नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।
हिन्दी अर्थ: प्रभू की हजूरी में वही बंदे सूरमे कहे जाते हैं। वही बंदे सदा स्थिर प्रभू की दरगाह में आदर पाते हैं। वे दरगाह में सम्मान पाते हैं।सम्मान से (यहाँ से) जाते हैं और आगे परलोक में उन्हें कोई दुख नहीं व्यप्तता। वे लोग परमात्मा को (हर जगह) व्यापक समझ के सिमरते हैं।उस प्रभू के दर से फल प्राप्त करते हैं जिसका सिमरन करने से (हरेक किस्म का) डर दूर हो जाता है। (हे भाई !) अहंकार के बोल नहीं बोलने चाहिए।अपने आप को काबू में रखना चाहिए।वह अंतरजामी प्रभू हरेक के दिल की खुद ही जानता है। जो मनुष्य (जीते जी ही प्रभू की नजरों में) कबूल हो के मरते हैं वे शूरवीर है।उनका मरना (लोक-परलोक में) सराहा जाता है। 3। हे नानक ! (कह) हे भाई ! ये जगत एक खेल है (खेल बनती-बिगड़ती ही रहती है) किसी के मरने पर रोना व्यर्थ है। मालिक प्रभू अपने पैदा किए जगत की स्वयं ही संभाल करता है।अपनी रची हुई रचना का खुद ही ध्यान रखता है। प्रभू अपनी रची रचना का ख्याल रखता है।इसको आसरा सहारा देता है।जिसने जगत रचा है वही इसकी जरूरतें भी जानता है। प्रभू स्वयं ही सबके किए कर्मों को देखता है।खुद ही सबके दिलों की समझता है।खुद ही अपने हुकम को पहचानता है (कि कैसे ये हुकम जगत में बरता जाना है)। जिस प्रभू ने ये जगत-रचना की हुई है वही इसकी जरूरतें (भी) जानता है।उस प्रभू का स्वरूप बेअंत है। हे नानक ! (कह) हे भाई ! ये जगत एक खेल है (यहाँ जो घड़ा गया है उसने टूटना भी है) किसी के मरने पर रोना व्यर्थ है। 4। 2।
नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।
हिन्दी अर्थ: वडहंसु महला 1 दखणी ॥ (हे भाई !) निष्चय करो कि जगत को पैदा करने वाला परमात्मा ही सदा स्थिर रहने वाला है।वह सदा स्थिर प्रभू (जीवों की) पालना करने वाला है। जिस सदा स्थिर ने खुद ही अपने आप को (जगत के रूप में) प्रकट किया हुआ है।वह अदृश्य है और बेअंत है। (धरती और आकाश जगत के) दोनों पुड़ जोड़ के (भाव।जगत रचना करके) उस प्रभू ने जीवों को माया के मोह में फसा के अपने से विछोड़ दिया है (भाव।ये प्रभू की रजा है कि जीव मोह में फस के प्रभू को भुला बैठे हैं)।गुरू के बिना (जगत में माया के मोह का) घोर अंधेरा है। उस परमात्मा ने ही सूरज और चंद्रमा बनाए हैं।(सूर्य) दिन के समय (चंद्रमा) रात को (प्रकाश देता है)।(हे भाई !) याद रख कि प्रभू का बनाया हुआ ये जगत तमाशा है। 1। हे प्रभू ! आप सदा ही स्थिर रहने वाला मालिक है।आप खुद ही सब जीवों को सदा स्थिर रहने वाले प्यार की दाति देता है।रहाउ। हे प्रभू ! तूने ही सृष्टि पैदा की है (जीवों को) दुख और सुख देने वाला भी आप ही है। (जगत में) सि्त्रयां और मर्द भी तूने ही पैदा किए है।माया जहर का मोह और प्यार भी तूने ही बनाए हैं। जीव उत्पक्ति की चार खाणियां और जीवों की बोलियां भी आपकी ही रची हुई हैं।सब जीवों को आप ही आसरा देता है। हे प्रभू ! ये सारी रचना (-रूप) तख़त तूने (अपने बैठने के लिए) बनाया है।अपने सदा स्थिर नाम में (जोड़ के जीवों के कर्मों के लेख भी) आप खुद ही खत्म करने वाला है। 2। हे करणहार करतार ! (जीवों के लिए) जनम-मरण का चक्कर तूने ही पैदा किया है।पर आप खुद सदा कायम रहने वाला है (आपको ये चक्कर व्याप नहीं सकता)। (माया के मोह के कारण) विकारों में बँधा हुआ जीव नित्य पैदा होता है और मरता है।इसे जनम-मरण का चक्कर पड़ा ही रहता है। (माया के मोह में फंसे) बुरे जीव ने (आपका) नाम भुला दिया है।मोह में डूबे हुए की कोई पेश नहीं चलती। गुणों को छोड़ के (विकारों का) जहर इस जीव ने एकत्र कर लिया है (जगत में आ के सारी उम्र) अवगुणों का ही बणज करता रहता है। 3। जब सदा स्थिर रहने वाले करतार के हुकम में उन प्यारों को (यहाँ से कूच करने के) बुलावे आते हैं (जो यहाँ इकट्ठे जीवन निर्बाह कर रहे होते हैं) तो (एक साथ रहने वाले) स्त्री-मर्दों के विछोड़े हो जाते हैं (इस विछोड़े को कोई मिटा नहीं सकता)। विछुड़ों को तो परमात्मा खुद ही मिलाने में समर्थ है। यमराज के सिर पर भी परमात्मा के हुकम में ही (मौत के माध्यम से जीवों के विछोड़े करने की) जिंमेदारी सौंपी गई है। कोई यम किसी सुंदरी के रूप की परवाह नहीं कर सकता (कि इस सुंदरी की मौत ना लाऊँ)। यम बच्चों और बुढों की भी परवाह नहीं करते।सब का (आपस में) मोह प्यार तोड़ देते हैं। 4। जब सदा स्थिर रहने वाले परमात्मा के हुकम में (मौत का बुलावा आता है तो शरीर के) नौ दरवाजे बंद हो जाते हैं।जीवात्मा (कहीं) आकाश में चली जाती है। (जिस स्त्री का पति मर जाता है) वह स्त्री अकेली रह जाती है।वह माया के मोह में लुट चुकी होती है।वह विधवा हो जाती है (उसके पति की) लाश घर के आंगन में पड़ी होती है (जिसे देख-देख के) वह स्त्री दहलीजों में बैठी रोती है (और कहती है) हे माँ ! इस मौत (को देख के) मेरी अक्ल ठिकाने नहीं रह गई। हे प्रभू-पति की सि्त्रयो ! (हे जीव-सि्त्रयो ! शरीर के विछोड़े का ये सिलसिला बना ही रहना है।किसी ने भी यहाँ सदा बैठे नहीं रहना) आप सदा स्थिर रहने वाले परमात्मा की सिफत सालाह हृदय में संभाल के (प्रभू-कंत को याद करके) वैराग अवस्था में आएँ (तब ही जीवन सफल होगा)। साक-संबंधी (मरे हुए प्राणी की लाश को) मल-मल के स्नान करवाते हैं।और रेशम (आदि) कपड़े से (लपेटते हैं)। (उसे शमशान में ले जाने के लिए) ‘राम नाम सत्य है’ के बोल शुरू हो जाते हैं (माता।पिता भाई।पुत्र।स्त्री आदि) निकटवर्ती दुख में मृतक समान हो जाते हैं। (उसकी स्त्री रोती है और कहती है) साथी के मरने से मैं भी मरे जैसी हो गई हूँ।अब संसार में मेरे जीने को भी धिक्कार है। (पर ये मोह तो अवश्य ही दुखदाई है।ये शारीरिक विछोड़े तो होने ही हैं।हाँ) जो जीव।सदा स्थिर रहने वाले परमात्मा के प्यार में प्रेम में टिक के जगत में कार्य-व्यवहार करते हुए ही मोह से मरता (मुक्त रहता) है।वह (परमात्मा की हजूरी में) आदर पाता है। 6। हे जीव-सि्त्रयो ! जब तक संसार में आपको माया के मोह ने ठगा हुआ है।आप दुखी ही रहोगी।(यही समझा जाएगा कि) आप दुखी होने के लिए ही जगत में आई हैं।
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।
नानक की रचनाओं में एक खास तरह की आबजर्वेशनल आँख है। एक पटवारी का पेशा छोड़ कर तीस के बाद के दशकों में वो काबुल, मक्का, अरब, असम, श्रीलंका, और तिब्बत की सरहद तक गए। हर जगह संत-फ़क़ीरों, बादशाहों, और साधारण किसानों से बातचीत की, और उसी बातचीत की पर्तें इन शबदों में बैठी हैं।
इस अंग पर दो शबद बैठे हैं, एक के बाद दूसरा। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “प्रभू की हजूरी में वही बंदे सूरमे कहे जाते हैं।”
इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।