Lulla Family

अंग 590

अंग
590
राग Vadhans
राग: Vadhans · रचयिता: Guru Amar Daas Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
नानक बिनु सतिगुर सेवे जम पुरि बधे मारीअनि मुहि कालै उठि जाहि ॥1॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।

हिन्दी अर्थ: हे नानक ! सतिगुरू की सेवा के बिना काले मुँह (संसार से) चले जाते हैं और जम-पुरी में बँधे हुए मार खाते हैं (भाव।इस लोक में काला मुँह करवाते हैं और आगे भी दुखी होते हैं)। 1।
महला 1 ॥
जालउ ऐसी रीति जितु मै पिआरा वीसरै ॥
नानक साई भली परीति जितु साहिब सेती पति रहै ॥2॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।

हिन्दी अर्थ: महला 1॥ मैं ऐसी रीति को जला डालूँ जिसके कारण प्यारा प्रभू मुझे बिसर जाए। हे नानक ! प्रेम वह ही अच्छा है जिससे पति से इज्जत बनी रहे। 2।
पउड़ी ॥
हरि इको दाता सेवीऐ हरि इकु धिआईऐ ॥
हरि इको दाता मंगीऐ मन चिंदिआ पाईऐ ॥
जे दूजे पासहु मंगीऐ ता लाज मराईऐ ॥
जिनि सेविआ तिनि फलु पाइआ तिसु जन की सभ भुख गवाईऐ ॥
नानकु तिन विटहु वारिआ जिन अनदिनु हिरदै हरि नामु धिआईऐ ॥10॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी। एक ही दातार करतार की सेवा करनी चाहिए।एक परमात्मा को ही सिमरना चाहिए। एक हरी से ही दान माँगना चाहिए।जिस के पास से मन-मांगी मुराद मिल जाए; अगर किसी और से मांगें तो ये शर्म से मर जाएं (भाव।किसी और से माँगने से बेहतर है शर्म से मर जाएं)। जिस भी मनुष्य ने हरी की सेवा की है उसने फल पा लिया है।उस मनुष्य की सारी तृष्णा मिट गई है। नानक कुर्बान जाता है उन मनुष्यों से।जो हर वक्त हृदय में हरी का नाम सिमरते हैं। 10।
सलोकु मः 3 ॥
भगत जना कंउ आपि तुठा मेरा पिआरा आपे लइअनु जन लाइ ॥
पातिसाही भगत जना कउ दितीअनु सिरि छतु सचा हरि बणाइ ॥
सदा सुखीए निरमले सतिगुर की कार कमाइ ॥
राजे ओइ न आखीअहि भिड़ि मरहि फिरि जूनी पाहि ॥
नानक विणु नावै नकंी वढंी फिरहि सोभा मूलि न पाहि ॥1॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 3॥ प्यारा प्रभू अपने भक्तों पर खुद प्रसन्न होता है और खुद ही उसने उनको अपने साथ जोड़ लिया है। भक्तों के सिर पर सच्चा छत्र झुला के उसने भक्तों को बादशाहियत् बख्शी है; सतिगुरू की बताई हुई सेवा कमा के वे सदा सुखी तथा पवित्र रहते हैं। राजे उनको नहीं कहते जो आपस में लड़ मरते हैं और फिर जूनियों में पड़ जाते हैं। (क्योंकि) हे नानक ! नाम से वंचित राजे भी नाक कटाए फिरते हैं और कभी शोभा नहीं पाते। 1।
मः 3 ॥
सुणि सिखिऐ सादु न आइओ जिचरु गुरमुखि सबदि न लागै ॥
सतिगुरि सेविऐ नामु मनि वसै विचहु भ्रमु भउ भागै ॥
जेहा सतिगुर नो जाणै तेहो होवै ता सचि नामि लिव लागै ॥
नानक नामि मिलै वडिआई हरि दरि सोहनि आगै ॥2॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।

हिन्दी अर्थ: महला 3॥ जब तक सतिगुरू के सन्मुख हो के मनुष्य सतिगुरू के शबद में नहीं जुड़ता तब तक सतिगुरू की शिक्षा निरी सुन के स्वाद नहीं आता। सतिगुरू की बताई हुई सेवा करके ही नाम मन में बसता है और अंदर से भ्रम और डर दूर हो जाता है। जब मनुष्य जैसा अपने सतिगुरू को समझता है।वैसा ही खुद बन जाए (भाव।जब अपने सतिगुरू वाले गुण धारण करे) तब उसकी बिरती सच्चे नाम में जुड़ती है; हे नानक ! (ऐसे जीवों को) नाम के कारण यहाँ आदर मिलता है और आगे हरी की दरगाह में वे शोभा पाते हैं। 2।
पउड़ी ॥
गुरसिखां मनि हरि प्रीति है गुरु पूजण आवहि ॥
हरि नामु वणंजहि रंग सिउ लाहा हरि नामु लै जावहि ॥
गुरसिखा के मुख उजले हरि दरगह भावहि ॥
गुरु सतिगुरु बोहलु हरि नाम का वडभागी सिख गुण सांझ करावहि ॥
तिना गुरसिखा कंउ हउ वारिआ जो बहदिआ उठदिआ हरि नामु धिआवहि ॥11॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ गुरसिखों के मन में हरी के प्रति प्यार होता है और (उस प्यार के सदका वे) अपने सतिगुरू की सेवा करते आते हैं; (सतिगुरू के पास आ के) प्यार से हरी-नाम का व्यापार करते हैं और हरी नाम का लाभ कमा के ले जाते हैं। (ऐसे) गुरसिखों के मुँह उज्जवल होते हैं और हरी की दरगाह में वे प्यारे लगते हैं। गुरू सतिगुरू हरी के नाम का (जैसे) बोहल है।बड़े भाग्यशाली सिख आ के गुणों की सांझ पाते हैं; सदके हूँ उन गुरसिखों से।जो बैठते-उठते (भाव।हर वक्त) हरी का नाम सिमरते हैं। 11।
सलोक मः 3 ॥
नानक नामु निधानु है गुरमुखि पाइआ जाइ ॥
मनमुख घरि होदी वथु न जाणनी अंधे भउकि मुए बिललाइ ॥1॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 3॥ हे नानक ! नाम (ही असल) खजाना है।जो सतिगुरू के सन्मुख हो के मिल सकता है; अंधे मनमुख (हृदय-रूप) घर में होती (इस) वस्तु को नहीं पहचानते।और (बाहर माया के पीछे) बिलकते और भौंकते मर जाते हैं। 1।
मः 3 ॥
कंचन काइआ निरमली जो सचि नामि सचि लागी ॥
निरमल जोति निरंजनु पाइआ गुरमुखि भ्रमु भउ भागी ॥
नानक गुरमुखि सदा सुखु पावहि अनदिनु हरि बैरागी ॥2॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।

हिन्दी अर्थ: महला 3॥ जो शरीर सच्चे नाम के द्वारा सच्चे प्रभू में जुड़ा हुआ है।वह सोने जैसा शुद्ध है; उसको निर्मल ज्योति (रूपी) माया से रहित प्रभू मिल जाता है और सतिगुरू के सन्मुख हो के उसका भ्रम और डर दूर हो जाता है; हे नानक ! सतिगुरू के सन्मुख मनुष्य हर वक्त परमात्मा के वैरागी हो के सदा सुख पाते हैं। 2।
पउड़ी ॥
से गुरसिख धनु धंनु है जिनी गुर उपदेसु सुणिआ हरि कंनी ॥
गुरि सतिगुरि नामु द्रिड़ाइआ तिनि हंउमै दुबिधा भंनी ॥
बिनु हरि नावै को मित्रु नाही वीचारि डिठा हरि जंनी ॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ धन्य हैं वे गुरसिख जिन्होंने सतिगुरू का उपदेश ध्यान से सुना है; सतिगुरू ने (जिसके भी हृदय में) नाम दृढ़ किया है उसने अहंकार और दुविधा (हृदय में से) तोड़ डाली है। प्रभू का सिमरन करने वाले (गुरसिखों) ने ये बात विचार के देख ली है कि परमात्मा के नाम के बिना कोई (सच्चा) मित्र नहीं है;

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।

अमरदास जी ने एक ऐसी उम्र में गुरु-गद्दी पायी जब अधिकांश लोग रिटायर हो जाते हैं। उनकी रचनाओं में एक बड़े आदमी की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध उनका सीधा रुख़ बाद की सिख-परम्परा का foundational-वाक्य बना।

इस अंग पर 9 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे नानक ! सतिगुरू की सेवा के बिना काले मुँह (संसार से) चले जाते हैं और जम-पुरी में बँधे हुए मार खाते हैं (भाव।”

पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।