हुकमे जंमणु हुकमे मरणा ॥2॥
नामु तेरा मन तन आधारी ॥
नानक दासु बखसीस तुमारी ॥3॥8॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
मेरै अंतरि लोचा मिलण की पिआरे हउ किउ पाई गुर पूरे ॥
जे सउ खेल खेलाईऐ बालकु रहि न सकै बिनु खीरे ॥
मेरै अंतरि भुख न उतरै अंमाली जे सउ भोजन मै नीरे ॥
मेरै मनि तनि प्रेमु पिरंम का बिनु दरसन किउ मनु धीरे ॥1॥
सुणि सजण मेरे प्रीतम भाई मै मेलिहु मित्रु सुखदाता ॥
ओहु जीअ की मेरी सभ बेदन जाणै नित सुणावै हरि कीआ बाता ॥
हउ इकु खिनु तिसु बिनु रहि न सका जिउ चात्रिकु जल कउ बिललाता ॥
हउ किआ गुण तेरे सारि समाली मै निरगुण कउ रखि लेता ॥2॥
हउ भई उडीणी कंत कउ अंमाली सो पिरु कदि नैणी देखा ॥
सभि रस भोगण विसरे बिनु पिर कितै न लेखा ॥
इहु कापड़ु तनि न सुखावई करि न सकउ हउ वेसा ॥
जिनी सखी लालु राविआ पिआरा तिन आगै हम आदेसा ॥3॥
मै सभि सीगार बणाइआ अंमाली बिनु पिर कामि न आए ॥
जा सहि बात न पुछीआ अंमाली ता बिरथा जोबनु सभु जाए ॥
धनु धनु ते सोहागणी अंमाली जिन सहु रहिआ समाए ॥
हउ वारिआ तिन सोहागणी अंमाली तिन के धोवा सद पाए ॥4॥
जिचरु दूजा भरमु सा अंमाली तिचरु मै जाणिआ प्रभु दूरे ॥
जा मिलिआ पूरा सतिगुरू अंमाली ता आसा मनसा सभ पूरे ॥
मै सरब सुखा सुख पाइआ अंमाली पिरु सरब रहिआ भरपूरे ॥
जन नानक हरि रंगु माणिआ अंमाली गुर सतिगुर कै लगि पैरे ॥5॥1॥9॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
सची बाणी सचु धुनि सचु सबदु वीचारा ॥
अनदिनु सचु सलाहणा धनु धनु वडभाग हमारा ॥1॥
मन मेरे साचे नाम विटहु बलि जाउ ॥
दासनि दासा होइ रहहि ता पावहि सचा नाउ ॥1॥ रहाउ ॥
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।
अर्जन देव जी एक compiler-कवि थे। उन्होंने अपने पूर्ववर्ती चार गुरुओं की वाणी, पन्द्रह हिन्दू भगतों की वाणी, ग्यारह भट्ट कवियों की प्रशंसा-वाणी, और अपनी स्वयं की सबसे बड़ी रचना-संख्या को एक साथ रख कर ग्रंथ का प्रथम-संकलन पूरा किया। यह क्षण सिख-इतिहास में 1604 का है।
इस अंग पर 3 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे प्रभू ! आप खुद ही (जगत-रचना का) सबब (बनाने वाला) है।”
इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।