पूरै गुरि वेखालिआ सबदे सोझी पाई ॥
पुरखै सेवहि से पुरख होवहि जिनी हउमै सबदि जलाई ॥
तिस का सरीकु को नही ना को कंटकु वैराई ॥
निहचल राजु है सदा तिसु केरा ना आवै ना जाई ॥
अनदिनु सेवकु सेवा करे हरि सचे के गुण गाई ॥
नानकु वेखि विगसिआ हरि सचे की वडिआई ॥2॥
जिन कै हरि नामु वसिआ सद हिरदै हरि नामो तिन कंउ रखणहारा ॥
हरि नामु पिता हरि नामो माता हरि नामु सखाई मित्रु हमारा ॥
हरि नावै नालि गला हरि नावै नालि मसलति हरि नामु हमारी करदा नित सारा ॥
हरि नामु हमारी संगति अति पिआरी हरि नामु कुलु हरि नामु परवारा ॥
जन नानक कंउ हरि नामु हरि गुरि दीआ हरि हलति पलति सदा करे निसतारा ॥15॥
जिन कंउ सतिगुरु भेटिआ से हरि कीरति सदा कमाहि ॥
अचिंतु हरि नामु तिन कै मनि वसिआ सचै सबदि समाहि ॥
कुलु उधारहि आपणा मोख पदवी आपे पाहि ॥
पारब्रहमु तिन कंउ संतुसटु भइआ जो गुर चरनी जन पाहि ॥
जनु नानकु हरि का दासु है करि किरपा हरि लाज रखाहि ॥1॥
हंउमै अंदरि खड़कु है खड़के खड़कि विहाइ ॥
हंउमै वडा रोगु है मरि जंमै आवै जाइ ॥
जिन कउ पूरबि लिखिआ तिना सतगुरु मिलिआ प्रभु आइ ॥
नानक गुर परसादी उबरे हउमै सबदि जलाइ ॥2॥
हरि नामु हमारा प्रभु अबिगतु अगोचरु अबिनासी पुरखु बिधाता ॥
हरि नामु हम स्रेवह हरि नामु हम पूजह हरि नामे ही मनु राता ॥
हरि नामै जेवडु कोई अवरु न सूझै हरि नामो अंति छडाता ॥
हरि नामु दीआ गुरि परउपकारी धनु धंनु गुरू का पिता माता ॥
हंउ सतिगुर अपुणे कंउ सदा नमसकारी जितु मिलिऐ हरि नामु मै जाता ॥16॥
गुरमुखि सेव न कीनीआ हरि नामि न लगो पिआरु ॥
सबदै सादु न आइओ मरि जनमै वारो वार ॥
मनमुखि अंधु न चेतई कितु आइआ सैसारि ॥
नानक जिन कउ नदरि करे से गुरमुखि लंघे पारि ॥1॥
इको सतिगुरु जागता होरु जगु सूता मोहि पिआसि ॥
सतिगुरु सेवनि जागंनि से जो रते सचि नामि गुणतासि ॥
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।
अमरदास जी ने एक ऐसी उम्र में गुरु-गद्दी पायी जब अधिकांश लोग रिटायर हो जाते हैं। उनकी रचनाओं में एक बड़े आदमी की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध उनका सीधा रुख़ बाद की सिख-परम्परा का foundational-वाक्य बना।
इस अंग पर 7 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “परमात्मा पति सारे घटों को भोगता है (भाव।”
इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।