Lulla Family

अंग 571

अंग
571
राग Vadhans
राग: Vadhans · रचयिता: Guru Amar Daas Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
माइआ मोहु अंतरि मलु लागै माइआ के वापारा राम ॥
माइआ के वापारा जगति पिआरा आवणि जाणि दुखु पाई ॥
बिखु का कीड़ा बिखु सिउ लागा बिस्टा माहि समाई ॥
जो धुरि लिखिआ सोइ कमावै कोइ न मेटणहारा ॥
नानक नामि रते तिन सदा सुखु पाइआ होरि मूरख कूकि मुए गावारा ॥3॥
माइआ मोहि मनु रंगिआ मोहि सुधि न काई राम ॥
गुरमुखि इहु मनु रंगीऐ दूजा रंगु जाई राम ॥
दूजा रंगु जाई साचि समाई सचि भरे भंडारा ॥
गुरमुखि होवै सोई बूझै सचि सवारणहारा ॥
आपे मेले सो हरि मिलै होरु कहणा किछू न जाए ॥
नानक विणु नावै भरमि भुलाइआ इकि नामि रते रंगु लाए ॥4॥5॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।

हिन्दी अर्थ: इनके अपने अंदर तो माया का मोह (प्रबल) है।(इनके अपने मन को तो माया की) मैल लगी रहती है।(इनके सारे उपदेश) माया के ही व्यापार हैं। (ऐसे मनुष्य को) जगत में (ये धर्म उपदेश) माया के व्यापार (की तरह ही) प्यारे हैं।(औरों को उपदेश करता है।पर स्वयं) जनम-मरन के चक्र में दुख पाता रहता है। (ऐसा मनुष्य सारी उम्र आत्मिक मौत लाने वाला मोह-) जहर का कीड़ा बना रहता है।इसी जहर से चिपका रहता है।इसी गंद में आत्मिक जीवन समाप्त कर लेता है। (परमात्मा ने ऐसे मनुष्य के पिछले किए कर्मों के अनुसार) जो कुछ धुर से (उसके माथे पर) लिख दिया है (जगत में आ के) ये वही कुछ कमाता रहता है।कोई मनुष्य (उसके माथे के उन लेखों को) मिटा नहीं सकता। हे नानक ! जो मनुष्य माया के नाम-रंग में रंगे रहते हैं वे सदा ही आनंद भोगते हैं।बाकी के वो मूर्ख हैं गवार हैं जो औरों को उपदेश कर करके खुद आत्मिक मौत सहेड़ लेते हैं। 3। हे भाई ! माया के मोह में (इस मनुष्य का) मन रंगा जाता है।मोह में (फस के उसको आत्मिक जीवन की) कोई समझ नहीं आती। अगर इस मन को गुरू की शरण पड़ के (नाम-रंग से) रंग लिया जाए।तो (इससे) माया के मोह का रंग उतर जाता है। (जब मनुष्य के मन से) माया के मोह का रंग उतर जाता है।तब (मनुष्य) सदा-स्थिर हरी नाम में लीन हो जाता है। सदा स्थिर हरी नाम धन से (उसके आत्मिक) खजाने भरे जाते हैं। हे भाई ! जो मनुष्य गुरू के सन्मुख रहता है वही (इस भेद को) समझता है।वह सदा-स्थिर हरी-नाम से अपने जीवन को सुंदर बना लेता है। पर। हे भाई ! जिस मनुष्य को परमात्मा खुद (अपने साथ) मिलाता है वही परमात्मा को मिल सकता है (परमात्मा की अपनी मेहर के अतिरिक्त) और कोई उपाय बताया नहीं जा सकता। हे नानक ! जगत।नाम के बिना भटकना में पड़ के गलत राह पर पड़ा रहता है।कई ऐसे भी हैं जो (प्रभू चरणों से) प्रीति जोड़ के प्रभू के नाम-रंग में रंगे रहते हैं। 4। 5।
वडहंसु महला 3 ॥
ए मन मेरिआ आवा गउणु संसारु है अंति सचि निबेड़ा राम ॥
आपे सचा बखसि लए फिरि होइ न फेरा राम ॥
फिरि होइ न फेरा अंति सचि निबेड़ा गुरमुखि मिलै वडिआई ॥
साचै रंगि राते सहजे माते सहजे रहे समाई ॥
सचा मनि भाइआ सचु वसाइआ सबदि रते अंति निबेरा ॥
नानक नामि रते से सचि समाणे बहुरि न भवजलि फेरा ॥1॥
माइआ मोहु सभु बरलु है दूजै भाइ खुआई राम ॥
माता पिता सभु हेतु है हेते पलचाई राम ॥
हेते पलचाई पुरबि कमाई मेटि न सकै कोई ॥
जिनि स्रिसटि साजी सो करि वेखै तिसु जेवडु अवरु न कोई ॥
मनमुखि अंधा तपि तपि खपै बिनु सबदै सांति न आई ॥
नानक बिनु नावै सभु कोई भुला माइआ मोहि खुआई ॥2॥
एहु जगु जलता देखि कै भजि पए हरि सरणाई राम ॥
अरदासि करंी गुर पूरे आगै रखि लेवहु देहु वडाई राम ॥
रखि लेवहु सरणाई हरि नामु वडाई तुधु जेवडु अवरु न दाता ॥
सेवा लागे से वडभागे जुगि जुगि एको जाता ॥
जतु सतु संजमु करम कमावै बिनु गुर गति नही पाई ॥
नानक तिस नो सबदु बुझाए जो जाइ पवै हरि सरणाई ॥3॥
जो हरि मति देइ सा ऊपजै होर मति न काई राम ॥
अंतरि बाहरि एकु तू आपे देहि बुझाई राम ॥
आपे देहि बुझाई अवर न भाई गुरमुखि हरि रसु चाखिआ ॥
दरि साचै सदा है साचा साचै सबदि सुभाखिआ ॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।

हिन्दी अर्थ: वडहंसु महला 3 ॥ हे मेरे मन ! जगत (का मोह जीव के वास्ते) जनम-मरन (के चक्कर लाता) है।आखिर सदा कायम रहने वाले परमात्मा में जुड़ने से (जनम-मरण के चक्कर का) खात्मा हो जाता है। जिस मनुष्य को सदा स्थिर रहने वाला प्रभू खुद ही बख्शता है उसको जगत में बार बार फेरा नहीं डालना पड़ता। उसको बार बार जनम मरण के चक्कर नहीं मिलते। सदा स्थिर हरी-नाम में रंगे जाते हैं।वे आत्मिक अडोलता में मस्त रहते हैं।और आत्मिक अडोलता के द्वारा ही परमात्मा में लीन हो जाते हैं। हे मेरे मन ! जिन मनुष्यों को सदा स्थिर रहने वाला प्रभू प्यारा लगने लग जाता है।जो मनुष्य सदा स्थिर प्रभू को अपने मन में बसा लेते हैं।जो मनुष्य गुरू के शबद में रंगे जाते हैं।उनके जनम-मरण का आखिर खात्मा हो जाता है। हे नानक ! प्रभू के नाम-रंग में रंगे हुए मनुष्य सदा-स्थिर प्रभू में लीन हो जाते हैं।उनको संसार-समुंद्र में बार-बार फेरा नहीं डालना पड़ता। 1। माया का मोह पूरी तरह पागलपन है (जो दुनिया को चिपका हुआ है।दुनिया इस) माया के मोह में सही रास्ते से टूटती जा रही है। (ये मेरी) माँ (है।ये मेरा) पिता (है।ये मेरी स्त्री है।ये मेरा पुत्र है’ ये भी) निरा मोह है।इस मोह में ही दुनिया उलझी पड़ी है। पूबर्लि जनम में किए कर्मों के अनुसार (दुनिया संन्धियों के) मोह में फँसी रहती है।(अपनी किसी समझदारी-चतुराई से पूबर्लि कर्मों के संस्कारों को) कोई मनुष्य मिटा नहीं सकता। जिस करतार ने ये सृष्टि पैदा की है।वह यह माया का मोह रच के (तमाशा) देख रहा है (कोई उसके रास्ते पर रुकावट नहीं खड़ी कर सकता।क्योंकि) उसके बराबर का कोई और नहीं। अपने मन के पीछे चलने वाला मनुष्य माया के मोह में अंधा हो के (मोह में) जल-जल के दुखी होता है।गुरू के शबद के बिना उसको शांति नहीं मिल सकती। हे नानक ! परमात्मा के नाम के बिना हरेक जीव गलत रास्ते पर पड़ा हुआ है।माया के मोह के कारण सही जीवन राह से टूटा हुआ है। 2। हे भाई ! इस संसार को (विकारों में) जलता देख के (जो मनुष्य) दौड़ के परमात्मा की शरण जा पड़ते हैं (वे जलने से बच जाते हैं)। मैं (भी) पूरे गुरू के आगे अरजोई करता हूँ- मुझे (विकारों में जलने से) बचा ले। मुझे (ये) बड़प्पन बख्श।मुझे अपनी शरण में रख परमात्मा का नाम जपने की वडिआई बख्श।ये दाति बख्शने की समर्था रखने वाला आपके जितना और कोई नहीं। हे भाई ! जो मनुष्य परमात्मा की सेवा भक्ति में लगते हैं।वे बहुत भाग्यशाली हैं।वह उस परमात्मा के साथ गहरी सांझ डाल लेते हैं जो हरेक युग में एक स्वयं ही स्वयं है। (हे भाई ! जो कोई मनुष्य) जत सत संजम (आदि) कर्म करता है (उसका ये उद्यम व्यर्थ जाता है)।गुरू की शरण पड़े बिना ऊँची आत्मिक अवस्था प्राप्त नहीं हो सकती। हे नानक ! जो मनुष्य परमात्मा की शरण जा पड़ता है।परमात्मा उसको गुरू का शबद समझने की दाति बख्शता है। 3। हे भाई ! परमात्मा जो बुद्धि (मनुष्य को) देता है (उसके अंदर) वही मति प्रकट होती है।(प्रभू की दी हुई मति के बिना) और कोई मति (मनुष्य ग्रहण) नहीं (कर सकता)। हे प्रभू ! (हरेक जीव के) अंदर और बाहर सिर्फ आप ही आप बसता है।आप खुद ही जीव को समझ बख्शता है। (हे प्रभू !) आप खुद ही (जीव को) अक्ल देता है (आपकी दी हुई अक्ल के बिना) कोई और (अकल जीव को) पसंद ही नहीं आ सकती।(तभी तो।हे भाई !) गुरू की शरण पड़ने वाला मनुष्य परमात्मा के नाम का स्वाद चखता है। गुरू के शबद के माध्यम से जो मनुष्य सदा स्थिर प्रभू की सिफत सालाह करता है।वह सदा-स्थिर प्रभू के दर पर सदा अडोल-चित्त टिका रहता है।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।

गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर वर्ष की आयु में गुरु-गद्दी सँभाली, 1552 में, और 1574 तक रहे। उनकी वाणी में बुढ़ापे, समाज की संरचना, और संगति की चिन्ताएँ बार-बार लौटती हैं। उन्होंने ही लंगर (साझा-भोजन) की व्यवस्था मज़बूत की, और देश-भर में बाईस मंजी (केन्द्र) स्थापित किए।

इस अंग पर दो शबद बैठे हैं, एक के बाद दूसरा। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “इनके अपने अंदर तो माया का मोह (प्रबल) है।”

बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।