आया है (अपना समय गुजार के) चला जाएगा।नाशवंत जगत के मोह में फंस के (व्यर्थ) गुमान करते हैं। हे नानक ! (कह) हे भाई ! उसी मनुष्य को सही वैराग में आया समझो जो (परमात्मा के मिलाप की खातिर) प्यार से वैराग में आता है। 4। 1।
वडहंसु महला 1 ॥ आवहु मिलहु सहेलीहो सचड़ा नामु लएहां ॥ रोवह बिरहा तन का आपणा साहिबु संम॑ालेहां ॥ साहिबु सम॑ालिह पंथु निहालिह असा भि ओथै जाणा ॥ जिस का कीआ तिन ही लीआ होआ तिसै का भाणा ॥ जो तिनि करि पाइआ सु आगै आइआ असी कि हुकमु करेहा ॥ आवहु मिलहु सहेलीहो सचड़ा नामु लएहा ॥1॥ मरणु न मंदा लोका आखीऐ जे मरि जाणै ऐसा कोइ ॥ सेविहु साहिबु संम्रथु आपणा पंथु सुहेला आगै होइ ॥ पंथि सुहेलै जावहु तां फलु पावहु आगै मिलै वडाई ॥ भेटै सिउ जावहु सचि समावहु तां पति लेखै पाई ॥ महली जाइ पावहु खसमै भावहु रंग सिउ रलीआ माणै ॥ मरणु न मंदा लोका आखीऐ जे कोई मरि जाणै ॥2॥ मरणु मुणसा सूरिआ हकु है जो होइ मरनि परवाणो ॥
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।
हिन्दी अर्थ: वडहंसु महला 1 ॥ हे सहेलियो ! (हे सत्संगी सज्जनों !) आएँ।मिल के बैठें और परमात्मा का सदा स्थिर रहने वाला नाम सिमरें।आएँ। प्रभू से अपने विछोड़े का बारंबार अफसोस से चेता करें।(वह वियोग दूर करने के लिए) मालिक प्रभू को याद करें।आएँ। हम मालिक को दिल में बसाएं।और उस रास्ते को देखें (जिस रास्ते सब जा रहे हैं)।हमने भी (आखिर) उस परलोक में जाना है (जहाँ अनेकों जा चुके हैं)। (किसी के मरने पर रोना व्यर्थ है) जिस प्रभू का ये पैदा किया हुआ था।उसने जीवात्मा वापस ले ली है।उसकी की रजा हुई है। यहाँ जगत में जीव ने जो कुछ किया।(मरने पर) उसके आगे आ जाता है।(इस ईश्वरीय नियम के आगे) हमारा कोई जोर नहीं चल सकता। (इस वास्ते) हे सहेलियो ! आएँ।मिल के बैठें और सदा स्थिर रहने वाले प्रभू का नाम सिमरें। 1। हे लोगो ! मौत को बुरा ना कहो (मौत अच्छी है।पर तब ही) अगर कोई मनुष्य उस तरीके से (जी के) मरना जानता हैं। (वह तरीका ये है कि) अपने सर्व-शक्तिमान मालिक को सिमरो।(ताकि जीवन के सफर में) रास्ता आसान हो जाए (सिमरन की बरकति से) आसान जीवन-राह पर चलोगे तो इसका फल भी मिलेगा प्रभू की हजूरी में सम्मान मिलेगा। अगर प्रभू के नाम की भेटा ले के जाएँगे तो उस सदा स्थिर प्रभू में एक-रूप हो जाएँगे।किए कर्मों के हिसाब के समय इज्जत मिलेगी। प्रभू की हजूरी में स्थान प्राप्त करेंगे।और पति-प्रभू को अच्छे लगोगे।(जो जीव ये भेटा ले के जाता है वह) प्रेम से आत्मिक आनंद लेता है। हे लोगो ! मौत को बुरा ना कहो (पर इस बात को वही समझता है) जो इस तरह मरना जानता हैं। 2। जो मनुष्य (जीते जी ही प्रभू की नजरों में) कबूल हो के मरते हैं वे शूरवीर हैं उनका मरना भी (लोक-परलोक में) सराहा जाता है।
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।
नानक का स्वर साफ़ है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पन्द्रहवीं सदी के अंतिम दशकों में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पहली बड़ी यात्रा पर थे। वो जो शब्द लाए, वो आज भी इसी ग्रंथ में पढ़े जाते हैं।
इस अंग पर दो शबद बैठे हैं, एक के बाद दूसरा। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “(उम्र के खत्म होने पर) जब परमात्मा का लिखा हुकम आता है।”
बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।