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अंग 592

अंग
592
राग Vadhans
राग: Vadhans · रचयिता: Guru Amar Daas Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
सभि घट भोगवै अलिपतु रहै अलखु न लखणा जाई ॥
पूरै गुरि वेखालिआ सबदे सोझी पाई ॥
पुरखै सेवहि से पुरख होवहि जिनी हउमै सबदि जलाई ॥
तिस का सरीकु को नही ना को कंटकु वैराई ॥
निहचल राजु है सदा तिसु केरा ना आवै ना जाई ॥
अनदिनु सेवकु सेवा करे हरि सचे के गुण गाई ॥
नानकु वेखि विगसिआ हरि सचे की वडिआई ॥2॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।

हिन्दी अर्थ: परमात्मा पति सारे घटों को भोगता है (भाव।सारे शरीरों में व्यापक है) और निर्लिप भी है।इस अलख प्रभू की समझ नहीं पड़ती। (जिस मनुष्य को) पूरे सतिगुरू ने (उस अलख प्रभू के) दर्शन करवा दिए।उसको सतिगुरू के शबद द्वारा समझ पड़ गई; जिन मनुष्यों ने शबद के माध्यम से अहंकार दूर किया है।जो प्रभू पुरुख को जपते हैं।वे भी उस पुरुष का रूप हो जाते हैं। उस अलख हरी का कोई शरीक नहीं।ना ही कोई दुखी करने वाला (काँटा) उस का वैरी है; उसका राज सदा अटल है।ना वह पैदा होता है ना मरता है। (सच्चा) सेवक उस सच्चे हरी की सिफत सालाह करके हर वक्त उसका सिमरन करता है; नानक (भी उस) सच्चे की महिमा देख के प्रसन्न हो रहा है। 2।
पउड़ी ॥
जिन कै हरि नामु वसिआ सद हिरदै हरि नामो तिन कंउ रखणहारा ॥
हरि नामु पिता हरि नामो माता हरि नामु सखाई मित्रु हमारा ॥
हरि नावै नालि गला हरि नावै नालि मसलति हरि नामु हमारी करदा नित सारा ॥
हरि नामु हमारी संगति अति पिआरी हरि नामु कुलु हरि नामु परवारा ॥
जन नानक कंउ हरि नामु हरि गुरि दीआ हरि हलति पलति सदा करे निसतारा ॥15॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी। जिन मनुष्यों के दिल में सदैव हरी नाम बसता है।उन्हें रखने वाला हरी का नाम ही होता है। (उन्हें विश्वास हो जाता है कि) हरी का नाम ही हमारा माता-पिता है और नाम ही हमारा सखा और मित्र है। हरी के नाम से ही हमारी बातें।और नाम से ही सलाह हैं;नाम ही सदा हमारी सार लेता है; हरी का नाम ही हमारी प्यारी संगति है।और नाम ही हमारा कुल व परिवार है। दास नानक को भी गुरू ने (उस) हरी का नाम दिया है जो इस लोक में और परलोक में पार उतारा करता है। 15।
सलोकु मः 3 ॥
जिन कंउ सतिगुरु भेटिआ से हरि कीरति सदा कमाहि ॥
अचिंतु हरि नामु तिन कै मनि वसिआ सचै सबदि समाहि ॥
कुलु उधारहि आपणा मोख पदवी आपे पाहि ॥
पारब्रहमु तिन कंउ संतुसटु भइआ जो गुर चरनी जन पाहि ॥
जनु नानकु हरि का दासु है करि किरपा हरि लाज रखाहि ॥1॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 3॥ जिन्हें सतिगुरू मिला है।वे सदा हरी की सिफत सालाह करते हैं; चिंता से विहीन (करने वाले) हरी का नाम उनके मन में बसता है और वह सतिगुरू के सच्चे शबद में लीन रहते हैं। वह मनुष्य अपने कुल का उद्धार कर लेते हैं और खुद भी मुक्ति का रुतबा हासिल कर लेते हैं। जो मनुष्य सतिगुरू के चरणों में लगते हैं।उन पर परमात्मा प्रसन्न हो जाता है। दास नानक (भी) उस हरी का दास है।हरी मेहर करके (अपने दास की) लाज रखता है। 1।
मः 3 ॥
हंउमै अंदरि खड़कु है खड़के खड़कि विहाइ ॥
हंउमै वडा रोगु है मरि जंमै आवै जाइ ॥
जिन कउ पूरबि लिखिआ तिना सतगुरु मिलिआ प्रभु आइ ॥
नानक गुर परसादी उबरे हउमै सबदि जलाइ ॥2॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।

हिन्दी अर्थ: महला 3॥ अहंकार में रहने से मनुष्य के मन में अशांति बनी रहती है और उसकी उम्र इस अशांति में ही गुजर जाती है; अहंकार (मनुष्य के लिए) एक बहुत बड़ा रोग है (इस रोग में ही) मनुष्य मरता है।पैदा होता है।आता है फिर जाता है (भाव।जनम-मरन के चक्कर में पड़ा रहता है)। जिनके दिल में शुरू से ही (किए कर्मों के संस्कार-रूपी लेख) उकरे हुए हैं।उनको सतिगुरू मिलता है (और सतिगुरू के मिलने से) परमात्मा (भी) आ मिलता है; हे नानक ! वह मनुष्य सतिगुरू के शबद द्वारा अहंकार को दूर करके सतिगुरू की कृपा से (‘अहम् रोग’ से) बच जाते हैं। 2।
पउड़ी ॥
हरि नामु हमारा प्रभु अबिगतु अगोचरु अबिनासी पुरखु बिधाता ॥
हरि नामु हम स्रेवह हरि नामु हम पूजह हरि नामे ही मनु राता ॥
हरि नामै जेवडु कोई अवरु न सूझै हरि नामो अंति छडाता ॥
हरि नामु दीआ गुरि परउपकारी धनु धंनु गुरू का पिता माता ॥
हंउ सतिगुर अपुणे कंउ सदा नमसकारी जितु मिलिऐ हरि नामु मै जाता ॥16॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ जो हरी अदृष्य है।जो इन्द्रियों की पहुँच से परे है।नाश से रहित है।हर जगह व्यापक है और सृजनहार है।उसका नाम हमारा (रक्षक) है; हम उस हरी-नाम की सेवा करते हैं।नाम को पूजते हैं।नाम में ही हमारा मन रंगा हुआ है। हरी के नाम जितना मुझे और कोई नहीं सूझता।नाम ही आखिरी समय में छुड़वाता है। धन्य है उस परोपकारी सतिगुरू के माता-पिता।जिस गुरू ने हमें नाम बख्शा है। मैं अपने सतिगुरू को सदा नमस्कार करता हूँ।जिसके मिलने से मुझे हरी का नाम समझ आया है। 16।
सलोकु मः 3 ॥
गुरमुखि सेव न कीनीआ हरि नामि न लगो पिआरु ॥
सबदै सादु न आइओ मरि जनमै वारो वार ॥
मनमुखि अंधु न चेतई कितु आइआ सैसारि ॥
नानक जिन कउ नदरि करे से गुरमुखि लंघे पारि ॥1॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 3॥ अंधे मनमुख ने सतिगुरू के सन्मुख हो के ना सेवा की।ना परमात्मा के नाम में उसका प्यार ही लगा। शबद में रस भी न आया।(तभी तो) घड़ी-पल पैदा होता मरता है; अगर अंधा मनुष्य हरी को याद नहीं करता तो संसार में आने का भी क्या लाभ (उसने क्या कमाया) । हे नानक ! जिन मनुष्यों पे मेहर की नजर करता है।वह सतिगुरू के सन्मुख हो के (संसार सागर से) पार उतरते हैं। 1।
मः 3 ॥
इको सतिगुरु जागता होरु जगु सूता मोहि पिआसि ॥
सतिगुरु सेवनि जागंनि से जो रते सचि नामि गुणतासि ॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।

हिन्दी अर्थ: महला 3॥ एक सतिगुरू ही सचेत है।और सारा संसार (माया के) मोह में तृष्णा में सोया हुआ है; जो मनुष्य सतिगुरू की सेवा करते हैं और गुणों के खजाने सच्चे नाम में रंगे हुए हैं।(वे) जागते हैं।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।

अमरदास जी ने एक ऐसी उम्र में गुरु-गद्दी पायी जब अधिकांश लोग रिटायर हो जाते हैं। उनकी रचनाओं में एक बड़े आदमी की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध उनका सीधा रुख़ बाद की सिख-परम्परा का foundational-वाक्य बना।

इस अंग पर 7 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “परमात्मा पति सारे घटों को भोगता है (भाव।”

इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।