ੴ सति नामु करता पुरखु निरभउ निरवैरु अकाल मूरति अजूनी सैभं गुर प्रसादि ॥ रागु वडहंसु महला 1 घरु 1 ॥ अमली अमलु न अंबड़ै मछी नीरु न होइ ॥ जो रते सहि आपणै तिन भावै सभु कोइ ॥1॥ हउ वारी वंञा खंनीऐ वंञा तउ साहिब के नावै ॥1॥ रहाउ ॥ साहिबु सफलिओ रुखड़ा अंम्रितु जा का नाउ ॥ जिन पीआ ते त्रिपत भए हउ तिन बलिहारै जाउ ॥2॥ मै की नदरि न आवही वसहि हभीआं नालि ॥ तिखा तिहाइआ किउ लहै जा सर भीतरि पालि ॥3॥ नानकु तेरा बाणीआ तू साहिबु मै रासि ॥ मन ते धोखा ता लहै जा सिफति करी अरदासि ॥4॥1॥
नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।
हिन्दी अर्थ: परमेश्वर एक है, उसका नाम सत्य है, वह समूची सृष्टि-मानव जाति को बनाने वाला है, वह सर्वशक्तिमान है, वह निडर है, उसकी किसी से शत्रुता नहीं अर्थात् प्रेम की मूर्ति है), वह कालातीत, वह जन्म-मरण से रहित है, वह स्वतः प्रकाशमान हुआ है और गुरु-कृपा से लब्धि होती है। रागु वडहंसु महला 1 घरु 1 ॥ (अफीमी आदि) अमली को अगर (अफीम आदि) अमल (नशा) ना मिले (तो वह मर जाता है)।अगर मछली को पानी ना मिले (तो वह तड़प उठती है।इसी तरह। अगर प्रभू ! आपका नाम जिनकी जिंदगी का सहारा बन गया है वे आपकी याद के बिना नहीं रह सकते।उनको कुछ भी अच्छा नहीं लगता)। जो लोग अपने पति-प्रभू के प्यार में रंगे हुए हैं (वह अंदर से खिले हुए हैं) उन्हें हर कोई अच्छा लगता है। 1। हे मेरे साहिब ! मैं आपके नाम से सदके हूँ।कुर्बान जाता हूँ। 1।रहाउ। (हमारा) मालिक प्रभू फलों वाला एक सोहणा वृक्ष (है समझ लें)।इस वृक्ष का फल है उसका ‘नाम’ जो (जीव को) अटल आत्मिक जीवन देने वाला (रस अमृत) है। जिन्होंने ये रस पीया है वे (मायावी पदार्थों की भूख-प्यास से) तृप्त हो जाते हैं।मैं उनसे कुर्बान जाता हूँ। 2। (हे प्रभू !) आप सब जीवों के अंग-संग बसता है।पर आप मुझे नहीं दिखता। (जीव का ये कितना बड़ा दुर्भाग्य है कि उसके अपने अंदर ही पानी का सरोवर हो और वह प्यासा तड़पता फिरे ! पर) प्यास से तड़प रहे को (पानी) मिले भी कैसे।जब उसके और (उसके अंदर के) सरोवर के बीच दीवार बनी हो।(माया के मोह की बनी कोई दीवार अमृत सरोवर में से नाम-जल तक पहुँचने नहीं देती)। 3। (हे प्रभू ! मेहर कर।आपका दास) आपके नाम का बंजारा बन जाए।आप मेरा शाहु हैं आपका नाम मेरी पूँजी बने। मेरे मन से दुनिया का सहम तब ही दूर हैं सकता है अगर मैं सदा प्रभू की सिफत-सालाह करता रहूँ।अगर उसके दर पर अरदास-आरजू करता रहूँ। 4। 1।
वडहंसु महला 1 ॥ गुणवंती सहु राविआ निरगुणि कूके काइ ॥ जे गुणवंती थी रहै ता भी सहु रावण जाइ ॥1॥ मेरा कंतु रीसालू की धन अवरा रावे जी ॥1॥ रहाउ ॥ करणी कामण जे थीऐ जे मनु धागा होइ ॥ माणकु मुलि न पाईऐ लीजै चिति परोइ ॥2॥ राहु दसाई न जुलां आखां अंमड़ीआसु ॥ तै सह नालि अकूअणा किउ थीवै घर वासु ॥3॥ नानक एकी बाहरा दूजा नाही कोइ ॥ तै सह लगी जे रहै भी सहु रावै सोइ ॥4॥2॥
गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।
हिन्दी अर्थ: वडहंसु महला 1 ॥ जिस जीव-स्त्री के पास ये गुण है (जिस जीव-स्त्री को ये विश्वास है कि प्रभू ही सुखों का सोमा है।वह) प्रभू-पति (का पल्ला पकड़ के उस) को प्रसन्न कर लेती है (और आत्मिक सुख हासिल करती है) पर जिसके पल्ले ये गुण नहीं है (और जो जगह-जगह भटकती फिरती है) वह (आत्मिक सुख के लिए) व्यर्थ ही तरले लेती है।हाँ। अगर उसके अंदर भी ये गुण आ जाए।तो पति-प्रभू को प्रसन्न करने का सफल उद्यम कर सकती है। 1। हे बहन ! (जिस जीव-स्त्री को ये विश्वास हो जाए कि) मेरा पति-प्रभू सारे सुखों का श्रोत है।वह (पति-प्रभू को छोड़ के) औरों को (सुखों का साधन समझ के) प्रसन्न करने नहीं जाती। 1।रहाउ। अगर जीव-स्त्री का ऊँचा आचरण कामण डालने (पति को वश में करने वाले गीत) का काम करे।अगर वह मन धागा बने तो इस मन के धागे से उस नाम-मोती को अपने चित्त में परो ले (धन-पदार्थ आदि किसी) मूल्य से नहीं मिल सकता। 2। (पर। निरी बातों से।हे सुख सागर ! आपके चरणों में पहुँचा जा सकता) हे पति-प्रभू ! अगर मैं (आपके देश का) हमेशा रास्ता ही पूछती रहूँ।पर उस रास्ते पर चलूँ ही ना।मुँह से कहे जाऊँ कि मैं (आपके देश तक) पहुँच गई हूँ। वैसे कभी आपके साथ बोलचाल (अपना पन) ना बनाया हैं (कभी आपके दर पर अरदास भी ना की हो)।इस तरह आपके चरणों में ठिकाना नहीं मिल सकता। 3। हे नानक ! (ये यकीन जानो कि) एक परमात्मा के बिना और कोई भी सुखदाता नहीं। (इसलिए उसके दर पे अरदास कर और कह) हे प्रभू पति ! जो जीव-स्त्री आपके चरणों में जुड़ी रहती है वह आपको प्रसन्न कर लेती है (और आत्मिक सुख पाती है)। 4। 2।
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।
हिन्दी अर्थ: वडहंसु महला 1 घरु 2 ॥ हे बहन ! सावन (का महीना) आ गया है (सावन की काली घटाएं देख के सुहाने) मोरों ने मीठे गीत आरम्भ कर दिए हैं (और नाचना शुरू कर दिया हैं)। (हे प्रभू !) आपकी ये सोहानी कुदरत मुझ जीव-स्त्री के लिए।जैसे।कटार है (जो मेरे अंदर विरहा की चोट कर रही है)।फाही है।इसने मुझे आपके दीदार की प्रेमिका को मोह लिया है (और मुझे आपके चरणों की तरफ खींचती जा रही है)। (हे प्रभू !) आपके इस सोहाने स्वरूप से जो अब दिख रहा है मैं सदके हूँ मैं सदके हूँ (आपका ये स्वरूप मुझे आपका नाम याद करा रहा है।और) मैं आपके नाम से कुर्बान हूँ। (हे प्रभू !) चुँकि आप (इस कुदरत में मुझे दिख रहा है) मैंने ये कहने का हौसला किया है (कि आपकी ये कुदरति सुहावनी है)।अगर कुदरति में आप ही ना दिखे तो ये कहने में क्या स्वाद रह जाए कि कुदरति सुहानी है। हे भोली स्त्री ! (तूने पति को मिलने के लिए अपनी बाँहों में चूड़ा डाला।व और भी कई श्रृंगार किए। पर) हे इतने सारे श्रृंगार करने वाली नारी ! अगर आपका पति (फिर भी) औरों से ही प्यार करता रहा (तो इतने सारे श्रृंगारों के क्या लाभ।फिर) पलंघ से मार-मार के अपना चूड़ा तोड़ दे।
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।
गुरु नानक की वाणी का अपना मिज़ाज है, सीधा-सादा, बिना अलंकार के, मगर हर पंक्ति में एक ठहराव। 1469 में तलवण्डी में जन्म, सुलतानपुर के बहीखाते में कुछ साल काम, फिर तीस की उम्र के क़रीब वो लम्बी पैदल यात्रा जो काबुल, बग़दाद, मक्का, जगन्नाथ-पुरी, तिब्बत की सरहद तक उन्हें ले गयी। उनके शबद इन्हीं यात्राओं की वाणी हैं।
इस अंग पर 3 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “परमेश्वर एक है, उसका नाम सत्य है, वह समूची सृष्टि-मानव जाति को बनाने वाला है, वह सर्वशक्तिमान है, वह निडर है, उसकी किसी से शत्रुता नहीं अर्थात् प्रेम की मूर्ति है), वह कालातीत, वह ।”
एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।